विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० २० ] * प्रथम अंश * १०१
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले— |
|---|---|
| कृतकृत्योऽस्मि भगवन्वरेणानेन यत्त्वयि।<br>भवित्री त्वत्प्रसादेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ २६<br>धर्मार्थकामैः किं तस्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता।<br>समस्तजगतां मूले यस्य भक्तिः स्थिरा त्वयि ॥ २७ | हे भगवन्! मैं तो आपके इस वरसे ही कृतकृत्य हो गया कि आपकी कृपासे आपमें मेरी निरन्तर अविचल भक्ति रहेगी ॥ २६ ॥ हे प्रभो ! सम्पूर्ण जगत्के कारणरूप आपमें जिसकी निश्चल भक्ति है, मुक्ति भी उसकी मुट्ठीमें रहती है, फिर धर्म, अर्थ, कामसे तो उसे लेना ही क्या है ? ॥ २७ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान् बोले— |
| यथा ते निश्चलं चेतो मयि भक्तिसमन्वितम्।<br>तथा त्वं मत्प्रसादेन निर्वाणं परमाप्स्यसि ॥ २८ | हे प्रह्लाद! मेरी भक्तिसे युक्त तेरा चित्त जैसा निश्चल है उसके कारण तू मेरी कृपासे परम निर्वाणपद प्राप्त करेगा ॥ २८ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुस्तस्य मैत्रेय पश्यतः।<br>स चापि पुनरागम्य ववन्दे चरणौ पितुः ॥ २९<br>तं पिता मूर्घ्न्युपाघ्राय परिष्वज्य च पीडितम्।<br>जीवसीत्याह वत्सेति बाष्पार्द्रनयनो द्विज ॥ ३०<br>प्रीतिमांश्चाऽभवत्तस्मिन्ननुतापी महासुरः।<br>गुरुपित्रोश्चकारैवं शुश्रूषां सोऽपि धर्मवित् ॥ ३१<br>पितर्युपरतिं नीते नरसिंहस्वरूपिणा।<br>विष्णुना सोऽपि दैत्यानां मैत्रेयाभूत्पतिस्ततः ॥ ३२<br>ततो राज्यद्युतिं प्राप्य कर्मशुद्धिकरीं द्विज।<br>पुत्रपौत्रांश्च सुबहूनवाप्यैश्वर्यमेव च ॥ ३३<br>क्षीणाधिकारः स यदा पुण्यपापविवर्जितः।<br>तदा स भगवद्ध्यानात्परं निर्वाणमाप्तवान् ॥ ३४<br>एवंप्रभावो दैत्योऽसौ मैत्रेयासीन्महामतिः।<br>प्रह्लादो भगवद्भक्तो यं त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३५<br>यस्त्वेतच्चरितं तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः।<br>शृणोति तस्य पापानि सद्यो गच्छन्ति सङ्क्षयम् ॥ ३६<br>अहोरात्रकृतं पापं प्रह्लादचरितं नरः।<br>शृण्वन् पठंश्च मैत्रेय व्यपोहति न संशयः ॥ ३७<br>पौर्णमास्याममावास्यामष्टम्यामथ वा पठन्।<br>द्वादश्यां वा तदाप्नोति गोप्रदानफलं द्विज ॥ ३८<br>प्रह्लादं सकलापत्सु यथा रक्षितवान्हरिः।<br>तथा रक्षति यस्तस्य शृणोति चरितं सदा ॥ ३९ | हे मैत्रेय ! ऐसा कह भगवान् उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये; और उन्होंने भी फिर आकर अपने पिताके चरणोंकी वन्दना की ॥ २९ ॥ हे द्विज ! तब पिता हिरण्यकशिपुने, जिसे नाना प्रकारसे पीड़ित किया था उस पुत्रका सिर सूँघकर, आँखोंमें आँसू भरकर कहा—'बेटा, जीता तो है !' ॥ ३० ॥ वह महान् असुर अपने कियेपर पछताकर फिर प्रह्लादसे प्रेम करने लगा और इसी प्रकार धर्मज्ञ प्रह्लादजी भी अपने गुरु और माता-पिताकी सेवा-शुश्रूषा करने लगे ॥ ३१ ॥ हे मैत्रेय ! तदनन्तर नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा पिताके मारे जानेपर वे दैत्योंके राजा हुए ॥ ३२ ॥ हे द्विज ! फिर प्रारब्धक्षयकारिणी राज्यलक्ष्मी, बहुत-से पुत्र-पौत्रादि तथा परम ऐश्वर्य पाकर, कर्माधिकारके क्षीण होनेपर पुण्य-पापसे रहित हो भगवान्का ध्यान करते हुए उन्होंने परम निर्वाणपद प्राप्त किया ॥ ३३-३४ ॥<br>हे मैत्रेय ! जिनके विषयमें तुमने पूछा था वे परम भगवद्भक्त महामति दैत्यप्रवर प्रह्लादजी ऐसे प्रभावशाली हुए ॥ ३५ ॥ उन महात्मा प्रह्लादजीके इस चरित्रको जो पुरुष सुनता है उसके पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ हे मैत्रेय ! इसमें सन्देह नहीं कि मनुष्य प्रह्लाद-चरित्रके सुनने या पढ़नेसे दिन-रातके (निरन्तर) किये हुए पापसे अवश्य छूट जाता है ॥ ३७ ॥ हे द्विज ! पूर्णिमा, अमावास्या, अष्टमी अथवा द्वादशीको इसे पढ़नेसे मनुष्यको गोदानका फल मिलता है ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार भगवान्ने प्रह्लादजीकी सम्पूर्ण आपत्तियोंसे रक्षा की थी उसी प्रकार वे सर्वदा उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनका चरित्र सुनता है ॥ ३९ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंऽशे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
१०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१
इक्कीसवाँ अध्याय
कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| संह्लादपुत्र आयुष्माञ्छिबिर्बाष्कल एव च।<br>विरोचनस्तु प्राह्लादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात्॥ १ | संह्लादके पुत्र आयुष्मान् शिबि और बाष्कल थे तथा प्रह्लादके पुत्र विरोचन थे और विरोचनसे बलिका जन्म हुआ॥ १॥ |
| बलेः पुत्रशतं त्वासीद्बाणज्येष्ठं महामुने।<br>हिरण्याक्षसुताश्चासन्सर्व एव महाबलाः॥ २<br>उत्कुरः शकुनिश्चैव भूतसन्तापनस्तथा।<br>महानाभो महाबाहुः कालनाभस्तथापरः॥ ३ | हे महामुने! बलिके सौ पुत्र थे जिनमें बाणासुर सबसे बड़ा था। हिरण्याक्षके पुत्र उत्कुर, शकुनि, भूतसन्तापन, महानाभ, महाबाहु तथा कालनाभ आदि सभी महाबलवान् थे॥ २-३॥ |
| अभवन्द्वनुपुत्राश्च द्विमूर्द्धा शम्बरस्तथा।<br>अयोमुखः शङ्कुशिराः कपिलः शङ्करस्तथा॥ ४<br>एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबलः।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च पुलोमश्च महाबलः॥ ५<br>एते दनोः सुताः ख्याता विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६ | (कश्यपजीकी एक दूसरी स्त्री) दनुके पुत्र द्विमूर्धा, शम्बर, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और परमपराक्रमी विप्रचित्ति थे। ये सब दनुके पुत्र विख्यात हैं॥ ४-६॥ |
| स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>उपदानी हयशिराः प्रख्याता वरकन्यकाः॥ ७ | स्वर्भानुकी कन्या प्रभा थी तथा शर्मिष्ठा, उपदानी और हयशिरा—ये वृषपर्वाकी परम सुन्दरी कन्याएँ विख्यात हैं॥ ७॥ |
| वैश्वानरसुते चोभे पुलोमा कालका तथा।<br>उभे सुते महाभागे मारीचेस्तु परिग्रहः॥ ८ | वैश्वानरकी पुलोमा और कालका दो पुत्रियाँ थीं। हे महाभाग! वे दोनों कन्याएँ मरीचिनन्दन कश्यपजीकी भार्या हुईं॥ ८॥ |
| ताभ्यां पुत्रसहस्राणि षष्टिर्दानवसत्तमाः।<br>पौलोमाः कालकेयाश्च मारीचतनयाः स्मृताः॥ ९ | उनके पुत्र साठ हजार दानव-श्रेष्ठ हुए। मरीचिनन्दन कश्यपजीके वे सभी पुत्र पौलोम और कालकेय कहलाये॥ ९॥ |
| ततोऽपरे महावीर्या दारुणास्त्वतिनिर्घृणाः।<br>सिंहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तथा॥ १० | इनके सिवा विप्रचित्तिके सिंहिकाके गर्भसे और भी बहुत-से महाबलवान्, भयंकर और अतिक्रूर पुत्र उत्पन्न हुए॥ १०॥ |
| व्यंशः शल्यश्च बलवान् नभश्चैव महाबलः।<br>वातापी नमुचिश्चैव इल्वलः खसृमस्तथा॥ ११<br>अन्धको नरकश्चैव कालनाभस्तथैव च।<br>स्वर्भानुश्च महावीर्यो वक्त्रयोधी महासुरः॥ १२ | वे व्यंश, शल्य, बलवान् नभ, महाबली वातापी, नमुचि, इल्वल, खसृम, अन्धक, नरक, कालनाभ, महावीर, स्वर्भानु और महादैत्य वक्त्र योधी थे॥ ११-१२॥ |
| एते वै दानवाः श्रेष्ठा दनुवंशविवर्द्धनाः।<br>एतेषां पुत्रपौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३ | ये सब दानवश्रेष्ठ दनुके वंशको बढ़ानेवाले थे। इनके और भी सैकड़ों-हजारों पुत्र-पौत्रादि हुए॥ १३॥ |
| प्रह्लादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले।<br>समुत्पन्नाः सुमहता तपसा भावितात्मनः॥ १४ | महान् तपस्याद्वारा आत्मज्ञानसम्पन्न दैत्यवर प्रह्लादजीके कुलमें निवातकवच नामक दैत्य उत्पन्न हुए॥ १४॥ |
| षट् सुताः सुमहास्तत्त्वास्ताम्रायाः परिकीर्त्तिताः।<br>शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवीशुचिगृध्रिकाः॥ १५ | कश्यपजीकी स्त्री ताम्राकी शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, शुचि और गृध्रिका—ये छः अति प्रभावशालिनी कन्याएँ कही जाती हैं॥ १५॥ |
अ० २१ ] * प्रथम अंश * १०३
शुकी शुकानजनयदूलूकप्रत्युलूकिकान्।
श्येनी श्येनांस्तथा भासी भासान्गृध्रांश्च गृध्र्यपि॥ १६
शुच्यौदकान्पक्षिगणान्सुग्रीवी तु व्यजायत।
अश्वानुष्ट्रान्गर्दभांश्च ताम्रावंशः प्रकीर्त्तितः॥ १७
विनतायास्तु द्वौ पुत्रौ विख्यातौ गरुडारुणौ।
सुपर्णः पततां श्रेष्ठो दारुणः पन्नगाशनः॥ १८
सुरसायां सहस्रं तु सर्पाणाममितौजसाम्।
अनेकfilterशिरसां ब्रह्मन् खेचराणां महात्मनाम्॥ १९
काद्रवेयास्तु बलिनः सहस्त्रममितौजसः।
सुपर्णवशगा ब्रह्मन् जज्ञिरे नैक मस्तकाः॥ २०
तेषां प्रधानभूतास्तु शेषवासुकितक्षकाः।
शङ्खश्वेतो महापद्मः कम्बलाश्वतरौ तथा॥ २१
एलापुत्रस्तथा नागः कर्कोटकधनञ्जयौ।
एते चान्ये च बहवो दन्दशूका विषोल्बणाः॥ २२
गणं क्रोधवशं विद्धि तस्याः सर्वे च दंष्ट्रिणः।
स्थलजाः पक्षिणोऽब्जाश्च दारुणाः पिशिताशनाः॥ २३
क्रोधा तु जनयामास पिशाचांश्च महाबलान्।
गास्तु वै जनयामास सुरभिर्महिषांस्तथा।
इरावृक्षलतावल्लीस्तृणजातीश्च सर्वशः॥ २४
खसा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा।
अरिष्टा तु महासत्त्वान् गन्धर्वान्समजीजनत्॥ २५
एते कश्यपदायदाः कीर्त्तिताः स्थाणुजङ्गमाः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ २६
एष मन्वन्तरे सर्गो ब्रह्मन्स्वारोचिषे स्मृतः॥ २७
वैवस्वते च महति वारुणे वितते कृतौ।
जुह्वानस्य ब्रह्मणो वै प्रजासर्ग इहोच्यते॥ २८
पूर्वं यत्र तु सप्तर्षीनुत्पन्नान्सप्तमानसान्।
पितृत्वे कल्पयामास स्वयमेव पितामहः।
गन्धर्वभोगिदेवानां दानवानां च सत्तम॥ २९
दितिर्विनष्टपुत्रा वै तोषयामास काश्यपम्।
तया चाराधितः सम्यक् काश्यपस्तपसां वरः॥ ३०
वरेणच्छन्दयामास सा च वव्रे ततो वरम्।
पुत्रमिन्द्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्॥ ३१
