भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 112

अ० २० ] * प्रथम अंश * १०१

प्रह्लाद उवाचप्रह्लादजी बोले—
कृतकृत्योऽस्मि भगवन्वरेणानेन यत्त्वयि।<br>भवित्री त्वत्प्रसादेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ २६<br>धर्मार्थकामैः किं तस्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता।<br>समस्तजगतां मूले यस्य भक्तिः स्थिरा त्वयि ॥ २७हे भगवन्! मैं तो आपके इस वरसे ही कृतकृत्य हो गया कि आपकी कृपासे आपमें मेरी निरन्तर अविचल भक्ति रहेगी ॥ २६ ॥ हे प्रभो ! सम्पूर्ण जगत्‌के कारणरूप आपमें जिसकी निश्चल भक्ति है, मुक्ति भी उसकी मुट्ठीमें रहती है, फिर धर्म, अर्थ, कामसे तो उसे लेना ही क्या है ? ॥ २७ ॥
श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान् बोले—
यथा ते निश्चलं चेतो मयि भक्तिसमन्वितम्।<br>तथा त्वं मत्प्रसादेन निर्वाणं परमाप्स्यसि ॥ २८हे प्रह्लाद! मेरी भक्तिसे युक्त तेरा चित्त जैसा निश्चल है उसके कारण तू मेरी कृपासे परम निर्वाणपद प्राप्त करेगा ॥ २८ ॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुस्तस्य मैत्रेय पश्यतः।<br>स चापि पुनरागम्य ववन्दे चरणौ पितुः ॥ २९<br>तं पिता मूर्घ्न्युपाघ्राय परिष्वज्य च पीडितम्।<br>जीवसीत्याह वत्सेति बाष्पार्द्रनयनो द्विज ॥ ३०<br>प्रीतिमांश्चाऽभवत्तस्मिन्ननुतापी महासुरः।<br>गुरुपित्रोश्चकारैवं शुश्रूषां सोऽपि धर्मवित् ॥ ३१<br>पितर्युपरतिं नीते नरसिंहस्वरूपिणा।<br>विष्णुना सोऽपि दैत्यानां मैत्रेयाभूत्पतिस्ततः ॥ ३२<br>ततो राज्यद्युतिं प्राप्य कर्मशुद्धिकरीं द्विज।<br>पुत्रपौत्रांश्च सुबहूनवाप्यैश्वर्यमेव च ॥ ३३<br>क्षीणाधिकारः स यदा पुण्यपापविवर्जितः।<br>तदा स भगवद्ध्यानात्परं निर्वाणमाप्तवान् ॥ ३४<br>एवंप्रभावो दैत्योऽसौ मैत्रेयासीन्महामतिः।<br>प्रह्लादो भगवद्भक्तो यं त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३५<br>यस्त्वेतच्चरितं तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः।<br>शृणोति तस्य पापानि सद्यो गच्छन्ति सङ्क्षयम् ॥ ३६<br>अहोरात्रकृतं पापं प्रह्लादचरितं नरः।<br>शृण्वन् पठंश्च मैत्रेय व्यपोहति न संशयः ॥ ३७<br>पौर्णमास्याममावास्यामष्टम्यामथ वा पठन्।<br>द्वादश्यां वा तदाप्नोति गोप्रदानफलं द्विज ॥ ३८<br>प्रह्लादं सकलापत्सु यथा रक्षितवान्हरिः।<br>तथा रक्षति यस्तस्य शृणोति चरितं सदा ॥ ३९हे मैत्रेय ! ऐसा कह भगवान् उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये; और उन्होंने भी फिर आकर अपने पिताके चरणोंकी वन्दना की ॥ २९ ॥ हे द्विज ! तब पिता हिरण्यकशिपुने, जिसे नाना प्रकारसे पीड़ित किया था उस पुत्रका सिर सूँघकर, आँखोंमें आँसू भरकर कहा—'बेटा, जीता तो है !' ॥ ३० ॥ वह महान् असुर अपने कियेपर पछताकर फिर प्रह्लादसे प्रेम करने लगा और इसी प्रकार धर्मज्ञ प्रह्लादजी भी अपने गुरु और माता-पिताकी सेवा-शुश्रूषा करने लगे ॥ ३१ ॥ हे मैत्रेय ! तदनन्तर नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा पिताके मारे जानेपर वे दैत्योंके राजा हुए ॥ ३२ ॥ हे द्विज ! फिर प्रारब्धक्षयकारिणी राज्यलक्ष्मी, बहुत-से पुत्र-पौत्रादि तथा परम ऐश्वर्य पाकर, कर्माधिकारके क्षीण होनेपर पुण्य-पापसे रहित हो भगवान्‌का ध्यान करते हुए उन्होंने परम निर्वाणपद प्राप्त किया ॥ ३३-३४ ॥<br>हे मैत्रेय ! जिनके विषयमें तुमने पूछा था वे परम भगवद्भक्त महामति दैत्यप्रवर प्रह्लादजी ऐसे प्रभावशाली हुए ॥ ३५ ॥ उन महात्मा प्रह्लादजीके इस चरित्रको जो पुरुष सुनता है उसके पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ हे मैत्रेय ! इसमें सन्देह नहीं कि मनुष्य प्रह्लाद-चरित्रके सुनने या पढ़नेसे दिन-रातके (निरन्तर) किये हुए पापसे अवश्य छूट जाता है ॥ ३७ ॥ हे द्विज ! पूर्णिमा, अमावास्या, अष्टमी अथवा द्वादशीको इसे पढ़नेसे मनुष्यको गोदानका फल मिलता है ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार भगवान्‌ने प्रह्लादजीकी सम्पूर्ण आपत्तियोंसे रक्षा की थी उसी प्रकार वे सर्वदा उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनका चरित्र सुनता है ॥ ३९ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंऽशे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