भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

११६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २

वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।<br>वैभ्राजं पश्चिमे तद्वदुत्तरे नन्दनं स्मृतम्॥ २५<br>अरुणोदं महाभद्रमसितोदं समानसम्।<br>सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥ २६<br>शीताम्भश्च कुमुन्दश्च कुररी माल्यवांस्तथा।<br>वैकङ्कप्रमुखा मेरोः पूर्वतः केसराचलाः॥ २७<br>त्रिकूटः शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा।<br>निषदाद्या दक्षिणतस्तस्य केसरपर्वताः॥ २८<br>शिखिवासाः सवैडूर्यः कपिलो गन्धमादनः।<br>जारुधिप्रमुखास्तद्वत्पश्चिमे केसराचलाः॥ २९<br>मेरोरनन्तराङ्गेषु जठरादिष्ववस्थिताः।<br>शङ्खकूतोऽथ ऋषभो हंसो नागस्तथापरः।<br>कालञ्जाद्याश्च तथा उत्तरे केसराचलाः॥ ३०<br>चतुर्दशसहस्त्राणि योजनानां महापुरी।<br>मेरोरुपरि मैत्रेय ब्रह्मणः प्रथिता दिवि॥ ३१<br>तस्यास्समन्ततश्चाष्टौ दिशासु विदिशासु च।<br>इन्द्रादिलोकपालानां प्रख्याताः प्रवराः पुरः॥ ३२<br>विष्णुपदविनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।<br>समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः॥ ३३<br>सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्द्धा प्रतिपद्यते।<br>सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भाद्रा च वै क्रमात्॥ ३४<br>पूर्वेण शैलात्सीता तु शैलं यात्यन्तरिक्षगा।<br>ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति सार्णवम्॥ ३५<br>तथैवालकनन्दापि दक्षिणेनैत्य भारतम्।<br>प्रयाति सागरं भूत्वा सप्तभेदा महामुने॥ ३६<br>चक्षुश्च पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्ततः।<br>पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति सागरम्॥ ३७<br>भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।<br>अतीत्योत्तरमम्भोधिं समभ्येति महामुने॥ ३८<br>आनीलनिषधायामौ माल्यवद्गन्धमादनौ।<br>तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः॥ ३९<br>भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।<br>पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥ ४०इसी प्रकार उसके पूर्वकी ओर चैत्ररथ, दक्षिणकी ओर गन्धमादन, पश्चिमकी ओर वैभ्राज और उत्तरकी ओर नन्दन नामक वन है॥ २५॥ तथा सर्वदा देवताओंसे सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस—ये चार सरोवर हैं॥ २६॥<br>हे मैत्रेय! शीताम्भ, कुमुन्द, कुररी, माल्यवान् तथा वैकंक आदि पर्वत [भूपद्मकी कर्णिकारूप] मेरुके पूर्व-दिशाके केसराचल हैं॥ २७॥ त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक और निषाद आदि केसराचल उसके दक्षिण ओर हैं॥ २८॥ शिखिवासा, वैडूर्य, कपिल, गन्धमादन और जारुधि आदि उसके पश्चिमीय केसरपर्वत हैं॥ २९॥ तथा मेरुके अति समीपस्थ इलावृतवर्षमें और जठरादि देशोंमें स्थित शंखकूट, ऋषभ, हंस, नाग तथा कालंज आदि पर्वत उत्तरदिशाके केसराचल हैं॥ ३०॥<br>हे मैत्रेय! मेरुके ऊपर अन्तरिक्षमें चौदह सहस्र योजनके विस्तारवाली ब्रह्माजीकी महापुरी (ब्रह्मपुरी) है॥ ३१॥ उसके सब ओर दिशा एवं विदिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके आठ अति रमणीक और विख्यात नगर हैं॥ ३२॥ विष्णुपदोद्भवा श्रीगंगाजी चन्द्रमण्डलको चारों ओरसे आप्लावित कर स्वर्गलोकसे ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं॥ ३३॥ वहाँ गिरनेपर वे चारों दिशाओंमें क्रमसे सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामसे चार भागोंमें विभक्त हो जाती हैं॥ ३४॥ उनमेंसे सीता पूर्वकी ओर आकाश-मार्गसे एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर जाती हुई अन्तमें पूर्वस्थित भद्राश्ववर्षको पारकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ३५॥ इसी प्रकार, हे महामुने! अलकनन्दा दक्षिण-दिशाकी ओर भारतवर्षमें आती है और सात भागोंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिल जाती है॥ ३६॥ चक्षु पश्चिमदिशाके समस्त पर्वतोंको पारकर केतुमाल नामक वर्षमें बहती हुई अन्तमें सागरमें जा गिरती है॥ ३७॥ तथा हे महामुने! भद्रा उत्तरके पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षको पार करती हुई उत्तरीय समुद्रमें मिल जाती है॥ ३८॥ माल्यवान् और गन्धमादनपर्वत उत्तर तथा दक्षिणकी ओर नीलाचल और निषधपर्वततक फैले हुए हैं। उन दोनोंके बीचमें कर्णिकाकार मेरुपर्वत स्थित है॥ ३९॥<br>हे मैत्रेय! मर्यादापर्वतोंके बहिर्भागमें स्थित भारत, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष इस लोकपद्मके पत्तोंके समान हैं॥ ४०॥

