भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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११० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२

अस्त्रभूषणसंस्थानस्वरूपं रूपवर्जितः।<br>बिभर्त्ति मायारूपोऽसौ श्रेयसे प्राणिनां हरिः ॥ ७६<br>सविकारं प्रधानं च पुमांसमखिलं जगत्।<br>बिभर्त्ति पुण्डरीकाक्षस्तदेवं परमेश्वरः॥ ७७<br>याविद्या या तथाविद्या यत्सद्यच्चासदव्ययम्।<br>तत्सर्वं सर्वभूतेशे मैत्रेय मधुसूदने ॥ ७८<br>कलाकाष्ठानिमेषादिदिनत्वेयनहायनैः ।<br>कालस्वरूपो भगवानपापो हरिरव्ययः॥ ७९<br>भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोको मुनिसत्तम।<br>महर्जनस्तपः सत्यं सप्त लोका इमे विभुः ॥ ८०<br>लोकात्ममूर्त्तिः सर्वेषां पूर्वेषामपि पूर्वजः।<br>आधारः सर्वविद्यानां स्वयमेव हरिः स्थितः ॥ ८१<br>देवमानुषपश्वादिस्वरूपैर्बहुभिः स्थितः।<br>ततः सर्वेश्वरोऽनन्तो भूतमूर्त्तिरमूर्त्तिमान् ॥ ८२<br>ऋचो यजूंषि सामानि तथैवाथर्वणानि वै।<br>इतिहासोपवेदाश्च वेदान्तेषु तथोक्तयः॥ ८३<br>वेदाङ्गानि समस्तानि मन्वादिगदितानि च।<br>शास्त्राण्यशेषाण्याख्यानान्यनुवाकाश्च ये क्वचित् ॥ ८४<br>काव्यालापाश्च ये केचिद्गीतकान्यखिलानि च।<br>शब्दमूर्त्तिधरस्यैतद्वपुर्विष्णोर्महात्मनः ॥ ८५<br>यानि मूर्त्तान्यमूर्त्तानि यान्यत्रान्यत्र वा क्वचित्।<br>सन्ति वै वस्तुजातानि तानि सर्वाणि तद्वपुः ॥ ८६<br>अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो<br>$\quad\quad\quad$नान्यत्ततः कारणकार्यजातम्।<br>ईदृङ्मना यस्य न तस्य भूयो<br>$\quad\quad\quad$भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ॥ ८७<br>इत्येष तैऽशः प्रथमः पुराणस्यास्य वै द्विज।<br>यथावत्कथितो यस्मिञ्छुते पापैः प्रमुच्यते ॥ ८८<br>कार्त्तिकां पुष्करस्नाने द्वादशाब्देन यत्फलम्।<br>तदस्य श्रवणात्सर्वं मैत्रेयाप्नोति मानवः ॥ ८९<br>देवर्षिपितृगन्धर्वयक्षादीनां च सम्भवम्।<br>भवन्ति शृण्वतः पुंसो देवादद्या वरदा मुने॥ ९०श्रीहरि रूपरहित होकर भी मायामयरूपसे प्राणियोंके कल्याणके लिये इन सबको अस्त्र और भूषणरूपसे धारण करते हैं॥ ७६॥ इस प्रकार वे कमलनयन परमेश्वर सविकार प्रधान [ निर्विकार ], पुरुष तथा सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं॥ ७७॥ जो कुछ भी विद्या-अविद्या, सत्-असत् तथा अव्ययरूप है, हे मैत्रेय ! वह सब सर्वभूतेश्वर श्रीमधुसूदनमें ही स्थित है॥ ७८॥ कला, काष्ठा, निमेष, दिन, ऋतु, अयन और वर्षरूपसे वे कालस्वरूप निष्पाप अव्यय श्रीहरि ही विराजमान हैं॥ ७९॥<br>हे मुनिश्रेष्ठ! भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक तथा मह, जन, तप और सत्य आदि सातों लोक भी सर्वव्यापक भगवान् ही हैं॥ ८०॥ सभी पूर्वजोंके पूर्वज तथा समस्त विद्याओंके आधार श्रीहरि ही स्वयं लोकमयस्वरूपसे स्थित हैं॥ ८१॥ निराकार और सर्वेश्वर श्रीअनन्त ही भूतस्वरूप होकर देव, मनुष्य और पशु आदि नानारूपोंसे स्थित हैं॥ ८२॥ ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद, इतिहास (महाभारतादि), उपवेद (आयुर्वेदादि), वेदान्तवाक्य, समस्त वेदांग, मनु आदि कथित समस्त धर्मशास्त्र, पुराणादि सकल शास्त्र, आख्यान, अनुवाक (कल्पसूत्र) तथा समस्त काव्य-चर्चा और राग-रागिनी आदि जो कुछ भी हैं वे सब शब्दमूर्त्तिधारी परमात्मा विष्णुका ही शरीर हैं॥ ८३-८५॥ इस लोकमें अथवा कहीं और भी जितने मूर्त, अमूर्त पदार्थ हैं, वे सब उन्हींका शरीर हैं॥ ८६॥ 'मैं तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन श्रीहरि ही हैं; उनसे भिन्न और कुछ भी कार्य-कारणादि नहीं है'-जिसके चित्तमें ऐसी भावना है उसे फिर देहजन्य राग-द्वेषादि द्वन्द्वरूप रोगकी प्राप्ति नहीं होती॥ ८७॥<br>हे द्विज ! इस प्रकार तुमसे इस पुराणके पहले अंशका यथावत् वर्णन किया। इसका श्रवण करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ८८॥ हे मैत्रेय ! बारह वर्षतक कार्तिक मासमें पुष्करक्षेत्रमें स्नान करनेसे जो फल होता है; वह सब मनुष्यको इसके श्रवणमात्रसे मिल जाता है॥ ८९॥ हे मुने! देव, ऋषि, गन्धर्व, पितृ और यक्ष आदिकी उत्पत्तिका श्रवण करनेवाले पुरुषको वे देवादि वरदायक हो जाते हैं॥ ९०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥ इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपपरत्वनिर्णायके श्रीमति विष्णुमहापुराणे प्रथमोऽंशः समाप्तः॥