भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

अ० २] * द्वितीय अंश * १९५

भूपद्मस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकारसंस्थितः ॥ १०यह पर्वत इस पृथिवीरूप कमलकी कर्णिका (कोश) के
हिमवान्हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे ।समान है ॥ ८–१० ॥ इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट
नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः ॥ ११और निषध तथा उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं [जो भिन्न-भिन्न वर्षोंका विभाग करते हैं] ॥ ११ ॥
लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्यौ दशहीनास्तथापरे ।उनमें बीचके दो पर्वत [निषध और नील] एक-एक
सहस्रद्वितयोच्छ्रायास्तावद्विस्तारिणश्च ते ॥ १२लाख योजनतक फैले हुए हैं, उनसे दूसरे-दूसरे दस-दस हजार योजन कम हैं। [अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे-नब्बे हजार योजन तथा हिमवान् और शृंगी अस्सी-अस्सी सहस्र योजनतक फैले हुए हैं।] वे सभी दो-दो सहस्र योजन ऊँचे और इतने ही चौड़े हैं ॥ १२ ॥
भारतं प्रथमं वर्षं ततः किम्पुरुषं स्मृतम् ।
हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज ॥ १३
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानु हिरण्मयम् ।हे द्विज! मेरुपर्वतके दक्षिणकी ओर पहला भारतवर्ष है तथा दूसरा किम्पुरुषवर्ष और तीसरा हरिवर्ष है ॥ १३ ॥
उत्तराः कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा ॥ १४उत्तरकी ओर प्रथम रम्यक, फिर हिरण्मय और तदनन्तर उत्तरकुरुवर्ष है जो [द्वीपमण्डलकी सीमापर होनेके कारण]
नवसाहस्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम ।भारतवर्षके समान [धनुषाकार] है ॥ १४ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ!
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुुरुच्छ्रितः ॥ १५इनमेंसे प्रत्येकका विस्तार नौ-नौ हजार योजन है तथा इन सबके बीचमें इलावृतवर्ष है जिसमें सुवर्णमय सुमेरुपर्वत
मेरोश्चतुर्दिशं तत्तु नवसाहस्रविस्तृतम् ।खड़ा हुआ है ॥ १५ ॥ हे महाभाग! यह इलावृतवर्ष सुमेरुके
इलावृतं महाभाग चत्वारश्चात्र पर्वताः ॥ १६चारों ओर नौ हजार योजनतक फैला हुआ है। इसके चारों ओर चार पर्वत हैं ॥ १६ ॥ ये चारों पर्वत मानो सुमेरुको
विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छ्रिताः ॥ १७धारण करनेके लिये ईश्वरकृत कीलियाँ हैं [क्योंकि इनके
पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः ।बिना ऊपरसे विस्तृत और मूलमें संकुचित होनेके कारण सुमेरुके गिरनेकी सम्भावना है]। इनमेंसे मन्दराचल पूर्वमें,
विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः ॥ १८गन्धमादन दक्षिणमें, विपुल पश्चिममें और सुपार्श्व उत्तरमें है।
कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च ।ये सभी दस-दस हजार योजन ऊँचे हैं ॥ १७–१८ ॥ इनपर
एकादशशतायामाः पादपा गिरिकेतवः ॥ १९पर्वतोंकी ध्वजाओंके समान क्रमशः ग्यारह-ग्यारह सौ योजन ऊँचे कदम्ब, जम्बू, पीपल और वटके वृक्ष हैं ॥ १९ ॥
जम्बूद्वीपस्य सा जम्बूर्नामहेतुर्महामुने ।हे महामुने! इनमें जम्बू (जामुन) वृक्ष जम्बूद्वीपके
महागजब्रमाणाति जम्ब्वास्तस्याः फलानि वै ।नामका कारण है। उसके फल महान् गजराजके समान बड़े
पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः ॥ २०होते हैं। जब वे पर्वतपर गिरते हैं तो फटकर सब ओर फैल जाते हैं ॥ २० ॥ उनके रससे निकली जम्बू नामकी प्रसिद्ध
रसेन तेषां प्रख्याता तत्र जाम्बूनदीति वै ।नदी वहाँ बहती है, जिसका जल वहाँके रहनेवाले पीते हैं ॥ २१ ॥
सरित्प्रवर्त्तते चापि पीयते तन्निवासिभिः ॥ २१उसका पान करनेसे वहाँके शुद्धचित्त लोगोंको पसीना, दुर्गन्ध,
न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियक्षयः ।बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता ॥ २२ ॥ उसके किनारेकी
तत्पानात्स्वच्छमनसां जनानां तत्र जायते ॥ २२मृत्तिका उस रससे मिलकर मन्द-मन्द वायुसे सूखनेपर
तीरमृत्तद्रसं प्राप्य सुखवायुविशोषिता ।जाम्बूनद नामक सुवर्ण हो जाती है, जो सिद्ध पुरुषोंका भूषण
जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम् ॥ २३है ॥ २३ ॥ मेरुके पूर्वमें भद्राश्ववर्ष और पश्चिममें केतुमालवर्ष
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे ।है तथा हे मुनिश्रेष्ठ! इन दोनोंके बीचमें इलावृतवर्ष है ॥ २४ ॥
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः ॥ २४