शुकीसे शुक, उलूक एवं उलूकोंके प्रतिपक्षी काक आदि उत्पन्न हुए तथा श्येनीसे श्येन (बाज), भासीसे भास और गृध्रिकासे गृद्ध्रोंका जन्म हुआ॥ १६॥ शुचिसे जलके पक्षिगण और सुग्रीवीसे अश्व, उष्ट्र और गर्दभोंकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार यह ताम्राका वंश कहा जाता है॥ १७॥ विनताके गरुड और अरुण ये दो पुत्र विख्यात हैं। इनमें पक्षियोंमें श्रेष्ठ सुपर्ण (गरुडजी) अति भयंकर और सर्पोंको खानेवाले हैं॥ १८॥ हे ब्रह्मन्! सुरसासे सहस्रों सर्प उत्पन्न हुए जो बड़े ही प्रभावशाली, आकाशमें विचरनेवाले, अनेक सिरोंवाले और बड़े विशालकाय थे॥ १९॥ और कद्रूके पुत्र भी महाबली और अमित तेजस्वी अनेक सिरवाले सहस्रों सर्प ही हुए जो गरुडजीके वशवर्ती थे॥ २०॥ उनमेंसे शेष, वासुकि, तक्षक, शंखश्वेत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापुत्र, नाग, कर्कोटक, धनंजय तथा और भी अनेक उग्र विषधर एवं काटनेवाले सर्प प्रधान हैं॥ २१-२२॥ क्रोधवशाके पुत्र क्रोधवशगण हैं। वे सभी बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले, भयंकर और कच्चा मांस खानेवाले जलचर, स्थलचर एवं पक्षिगण हैं॥ २३॥ महाबली पिशाचोंको भी क्रोधाने ही जन्म दिया है। सुरभिसे गौ और महिष आदिकी उत्पत्ति हुई तथा इरासे वृक्ष, लता, बेल और सब प्रकारके तृण उत्पन्न हुए हैं॥ २४॥ खसाने यक्ष और राक्षसोंको, मुनिने अप्सराओंको तथा अरिष्टाने अति समर्थ गन्धर्वोंको जन्म दिया॥ २५॥ ये सब स्थावर-जंगम कश्यपजीकी सन्तान हुए। इनके और भी सैकड़ों-हजारों पुत्र-पौत्रादि हुए॥ २६॥ हे ब्रह्मन्! यह स्वारोचिष-मन्वन्तरकी सृष्टिका वर्णन कहा जाता है॥ २७॥ वैवस्वत-मन्वन्तरके आरम्भमें महान् वरुण यज्ञ हुआ, उसमें ब्रह्माजी होता थे, अब मैं उनकी प्रजाका वर्णन करता हूँ॥ २८॥
हे साधुश्रेष्ठ! पूर्व-मन्वन्तरमें जो सप्तर्षिगण स्वयं ब्रह्माजीके मानसपुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे, उन्हींको ब्रह्माजीने इस कल्पमें गन्धर्व, नाग, देव और दानवादिके पितृरूपसे निश्चित किया॥ २९॥ पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर दितिने कश्यपजीको प्रसन्न किया। उसकी सम्यक् आराधनासे सन्तुष्ट हो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ कश्यपजीने उसे वर देकर प्रसन्न किया। उस समय उसने इन्द्रके वध करनेमें समर्थ एक अति तेजस्वी पुत्रका वर माँगा॥ ३०-३१॥
१०४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१
स च तस्मै वरं प्रादाद्भार्यायै मुनिसत्तमः ।
दत्त्वा च वरमत्युग्रं कश्यपस्तामुवाच ह ॥ ३२
शक्रं पुत्रो निहन्ता ते यदि गर्भं शरच्छतम् ।
समाहितातिप्रयता शौचिनी धारयिष्यसि ॥ ३३
इत्येवमुक्त्वा तां देवीं सङ्गतः कश्यपो मुनिः ।
दधार सा च तं गर्भं सम्यक्छौचसमन्विता ॥ ३४
गर्भमात्मवधार्थाय ज्ञात्वा तं मघवानपि ।
शुश्रूषुस्तामथागच्छद्दिनयादमराधिपः ॥ ३५
तस्याश्चैवान्तरप्रेप्सुरतिष्ठत्पाकशासनः ।
ऊने वर्षशते चास्या ददर्शान्तरमात्मना ॥ ३६
अकृत्वा पादयोः शौचं दितिः शयनमाविशत् ।
निद्रा चाहारयामास तस्याः कुक्षिं प्रविश्य सः ॥ ३७
वज्रपाणिर्महागर्भं चिच्छेदाथ स सप्तधा ।
सम्पीड्यमानो वज्रेण स रुरोदातिदारुणम् ॥ ३८
मा रोदीरिति तं शक्रः पुनः पुनः पुनरभाषत ।
सोऽभवत्सप्तधा गर्भस्तमिन्द्रः कुपितः पुनः ॥ ३९
एकैकं सप्तधा चक्रे वज्रेणारिविदारिणा ।
मरुतो नाम देवास्ते बभूवुरतिवेगिनः ॥ ४०
यदुक्तं वै भगवता तेनैव मरुतोऽभवन् ।
देवा एकोनपञ्चाशत्सहाया वज्रपाणिनः ॥ ४१
मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने अपनी भार्या दितिको वह वर दिया और उस अति उग्र वरको देते हुए वे उससे बोले- ॥ ३२ ॥ "यदि तुम भगवान्के ध्यानमें तत्पर रहकर अपना गर्भ शौच* और संयमपूर्वक सौ वर्षतक धारण कर सकोगी तो तुम्हारा पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा" ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर मुनि कश्यपजीने उस देवीसे संगमन किया और उसने बड़े शौचपूर्वक रहते हुए वह गर्भ धारण किया ॥ ३४ ॥
उस गर्भको अपने वधका कारण जान देवराज इन्द्र भी विनयपूर्वक उसकी सेवा करनेके लिये आ गये ॥ ३५ ॥ उसके शौचादिमें कभी कोई अन्तर पड़े- यही देखनेकी इच्छासे इन्द्र वहाँ हर समय उपस्थित रहते थे। अन्तमें सौ वर्षमें कुछ ही कमी रहनेपर उन्होंने एक अन्तर देख ही लिया ॥ ३६ ॥ एक दिन दिति बिना चरण-शुद्धि किये ही अपनी शय्यापर लेट गयी। उस समय निद्राने उसे घेर लिया। तब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर उसकी कुक्षिमें घुस गये और उस महागर्भके सात टुकड़े कर डाले। इस प्रकार वज्रसे पीड़ित होनेसे वह गर्भ जोर-जोरसे रोने लगा ॥ ३७-३८ ॥ इन्द्रने उससे पुनः-पुनः कहा कि 'मत रो'। किन्तु जब वह गर्भ सात भागोंमें विभक्त हो गया, [और फिर भी न मरा ] तो इन्द्रने अत्यन्त कुपित हो अपने शत्रु-विनाशक वज्रसे एक-एकके सात-सात टुकड़े और कर दिये। वे ही अति वेगवान् मरुत् नामक देवता हुए ॥ ३९-४० ॥ भगवान् इन्द्रने जो उससे कहा था कि 'मा रोदीः' (मत रो) इसीलिये वे मरुत् कहलाये। ये उनचास मरुद्गण इन्द्रके सहायक देवता हुए ॥ ४१ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
* शौच आदि नियम मत्स्यपुराणमें इस प्रकार बतलाये गये हैं-
सन्ध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि । न स्थातव्यं न गन्तव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा ॥
वर्जयेत् कलहं लोके गात्रभङ्गं तथैव च। नोन्मुक्तकेशी तिष्ठेच्च नाशुचिः स्यात् कदाचन ॥
हे सुन्दरि! गर्भिणी स्त्रीको चाहिये कि सायंकालमें भोजन न करे, वृक्षोंके नीचे न जाय और न वहाँ ठहरे ही तथा लोगोंके साथ कलह और अँगड़ाई लेना छोड़ दे, कभी केश खुला न रखे और न अपवित्र ही रहे।
तथा भागवतमें भी कहा है—'न हिंस्यात्सर्वभूतानि न शपेन्नानृतं वदेत्' इत्यादि। अर्थात् प्राणियोंकी हिंसा न करे, किसीको बुरा-भला न कहे और कभी झूठ न बोले।
अ० २२ ] * प्रथम अंश * १०५
बाईसवाँ अध्याय
विष्णुभगवान्की विभूति और जगत्की व्यवस्थाका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—पूर्वकालमें महर्षियोंने जब महाराज पृथुको राज्यपदपर अभिषिक्त किया तो लोक-पितामह श्रीब्रह्माजीने भी क्रमसे राज्योंका बँटवारा किया॥ १॥ ब्रह्माजीने नक्षत्र, ग्रह, ब्राह्मण, सम्पूर्ण वनस्पति और यज्ञ तथा तप आदिके राज्यपर चन्द्रमाको नियुक्त किया॥ २॥ इसी प्रकार विश्रवाके पुत्र कुबेरजीको राजाओंका, वरुणको जलोंका, विष्णुको आदित्योंका और अग्निको वसुगणोंका अधिपति बनाया॥ ३॥ दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुद्गणका तथा प्रह्लादजीको दैत्य और दानवोंका आधिपत्य दिया॥ ४॥ पितृगणके राज्यपदपर धर्मराज यमको अभिषिक्त किया और सम्पूर्ण गजराजोंका स्वामित्व ऐरावतको दिया॥ ५॥ गरुडको पक्षियोंका, इन्द्रको देवताओंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका और वृषभको गौओंका अधिपति बनाया॥ ६॥ प्रभु ब्रह्माजीने समस्त मृगों (वन्यपशुओं)-का राज्य सिंहको दिया और सर्पोंका स्वामी शेषनागको बनाया॥ ७॥ स्थावरोंका स्वामी हिमालयको, मुनिजनोंका कपिलदेवजीको और नख तथा दाढ़वाले मृगगणका राजा व्याघ्र (बाघ)-को बनाया॥ ८॥ तथा प्लक्ष (पाकर)-को वनस्पतियोंका राजा किया। इसी प्रकार ब्रह्माजीने और-और जातियोंके प्राधान्यकी भी व्यवस्था की॥ ९॥ |
|---|---|
| यदाभिषिक्तः स पृथुः पूर्वं राज्ये महर्षिभिः।<br>ततः क्रमेण राज्यानि ददौ लोकपितामहः॥ १ | |
| नक्षत्रग्रहविप्राणां वीरुधां चाप्यशेषतः।<br>सोमं राज्ये दधद्ब्रह्मा यज्ञानां तपसामपि॥ २ | |
| राज्ञां वैश्रवणं राज्ये जलानां वरुणं तथा।<br>आदित्यानां पतिं विष्णुं वसूनामथ पावकम्॥ ३ | |
| प्रजापतीनां दक्षं तु वासवं मरुतामपि।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादमधिपं ददौ॥ ४ | |
| पितॄणां धर्मराजं तं यमं राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>ऐरावतं गजेन्द्राणामशेषाणां पतिं ददौ॥ ५ | |
| पतत्रिणां तु गरुडं देवानापि वासवम्।<br>उच्चैःश्रवसमश्वानां वृषभं तु गवामपि॥ ६ | |
| मृगाणां चैव सर्वेषां राज्ये सिंहं ददौ प्रभुः।<br>शेषं तु दन्दशूकानामकरोत्पतिमव्ययः॥ ७ | |
| हिमालयं स्थावराणां मुनीनां कपिलं मुनिम्।<br>नखिनां दंष्ट्रिणां चैव मृगाणां व्याघ्रमीश्वरम्॥ ८ | |
| वनस्पतीनां राजानं प्लक्षमेवाभ्यषेचयत्।<br>एवमेवान्यजातीनां प्राधान्येनाकरोत्प्रभून्॥ ९ | |
| एवं विभज्य राज्यानि दिशां पालाननन्तरम्।<br>प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा स्थापयामास सर्वतः॥ १० | इस प्रकार राज्योंका विभाग करनेके अनन्तर प्रजापतियोंके स्वामी ब्रह्माजीने सब ओर दिक्पालोंकी स्थापना की॥ १०॥ उन्होंने पूर्व-दिशामें वैराज प्रजापतिके पुत्र राजा सुधन्वाको दिक्पालपदपर अभिषिक्त किया॥ ११॥ तथा दक्षिण-दिशामें कर्दम प्रजापतिके पुत्र राजा शंखपदकी नियुक्ति की॥ १२॥ कभी च्युत न होनेवाले रजसपुत्र महात्मा केतुमान्को उन्होंने पश्चिम-दिशामें स्थापित किया॥ १३॥ और पर्जन्य प्रजापतिके पुत्र अति दुर्द्धर्ष राजा हिरण्यरोमाको उत्तर-दिशामें अभिषिक्त किया॥ १४॥ वे आजतक सात द्वीप और अनेकों नगरोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथिवीका अपने-अपने विभागानुसार धर्मपूर्वक पालन करते हैं॥ १५॥ |
| पूर्वस्यां दिशि राजानं वैराजस्य प्रजापतेः।<br>दिशापालं सुधन्वानं सुतं वै सोऽभ्यषेचयत्॥ ११ | |
| दक्षिणस्यां दिशि तथा कर्दमस्य प्रजापतेः।<br>पुत्रं शङ्खपदं नाम राजानं सोऽभ्यषेचयत्॥ १२ | |
| पश्चिमस्यां दिशि तथा रजसः पुत्रमच्युतम्।<br>केतुमन्तं महात्मानं राजानं सोऽभ्यषेचयत्॥ १३ | |
| तथा हिरण्यरोमाणं पर्जन्यस्य प्रजापतेः।<br>उदीच्यां दिशि दुर्द्धर्षं राजानमभ्यषेचयत्॥ १४ | |
| तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना।<br>यथाप्रदेशमद्यापि धर्मतः परिपाल्यते॥ १५ |