अ० २ ] * द्वितीय अंश * ११७

जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ । तौ दक्षिणोत्तरायामावानीलनिषधायतौ ॥ ४१ गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चायतावुभौ । अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ४२ निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वतावुभौ । मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथा पूर्वे तथा स्थितौ ॥ ४३ त्रिशृङ्गो जारुधिश्चैव उत्तरौ वर्षपर्वतौ । पूर्वपश्चायतावेतावर्णावान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ४४ इत्येते मुनिवर्योक्ता मर्यादापर्वतास्तव । जठराद्याः स्थिता मेरोस्तेषां द्वौ द्वौ चतुर्दिशम् ॥ ४५ मेरोश्चतुर्दिशं ये तु प्रोक्ताः केसरपर्वताः । शीतान्ताद्या मुने तेषामतीव हि मनोरमाः । शैलानामान्तरे द्रोण्यः सिद्धचारणसेविताः ॥ ४६ सुरम्याणि तथा तासु काननानि पुराणि च । लक्ष्मीविष्णुवग्निसूर्यादिदेवानां मुनिसत्तम । तास्वायतनवर्याणि जुष्टानि वरकिन्नरैः ॥ ४७ गन्धर्वयक्षरक्षांसि तथा दैतेयदानवाः । क्रीडन्ति तासु रम्यासु शैलद्रोणीष्वहर्निशम् ॥ ४८ भौमा ह्येते स्मृताः स्वर्गा धर्मिणामालया मुने । नैतेषु पापकर्माणो यान्ति जन्मशतैरपि ॥ ४९ भद्राश्वे भगवान्विष्णुरास्ते हयशिरा द्विज । वराहः केतुमाले तु भारते कूर्मरूपधृक् ॥ ५० मत्स्यरूपश्च गोविन्दः कुरुष्वास्ते जनार्दनः ॥ ५१ विश्वरूपेण सर्वत्र सर्वः सर्वत्रगो हरिः । सर्वस्याधारभूतोऽसौ मैत्रेयास्तेऽखिलात्मकः ॥ ५२ यानि किम्पुरुषादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने । न तेषु शोको नायासो नोद्वेगः क्षुद्भयादिकम् ॥ ५३ स्वस्थाः प्रजा निरातङ्कास्सर्वदुःखविवर्जिताः । दशद्वादशवर्षाणां सहस्राणि स्थिरायुषः ॥ ५४ न तेषु वर्षते देवो भौमान्यम्भांसि तेषु वै । कृतत्रेतादिकं नैव तेषु स्थानेषु कल्पना ॥ ५५ सर्वेष्वेतेषु वर्षेषु सप्त सप्त कुलाचलाः । नद्यश्च शतशस्तेभ्यः प्रसूता या द्विजोत्तम ॥ ५६

जठर और देवकूट—ये दोनों मर्यादापर्वत हैं जो उत्तर और दक्षिणकी ओर नील तथा निषधपर्वततक फैले हुए हैं ॥ ४१ ॥ पूर्व और पश्चिमकी ओर फैले हुए गन्धमादन और कैलास—ये दो पर्वत जिनका विस्तार अस्सी योजन है, समुद्रके भीतर स्थित हैं ॥ ४२ ॥ पूर्वके समान मेरुकी पश्चिम ओर भी निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादापर्वत स्थित हैं ॥ ४३ ॥ उत्तरकी ओर त्रिश्रृंग और जारुधि नामक वर्षपर्वत हैं। ये दोनों पूर्व और पश्चिमकी ओर समुद्रके गर्भमें स्थित हैं ॥ ४४ ॥ इस प्रकार, हे मुनिवर ! तुमसे जठर आदि मर्यादापर्वतोंका वर्णन किया, जिनमेंसे दो-दो मेरुकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं ॥ ४५ ॥

