भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० २२ ] * प्रथम अंश * १०५

बाईसवाँ अध्याय

विष्णुभगवान्‌की विभूति और जगत्‌की व्यवस्थाका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—पूर्वकालमें महर्षियोंने जब महाराज पृथुको राज्यपदपर अभिषिक्त किया तो लोक-पितामह श्रीब्रह्माजीने भी क्रमसे राज्योंका बँटवारा किया॥ १॥ ब्रह्माजीने नक्षत्र, ग्रह, ब्राह्मण, सम्पूर्ण वनस्पति और यज्ञ तथा तप आदिके राज्यपर चन्द्रमाको नियुक्त किया॥ २॥ इसी प्रकार विश्रवाके पुत्र कुबेरजीको राजाओंका, वरुणको जलोंका, विष्णुको आदित्योंका और अग्निको वसुगणोंका अधिपति बनाया॥ ३॥ दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुद्गणका तथा प्रह्लादजीको दैत्य और दानवोंका आधिपत्य दिया॥ ४॥ पितृगणके राज्यपदपर धर्मराज यमको अभिषिक्त किया और सम्पूर्ण गजराजोंका स्वामित्व ऐरावतको दिया॥ ५॥ गरुडको पक्षियोंका, इन्द्रको देवताओंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका और वृषभको गौओंका अधिपति बनाया॥ ६॥ प्रभु ब्रह्माजीने समस्त मृगों (वन्यपशुओं)-का राज्य सिंहको दिया और सर्पोंका स्वामी शेषनागको बनाया॥ ७॥ स्थावरोंका स्वामी हिमालयको, मुनिजनोंका कपिलदेवजीको और नख तथा दाढ़वाले मृगगणका राजा व्याघ्र (बाघ)-को बनाया॥ ८॥ तथा प्लक्ष (पाकर)-को वनस्पतियोंका राजा किया। इसी प्रकार ब्रह्माजीने और-और जातियोंके प्राधान्यकी भी व्यवस्था की॥ ९॥
यदाभिषिक्तः स पृथुः पूर्वं राज्ये महर्षिभिः।<br>ततः क्रमेण राज्यानि ददौ लोकपितामहः॥ १
नक्षत्रग्रहविप्राणां वीरुधां चाप्यशेषतः।<br>सोमं राज्ये दधद्ब्रह्मा यज्ञानां तपसामपि॥ २
राज्ञां वैश्रवणं राज्ये जलानां वरुणं तथा।<br>आदित्यानां पतिं विष्णुं वसूनामथ पावकम्॥ ३
प्रजापतीनां दक्षं तु वासवं मरुतामपि।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादमधिपं ददौ॥ ४
पितॄणां धर्मराजं तं यमं राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>ऐरावतं गजेन्द्राणामशेषाणां पतिं ददौ॥ ५
पतत्रिणां तु गरुडं देवानापि वासवम्।<br>उच्चैःश्रवसमश्वानां वृषभं तु गवामपि॥ ६
मृगाणां चैव सर्वेषां राज्ये सिंहं ददौ प्रभुः।<br>शेषं तु दन्दशूकानामकरोत्पतिमव्ययः॥ ७
हिमालयं स्थावराणां मुनीनां कपिलं मुनिम्।<br>नखिनां दंष्ट्रिणां चैव मृगाणां व्याघ्रमीश्वरम्॥ ८
वनस्पतीनां राजानं प्लक्षमेवाभ्यषेचयत्।<br>एवमेवान्यजातीनां प्राधान्येनाकरोत्प्रभून्॥ ९
एवं विभज्य राज्यानि दिशां पालाननन्तरम्।<br>प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा स्थापयामास सर्वतः॥ १०इस प्रकार राज्योंका विभाग करनेके अनन्तर प्रजापतियोंके स्वामी ब्रह्माजीने सब ओर दिक्पालोंकी स्थापना की॥ १०॥ उन्होंने पूर्व-दिशामें वैराज प्रजापतिके पुत्र राजा सुधन्वाको दिक्पालपदपर अभिषिक्त किया॥ ११॥ तथा दक्षिण-दिशामें कर्दम प्रजापतिके पुत्र राजा शंखपदकी नियुक्ति की॥ १२॥ कभी च्युत न होनेवाले रजसपुत्र महात्मा केतुमान्‌को उन्होंने पश्चिम-दिशामें स्थापित किया॥ १३॥ और पर्जन्य प्रजापतिके पुत्र अति दुर्द्धर्ष राजा हिरण्यरोमाको उत्तर-दिशामें अभिषिक्त किया॥ १४॥ वे आजतक सात द्वीप और अनेकों नगरोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथिवीका अपने-अपने विभागानुसार धर्मपूर्वक पालन करते हैं॥ १५॥
पूर्वस्यां दिशि राजानं वैराजस्य प्रजापतेः।<br>दिशापालं सुधन्वानं सुतं वै सोऽभ्यषेचयत्॥ ११
दक्षिणस्यां दिशि तथा कर्दमस्य प्रजापतेः।<br>पुत्रं शङ्खपदं नाम राजानं सोऽभ्यषेचयत्॥ १२
पश्चिमस्यां दिशि तथा रजसः पुत्रमच्युतम्।<br>केतुमन्तं महात्मानं राजानं सोऽभ्यषेचयत्॥ १३
तथा हिरण्यरोमाणं पर्जन्यस्य प्रजापतेः।<br>उदीच्यां दिशि दुर्द्धर्षं राजानमभ्यषेचयत्॥ १४
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना।<br>यथाप्रदेशमद्यापि धर्मतः परिपाल्यते॥ १५