१०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| एते सर्वे प्रवृत्तस्य स्थितौ विष्णोर्महात्मनः।<br>विभूतिभूता राजानो ये चान्ये मुनिसत्तम॥ १६<br>ये भविष्यन्ति ये भूताः सर्वे भूतेश्वरा द्विज।<br>ते सर्वे सर्वभूतस्य विष्णोरंशा द्विजोत्तम॥ १७<br>ये तु देवाधिपतयो ये च दैत्याधिपास्तथा।<br>दानवानां च ये नाथा ये नाथाः पिशिताशिनाम्॥ १८<br>पशूनां ये च पतयः पतयो ये च पक्षिणाम्।<br>मनुष्याणां च सर्पाणां नागानामधिपाश्च ये॥ १९<br>वृक्षाणां पर्वतानां च ग्रहाणां चापि येऽधिपाः।<br>अतीता वर्त्तमानाश्च ये भविष्यन्ति चापरे।<br>ते सर्वे सर्वभूतस्य विष्णोरंशसमुद्भवाः॥ २०<br>न हि पालनसामर्थ्यमृते सर्वेश्वरं हरिम्।<br>स्थितं स्थितौ महाप्राज्ञ भवत्यन्यस्य कस्यचित्॥ २१<br>सृजत्येष जगत्सृष्टौ स्थितौ पाति सनातनः।<br>हन्ति चैवान्तकत्वेन रजःसत्त्वादि संश्रयः॥ २२<br>चतुर्विभागः संसृष्टौ चतुर्धा संस्थितः स्थितौ।<br>प्रलयं च करोत्यन्ते चतुर्भेदो जनार्दनः॥ २३<br>एकेनांशेन ब्रह्मासौ भवत्यव्यक्तमूर्त्तिमान्।<br>मरीचिमिश्राः पतयः प्रजानां चान्यभागशः॥ २४<br>कालस्तृतीयस्तस्यांशः सर्वभूतानि चापरः।<br>इत्थं चतुर्धा संसृष्टौ वर्त्ततेऽसौ रजोगुणः॥ २५<br>एकांशेनास्थितो विष्णुः करोति प्रतिपालनम्।<br>मन्वादिरूपश्चान्येन कालरूपोऽपरेण च॥ २६<br>सर्वभूतेषु चान्येन संस्थितः कुरुते स्थितिम्।<br>सत्त्वं गुणं समाश्रित्य जगतः पुरुषोत्तमः॥ २७<br>आश्रित्य तमसो वृत्तिमन्तकाले तथा पुनः।<br>रुद्रस्वरूपो भगवानेकांशेन भवत्यजः॥ २८<br>अग्न्यन्तकादिरूपेण भागेनान्येन वर्त्तते।<br>कालस्वरूपो भागो यस्सर्वभूतानि चापरः॥ २९<br>विनाशं कुर्वतस्तस्य चतुर्द्धैवं महात्मनः।<br>विभागकल्पना ब्रह्मन् कथ्यते सार्वकालिकी॥ ३०<br>ब्रह्मा दक्षादयः कालस्तथैवाखिलजन्तवः।<br>विभूतयो हरेरेता जगतः सृष्टिहेतवः॥ ३१ | हे मुनिसत्तम! ये तथा अन्य भी जो सम्पूर्ण राजालोग हैं वे सभी विश्वके पालनमें प्रवृत्त परमात्मा श्रीविष्णुभगवान्के विभूतिरूप हैं॥१६॥ हे द्विजोत्तम! जो-जो भूताधिपति पहले हो गये हैं और जो-जो आगे होंगे वे सभी सर्वभूत भगवान् विष्णुके अंश हैं॥१७॥ जो-जो भी देवताओं, दैत्यों, दानवों और मांसभोजियोंके अधिपति हैं, जो-जो पशुओं, पक्षियों, मनुष्यों, सर्पों और नागोंके अधिनायक हैं, जो-जो वृक्षों, पर्वतों और ग्रहोंके स्वामी हैं तथा और भी भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानकालीन जितने भूतेश्वर हैं वे सभी सर्वभूत भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं॥१८-२०॥ हे महाप्राज्ञ! सृष्टिके पालन-कार्यमें प्रवृत्त सर्वेश्वर श्रीहरिको छोड़कर और किसीमें भी पालन करनेकी शक्ति नहीं है॥२१॥ रजः और सत्त्वादि गुणोंके आश्रयसे वे सनातन प्रभु ही जगत्की रचनाके समय रचना करते हैं, स्थितिके समय पालन करते हैं और अन्तसमयमें कालरूपसे संहार करते हैं॥२२॥<br>वे जनार्दन चार विभागसे सृष्टिके और चार विभागसे ही स्थितिके समय रहते हैं तथा चार रूप धारण करके ही अन्तमें प्रलय करते हैं॥२३॥ एक अंशसे वे अव्यक्तस्वरूप ब्रह्मा होते हैं, दूसरे अंशसे मरीचि आदि प्रजापति होते हैं, उनका तीसरा अंश काल है और चौथा सम्पूर्ण प्राणी। इस प्रकार वे रजोगुणविशिष्ट होकर चार प्रकारसे सृष्टिके समय स्थित होते हैं॥२४-२५॥ फिर वे पुरुषोत्तम सत्त्वगुणका आश्रय लेकर जगत्की स्थिति करते हैं। उस समय वे एक अंशसे विष्णु होकर पालन करते हैं, दूसरे अंशसे मनु आदि होते हैं तथा तीसरे अंशसे काल और चौथेसे सर्वभूतोंमें स्थित होते हैं॥२६-२७॥ तथा अन्तकालमें वे अजन्मा भगवान् तमोगुणकी वृत्तिका आश्रय ले एक अंशसे रुद्ररूप, दूसरे भागसे अग्नि और अन्तकादि रूप, तीसरेसे कालरूप और चौथेसे सम्पूर्ण भूतस्वरूप हो जाते हैं॥२८-२९॥ हे ब्रह्मन्! विनाश करनेके लिये उन महात्माकी यह चार प्रकारकी सार्वकालिक विभागकल्पना कही जाती है॥३०॥ ब्रह्मा, दक्ष आदि प्रजापतिगण, काल तथा समस्त प्राणी—ये श्रीहरिकी विभूतियाँ जगत्की सृष्टिकी कारण हैं॥३१॥ |
अ० २२] * प्रथम अंश * १०७
| विष्णुर्मन्वादयः कालः सर्वभूतानि च द्विज ।<br>स्थितेर्निमित्तभूतस्य विष्णोरेता विभूतयः ॥ ३२<br><br>रुद्रः कालान्तकाद्याश्च समस्ताश्चैव जन्तवः ।<br>चतुर्धा प्रलयायैता जनार्दनविभूतयः ॥ ३३<br><br>जगदादौ तथा मध्ये सृष्टिराप्रलयाद् द्विज ।<br>धात्रा मरीचिमिश्रैश्च क्रियते जन्तुभिस्तथा ॥ ३४<br><br>ब्रह्मा सृजत्यादिकाले मरीचिप्रमुखास्ततः ।<br>उत्पादयन्त्यपत्यानि जन्तवश्च प्रतिक्षणम् ॥ ३५<br><br>कालेन न विना ब्रह्मा सृष्टिनिष्पादको द्विज ।<br>न प्रजापतयः सर्वे न चैवाखिलजन्तवः ॥ ३६<br><br>एवमेव विभागोऽयं स्थितावप्युपदिश्यते ।<br>चतुर्धा तस्य देवस्य मैत्रेय प्रलये तथा ॥ ३७<br><br>यत्किञ्चित्सृज्यते येन सत्त्वजातेन वै द्विज ।<br>तस्य सृज्यस्य सम्भूतौ तत्सर्वं वै हरेस्तनुः ॥ ३८<br><br>हन्ति यावच्च यत्किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।<br>जनार्दनस्य तद्रौद्रं मैत्रेयान्तकरं वपुः ॥ ३९<br><br>एवमेष जगत्स्रष्टा जगत्पाता तथा जगत् ।<br>जगद्भक्षयिता देवः समस्तस्य जनार्दनः ॥ ४०<br><br>सृष्टिस्थित्यन्तकालेषु त्रिधैवं सम्प्रवर्तते ।<br>गुणप्रवृत्त्या परमं पदं तस्यागुणं महत् ॥ ४१<br><br>तच्च ज्ञानमयं व्यापि स्वसंवेद्यमनौपमम् ।<br>चतुष्प्रकारं तदपि स्वरूपं परमात्मनः ॥ ४२<br><br>श्रीमैत्रेय उवाच<br><br>चतुष्प्रकारतां तस्य ब्रह्मभूतस्य हे मुने ।<br>ममाचक्ष्व यथान्यायं यदुक्तं परमं पदम् ॥ ४३<br><br>श्रीपराशर उवाच<br><br>मैत्रेय कारणं प्रोक्तं साधनं सर्ववस्तुषु ।<br>साध्यं च वस्त्वभिमतं यत्साधयितुमात्मनः ॥ ४४<br><br>योगिनो मुक्तिकामस्य प्राणायामादिसाधनम् ।<br>साध्यं च परमं ब्रह्म पुनर्नार्त्तते यतः ॥ ४५ | हे द्विज! विष्णु, मनु आदि, काल और समस्त भूतगण—ये जगत्की स्थितिके कारणरूप भगवान् विष्णुकी विभूतियाँ हैं॥ ३२॥ तथा रुद्र, काल, अन्तकादि और सकल जीव—श्रीजनार्दनकी ये चार विभूतियाँ प्रलयकी कारणरूप हैं॥ ३३॥<br><br>हे द्विज! जगत्के आदि और मध्यमें तथा प्रलय-पर्यन्त भी ब्रह्मा, मरीचि आदि तथा भिन्न-भिन्न जीवोंसे ही सृष्टि हुआ करती है॥ ३४॥ सृष्टिके आरम्भमें पहले ब्रह्माजी रचना करते हैं, फिर मरीचि आदि प्रजापतिगण और तदनन्तर समस्त जीव क्षण-क्षणमें सन्तान उत्पन्न करते रहते हैं॥ ३५॥ हे द्विज! कालके बिना ब्रह्मा, प्रजापति एवं अन्य समस्त प्राणी भी सृष्टि-रचना नहीं कर सकते [ अतः भगवान् कालरूप विष्णु ही सर्वदा सृष्टिके कारण हैं ]॥ ३६॥ हे मैत्रेय! इसी प्रकार जगत्की स्थिति और प्रलयमें भी उन देवदेवके चार-चार विभाग बताये जाते हैं॥ ३७॥ हे द्विज! जिस किसी जीवद्वारा जो कुछ भी रचना की जाती है उस उत्पन्न हुए जीवकी उत्पत्तिमें सर्वथा श्रीहरिका शरीर ही कारण है॥ ३८॥ हे मैत्रेय! इसी प्रकार जो कोई स्थावर-जंगम भूतोंमेंसे किसीको नष्ट करता है, वह नाश करनेवाला भी श्रीजनार्दनका अन्तकारक रौद्ररूप ही है॥ ३९॥ इस प्रकार वे जनार्दनदेव ही समस्त संसारके रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हैं तथा वे ही स्वयं जगत्-रूप भी हैं॥ ४०॥ जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और अन्तके समय वे इसी प्रकार तीनों गुणोंकी प्रेरणासे प्रवृत्त होते हैं, तथापि उनका परमपद महान् निर्गुण है॥ ४१॥ परमात्माका वह स्वरूप ज्ञानमय, व्यापक, स्वसंवेद्य (स्वयं-प्रकाश) और अनुपम है तथा वह भी चार प्रकारका ही है॥ ४२॥<br><br>**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुने! आपने जो भगवान्का परम पद कहा, वह चार प्रकारका कैसे है? यह आप मुझसे विधिपूर्वक कहिये॥ ४३॥<br><br>**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! सब वस्तुओंका जो कारण होता है वही उनका साधन भी होता है और जिस अपनी अभिमत वस्तुकी सिद्धि की जाती है वही साध्य कहलाती है॥ ४४॥ मुक्तिकी इच्छावाले योगिजनोंके लिये प्राणायाम आदि साधन हैं और परब्रह्म ही साध्य है, जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता॥ ४५॥ |
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| १०८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २२ |
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साधनालम्बनं ज्ञानं मुक्तये योगिनां हि यत्।
स भेदः प्रथमस्तस्य ब्रह्मभूतस्य वै मुने॥ ४६
युञ्जतः क्लेशमुक्त्यर्थं साध्यं यद्ब्रह्म योगिनः।
तदालम्बनविज्ञानं द्वितीयोंऽशो महामुने॥ ४७
उभयोस्त्वविभागेन साध्यसाधनयोर्हि यत्।
विज्ञानमद्वैतमयं तद्भागोऽन्यो मयोदितः॥ ४८
ज्ञानत्रयस्य वै तस्य विशेषो यो महामुने।
तन्निराकरणद्वारा दर्शितात्मस्वरूपवत्॥ ४९
निर्व्यापारमनाख्येयं व्याप्तिमात्रमनूपमम्।
आत्मसम्बोधविषयं सत्तामात्रमलक्षणम्॥ ५०
प्रशान्तमभयं शुद्धं दुर्विभाव्यमसंश्रयम्।
विष्णोर्ज्ञानमयस्योक्तं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ५१
तत्र ज्ञाननिरोधेन योगिनो यान्ति ये लयम्।
संसारकर्षणोप्तौ ते यान्ति निर्बीजतां द्विज॥ ५२
एवंप्रकारममलं नित्यं व्यापकमक्षयम्।
समस्तहेयरहितं विष्ण्वाख्यं परमं पदम्॥ ५३
तद्ब्रह्म परमं योगी यतो नावत्र्तते पुनः।
श्रयत्यपुण्योपरमे क्षीणक्लेशोऽतिनिर्मलः॥ ५४
द्वे रूपे ब्रह्मणस्तस्य मूर्त्तं चामूर्त्तमेव च।
क्षराक्षरस्वरूपे ते सर्वभूतेष्ववस्थिते॥ ५५
अक्षरं तत्परं ब्रह्म क्षरं सर्वमिदं जगत्।
एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथेदमखिलं जगत्॥ ५६
तत्राप्या सन्नदूरत्वाद्वहुत्वस्वल्पतामयः।
ज्योत्स्नाभेदोऽस्ति तच्छक्तेस्तद्वन्मैत्रेय विद्यते॥ ५७
ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन्प्रधाना ब्रह्मशक्तयः।
ततश्च देवा मैत्रेय न्यूना दक्षादयस्ततः॥ ५८
ततो मनुष्याः पशवो मृगपक्षिसरीसृपाः।
न्यूनान्न्यूनतराश्चैव वृक्षगुल्मादयस्तथा॥ ५९
तदेतदक्षरं नित्यं जगन्मुनिवराखिलम्।
आविर्भावतिरोभावजन्मनाशविकल्पवत्॥ ६०
हिन्दी अनुवाद