हे मुने ! मेरुके चारों ओर स्थित जिन शीतान्त आदि केसरपर्वतोंके विषयमें तुमसे कहा था, उनके बीचमें सिद्ध-चारणादिसे सेवित अति सुन्दर कन्दराएँ हैं ॥ ४६ ॥ हे मुनिसत्तम ! उनमें सुरम्य नगर तथा उपवन हैं और लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि एवं सूर्य आदि देवताओंके अत्यन्त सुन्दर मन्दिर हैं जो सदा किन्नरश्रेष्ठोंसे सेवित रहते हैं ॥ ४७ ॥ उन सुन्दर पर्वत-द्रोणियोंमें गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य और दानवादि अहर्निश क्रीडा करते हैं ॥ ४८ ॥ हे मुने ! ये सम्पूर्ण स्थान भौम (पृथिवीके) स्वर्ग कहलाते हैं; ये धार्मिक पुरुषोंके निवासस्थान हैं। पापकर्म पुरुष इनमें सौ जन्ममें भी नहीं जा सकते ॥ ४९ ॥

हे द्विज ! श्रीविष्णुभगवान् भद्राश्ववर्षमें हयग्रीवरूपसे, केतुमालवर्षमें वराहरूपसे और भारतवर्षमें कूर्मरूपसे रहते हैं ॥ ५० ॥ तथा वे भक्तप्रतिपालक श्रीगोविन्द कुरुवर्षमें मत्स्यरूपसे रहते हैं। इस प्रकार वे सर्वमय सर्वगामी हरि विश्वरूपसे सर्वत्र ही रहते हैं। हे मैत्रेय ! वे सबके आधारभूत और सर्वात्मक हैं ॥ ५१–५२ ॥ हे महामुने ! किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं उनमें शोक, श्रम, उद्वेग और क्षुधाका भय आदि कुछ भी नहीं है ॥ ५३ ॥ वहाँकी प्रजा स्वस्थ, आतंकहीन और समस्त दुःखोंसे रहित है तथा वहाँके लोग दस-बारह हजार वर्षकी स्थिर आयुवाले होते हैं ॥ ५४ ॥ उनमें वर्षा कभी नहीं होती, केवल पार्थिव जल ही है और न उन स्थानोंमें कृतत्रेतादि युगोंकी ही कल्पना है ॥ ५५ ॥ हे द्विजोत्तम ! इन सभी वर्षोंमें सात-सात कुलपर्वत हैं और उनसे निकली हुई सैकड़ों नदियाँ हैं ॥ ५६ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

११८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ३

तीसरा अध्याय

भारतादि नौ खण्डोंका विभाग

श्रीपराशर उवाच

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ १

नवयोजनसाहस्रो विस्तारोऽस्य महामुने।
कर्मभूमिरियं स्वर्गमपवर्गं च गच्छताम्॥ २

महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः।
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥ ३

अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात्प्रयान्ति वै।
तिर्यक्त्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा मुने॥ ४

इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गम्यते।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्म भूमौ विधीयते॥ ५

भारतस्यास्य वर्षस्य नवभेदान्निशामय।
इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्॥ ६

नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः।
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः॥ ७

योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात्।
पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः॥ ८

ब्राह्मणाःक्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।
इज्यायुद्धवणिज्याद्यैर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः॥ ९

शतद्रूचन्द्रभागाद्या हिमवत्पादनिर्गताः।
वेदस्मृतिमुखाद्याश्च पारियात्रोद्भवा मुने॥ १०

नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विन्ध्याद्रिनिर्गताः।
तापीपयोष्णीनिर्विन्ध्याप्रमुखा ऋक्षसम्भवाः॥ ११

गोदावरी भीमरथी कृष्णवेण्यादिकास्तथा।
सह्यपादोद्भवा नद्यः स्मृताः पापभयापहाः॥ १२

कृतमाला ताम्रपर्णीप्रमुखा मलयोद्भवाः।
त्रिसामा चार्यकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः॥ १३

ऋषिकुल्याकुमाराद्याः शुक्तिमत्पादसम्भवाः।
आसां नद्युपनद्यश्च सन्त्यन्याश्च सहस्रशः॥ १४


