भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० २२] * प्रथम अंश * १०७


विष्णुर्मन्वादयः कालः सर्वभूतानि च द्विज ।<br>स्थितेर्निमित्तभूतस्य विष्णोरेता विभूतयः ॥ ३२<br><br>रुद्रः कालान्तकाद्याश्च समस्ताश्चैव जन्तवः ।<br>चतुर्धा प्रलयायैता जनार्दनविभूतयः ॥ ३३<br><br>जगदादौ तथा मध्ये सृष्टिराप्रलयाद् द्विज ।<br>धात्रा मरीचिमिश्रैश्च क्रियते जन्तुभिस्तथा ॥ ३४<br><br>ब्रह्मा सृजत्यादिकाले मरीचिप्रमुखास्ततः ।<br>उत्पादयन्त्यपत्यानि जन्तवश्च प्रतिक्षणम् ॥ ३५<br><br>कालेन न विना ब्रह्मा सृष्टिनिष्पादको द्विज ।<br>न प्रजापतयः सर्वे न चैवाखिलजन्तवः ॥ ३६<br><br>एवमेव विभागोऽयं स्थितावप्युपदिश्यते ।<br>चतुर्धा तस्य देवस्य मैत्रेय प्रलये तथा ॥ ३७<br><br>यत्किञ्चित्सृज्यते येन सत्त्वजातेन वै द्विज ।<br>तस्य सृज्यस्य सम्भूतौ तत्सर्वं वै हरेस्तनुः ॥ ३८<br><br>हन्ति यावच्च यत्किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।<br>जनार्दनस्य तद्रौद्रं मैत्रेयान्तकरं वपुः ॥ ३९<br><br>एवमेष जगत्स्रष्टा जगत्पाता तथा जगत् ।<br>जगद्भक्षयिता देवः समस्तस्य जनार्दनः ॥ ४०<br><br>सृष्टिस्थित्यन्तकालेषु त्रिधैवं सम्प्रवर्तते ।<br>गुणप्रवृत्त्या परमं पदं तस्यागुणं महत् ॥ ४१<br><br>तच्च ज्ञानमयं व्यापि स्वसंवेद्यमनौपमम् ।<br>चतुष्प्रकारं तदपि स्वरूपं परमात्मनः ॥ ४२<br><br>श्रीमैत्रेय उवाच<br><br>चतुष्प्रकारतां तस्य ब्रह्मभूतस्य हे मुने ।<br>ममाचक्ष्व यथान्यायं यदुक्तं परमं पदम् ॥ ४३<br><br>श्रीपराशर उवाच<br><br>मैत्रेय कारणं प्रोक्तं साधनं सर्ववस्तुषु ।<br>साध्यं च वस्त्वभिमतं यत्साधयितुमात्मनः ॥ ४४<br><br>योगिनो मुक्तिकामस्य प्राणायामादिसाधनम् ।<br>साध्यं च परमं ब्रह्म पुनर्नार्त्तते यतः ॥ ४५हे द्विज! विष्णु, मनु आदि, काल और समस्त भूतगण—ये जगत्की स्थितिके कारणरूप भगवान् विष्णुकी विभूतियाँ हैं॥ ३२॥ तथा रुद्र, काल, अन्तकादि और सकल जीव—श्रीजनार्दनकी ये चार विभूतियाँ प्रलयकी कारणरूप हैं॥ ३३॥<br><br>हे द्विज! जगत्के आदि और मध्यमें तथा प्रलय-पर्यन्त भी ब्रह्मा, मरीचि आदि तथा भिन्न-भिन्न जीवोंसे ही सृष्टि हुआ करती है॥ ३४॥ सृष्टिके आरम्भमें पहले ब्रह्माजी रचना करते हैं, फिर मरीचि आदि प्रजापतिगण और तदनन्तर समस्त जीव क्षण-क्षणमें सन्तान उत्पन्न करते रहते हैं॥ ३५॥ हे द्विज! कालके बिना ब्रह्मा, प्रजापति एवं अन्य समस्त प्राणी भी सृष्टि-रचना नहीं कर सकते [ अतः भगवान् कालरूप विष्णु ही सर्वदा सृष्टिके कारण हैं ]॥ ३६॥ हे मैत्रेय! इसी प्रकार जगत्की स्थिति और प्रलयमें भी उन देवदेवके चार-चार विभाग बताये जाते हैं॥ ३७॥ हे द्विज! जिस किसी जीवद्वारा जो कुछ भी रचना की जाती है उस उत्पन्न हुए जीवकी उत्पत्तिमें सर्वथा श्रीहरिका शरीर ही कारण है॥ ३८॥ हे मैत्रेय! इसी प्रकार जो कोई स्थावर-जंगम भूतोंमेंसे किसीको नष्ट करता है, वह नाश करनेवाला भी श्रीजनार्दनका अन्तकारक रौद्ररूप ही है॥ ३९॥ इस प्रकार वे जनार्दनदेव ही समस्त संसारके रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हैं तथा वे ही स्वयं जगत्-रूप भी हैं॥ ४०॥ जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और अन्तके समय वे इसी प्रकार तीनों गुणोंकी प्रेरणासे प्रवृत्त होते हैं, तथापि उनका परमपद महान् निर्गुण है॥ ४१॥ परमात्माका वह स्वरूप ज्ञानमय, व्यापक, स्वसंवेद्य (स्वयं-प्रकाश) और अनुपम है तथा वह भी चार प्रकारका ही है॥ ४२॥<br><br>**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुने! आपने जो भगवान्‌का परम पद कहा, वह चार प्रकारका कैसे है? यह आप मुझसे विधिपूर्वक कहिये॥ ४३॥<br><br>**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! सब वस्तुओंका जो कारण होता है वही उनका साधन भी होता है और जिस अपनी अभिमत वस्तुकी सिद्धि की जाती है वही साध्य कहलाती है॥ ४४॥ मुक्तिकी इच्छावाले योगिजनोंके लिये प्राणायाम आदि साधन हैं और परब्रह्म ही साध्य है, जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता॥ ४५॥

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