हे मुने! जो योगीकी मुक्तिका कारण है, वह 'साधनालम्बन-ज्ञान' ही उस ब्रह्मभूत परमपदका प्रथम भेद है*॥ ४६॥ क्लेश-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये योगाभ्यासी योगीका साध्यरूप जो ब्रह्म है, हे महामुने! उसका ज्ञान ही 'आलम्बन-विज्ञान' नामक दूसरा भेद है॥ ४७॥ इन दोनों साध्य-साधनोंका अभेदपूर्वक जो 'अद्वैतमय ज्ञान' है उसीको मैं तीसरा भेद कहता हूँ॥ ४८॥ और हे महामुने! उक्त तीनों प्रकारके ज्ञानकी विशेषताका निराकरण करनेपर अनुभव हुए आत्मस्वरूपके समान ज्ञानस्वरूप भगवान् विष्णुका जो निर्व्यापार अनिर्वचनीय, व्याप्तिमात्र, अनुपम, आत्मबोधस्वरूप, सत्तामात्र, अलक्षण, शान्त, अभय, शुद्ध, भावनातीत और आश्रयहीन रूप है, वह 'ब्रह्म' नामक ज्ञान [उसका चौथा भेद] है॥ ४९—५१॥ हे द्विज! जो योगिजन अन्य ज्ञानोंका निरोधकर इस (चौथे भेद)-में ही लीन हो जाते हैं वे इस संसार-क्षेत्रके भीतर बीजारोपणरूप कर्म करनेमें निर्बीज (वासनारहित) होते हैं। [अर्थात् वे लोकसंग्रहके लिये कर्म करते भी रहते हैं तो भी उन्हें उन कर्मोंका कोई पाप-पुण्यरूप फल प्राप्त नहीं होता]॥ ५२॥ इस प्रकारका वह निर्मल, नित्य, व्यापक, अक्षय और समस्त हेय गुणोंसे रहित विष्णु नामक परमपद है॥ ५३॥ पुण्य-पापका क्षय और क्लेशोंकी निवृत्ति होनेपर जो अत्यन्त निर्मल हो जाता है वही योगी उस परब्रह्मका आश्रय लेता है जहाँसे वह फिर नहीं लौटता॥ ५४॥
उस ब्रह्मके मूर्त और अमूर्त दो रूप हैं, जो क्षर और अक्षररूपसे समस्त प्राणियोंमें स्थित हैं॥ ५५॥ अक्षर ही वह परब्रह्म है और क्षर सम्पूर्ण जगत् है। जिस प्रकार एकदेशीय अग्निका प्रकाश सर्वत्र फैला रहता है उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् परब्रह्मकी ही शक्ति है॥ ५६॥ हे मैत्रेय! अग्निकी निकटता और दूरताके भेदसे जिस प्रकार उसके प्रकाशमें भी अधिकता और न्यूनताका भेद रहता है उसी प्रकार ब्रह्मकी शक्तिमें भी तारतम्य है॥ ५७॥ हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा, विष्णु और शिव ब्रह्मकी प्रधान शक्तियाँ हैं, उनसे न्यून देवगण हैं तथा उनके अनन्तर दक्ष आदि प्रजापतिगण हैं॥ ५८॥ उनसे भी न्यून मनुष्य, पशु, पक्षी, मृग और सरीसृपादि हैं तथा उनसे भी अत्यन्त न्यून वृक्ष, गुल्म और लता आदि हैं॥ ५९॥ अतः हे मुनिवर! आविर्भाव (उत्पन्न होना), तिरोभाव (छिप जाना), जन्म और नाश आदि विकल्पयुक्त भी यह सम्पूर्ण जगत् वास्तवमें नित्य और अक्षय ही है॥ ६०॥
* प्राणायामादि साधनविषयक ज्ञानको 'साधनालम्बन-ज्ञान' कहते हैं।
अ० २२ ] * प्रथम अंश * १०९
सर्वशक्तिमयो विष्णुः स्वरूपं ब्रह्मणः परम्। मूर्त्तं यद्योगिभिः पूर्वं योगारम्भेषु चिन्त्यते ॥ ६१
सालम्बनो महायोगः सबीजो यत्र संस्थितः। मनस्यव्याहते सम्यग्युज्जतां जायते मुने ॥ ६२
स परः परशक्तीनां ब्रह्मणः समनन्तरम्। मूर्त्तं ब्रह्म महाभाग सर्वब्रह्ममयो हरिः ॥ ६३
तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्। ततो जगज्जगत्तस्मिन्स जगच्चाखिलं मुने ॥ ६४
क्षराक्षरमयो विष्णुर्बिभर्त्यखिलमीश्वरः। पुरुषाव्याकृतमयं भूषणास्त्रस्वरूपवत् ॥ ६५
श्रीमैत्रेय उवाच
भूषणास्त्रस्वरूपस्थं यच्चैतदखिलं जगत्। बिभर्त्ति भगवान्विष्णुस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ ६६
श्रीपराशर उवाच
नमस्कृत्याप्रमेयाय विष्णवे प्रभविष्णवे। कथयामि यथाख्यातं वसिष्ठेन ममाभवत् ॥ ६७
आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम्। बिभर्त्ति कौस्तुभमणिस্বরূপं भगवान्हरिः ॥ ६८
श्रीवत्ससंस्थानधरमनन्तेन समाश्रितम्। प्रधानं बुद्धिरप्यास्ते गदारूपेण माधवे ॥ ६९
भूतादिमिन्द्रियादिं च द्विधाहङ्कारमीश्वरः। बिभर्त्ति शङ्खरूपेण शार्ङ्गरूपेण च स्थितम् ॥ ७०
चलत्स्वरूपमत्यन्तं जवेनान्तरितानिलम्। चक्रस्वरूपं च मनो धत्ते विष्णुकरे स्थितम् ॥ ७१
पञ्चरूपा तु या माला वैजयन्ती गदाभृतः। सा भूतहेतुसङ्घाता भूतमाला च वै द्विज ॥ ७२
यानीन्द्रियाण्यशेषाणि बुद्धिकर्मात्मकानि वै। शररूपाण्यशेषाणि तानि धत्ते जनार्दनः ॥ ७३
बिभर्त्ति यच्चासिरत्नमच्युतोऽत्यन्तनिर्मलम्। विद्यामयं तु तज्ज्ञानमविद्याकोशसंस्थितम् ॥ ७४
इत्थं पुमान्प्रधानं च बुद्धयहङ्कारमेव च। भूतानि च हृषीकेशे मनः सर्वेन्द्रियाणि च। विद्याविद्ये च मैत्रेय सर्वमेतत्समाश्रितम् ॥ ७५
सर्वशक्तिमय विष्णु ही ब्रह्मके पर-स्वरूप तथा मूर्तरूप हैं जिनका योगिजन योगारम्भके पूर्व चिन्तन करते हैं ॥ ६१ ॥
हे मुने! जिनमें मनको सम्यक्-प्रकारसे निरन्तर एकाग्र करनेवालोंको आलम्बनयुक्त सबीज (सम्प्रज्ञात) महायोगकी प्राप्ति होती है, हे महाभाग ! हे सर्वब्रह्ममय श्रीविष्णुभगवान् समस्त परा शक्तियोंमें प्रधान और ब्रह्मके अत्यन्त निकटवर्ती मूर्त-ब्रह्मस्वरूप हैं॥ ६२-६३ ॥ हे मुने ! उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है, उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है और स्वयं वे ही समस्त जगत् हैं ॥ ६४ ॥ क्षराक्षरमय (कार्य-कारण-रूप) ईश्वर विष्णु ही इस पुरुष-प्रकृतिमय सम्पूर्ण जगत्को अपने आभूषण और आयुधरूपसे धारण करते हैं ॥ ६५ ॥
श्रीमैत्रेयजी बोले— भगवान् विष्णु इस संसारको भूषण और आयुधरूपसे किस प्रकार धारण करते हैं यह आप मुझसे कहिये ॥ ६६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मुने ! जगत्का पालन करनेवाले अप्रमेय श्रीविष्णुभगवान्को नमस्कार कर अब मैं, जिस प्रकार वसिष्ठजीने मुझसे कहा था वह तुम्हें सुनाता हूँ ॥ ६७ ॥ इस जगत्के निर्लेप तथा निर्गुण और निर्मल आत्माको अर्थात् शुद्ध क्षेत्रज्ञ-स्वरूपको श्रीहरि कौस्तुभमणिरूपसे धारण करते हैं ॥ ६८ ॥ श्रीअनन्तने प्रधानको श्रीवत्सरूपसे आश्रय दिया है और बुद्धि श्रीमाधवकी गदारूपसे स्थित है ॥ ६९ ॥ भूतोंके कारण तामस अहंकार और इन्द्रियोंके कारण राजस अहंकार इन दोनोंको वे शंख और शार्ङ्ग धनुषरूपसे धारण करते हैं ॥ ७० ॥ अपने वेगसे पवनको भी पराजित करनेवाला अत्यन्त चंचल, सात्त्विक अहंकाररूप मन श्रीविष्णुभगवान्के कर-कमलोंमें स्थित चक्रका रूप धारण करता है ॥ ७१ ॥
हे द्विज! भगवान् गदाधरकी जो [ मुक्ता, माणिक्य, मरकत, इन्द्रनील और हीरकमयी ] पंचरूपा वैजयन्ती माला है वह पंचतन्मात्राओं और पंचभूतोंका ही संघात है ॥ ७२ ॥ जो ज्ञान और कर्ममयी इन्द्रियाँ हैं उन सबको श्रीजनार्दन भगवान् बाणरूपसे धारण करते हैं ॥ ७३ ॥ भगवान् अच्युत जो अत्यन्त निर्मल खड्ग धारण करते हैं वह अविद्यामय कोशसे आच्छादित विद्यामय ज्ञान ही है ॥ ७४ ॥ हे मैत्रेय ! इस प्रकार पुरुष, प्रधान, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत, मन, इन्द्रियाँ तथा विद्या और अविद्या सभी श्रीहृषीकेशमें आश्रित हैं ॥ ७५ ॥
११० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| अस्त्रभूषणसंस्थानस्वरूपं रूपवर्जितः।<br>बिभर्त्ति मायारूपोऽसौ श्रेयसे प्राणिनां हरिः ॥ ७६<br>सविकारं प्रधानं च पुमांसमखिलं जगत्।<br>बिभर्त्ति पुण्डरीकाक्षस्तदेवं परमेश्वरः॥ ७७<br>याविद्या या तथाविद्या यत्सद्यच्चासदव्ययम्।<br>तत्सर्वं सर्वभूतेशे मैत्रेय मधुसूदने ॥ ७८<br>कलाकाष्ठानिमेषादिदिनत्वेयनहायनैः ।<br>कालस्वरूपो भगवानपापो हरिरव्ययः॥ ७९<br>भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोको मुनिसत्तम।<br>महर्जनस्तपः सत्यं सप्त लोका इमे विभुः ॥ ८०<br>लोकात्ममूर्त्तिः सर्वेषां पूर्वेषामपि पूर्वजः।<br>आधारः सर्वविद्यानां स्वयमेव हरिः स्थितः ॥ ८१<br>देवमानुषपश्वादिस्वरूपैर्बहुभिः स्थितः।<br>ततः सर्वेश्वरोऽनन्तो भूतमूर्त्तिरमूर्त्तिमान् ॥ ८२<br>ऋचो यजूंषि सामानि तथैवाथर्वणानि वै।<br>इतिहासोपवेदाश्च वेदान्तेषु तथोक्तयः॥ ८३<br>वेदाङ्गानि समस्तानि मन्वादिगदितानि च।<br>शास्त्राण्यशेषाण्याख्यानान्यनुवाकाश्च ये क्वचित् ॥ ८४<br>काव्यालापाश्च ये केचिद्गीतकान्यखिलानि च।<br>शब्दमूर्त्तिधरस्यैतद्वपुर्विष्णोर्महात्मनः ॥ ८५<br>यानि मूर्त्तान्यमूर्त्तानि यान्यत्रान्यत्र वा क्वचित्।<br>सन्ति वै वस्तुजातानि तानि सर्वाणि तद्वपुः ॥ ८६<br>अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो<br>$\quad\quad\quad$नान्यत्ततः कारणकार्यजातम्।<br>ईदृङ्मना यस्य न तस्य भूयो<br>$\quad\quad\quad$भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ॥ ८७<br>इत्येष तैऽशः प्रथमः पुराणस्यास्य वै द्विज।<br>यथावत्कथितो यस्मिञ्छुते पापैः प्रमुच्यते ॥ ८८<br>कार्त्तिकां पुष्करस्नाने द्वादशाब्देन यत्फलम्।<br>तदस्य श्रवणात्सर्वं मैत्रेयाप्नोति मानवः ॥ ८९<br>देवर्षिपितृगन्धर्वयक्षादीनां च सम्भवम्।<br>भवन्ति शृण्वतः पुंसो देवादद्या वरदा मुने॥ ९० | श्रीहरि रूपरहित होकर भी मायामयरूपसे प्राणियोंके कल्याणके लिये इन सबको अस्त्र और भूषणरूपसे धारण करते हैं॥ ७६॥ इस प्रकार वे कमलनयन परमेश्वर सविकार प्रधान [ निर्विकार ], पुरुष तथा सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं॥ ७७॥ जो कुछ भी विद्या-अविद्या, सत्-असत् तथा अव्ययरूप है, हे मैत्रेय ! वह सब सर्वभूतेश्वर श्रीमधुसूदनमें ही स्थित है॥ ७८॥ कला, काष्ठा, निमेष, दिन, ऋतु, अयन और वर्षरूपसे वे कालस्वरूप निष्पाप अव्यय श्रीहरि ही विराजमान हैं॥ ७९॥<br>हे मुनिश्रेष्ठ! भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक तथा मह, जन, तप और सत्य आदि सातों लोक भी सर्वव्यापक भगवान् ही हैं॥ ८०॥ सभी पूर्वजोंके पूर्वज तथा समस्त विद्याओंके आधार श्रीहरि ही स्वयं लोकमयस्वरूपसे स्थित हैं॥ ८१॥ निराकार और सर्वेश्वर श्रीअनन्त ही भूतस्वरूप होकर देव, मनुष्य और पशु आदि नानारूपोंसे स्थित हैं॥ ८२॥ ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद, इतिहास (महाभारतादि), उपवेद (आयुर्वेदादि), वेदान्तवाक्य, समस्त वेदांग, मनु आदि कथित समस्त धर्मशास्त्र, पुराणादि सकल शास्त्र, आख्यान, अनुवाक (कल्पसूत्र) तथा समस्त काव्य-चर्चा और राग-रागिनी आदि जो कुछ भी हैं वे सब शब्दमूर्त्तिधारी परमात्मा विष्णुका ही शरीर हैं॥ ८३-८५॥ इस लोकमें अथवा कहीं और भी जितने मूर्त, अमूर्त पदार्थ हैं, वे सब उन्हींका शरीर हैं॥ ८६॥ 'मैं तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन श्रीहरि ही हैं; उनसे भिन्न और कुछ भी कार्य-कारणादि नहीं है'-जिसके चित्तमें ऐसी भावना है उसे फिर देहजन्य राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप रोगकी प्राप्ति नहीं होती॥ ८७॥<br>हे द्विज ! इस प्रकार तुमसे इस पुराणके पहले अंशका यथावत् वर्णन किया। इसका श्रवण करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ८८॥ हे मैत्रेय ! बारह वर्षतक कार्तिक मासमें पुष्करक्षेत्रमें स्नान करनेसे जो फल होता है; वह सब मनुष्यको इसके श्रवणमात्रसे मिल जाता है॥ ८९॥ हे मुने! देव, ऋषि, गन्धर्व, पितृ और यक्ष आदिकी उत्पत्तिका श्रवण करनेवाले पुरुषको वे देवादि वरदायक हो जाते हैं॥ ९०॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥ इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपपरत्वनिर्णायके श्रीमति विष्णुमहापुराणे प्रथमोऽंशः समाप्तः॥
ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः
श्रीविष्णुपुराण
द्वितीय अंश
पहला अध्याय
प्रियव्रतके वंशका वर्णन
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— हे भगवन्! हे गुरो! मैंने जगत्की सृष्टिके विषयमें आपसे जो कुछ पूछा था वह सब आपने मुझसे भली प्रकार कह दिया॥१॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जगत्की सृष्टिसम्बन्धी आपने जो यह प्रथम अंश कहा है, उसकी एक बात मैं और सुनना चाहता हूँ॥२॥ स्वायम्भुवमनुके जो प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र थे, उनमेंसे उत्तानपादके पुत्र ध्रुवके विषयमें तो आपने कहा॥३॥ किंतु, हे द्विज! आपने प्रियव्रतकी सन्तानके विषयमें कुछ भी नहीं कहा, अतः मैं उसका वर्णन सुनना चाहता हूँ, सो आप प्रसन्नतापूर्वक कहिये॥४॥ |
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| भगवन्सम्पगाख्यातं ममैतदखिलं त्वया।<br>जगतः सर्गसम्बन्धि यत्पृष्टोऽसि गुरो मया॥ १<br>योऽयमंशो जगत्सृष्टिसम्बन्धो गदितस्त्वया।<br>तत्राहं श्रोतुमिच्छामि भूयोऽपि मुनिसत्तम॥ २<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ स्वायम्भुवस्य यौ।<br>तयोरुत्तानपादस्य ध्रुवः पुत्रस्त्वयोदितः॥ ३<br>प्रियव्रतस्य नैवोक्ता भवता द्विज सन्ततिः।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि प्रसन्नो वक्तुमर्हसि॥ ४ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— प्रियव्रतने कर्दमजीकी पुत्रीसे विवाह किया था। उससे उनके सम्राट् और कुक्षि नामकी दो कन्याएँ तथा दस पुत्र हुए॥५॥ प्रियव्रतके पुत्र बड़े बुद्धिमान्, बलवान्, विनयसम्पन्न और अपने माता-पिताके अत्यन्त प्रिय कहे जाते हैं; उनके नाम सुनो—॥६॥ वे आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, सवन और पुत्र थे तथा दसवाँ यथार्थनामा ज्योतिष्मान् था। वे प्रियव्रतके पुत्र अपने बल-पराक्रमके कारण विख्यात थे॥७-८॥ उनमें महाभाग मेधा, अग्निबाहु और पुत्र—ये तीन योगपरायण तथा अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त जाननेवाले थे। उन्होंने राज्य आदि भोगोंमें अपना चित्त नहीं लगाया॥९॥ |
| कर्दमस्यात्मजां कन्यामुपयेमे प्रियव्रतः।<br>सम्राट् कुक्षिश्च तत्कन्ये दशपुत्रास्तथाऽपरे॥ ५<br>महाप्रज्ञा महावीर्या विनीता दयिता पितुः।<br>प्रियव्रतसुताः ख्यातास्तेषां नामानि मे शृणु॥ ६<br>आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च वपुष्मान्द्युतिमांस्तथा।<br>मेधा मेधातिथिर्भव्यः सवनः पुत्र एव च॥ ७<br>ज्योतिष्मान्दशमस्तेषां सत्यनामा सुतोऽभवत्।<br>प्रियव्रतस्य पुत्रास्ते प्रख्याता बलवीर्यतः॥ ८<br>मेधाग्निबाहुपुत्रास्तु त्रयो योगपरायणाः।<br>जातिस्मरा महाभागा न राज्याय मनो दधुः॥ ९ |
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१९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १
| निर्मलाः सर्वकालन्तु समस्तार्थेषु वै मुने।<br>चक्रुःक्रियां यथान्यायम्फलाकाङ्क्षिणो हि ते ॥ १० | हे मुने! वे निर्मलचित्त और कर्म-फलकी इच्छासे रहित थे तथा समस्त विषयोंमें सदा न्यायाानुकूल ही प्रवृत्त होते थे ॥ १० ॥ |
| प्रियव्रतो ददौ तेषां सप्तानां मुनिसत्तम।<br>सप्तद्वीपानि मैत्रेय विभज्य सुमहात्मनाम् ॥ ११ | हे मुनिश्रेष्ठ! राजा प्रियव्रतने अपने शेष सात महात्मा पुत्रोंको सात द्वीप बाँट दिये ॥ ११॥ |
| जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नीध्राय ददौ पिता।<br>मेधातिथेस्तथा प्रादात्प्लक्षद्वीपं तथापरम् ॥ १२ | हे महाभाग! पिता प्रियव्रतने आग्नीध्रको जम्बूद्वीप और मेधातिथिको प्लक्ष नामक दूसरा द्वीप दिया ॥ १२ ॥ |
| शाल्मले च वपुष्मन्तं नरेन्द्रमभिषिक्तवान्।<br>ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान्प्रभुः ॥ १३ | उन्होंने शाल्मलद्वीपमें वपुष्मान्को अभिषिक्त किया; ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया ॥ १३ ॥ |
| द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत्।<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि भव्यं चक्रे प्रियव्रतः।<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं चापि स प्रभुः ॥ १४ | द्युतिमान्को क्रौंचद्वीपके शासनपर नियुक्त किया, भव्यको प्रियव्रतने शाकद्वीपका स्वामी बनाया और सवनको पुष्करद्वीपका अधिपति किया ॥ १४ ॥ |
| जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम ॥ १५<br>तस्य पुत्रा बभूवुस्ते प्रजापतिसमा नव।<br>नाभिः किम्पुरुषश्चैव हरिवर्ष इलावृतः ॥ १६<br>रम्यो हिरण्वान्व्रष्ठश्च कुरुर्भद्राश्व एव च।<br>केतुमालस्तथैवान्यः साधुचेष्टोऽभवन्नृपः ॥ १७ | हे मुनिसत्तम! उनमें जो जम्बूद्वीपके अधीश्वर राजा आग्नीध्र थे उनके प्रजापतिके समान नौ पुत्र हुए। वे नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्वान्, कुरु, भद्राश्व और सत्कर्मशील राजा केतुमाल थे ॥ १५-१७ ॥ हे विप्र! अब उनके जम्बूद्वीपके विभाग सुनो। |
| जम्बूद्वीपविभागांश्च तेषां विप्र निशामय।<br>पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम् ॥ १८ | पिता आग्नीध्रने दक्षिणकी ओरका हिमवर्ष [जिसे अब भारतवर्ष कहते हैं] नाभिको दिया ॥ १८ ॥ |
| हेमकूटं तथा वर्षं ददौ किम्पुरुषाय सः।<br>तृतीयं नैषधं वर्षं हरिवर्षाय दत्तवान् ॥ १९ | इसी प्रकार किम्पुरुषको हेमकूटवर्ष तथा हरिवर्षको तीसरा नैषधवर्ष दिया ॥ १९ ॥ |
| इलावृताय प्रददौ मेरूर्यत्र तु मध्यमः।<br>नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता ॥ २० | जिसके मध्यमें मेरुपर्वत है वह इलावृतवर्ष उन्होंने इलावृतको दिया तथा नीलाचलसे लगा हुआ वर्ष रम्यको दिया ॥ २० ॥ |
| श्वेतं तदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते ॥ २१<br>यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत्कुरवे ददौ।<br>मेरोः पूर्वेण यद्वर्षं भद्राश्वाय प्रदत्तवान् ॥ २२<br>गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्।<br>इत्येतानि ददौ तेभ्यः पुत्रेभ्यः स नरेश्वरः ॥ २३ | पिता आग्नीध्रने उसका उत्तरवर्ती श्वेतवर्ष हिरण्वान्को दिया तथा जो वर्ष श्रृंगवान्पर्वतके उत्तरमें स्थित है वह कुरुको और जो मेरुके पूर्वमें स्थित है वह भद्राश्वको दिया तथा केतुमालको गन्धमादनवर्ष दिया। इस प्रकार राजा आग्नीध्रने अपने पुत्रोंको ये वर्ष दिये ॥ २१-२३ ॥ |
| वर्षेष्वेतेषु तान्पुत्रानभिषिच्य स भूमिपः।<br>शालग्रामं महापुण्यं मैत्रेय तपसे ययौ ॥ २४ | हे मैत्रेय! अपने पुत्रोंको इन वर्षोमें अभिषिक्त कर वे तपस्याके लिये शालग्राम नामक महापवित्र क्षेत्रको चले गये ॥ २४ ॥ |
| यानि किम्पुरुषादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने।<br>तेषांस्वाभाविकीसिद्धिः सुखप्रायाह्ययत्नतः ॥ २५ | हे महामुने! किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं उनमें सुखकी बहुलता है और बिना यत्नके स्वभावसे ही समस्त भोग-सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ २५ ॥ |
अ० १ ] * द्वितीय अंश * ११३
विपर्ययो न तेष्वस्ति जरामृत्युभयं न च।
धर्माधर्मौ न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।
न तेष्वस्ति युगावस्था क्षेत्रेष्वष्टसु सर्वदा॥ २६
हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यर्षभोऽभवत्पुत्रो मेरुदेव्यां महाद्युतिः॥ २७
ऋषभाद्भरतो जज्ञे ज्येष्ठः पुत्रशतस्य सः।
कृत्वा राज्यं स्वधर्मेण तथेष्ट्वा विविधान्मखान्॥ २८
अभिषिच्य सुतं वीरं भरतं पृथिवीपतिः।
तपसे स महाभागः पुलहस्याश्रमं ययौ॥ २९
वानप्रस्थविधानेन तत्रापि कृतनिश्चयः।
तपस्तेपे यथान्यायमियाज स महीपतिः॥ ३०
तपसा कर्षितोऽत्यर्थं कृशो धमनिसन्ततः।
नग्नो वीटां मुखे कृत्वा वीराध्वानं ततो गतः॥ ३१
ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते।
भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रातिष्ठता वनम्॥ ३२
सुमतिर्भरतस्याभूत्पुत्रः परमधार्मिकः।
कृत्वा सम्यग्ददौ तस्मै राज्यमिष्टमखः पिता॥ ३३
पुत्रसङ्क्रामितश्रीस्तु भरतः स महीपतिः।
योगाभ्यासरतः प्राणान् शालग्रामेऽत्यजन्मुने॥ ३४
अजायत च विप्रोऽसौ योगिनां प्रवरे कुले।
मैत्रेय तस्य चरितं कथयिष्यामि ते पुनः॥ ३५
सुमतेस्तेजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत।
परमेष्ठी ततस्तस्मात्प्रतिहारस्तदन्वयः॥ ३६
प्रतिहर्तेति विख्यात उत्पन्नस्तस्य चात्मजः।
भवस्तस्मादथोद्गीथः प्रस्तावस्तत्सुतो विभुः॥ ३७
पृथुस्ततस्ततो नक्तो नक्तस्यापि गयः सुतः।
नरो गयस्य तनयस्तत्पुत्रोऽभूद्विराट् ततः॥ ३८
तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत।
महान्तस्तत्सुतश्चाभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः॥ ३९
त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत्सुतः।
शतजिद्रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं मुने॥ ४०
उनमें किसी प्रकारके विपर्यय (असुख या अकाल-मृत्यु आदि) तथा जरा-मृत्यु आदिका कोई भय नहीं होता और न धर्म, अधर्म अथवा उत्तम, अधम और मध्यम आदिका ही भेद है। उन आठ वर्षोंमें कभी कोई युगपरिवर्तन भी नहीं होता॥ २६॥
महात्मा नाभिका हिम नामक वर्ष था; उनके मेरुदेवीसे अतिशय कान्तिमान् ऋषभ नामक पुत्र हुआ॥ २७॥ ऋषभजीसे भरतका जन्म हुआ जो उनके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े थे। महाभाग पृथिवीपति ऋषभदेवजी धर्मपूर्वक राज्य-शासन तथा विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करनेके अनन्तर अपने वीर पुत्र भरतको राज्याधिकार सौंपकर तपस्याके लिये पुलहाश्रमको चले गये॥ २८-२९॥ महाराज ऋषभने वहाँ भी वानप्रस्थ-आश्रमकी विधिसे रहते हुए निश्चयपूर्वक तपस्या की तथा नियमानुकूल यज्ञानुष्ठान किये॥ ३०॥ वे तपस्याके कारण सूखकर अत्यन्त कृश हो गये और उनके शरीरकी शिराएँ (रक्तवाहिनी नाड़ियाँ) दिखायी देने लगीं। अन्तमें अपने मुखमें एक पत्थरकी बटिया रखकर उन्होंने नग्नावस्थामें महाप्रस्थान किया॥ ३१॥