श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! जो समुद्रके उत्तर तथा हिमालयके दक्षिणमें स्थित है वह देश भारतवर्ष कहलाता है। उसमें भरतकी सन्तान बसी हुई है॥ १॥ हे महामुने! इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त करनेवालोंकी कर्मभूमि है॥ २॥ इसमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं॥ ३॥ हे मुने! इसी देशमें मनुष्य शुभकर्मोंद्वारा स्वर्ग अथवा मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और यहींसे [पाप-कर्मोंमें प्रवृत्त होनेपर] वे नरक अथवा तिर्यग्योनिमें पड़ते हैं॥ ४॥ यहींसे [कर्मानुसार] स्वर्ग, मोक्ष, अन्तरिक्ष अथवा पाताल आदि लोकोंको प्राप्त किया जा सकता है, पृथिवीमें यहाँके सिवा और कहीं भी मनुष्यके लिये कर्मकी विधि नहीं है॥ ५॥

इस भारतवर्षके नौ भाग हैं; उनके नाम ये हैं—इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्रसे घिरा हुआ द्वीप उनमें नवाँ है॥ ६-७॥ यह द्वीप उत्तरसे दक्षिणतक सहस्र योजन है। इसके पूर्वीय भागमें किरातलोग और पश्चिमीयमें यवन बसे हुए हैं॥ ८॥ तथा यज्ञ, युद्ध और व्यापार आदि अपने-अपने कर्मोंकी व्यवस्थाके अनुसार आचरण करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रगण वर्णविभागानुसार मध्यमें रहते हैं॥ ९॥ हे मुने! इसकी शतद्रू और चन्द्रभागा आदि नदियाँ हिमालयकी तलैटीसे वेद और स्मृति आदि पारियात्र पर्वतसे, नर्मदा और सुरसा आदि विन्ध्याचलसे तथा तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्षगिरिसे निकली हैं॥ १०-११॥ गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणी आदि पापहारिणी नदियाँ सह्यपर्वतसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं॥ १२॥ कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचलसे, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरिसे तथा ऋषिकुल्या और कुमारी आदि नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हैं। इनकी और भी सहस्रों शाखा नदियाँ और उपनदियाँ हैं॥ १३-१४॥

अ० ३ ] * द्वितीय अंश * ११९


तास्विमे कुरुपाञ्चाला मध्यदेशादयो जनाः।
पूर्वदेशादिकाश्चैव कामरूपनिवासिनः ॥ १५
पुण्ड्राः कलिङ्गा मगधा दाक्षिणात्याश्च सर्वशः।
तथापरान्ताः सौराष्ट्राः शूराभीरास्तथार्बुदाः ॥ १६
कारूषा मालवाश्चैव पारियात्रनिवासिनः।
सौवीराः सैन्धवा हूणाःसाल्वाःकोशलवासिनः।
माद्रारामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकादयस्तथा ॥ १७
आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सहिताः सदा।
समीपतो महाभाग हृष्टपुष्टजनाकुलाः ॥ १८

इन नदियोंके तटपर कुरु, पांचाल और मध्यदेशादिके रहनेवाले, पूर्वदेश और कामरूपके निवासी, पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दाक्षिणात्यलोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण तथा शूर, आभीर और अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्रनिवासी, सौवीर, सैन्धव, हूण, साल्व और कोशल-देशवासी तथा माद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसीगण रहते हैं ॥ १५-१७ ॥ हे महाभाग! वे लोग सदा आपसमें मिलकर रहते हैं और इन्हींका जल पान करते हैं। इनकी सन्निधिके कारण वे बड़े हृष्ट-पुष्ट रहते हैं ॥ १८ ॥

चत्वारि भारते वर्षे युगान्यत्र महामुने।
कृतं त्रेता द्वापरञ्च कलिश्चान्यत्र न क्वचित्॥ १९

हे मुने! इस भारतवर्षमें ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि नामक चार युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं ॥ १९ ॥

तपस्तप्यन्ति मुनयो जुह्वते चात्र यज्विनः।
दानानि चात्र दीयन्ते परलोकार्थमादरात् ॥ २०

इस देशमें परलोकके लिये मुनिजन तपस्या करते हैं, याज्ञिकलोग यज्ञानुष्ठान करते हैं और दानीजन आदरपूर्वक दान देते हैं ॥ २० ॥

पुरुषैर्यज्ञपुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।
यज्ञैर्यज्ञमयो विष्णुरन्यद्वीपेषु चान्यथा ॥ २१

