विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| एते सर्वे प्रवृत्तस्य स्थितौ विष्णोर्महात्मनः।<br>विभूतिभूता राजानो ये चान्ये मुनिसत्तम॥ १६<br>ये भविष्यन्ति ये भूताः सर्वे भूतेश्वरा द्विज।<br>ते सर्वे सर्वभूतस्य विष्णोरंशा द्विजोत्तम॥ १७<br>ये तु देवाधिपतयो ये च दैत्याधिपास्तथा।<br>दानवानां च ये नाथा ये नाथाः पिशिताशिनाम्॥ १८<br>पशूनां ये च पतयः पतयो ये च पक्षिणाम्।<br>मनुष्याणां च सर्पाणां नागानामधिपाश्च ये॥ १९<br>वृक्षाणां पर्वतानां च ग्रहाणां चापि येऽधिपाः।<br>अतीता वर्त्तमानाश्च ये भविष्यन्ति चापरे।<br>ते सर्वे सर्वभूतस्य विष्णोरंशसमुद्भवाः॥ २०<br>न हि पालनसामर्थ्यमृते सर्वेश्वरं हरिम्।<br>स्थितं स्थितौ महाप्राज्ञ भवत्यन्यस्य कस्यचित्॥ २१<br>सृजत्येष जगत्सृष्टौ स्थितौ पाति सनातनः।<br>हन्ति चैवान्तकत्वेन रजःसत्त्वादि संश्रयः॥ २२<br>चतुर्विभागः संसृष्टौ चतुर्धा संस्थितः स्थितौ।<br>प्रलयं च करोत्यन्ते चतुर्भेदो जनार्दनः॥ २३<br>एकेनांशेन ब्रह्मासौ भवत्यव्यक्तमूर्त्तिमान्।<br>मरीचिमिश्राः पतयः प्रजानां चान्यभागशः॥ २४<br>कालस्तृतीयस्तस्यांशः सर्वभूतानि चापरः।<br>इत्थं चतुर्धा संसृष्टौ वर्त्ततेऽसौ रजोगुणः॥ २५<br>एकांशेनास्थितो विष्णुः करोति प्रतिपालनम्।<br>मन्वादिरूपश्चान्येन कालरूपोऽपरेण च॥ २६<br>सर्वभूतेषु चान्येन संस्थितः कुरुते स्थितिम्।<br>सत्त्वं गुणं समाश्रित्य जगतः पुरुषोत्तमः॥ २७<br>आश्रित्य तमसो वृत्तिमन्तकाले तथा पुनः।<br>रुद्रस्वरूपो भगवानेकांशेन भवत्यजः॥ २८<br>अग्न्यन्तकादिरूपेण भागेनान्येन वर्त्तते।<br>कालस्वरूपो भागो यस्सर्वभूतानि चापरः॥ २९<br>विनाशं कुर्वतस्तस्य चतुर्द्धैवं महात्मनः।<br>विभागकल्पना ब्रह्मन् कथ्यते सार्वकालिकी॥ ३०<br>ब्रह्मा दक्षादयः कालस्तथैवाखिलजन्तवः।<br>विभूतयो हरेरेता जगतः सृष्टिहेतवः॥ ३१ | हे मुनिसत्तम! ये तथा अन्य भी जो सम्पूर्ण राजालोग हैं वे सभी विश्वके पालनमें प्रवृत्त परमात्मा श्रीविष्णुभगवान्के विभूतिरूप हैं॥१६॥ हे द्विजोत्तम! जो-जो भूताधिपति पहले हो गये हैं और जो-जो आगे होंगे वे सभी सर्वभूत भगवान् विष्णुके अंश हैं॥१७॥ जो-जो भी देवताओं, दैत्यों, दानवों और मांसभोजियोंके अधिपति हैं, जो-जो पशुओं, पक्षियों, मनुष्यों, सर्पों और नागोंके अधिनायक हैं, जो-जो वृक्षों, पर्वतों और ग्रहोंके स्वामी हैं तथा और भी भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानकालीन जितने भूतेश्वर हैं वे सभी सर्वभूत भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं॥१८-२०॥ हे महाप्राज्ञ! सृष्टिके पालन-कार्यमें प्रवृत्त सर्वेश्वर श्रीहरिको छोड़कर और किसीमें भी पालन करनेकी शक्ति नहीं है॥२१॥ रजः और सत्त्वादि गुणोंके आश्रयसे वे सनातन प्रभु ही जगत्की रचनाके समय रचना करते हैं, स्थितिके समय पालन करते हैं और अन्तसमयमें कालरूपसे संहार करते हैं॥२२॥<br>वे जनार्दन चार विभागसे सृष्टिके और चार विभागसे ही स्थितिके समय रहते हैं तथा चार रूप धारण करके ही अन्तमें प्रलय करते हैं॥२३॥ एक अंशसे वे अव्यक्तस्वरूप ब्रह्मा होते हैं, दूसरे अंशसे मरीचि आदि प्रजापति होते हैं, उनका तीसरा अंश काल है और चौथा सम्पूर्ण प्राणी। इस प्रकार वे रजोगुणविशिष्ट होकर चार प्रकारसे सृष्टिके समय स्थित होते हैं॥२४-२५॥ फिर वे पुरुषोत्तम सत्त्वगुणका आश्रय लेकर जगत्की स्थिति करते हैं। उस समय वे एक अंशसे विष्णु होकर पालन करते हैं, दूसरे अंशसे मनु आदि होते हैं तथा तीसरे अंशसे काल और चौथेसे सर्वभूतोंमें स्थित होते हैं॥२६-२७॥ तथा अन्तकालमें वे अजन्मा भगवान् तमोगुणकी वृत्तिका आश्रय ले एक अंशसे रुद्ररूप, दूसरे भागसे अग्नि और अन्तकादि रूप, तीसरेसे कालरूप और चौथेसे सम्पूर्ण भूतस्वरूप हो जाते हैं॥२८-२९॥ हे ब्रह्मन्! विनाश करनेके लिये उन महात्माकी यह चार प्रकारकी सार्वकालिक विभागकल्पना कही जाती है॥३०॥ ब्रह्मा, दक्ष आदि प्रजापतिगण, काल तथा समस्त प्राणी—ये श्रीहरिकी विभूतियाँ जगत्की सृष्टिकी कारण हैं॥३१॥ |