पिता ऋषभदेवजीने वन जाते समय अपना राज्य भरतजीको दिया था; अतः तबसे यह (हिमवर्ष) इस लोकमें भारतवर्ष नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ३२॥ भरतजीके सुमति नामक परम धार्मिक पुत्र हुआ। पिता भरतने यज्ञानुष्ठानपूर्वक यथेच्छ राज्य-सुख भोगकर उसे सुमतिको सौंप दिया॥ ३३॥ हे मुने! महाराज भरतने पुत्रको राज्यलक्ष्मी सौंपकर योगाभ्यासमें तत्पर हो अन्तमें शालग्रामक्षेत्रमें अपने प्राण छोड़ दिये॥ ३४॥ फिर इन्होंने योगियोंके पवित्र कुलमें ब्राह्मणरूपसे जन्म लिया। हे मैत्रेय! इनका वह चरित्र मैं तुमसे फिर कहूँगा॥ ३५॥
तदनन्तर सुमतिके वीर्यसे इन्द्रद्युम्नका जन्म हुआ, उससे परमेष्ठी और परमेष्ठीका पुत्र प्रतिहार हुआ॥ ३६॥ प्रतिहारके प्रतिहर्ता नामसे विख्यात पुत्र उत्पन्न हुआ तथा प्रतिहर्ताका पुत्र भव, भवका उद्गीथ और उद्गीथका पुत्र अति समर्थ प्रस्ताव हुआ॥ ३७॥ प्रस्तावका पृथु, पृथुका नक्त और नक्तका पुत्र गय हुआ। गयके नर और उसके विराट् नामक पुत्र हुआ॥ ३८॥ उसका पुत्र महावीर्य था, उससे धीमान्का जन्म हुआ तथा धीमान्का पुत्र महान्त और उसका पुत्र मनस्यु हुआ॥ ३९॥ मनस्युका पुत्र त्वष्टा, त्वष्टाका विरज और विरजका पुत्र रज हुआ। हे मुने! रजके पुत्र शतजित्के सौ पुत्र उत्पन्न हुए॥ ४०॥
| ११४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० २ |
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विष्वग्ज्योतिःप्रधानास्ते यैर्रिमा वर्द्धि्ताःप्रजाः।
तैर्रिदं भारतं वर्षं नवभेदमलङ्कृतम्॥ ४१
तेषां वंशप्रसूतैश्च भुक्तेयं भारती पुरा।
कृतत्रेतादिसर्गेण युगाख्यामेकसप्ततिम्॥ ४२
एष स्वायम्भुवः सर्गो येनेदं पूरितं जगत्।
वाराहे तु मुने कल्पे पूर्वमन्वन्तराधिपः॥ ४३
| उनमें विष्वग्ज्योति प्रधान था। उन सौ पुत्रोंसे यहाँकी प्रजा बहुत बढ़ गयी। तब उन्होंने इस भारतवर्षको नौ विभागोंसे विभूषित किया। [अर्थात् वे सब इसको नौ भागोंमें बाँटकर भोगने लगे] ॥ ४१ ॥ उन्हींके वंशधरोंने पूर्वकालमें कृतत्रेतादि युगक्रमसे इकहत्तर युगपर्यन्त इस भारतभूमिको भोगा था॥ ४२ ॥ हे मुने ! यही इस वाराहकल्पमें सबसे पहले मन्वन्तराधिप स्वायम्भुवमनुका वंश है, जिसने उस समय इस सम्पूर्ण संसारको व्याप्त किया हुआ था॥ ४३॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
दूसरा अध्याय
भूगोलका विवरण
श्रीमैत्रेय उवाच
कथितो भवता ब्रह्मन्सर्गः स्वायम्भुवश्च मे।
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तः सकलं मण्डलं भुवः॥ १
यावन्तः सागरा द्वीपास्तथा वर्षाणि पर्वताः।
वनानि सरितः पुर्यो देवादीनां तथा मुने॥ २
यत्प्रमाणमिदं सर्वं यदाधारं यदात्मकम्।
संस्थानमस्य च मुने यथावद्वक्तुमर्हसि॥ ३
श्रीपराशर उवाच
मैत्रेय श्रूयतामेतत्सङ्क्षेपाद् गदतो मम।
नास्य वर्षशतेनापि वक्तुं शक्यो हि विस्तरः॥ ४
जम्बूप्लक्षाह्वयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज।
कुशः क्रौञ्चस्तथा शाकः पुष्करश्चैव सप्तमः॥ ५
एते द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्त सप्तभिरावृताः।
लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलैः समम्॥ ६
जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्थितः।
तस्यापि मेरुमैत्रेय मध्ये कनकपर्वतः॥ ७
चतुराशीतिसाहस्रो योजनैरस्य चोच्छ्रयः॥ ८
प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः।
मूले षोडशसाहस्रो विस्तारस्तस्य सर्वशः॥ ९
| श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! आपने मुझसे स्वायम्भुवमनुके वंशका वर्णन किया। अब मैं आपके मुखारविन्दसे सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका विवरण सुनना चाहता हूँ॥ १॥ हे मुने! जितने भी सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन, नदियाँ और देवता आदिकी पुरियाँ हैं, उन सबका जितना-जितना परिमाण है, जो आधार है, जो उपादान-कारण है और जैसा आकार है, वह सब आप यथावत् वर्णन कीजिये॥ २-३॥
श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! सुनो, मैं इन सब बातोंका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ, इनका विस्तारपूर्वक वर्णन तो सौ वर्षमें भी नहीं हो सकता॥ ४॥ हे द्विज! जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक और सातवाँ पुष्कर—ये सातों द्वीप चारों ओरसे खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जलके सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं॥ ५-६॥
हे मैत्रेय! जम्बूद्वीप इन सबके मध्यमें स्थित है और उसके भी बीचों-बीचमें सुवर्णमय सुमेरुपर्वत है॥ ७॥ इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है और नीचेकी ओर यह सोलह हजार योजन पृथिवीमें घुसा हुआ है। इसका विस्तार ऊपरी भागमें बत्तीस हजार योजन है तथा नीचे (तलैटीमें) केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार
अ० २] * द्वितीय अंश * १९५
| भूपद्मस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकारसंस्थितः ॥ १० | यह पर्वत इस पृथिवीरूप कमलकी कर्णिका (कोश) के |
| हिमवान्हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे । | समान है ॥ ८–१० ॥ इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट |
| नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः ॥ ११ | और निषध तथा उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं [जो भिन्न-भिन्न वर्षोंका विभाग करते हैं] ॥ ११ ॥ |
| लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्यौ दशहीनास्तथापरे । | उनमें बीचके दो पर्वत [निषध और नील] एक-एक |
| सहस्रद्वितयोच्छ्रायास्तावद्विस्तारिणश्च ते ॥ १२ | लाख योजनतक फैले हुए हैं, उनसे दूसरे-दूसरे दस-दस हजार योजन कम हैं। [अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे-नब्बे हजार योजन तथा हिमवान् और शृंगी अस्सी-अस्सी सहस्र योजनतक फैले हुए हैं।] वे सभी दो-दो सहस्र योजन ऊँचे और इतने ही चौड़े हैं ॥ १२ ॥ |
| भारतं प्रथमं वर्षं ततः किम्पुरुषं स्मृतम् । | |
| हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज ॥ १३ | |
| रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानु हिरण्मयम् । | हे द्विज! मेरुपर्वतके दक्षिणकी ओर पहला भारतवर्ष है तथा दूसरा किम्पुरुषवर्ष और तीसरा हरिवर्ष है ॥ १३ ॥ |
| उत्तराः कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा ॥ १४ | उत्तरकी ओर प्रथम रम्यक, फिर हिरण्मय और तदनन्तर उत्तरकुरुवर्ष है जो [द्वीपमण्डलकी सीमापर होनेके कारण] |
| नवसाहस्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम । | भारतवर्षके समान [धनुषाकार] है ॥ १४ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! |
| इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुुरुच्छ्रितः ॥ १५ | इनमेंसे प्रत्येकका विस्तार नौ-नौ हजार योजन है तथा इन सबके बीचमें इलावृतवर्ष है जिसमें सुवर्णमय सुमेरुपर्वत |
| मेरोश्चतुर्दिशं तत्तु नवसाहस्रविस्तृतम् । | खड़ा हुआ है ॥ १५ ॥ हे महाभाग! यह इलावृतवर्ष सुमेरुके |
| इलावृतं महाभाग चत्वारश्चात्र पर्वताः ॥ १६ | चारों ओर नौ हजार योजनतक फैला हुआ है। इसके चारों ओर चार पर्वत हैं ॥ १६ ॥ ये चारों पर्वत मानो सुमेरुको |
| विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छ्रिताः ॥ १७ | धारण करनेके लिये ईश्वरकृत कीलियाँ हैं [क्योंकि इनके |
| पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः । | बिना ऊपरसे विस्तृत और मूलमें संकुचित होनेके कारण सुमेरुके गिरनेकी सम्भावना है]। इनमेंसे मन्दराचल पूर्वमें, |
| विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः ॥ १८ | गन्धमादन दक्षिणमें, विपुल पश्चिममें और सुपार्श्व उत्तरमें है। |
| कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च । | ये सभी दस-दस हजार योजन ऊँचे हैं ॥ १७–१८ ॥ इनपर |
| एकादशशतायामाः पादपा गिरिकेतवः ॥ १९ | पर्वतोंकी ध्वजाओंके समान क्रमशः ग्यारह-ग्यारह सौ योजन ऊँचे कदम्ब, जम्बू, पीपल और वटके वृक्ष हैं ॥ १९ ॥ |
| जम्बूद्वीपस्य सा जम्बूर्नामहेतुर्महामुने । | हे महामुने! इनमें जम्बू (जामुन) वृक्ष जम्बूद्वीपके |
| महागजब्रमाणाति जम्ब्वास्तस्याः फलानि वै । | नामका कारण है। उसके फल महान् गजराजके समान बड़े |
| पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः ॥ २० | होते हैं। जब वे पर्वतपर गिरते हैं तो फटकर सब ओर फैल जाते हैं ॥ २० ॥ उनके रससे निकली जम्बू नामकी प्रसिद्ध |
| रसेन तेषां प्रख्याता तत्र जाम्बूनदीति वै । | नदी वहाँ बहती है, जिसका जल वहाँके रहनेवाले पीते हैं ॥ २१ ॥ |
| सरित्प्रवर्त्तते चापि पीयते तन्निवासिभिः ॥ २१ | उसका पान करनेसे वहाँके शुद्धचित्त लोगोंको पसीना, दुर्गन्ध, |
| न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियक्षयः । | बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता ॥ २२ ॥ उसके किनारेकी |
| तत्पानात्स्वच्छमनसां जनानां तत्र जायते ॥ २२ | मृत्तिका उस रससे मिलकर मन्द-मन्द वायुसे सूखनेपर |
| तीरमृत्तद्रसं प्राप्य सुखवायुविशोषिता । | जाम्बूनद नामक सुवर्ण हो जाती है, जो सिद्ध पुरुषोंका भूषण |
| जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम् ॥ २३ | है ॥ २३ ॥ मेरुके पूर्वमें भद्राश्ववर्ष और पश्चिममें केतुमालवर्ष |
| भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे । | है तथा हे मुनिश्रेष्ठ! इन दोनोंके बीचमें इलावृतवर्ष है ॥ २४ ॥ |
| वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः ॥ २४ |
११६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
| वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।<br>वैभ्राजं पश्चिमे तद्वदुत्तरे नन्दनं स्मृतम्॥ २५<br>अरुणोदं महाभद्रमसितोदं समानसम्।<br>सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥ २६<br>शीताम्भश्च कुमुन्दश्च कुररी माल्यवांस्तथा।<br>वैकङ्कप्रमुखा मेरोः पूर्वतः केसराचलाः॥ २७<br>त्रिकूटः शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा।<br>निषदाद्या दक्षिणतस्तस्य केसरपर्वताः॥ २८<br>शिखिवासाः सवैडूर्यः कपिलो गन्धमादनः।<br>जारुधिप्रमुखास्तद्वत्पश्चिमे केसराचलाः॥ २९<br>मेरोरनन्तराङ्गेषु जठरादिष्ववस्थिताः।<br>शङ्खकूतोऽथ ऋषभो हंसो नागस्तथापरः।<br>कालञ्जाद्याश्च तथा उत्तरे केसराचलाः॥ ३०<br>चतुर्दशसहस्त्राणि योजनानां महापुरी।<br>मेरोरुपरि मैत्रेय ब्रह्मणः प्रथिता दिवि॥ ३१<br>तस्यास्समन्ततश्चाष्टौ दिशासु विदिशासु च।<br>इन्द्रादिलोकपालानां प्रख्याताः प्रवराः पुरः॥ ३२<br>विष्णुपदविनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।<br>समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः॥ ३३<br>सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्द्धा प्रतिपद्यते।<br>सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भाद्रा च वै क्रमात्॥ ३४<br>पूर्वेण शैलात्सीता तु शैलं यात्यन्तरिक्षगा।<br>ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति सार्णवम्॥ ३५<br>तथैवालकनन्दापि दक्षिणेनैत्य भारतम्।<br>प्रयाति सागरं भूत्वा सप्तभेदा महामुने॥ ३६<br>चक्षुश्च पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्ततः।<br>पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति सागरम्॥ ३७<br>भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।<br>अतीत्योत्तरमम्भोधिं समभ्येति महामुने॥ ३८<br>आनीलनिषधायामौ माल्यवद्गन्धमादनौ।<br>तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः॥ ३९<br>भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।<br>पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥ ४० | इसी प्रकार उसके पूर्वकी ओर चैत्ररथ, दक्षिणकी ओर गन्धमादन, पश्चिमकी ओर वैभ्राज और उत्तरकी ओर नन्दन नामक वन है॥ २५॥ तथा सर्वदा देवताओंसे सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस—ये चार सरोवर हैं॥ २६॥<br>हे मैत्रेय! शीताम्भ, कुमुन्द, कुररी, माल्यवान् तथा वैकंक आदि पर्वत [भूपद्मकी कर्णिकारूप] मेरुके पूर्व-दिशाके केसराचल हैं॥ २७॥ त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि केसराचल उसके दक्षिण ओर हैं॥ २८॥ शिखिवासा, वैडूर्य, कपिल, गन्धमादन और जारुधि आदि उसके पश्चिमीय केसरपर्वत हैं॥ २९॥ तथा मेरुके अति समीपस्थ इलावृतवर्षमें और जठरादि देशोंमें स्थित शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग तथा कालंज आदि पर्वत उत्तरदिशाके केसराचल हैं॥ ३०॥<br>हे मैत्रेय! मेरुके ऊपर अन्तरिक्षमें चौदह सहस्र योजनके विस्तारवाली ब्रह्माजीकी महापुरी (ब्रह्मपुरी) है॥ ३१॥ उसके सब ओर दिशा एवं विदिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके आठ अति रमणीक और विख्यात नगर हैं॥ ३२॥ विष्णुपदोद्भवा श्रीगंगाजी चन्द्रमण्डलको चारों ओरसे आप्लावित कर स्वर्गलोकसे ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं॥ ३३॥ वहाँ गिरनेपर वे चारों दिशाओंमें क्रमसे सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामसे चार भागोंमें विभक्त हो जाती हैं॥ ३४॥ उनमेंसे सीता पूर्वकी ओर आकाश-मार्गसे एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर जाती हुई अन्तमें पूर्वस्थित भद्राश्ववर्षको पारकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ३५॥ इसी प्रकार, हे महामुने! अलकनन्दा दक्षिण-दिशाकी ओर भारतवर्षमें आती है और सात भागोंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ३६॥ चक्षु पश्चिमदिशाके समस्त पर्वतोंको पारकर केतुमाल नामक वर्षमें बहती हुई अन्तमें सागरमें जा गिरती है॥ ३७॥ तथा हे महामुने! भद्रा उत्तरके पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षको पार करती हुई उत्तरीय समुद्रमें मिल जाती है॥ ३८॥ माल्यवान् और गन्धमादनपर्वत उत्तर तथा दक्षिणकी ओर नीलाचल और निषधपर्वततक फैले हुए हैं। उन दोनोंके बीचमें कर्णिकाकार मेरुपर्वत स्थित है॥ ३९॥<br>हे मैत्रेय! मर्यादापर्वतोंके बहिर्भागमें स्थित भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष इस लोकपद्मके पत्तोंके समान हैं॥ ४०॥ |
अ० २ ] * द्वितीय अंश * ११७
जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ । तौ दक्षिणोत्तरायामावानीलनिषधायतौ ॥ ४१ गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चायतावुभौ । अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ४२ निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वतावुभौ । मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथा पूर्वे तथा स्थितौ ॥ ४३ त्रिशृङ्गो जारुधिश्चैव उत्तरौ वर्षपर्वतौ । पूर्वपश्चायतावेतावर्णावान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ४४ इत्येते मुनिवर्योक्ता मर्यादापर्वतास्तव । जठराद्याः स्थिता मेरोस्तेषां द्वौ द्वौ चतुर्दिशम् ॥ ४५ मेरोश्चतुर्दिशं ये तु प्रोक्ताः केसरपर्वताः । शीतान्ताद्या मुने तेषामतीव हि मनोरमाः । शैलानामान्तरे द्रोण्यः सिद्धचारणसेविताः ॥ ४६ सुरम्याणि तथा तासु काननानि पुराणि च । लक्ष्मीविष्णुवग्निसूर्यादिदेवानां मुनिसत्तम । तास्वायतनवर्याणि जुष्टानि वरकिन्नरैः ॥ ४७ गन्धर्वयक्षरक्षांसि तथा दैतेयदानवाः । क्रीडन्ति तासु रम्यासु शैलद्रोणीष्वहर्निशम् ॥ ४८ भौमा ह्येते स्मृताः स्वर्गा धर्मिणामालया मुने । नैतेषु पापकर्माणो यान्ति जन्मशतैरपि ॥ ४९ भद्राश्वे भगवान्विष्णुरास्ते हयशिरा द्विज । वराहः केतुमाले तु भारते कूर्मरूपधृक् ॥ ५० मत्स्यरूपश्च गोविन्दः कुरुष्वास्ते जनार्दनः ॥ ५१ विश्वरूपेण सर्वत्र सर्वः सर्वत्रगो हरिः । सर्वस्याधारभूतोऽसौ मैत्रेयास्तेऽखिलात्मकः ॥ ५२ यानि किम्पुरुषादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने । न तेषु शोको नायासो नोद्वेगः क्षुद्भयादिकम् ॥ ५३ स्वस्थाः प्रजा निरातङ्कास्सर्वदुःखविवर्जिताः । दशद्वादशवर्षाणां सहस्राणि स्थिरायुषः ॥ ५४ न तेषु वर्षते देवो भौमान्यम्भांसि तेषु वै । कृतत्रेतादिकं नैव तेषु स्थानेषु कल्पना ॥ ५५ सर्वेष्वेतेषु वर्षेषु सप्त सप्त कुलाचलाः । नद्यश्च शतशस्तेभ्यः प्रसूता या द्विजोत्तम ॥ ५६
जठर और देवकूट—ये दोनों मर्यादापर्वत हैं जो उत्तर और दक्षिणकी ओर नील तथा निषधपर्वततक फैले हुए हैं ॥ ४१ ॥ पूर्व और पश्चिमकी ओर फैले हुए गन्धमादन और कैलास—ये दो पर्वत जिनका विस्तार अस्सी योजन है, समुद्रके भीतर स्थित हैं ॥ ४२ ॥ पूर्वके समान मेरुकी पश्चिम ओर भी निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादापर्वत स्थित हैं ॥ ४३ ॥ उत्तरकी ओर त्रिश्रृंग और जारुधि नामक वर्षपर्वत हैं। ये दोनों पूर्व और पश्चिमकी ओर समुद्रके गर्भमें स्थित हैं ॥ ४४ ॥ इस प्रकार, हे मुनिवर ! तुमसे जठर आदि मर्यादापर्वतोंका वर्णन किया, जिनमेंसे दो-दो मेरुकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं ॥ ४५ ॥
हे मुने ! मेरुके चारों ओर स्थित जिन शीतान्त आदि केसरपर्वतोंके विषयमें तुमसे कहा था, उनके बीचमें सिद्ध-चारणादिसे सेवित अति सुन्दर कन्दराएँ हैं ॥ ४६ ॥ हे मुनिसत्तम ! उनमें सुरम्य नगर तथा उपवन हैं और लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि एवं सूर्य आदि देवताओंके अत्यन्त सुन्दर मन्दिर हैं जो सदा किन्नरश्रेष्ठोंसे सेवित रहते हैं ॥ ४७ ॥ उन सुन्दर पर्वत-द्रोणियोंमें गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य और दानवादि अहर्निश क्रीडा करते हैं ॥ ४८ ॥ हे मुने ! ये सम्पूर्ण स्थान भौम (पृथिवीके) स्वर्ग कहलाते हैं; ये धार्मिक पुरुषोंके निवासस्थान हैं। पापकर्म पुरुष इनमें सौ जन्ममें भी नहीं जा सकते ॥ ४९ ॥
हे द्विज ! श्रीविष्णुभगवान् भद्राश्ववर्षमें हयग्रीवरूपसे, केतुमालवर्षमें वराहरूपसे और भारतवर्षमें कूर्मरूपसे रहते हैं ॥ ५० ॥ तथा वे भक्तप्रतिपालक श्रीगोविन्द कुरुवर्षमें मत्स्यरूपसे रहते हैं। इस प्रकार वे सर्वमय सर्वगामी हरि विश्वरूपसे सर्वत्र ही रहते हैं। हे मैत्रेय ! वे सबके आधारभूत और सर्वात्मक हैं ॥ ५१–५२ ॥ हे महामुने ! किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं उनमें शोक, श्रम, उद्वेग और क्षुधाका भय आदि कुछ भी नहीं है ॥ ५३ ॥ वहाँकी प्रजा स्वस्थ, आतंकहीन और समस्त दुःखोंसे रहित है तथा वहाँके लोग दस-बारह हजार वर्षकी स्थिर आयुवाले होते हैं ॥ ५४ ॥ उनमें वर्षा कभी नहीं होती, केवल पार्थिव जल ही है और न उन स्थानोंमें कृतत्रेतादि युगोंकी ही कल्पना है ॥ ५५ ॥ हे द्विजोत्तम ! इन सभी वर्षोंमें सात-सात कुलपर्वत हैं और उनसे निकली हुई सैकड़ों नदियाँ हैं ॥ ५६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
| ११८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३ |
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तीसरा अध्याय
भारतादि नौ खण्डोंका विभाग
श्रीपराशर उवाच
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ १
नवयोजनसाहस्रो विस्तारोऽस्य महामुने।
कर्मभूमिरियं स्वर्गमपवर्गं च गच्छताम्॥ २
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः।
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥ ३
अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात्प्रयान्ति वै।
तिर्यक्त्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा मुने॥ ४
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गम्यते।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्म भूमौ विधीयते॥ ५
भारतस्यास्य वर्षस्य नवभेदान्निशामय।
इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्॥ ६
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः।
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः॥ ७
योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात्।
पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः॥ ८
ब्राह्मणाःक्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।
