विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २२ ] * प्रथम अंश * १०९
सर्वशक्तिमयो विष्णुः स्वरूपं ब्रह्मणः परम्। मूर्त्तं यद्योगिभिः पूर्वं योगारम्भेषु चिन्त्यते ॥ ६१
सालम्बनो महायोगः सबीजो यत्र संस्थितः। मनस्यव्याहते सम्यग्युज्जतां जायते मुने ॥ ६२
स परः परशक्तीनां ब्रह्मणः समनन्तरम्। मूर्त्तं ब्रह्म महाभाग सर्वब्रह्ममयो हरिः ॥ ६३
तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्। ततो जगज्जगत्तस्मिन्स जगच्चाखिलं मुने ॥ ६४
क्षराक्षरमयो विष्णुर्बिभर्त्यखिलमीश्वरः। पुरुषाव्याकृतमयं भूषणास्त्रस्वरूपवत् ॥ ६५
श्रीमैत्रेय उवाच
भूषणास्त्रस्वरूपस्थं यच्चैतदखिलं जगत्। बिभर्त्ति भगवान्विष्णुस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ ६६
श्रीपराशर उवाच
नमस्कृत्याप्रमेयाय विष्णवे प्रभविष्णवे। कथयामि यथाख्यातं वसिष्ठेन ममाभवत् ॥ ६७
आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम्। बिभर्त्ति कौस्तुभमणिस্বরূপं भगवान्हरिः ॥ ६८
श्रीवत्ससंस्थानधरमनन्तेन समाश्रितम्। प्रधानं बुद्धिरप्यास्ते गदारूपेण माधवे ॥ ६९
भूतादिमिन्द्रियादिं च द्विधाहङ्कारमीश्वरः। बिभर्त्ति शङ्खरूपेण शार्ङ्गरूपेण च स्थितम् ॥ ७०
चलत्स्वरूपमत्यन्तं जवेनान्तरितानिलम्। चक्रस्वरूपं च मनो धत्ते विष्णुकरे स्थितम् ॥ ७१
पञ्चरूपा तु या माला वैजयन्ती गदाभृतः। सा भूतहेतुसङ्घाता भूतमाला च वै द्विज ॥ ७२
यानीन्द्रियाण्यशेषाणि बुद्धिकर्मात्मकानि वै। शररूपाण्यशेषाणि तानि धत्ते जनार्दनः ॥ ७३
बिभर्त्ति यच्चासिरत्नमच्युतोऽत्यन्तनिर्मलम्। विद्यामयं तु तज्ज्ञानमविद्याकोशसंस्थितम् ॥ ७४
इत्थं पुमान्प्रधानं च बुद्धयहङ्कारमेव च। भूतानि च हृषीकेशे मनः सर्वेन्द्रियाणि च। विद्याविद्ये च मैत्रेय सर्वमेतत्समाश्रितम् ॥ ७५
सर्वशक्तिमय विष्णु ही ब्रह्मके पर-स्वरूप तथा मूर्तरूप हैं जिनका योगिजन योगारम्भके पूर्व चिन्तन करते हैं ॥ ६१ ॥
हे मुने! जिनमें मनको सम्यक्-प्रकारसे निरन्तर एकाग्र करनेवालोंको आलम्बनयुक्त सबीज (सम्प्रज्ञात) महायोगकी प्राप्ति होती है, हे महाभाग ! हे सर्वब्रह्ममय श्रीविष्णुभगवान् समस्त परा शक्तियोंमें प्रधान और ब्रह्मके अत्यन्त निकटवर्ती मूर्त-ब्रह्मस्वरूप हैं॥ ६२-६३ ॥ हे मुने ! उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है, उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है और स्वयं वे ही समस्त जगत् हैं ॥ ६४ ॥ क्षराक्षरमय (कार्य-कारण-रूप) ईश्वर विष्णु ही इस पुरुष-प्रकृतिमय सम्पूर्ण जगत्को अपने आभूषण और आयुधरूपसे धारण करते हैं ॥ ६५ ॥
श्रीमैत्रेयजी बोले— भगवान् विष्णु इस संसारको भूषण और आयुधरूपसे किस प्रकार धारण करते हैं यह आप मुझसे कहिये ॥ ६६ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मुने ! जगत्का पालन करनेवाले अप्रमेय श्रीविष्णुभगवान्को नमस्कार कर अब मैं, जिस प्रकार वसिष्ठजीने मुझसे कहा था वह तुम्हें सुनाता हूँ ॥ ६७ ॥ इस जगत्के निर्लेप तथा निर्गुण और निर्मल आत्माको अर्थात् शुद्ध क्षेत्रज्ञ-स्वरूपको श्रीहरि कौस्तुभमणिरूपसे धारण करते हैं ॥ ६८ ॥ श्रीअनन्तने प्रधानको श्रीवत्सरूपसे आश्रय दिया है और बुद्धि श्रीमाधवकी गदारूपसे स्थित है ॥ ६९ ॥ भूतोंके कारण तामस अहंकार और इन्द्रियोंके कारण राजस अहंकार इन दोनोंको वे शंख और शार्ङ्ग धनुषरूपसे धारण करते हैं ॥ ७० ॥ अपने वेगसे पवनको भी पराजित करनेवाला अत्यन्त चंचल, सात्त्विक अहंकाररूप मन श्रीविष्णुभगवान्के कर-कमलोंमें स्थित चक्रका रूप धारण करता है ॥ ७१ ॥
हे द्विज! भगवान् गदाधरकी जो [ मुक्ता, माणिक्य, मरकत, इन्द्रनील और हीरकमयी ] पंचरूपा वैजयन्ती माला है वह पंचतन्मात्राओं और पंचभूतोंका ही संघात है ॥ ७२ ॥ जो ज्ञान और कर्ममयी इन्द्रियाँ हैं उन सबको श्रीजनार्दन भगवान् बाणरूपसे धारण करते हैं ॥ ७३ ॥ भगवान् अच्युत जो अत्यन्त निर्मल खड्ग धारण करते हैं वह अविद्यामय कोशसे आच्छादित विद्यामय ज्ञान ही है ॥ ७४ ॥ हे मैत्रेय ! इस प्रकार पुरुष, प्रधान, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत, मन, इन्द्रियाँ तथा विद्या और अविद्या सभी श्रीहृषीकेशमें आश्रित हैं ॥ ७५ ॥