भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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११६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २

वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।<br>वैभ्राजं पश्चिमे तद्वदुत्तरे नन्दनं स्मृतम्॥ २५<br>अरुणोदं महाभद्रमसितोदं समानसम्।<br>सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥ २६<br>शीताम्भश्च कुमुन्दश्च कुररी माल्यवांस्तथा।<br>वैकङ्कप्रमुखा मेरोः पूर्वतः केसराचलाः॥ २७<br>त्रिकूटः शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा।<br>निषदाद्या दक्षिणतस्तस्य केसरपर्वताः॥ २८<br>शिखिवासाः सवैडूर्यः कपिलो गन्धमादनः।<br>जारुधिप्रमुखास्तद्वत्पश्चिमे केसराचलाः॥ २९<br>मेरोरनन्तराङ्गेषु जठरादिष्ववस्थिताः।<br>शङ्खकूतोऽथ ऋषभो हंसो नागस्तथापरः।<br>कालञ्जाद्याश्च तथा उत्तरे केसराचलाः॥ ३०<br>चतुर्दशसहस्त्राणि योजनानां महापुरी।<br>मेरोरुपरि मैत्रेय ब्रह्मणः प्रथिता दिवि॥ ३१<br>तस्यास्समन्ततश्चाष्टौ दिशासु विदिशासु च।<br>इन्द्रादिलोकपालानां प्रख्याताः प्रवराः पुरः॥ ३२<br>विष्णुपदविनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।<br>समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः॥ ३३<br>सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्द्धा प्रतिपद्यते।<br>सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भाद्रा च वै क्रमात्॥ ३४<br>पूर्वेण शैलात्सीता तु शैलं यात्यन्तरिक्षगा।<br>ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति सार्णवम्॥ ३५<br>तथैवालकनन्दापि दक्षिणेनैत्य भारतम्।<br>प्रयाति सागरं भूत्वा सप्तभेदा महामुने॥ ३६<br>चक्षुश्च पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्ततः।<br>पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति सागरम्॥ ३७<br>भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।<br>अतीत्योत्तरमम्भोधिं समभ्येति महामुने॥ ३८<br>आनीलनिषधायामौ माल्यवद्गन्धमादनौ।<br>तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः॥ ३९<br>भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।<br>पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥ ४०इसी प्रकार उसके पूर्वकी ओर चैत्ररथ, दक्षिणकी ओर गन्धमादन, पश्चिमकी ओर वैभ्राज और उत्तरकी ओर नन्दन नामक वन है॥ २५॥ तथा सर्वदा देवताओंसे सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस—ये चार सरोवर हैं॥ २६॥<br>हे मैत्रेय! शीताम्भ, कुमुन्द, कुररी, माल्यवान् तथा वैकंक आदि पर्वत [भूपद्मकी कर्णिकारूप] मेरुके पूर्व-दिशाके केसराचल हैं॥ २७॥ त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि केसराचल उसके दक्षिण ओर हैं॥ २८॥ शिखिवासा, वैडूर्य, कपिल, गन्धमादन और जारुधि आदि उसके पश्चिमीय केसरपर्वत हैं॥ २९॥ तथा मेरुके अति समीपस्थ इलावृतवर्षमें और जठरादि देशोंमें स्थित शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग तथा कालंज आदि पर्वत उत्तरदिशाके केसराचल हैं॥ ३०॥<br>हे मैत्रेय! मेरुके ऊपर अन्तरिक्षमें चौदह सहस्र योजनके विस्तारवाली ब्रह्माजीकी महापुरी (ब्रह्मपुरी) है॥ ३१॥ उसके सब ओर दिशा एवं विदिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके आठ अति रमणीक और विख्यात नगर हैं॥ ३२॥ विष्णुपदोद्भवा श्रीगंगाजी चन्द्रमण्डलको चारों ओरसे आप्लावित कर स्वर्गलोकसे ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं॥ ३३॥ वहाँ गिरनेपर वे चारों दिशाओंमें क्रमसे सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामसे चार भागोंमें विभक्त हो जाती हैं॥ ३४॥ उनमेंसे सीता पूर्वकी ओर आकाश-मार्गसे एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर जाती हुई अन्तमें पूर्वस्थित भद्राश्ववर्षको पारकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ३५॥ इसी प्रकार, हे महामुने! अलकनन्दा दक्षिण-दिशाकी ओर भारतवर्षमें आती है और सात भागोंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ३६॥ चक्षु पश्चिमदिशाके समस्त पर्वतोंको पारकर केतुमाल नामक वर्षमें बहती हुई अन्तमें सागरमें जा गिरती है॥ ३७॥ तथा हे महामुने! भद्रा उत्तरके पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षको पार करती हुई उत्तरीय समुद्रमें मिल जाती है॥ ३८॥ माल्यवान् और गन्धमादनपर्वत उत्तर तथा दक्षिणकी ओर नीलाचल और निषधपर्वततक फैले हुए हैं। उन दोनोंके बीचमें कर्णिकाकार मेरुपर्वत स्थित है॥ ३९॥<br>हे मैत्रेय! मर्यादापर्वतोंके बहिर्भागमें स्थित भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष इस लोकपद्मके पत्तोंके समान हैं॥ ४०॥