इज्यायुद्धवणिज्याद्यैर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः॥ ९
शतद्रूचन्द्रभागाद्या हिमवत्पादनिर्गताः।
वेदस्मृतिमुखाद्याश्च पारियात्रोद्भवा मुने॥ १०
नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विन्ध्याद्रिनिर्गताः।
तापीपयोष्णीनिर्विन्ध्याप्रमुखा ऋक्षसम्भवाः॥ ११
गोदावरी भीमरथी कृष्णवेण्यादिकास्तथा।
सह्यपादोद्भवा नद्यः स्मृताः पापभयापहाः॥ १२
कृतमाला ताम्रपर्णीप्रमुखा मलयोद्भवाः।
त्रिसामा चार्यकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः॥ १३
ऋषिकुल्याकुमाराद्याः शुक्तिमत्पादसम्भवाः।
आसां नद्युपनद्यश्च सन्त्यन्याश्च सहस्रशः॥ १४
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! जो समुद्रके उत्तर तथा हिमालयके दक्षिणमें स्थित है वह देश भारतवर्ष कहलाता है। उसमें भरतकी सन्तान बसी हुई है॥ १॥ हे महामुने! इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त करनेवालोंकी कर्मभूमि है॥ २॥ इसमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं॥ ३॥ हे मुने! इसी देशमें मनुष्य शुभकर्मोंद्वारा स्वर्ग अथवा मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और यहींसे [पाप-कर्मोंमें प्रवृत्त होनेपर] वे नरक अथवा तिर्यग्योनिमें पड़ते हैं॥ ४॥ यहींसे [कर्मानुसार] स्वर्ग, मोक्ष, अन्तरिक्ष अथवा पाताल आदि लोकोंको प्राप्त किया जा सकता है, पृथिवीमें यहाँके सिवा और कहीं भी मनुष्यके लिये कर्मकी विधि नहीं है॥ ५॥
इस भारतवर्षके नौ भाग हैं; उनके नाम ये हैं—इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्रसे घिरा हुआ द्वीप उनमें नवाँ है॥ ६-७॥ यह द्वीप उत्तरसे दक्षिणतक सहस्र योजन है। इसके पूर्वीय भागमें किरातलोग और पश्चिमीयमें यवन बसे हुए हैं॥ ८॥ तथा यज्ञ, युद्ध और व्यापार आदि अपने-अपने कर्मोंकी व्यवस्थाके अनुसार आचरण करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रगण वर्णविभागानुसार मध्यमें रहते हैं॥ ९॥ हे मुने! इसकी शतद्रू और चन्द्रभागा आदि नदियाँ हिमालयकी तलैटीसे वेद और स्मृति आदि पारियात्र पर्वतसे, नर्मदा और सुरसा आदि विन्ध्याचलसे तथा तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्षगिरिसे निकली हैं॥ १०-११॥ गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणी आदि पापहारिणी नदियाँ सह्यपर्वतसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं॥ १२॥ कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचलसे, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरिसे तथा ऋषिकुल्या और कुमारी आदि नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हैं। इनकी और भी सहस्रों शाखा नदियाँ और उपनदियाँ हैं॥ १३-१४॥
अ० ३ ] * द्वितीय अंश * ११९
तास्विमे कुरुपाञ्चाला मध्यदेशादयो जनाः।
पूर्वदेशादिकाश्चैव कामरूपनिवासिनः ॥ १५
पुण्ड्राः कलिङ्गा मगधा दाक्षिणात्याश्च सर्वशः।
तथापरान्ताः सौराष्ट्राः शूराभीरास्तथार्बुदाः ॥ १६
कारूषा मालवाश्चैव पारियात्रनिवासिनः।
सौवीराः सैन्धवा हूणाःसाल्वाःकोशलवासिनः।
माद्रारामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकादयस्तथा ॥ १७
आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सहिताः सदा।
समीपतो महाभाग हृष्टपुष्टजनाकुलाः ॥ १८
इन नदियोंके तटपर कुरु, पांचाल और मध्यदेशादिके रहनेवाले, पूर्वदेश और कामरूपके निवासी, पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दाक्षिणात्यलोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण तथा शूर, आभीर और अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्रनिवासी, सौवीर, सैन्धव, हूण, साल्व और कोशल-देशवासी तथा माद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसीगण रहते हैं ॥ १५-१७ ॥ हे महाभाग! वे लोग सदा आपसमें मिलकर रहते हैं और इन्हींका जल पान करते हैं। इनकी सन्निधिके कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं ॥ १८ ॥
चत्वारि भारते वर्षे युगान्यत्र महामुने।
कृतं त्रेता द्वापरञ्च कलिश्चान्यत्र न क्वचित्॥ १९
हे मुने! इस भारतवर्षमें ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि नामक चार युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं ॥ १९ ॥
तपस्तप्यन्ति मुनयो जुह्वते चात्र यज्विनः।
दानानि चात्र दीयन्ते परलोकार्थमादरात् ॥ २०
इस देशमें परलोकके लिये मुनिजन तपस्या करते हैं, याज्ञिकलोग यज्ञानुष्ठान करते हैं और दानीजन आदरपूर्वक दान देते हैं ॥ २० ॥
पुरुषैर्यज्ञपुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।
यज्ञैर्यज्ञमयो विष्णुरन्यद्वीपेषु चान्यथा ॥ २१
जम्बूद्वीपमें यज्ञमय यज्ञपुरुष भगवान् विष्णुका सदा यज्ञोंद्वारा यजन किया जाता है, इसके अतिरिक्त अन्य द्वीपोंमें उनकी और-और प्रकारसे उपासना होती है ॥ २१ ॥
अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।
यतो हि कर्मभूरेषा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः ॥ २२
हे महामुने! इस जम्बूद्वीपमें भी भारतवर्ष सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मभूमि है इसके अतिरिक्त अन्यान्य देश भोग-भूमियाँ हैं ॥ २२ ॥
अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि सत्तम।
कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसञ्चयात् ॥ २३
हे सत्तम! जीवको सहस्रों जन्मोंके अनन्तर महान् पुण्योंका उदय होनेपर ही कभी इस देशमें मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ २४
देवगण भी निरन्तर यही गान करते हैं कि 'जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्गके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया है वे पुरुष हम देवताओंकी अपेक्षा भी अधिक धन्य (बड़भागी) हैं ॥ २४ ॥
कर्माण्यसङ्कल्पिततत्फलानि
संन्यस्य विष्णौ परमात्मभूते।
अवाप्य तां कर्ममहीमनन्ते
तस्मिँल्लयं ये त्वमलाः प्रयान्ति ॥ २५
जो लोग इस कर्मभूमिमें जन्म लेकर अपने फलाकांक्षासे रहित कर्मोंको परमात्म-स्वरूप श्रीविष्णुभगवान्को अर्पण करनेसे निर्मल (पापपुण्यसे रहित) होकर उन अनन्तमें ही लीन हो जाते हैं [वे धन्य हैं!] ॥ २५ ॥
जानीम नैतत् क्व वयं विलीने
स्वर्गप्रदे कर्मणि देहबन्धम्।
प्राप्स्याम धन्याः खलु ते मनुष्या
ये भारते नेन्द्रियविप्रहीनाः ॥ २६
'पता नहीं, अपने स्वर्गप्रदकर्मोंका क्षय होनेपर हम कहाँ जन्म ग्रहण करेंगे! धन्य तो वे ही मनुष्य हैं जो भारतभूमिमें उत्पन्न होकर इन्द्रियोंकी शक्तिसे हीन नहीं हुए हैं' ॥ २६ ॥
| १२० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ४ |
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नववर्षं तु मैत्रेय जम्बूद्वीपमिदं मया।
लक्षयोजनविस्तारं सङ्क्षेपात्कथितं तव॥ २७
जम्बूद्वीपं समावृत्य लक्षयोजनविस्तरः।
मैत्रेय वलयाकारः स्थितः क्षारोदधिर्बहिः॥ २८
| हे मैत्रेय! इस प्रकार लाख योजनके विस्तारवाले नववर्ष-विशिष्ट इस जम्बूद्वीपका मैंने तुमसे संक्षेपसे वर्णन किया॥ २७॥ हे मैत्रेय! इस जम्बूद्वीपको बाहर चारों ओरसे लाख योजनके विस्तारवाले वलयाकार खारे पानीके समुद्रने घेरा हुआ है॥ २८॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
चौथा अध्याय
प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन
श्रीपराशर उवाच
क्षारोदेन यथा द्वीपो जम्बूसंज्ञोऽभिवेष्टितः।
संवेष्ट्य क्षारमुदधिं प्लक्षद्वीपस्तथा स्थितः॥ १
जम्बूद्वीपस्य विस्तारः शतसाहस्रसम्मितः।
स एव द्विगुणो ब्रह्मन् प्लक्षद्वीप उदाहृतः॥ २
सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वरस्य वै।
ज्येष्ठः शान्तहयो नाम शिशिरस्तदनन्तरः॥ ३
सुखोदयस्तथानन्दः शिवः क्षेमक एव च।
ध्रुवश्च सप्तमस्तेषां प्लक्षद्वीपेश्वरा हि ते॥ ४
पूर्वं शान्तहयं वर्षं शिशिरं च सुखं तथा।
आनन्दं च शिवं चैव क्षेमकं ध्रुवमेव च॥ ५
मर्यादाकारकास्तेषां तथान्ये वर्षपर्वताः।
सप्तैव तेषां नामानि शृणुष्व मुनिसत्तम॥ ६
गोमेदश्चैव चन्द्रश्च नारदो दुन्दुभिस्तथा।
सोमकः सुमनाश्चैव वैभ्राजश्चैव सप्तमः॥ ७
वर्षाचलेषु रम्येषु वर्षेष्वेतेषु चानघाः।
वसन्ति देवगन्धर्वसहिताः सततं प्रजाः॥ ८
तेषु पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।
नाधयो व्याधयो वापि सर्वकालसुखं हि तत्॥ ९
तेषां नद्यस्तु सप्तैव वर्षाणां च समुद्रगाः।
नामतस्ताः प्रवक्ष्यामि श्रुताः पापं हरन्ति याः॥ १०
अनुतप्ता शिखी चैव विपाशा त्रिदिवाक्लमा।
अमृता सुकृता चैव सप्तैतास्तत्र निम्नगाः॥ ११
श्रीपराशरजी बोले— जिस प्रकार जम्बूद्वीप क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ है उसी प्रकार क्षारसमुद्रको घेरे हुए प्लक्षद्वीप स्थित है॥ १॥ जम्बूद्वीपका विस्तार एक लक्ष योजन है; और हे ब्रह्मन्! प्लक्षद्वीपका उससे दूना कहा जाता है॥ २॥ प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके सात पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़ा शान्तहय था और उससे छोटा शिशिर॥ ३॥ उनके अनन्तर क्रमशः सुखोदय, आनन्द, शिव और क्षेमक थे तथा सातवाँ ध्रुव था। ये सब प्लक्षद्वीपके अधीश्वर हुए॥ ४॥ [उनके अपने-अपने अधिकृत वर्षोंमें] प्रथम शान्तहयवर्ष है तथा अन्य शिशिरवर्ष, सुखोदयवर्ष, आनन्दवर्ष, शिववर्ष, क्षेमकवर्ष और ध्रुववर्ष हैं॥ ५॥ तथा उनकी मर्यादा निश्चित करनेवाले अन्य सात पर्वत हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! उनके नाम ये हैं, सुनो—॥ ६॥ गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और सातवाँ वैभ्राज॥ ७॥
इन अति सुरम्य वर्ष-पर्वतों और वर्षोंमें देवता और गन्धर्वोंके सहित सदा निष्पाप प्रजा निवास करती है॥ ८॥ वहाँके निवासीगण पुण्यवान् होते हैं और वे चिरकालतक जीवित रहकर मरते हैं; उनको किसी प्रकारकी आधि-व्याधि नहीं होती, निरन्तर सुख ही रहता है॥ ९॥ उन वर्षोंकी सात ही समुद्रगामिनी नदियाँ हैं। उनके नाम मैं तुम्हें बतलाता हूँ जिनके श्रवणमात्रसे वे पापोंको दूर कर देती हैं॥ १०॥ वहाँ अनुतप्ता, शिखी, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता—ये ही सात नदियाँ हैं॥ ११॥