जम्बूद्वीपमें यज्ञमय यज्ञपुरुष भगवान् विष्णुका सदा यज्ञोंद्वारा यजन किया जाता है, इसके अतिरिक्त अन्य द्वीपोंमें उनकी और-और प्रकारसे उपासना होती है ॥ २१ ॥

अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।
यतो हि कर्मभूरेषा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः ॥ २२

हे महामुने! इस जम्बूद्वीपमें भी भारतवर्ष सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मभूमि है इसके अतिरिक्त अन्यान्य देश भोग-भूमियाँ हैं ॥ २२ ॥

अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि सत्तम।
कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसञ्चयात् ॥ २३

हे सत्तम! जीवको सहस्रों जन्मोंके अनन्तर महान् पुण्योंका उदय होनेपर ही कभी इस देशमें मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है ॥ २३ ॥

गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥ २४

देवगण भी निरन्तर यही गान करते हैं कि 'जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्गके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया है वे पुरुष हम देवताओंकी अपेक्षा भी अधिक धन्य (बड़भागी) हैं ॥ २४ ॥

कर्माण्यसङ्कल्पिततत्फलानि
संन्यस्य विष्णौ परमात्मभूते।
अवाप्य तां कर्ममहीमनन्ते
तस्मिँल्लयं ये त्वमलाः प्रयान्ति ॥ २५

जो लोग इस कर्मभूमिमें जन्म लेकर अपने फलाकांक्षासे रहित कर्मोंको परमात्म-स्वरूप श्रीविष्णुभगवान्‌को अर्पण करनेसे निर्मल (पापपुण्यसे रहित) होकर उन अनन्तमें ही लीन हो जाते हैं [वे धन्य हैं!] ॥ २५ ॥

जानीम नैतत् क्व वयं विलीने
स्वर्गप्रदे कर्मणि देहबन्धम्।
प्राप्स्याम धन्याः खलु ते मनुष्या
ये भारते नेन्द्रियविप्रहीनाः ॥ २६

'पता नहीं, अपने स्वर्गप्रदकर्मोंका क्षय होनेपर हम कहाँ जन्म ग्रहण करेंगे! धन्य तो वे ही मनुष्य हैं जो भारतभूमिमें उत्पन्न होकर इन्द्रियोंकी शक्तिसे हीन नहीं हुए हैं' ॥ २६ ॥

१२०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ४

नववर्षं तु मैत्रेय जम्बूद्वीपमिदं मया।
लक्षयोजनविस्तारं सङ्क्षेपात्कथितं तव॥ २७
जम्बूद्वीपं समावृत्य लक्षयोजनविस्तरः।
मैत्रेय वलयाकारः स्थितः क्षारोदधिर्बहिः॥ २८

| हे मैत्रेय! इस प्रकार लाख योजनके विस्तारवाले नववर्ष-विशिष्ट इस जम्बूद्वीपका मैंने तुमसे संक्षेपसे वर्णन किया॥ २७॥ हे मैत्रेय! इस जम्बूद्वीपको बाहर चारों ओरसे लाख योजनके विस्तारवाले वलयाकार खारे पानीके समुद्रने घेरा हुआ है॥ २८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥


चौथा अध्याय

प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन

श्रीपराशर उवाच

क्षारोदेन यथा द्वीपो जम्बूसंज्ञोऽभिवेष्टितः।
संवेष्ट्य क्षारमुदधिं प्लक्षद्वीपस्तथा स्थितः॥ १

जम्बूद्वीपस्य विस्तारः शतसाहस्रसम्मितः।
स एव द्विगुणो ब्रह्मन् प्लक्षद्वीप उदाहृतः॥ २

सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वरस्य वै।
ज्येष्ठः शान्तहयो नाम शिशिरस्तदनन्तरः॥ ३

सुखोदयस्तथानन्दः शिवः क्षेमक एव च।
ध्रुवश्च सप्तमस्तेषां प्लक्षद्वीपेश्वरा हि ते॥ ४

पूर्वं शान्तहयं वर्षं शिशिरं च सुखं तथा।
आनन्दं च शिवं चैव क्षेमकं ध्रुवमेव च॥ ५

मर्यादाकारकास्तेषां तथान्ये वर्षपर्वताः।
सप्तैव तेषां नामानि शृणुष्व मुनिसत्तम॥ ६

गोमेदश्चैव चन्द्रश्च नारदो दुन्दुभिस्तथा।
सोमकः सुमनाश्चैव वैभ्राजश्चैव सप्तमः॥ ७

वर्षाचलेषु रम्येषु वर्षेष्वेतेषु चानघाः।
वसन्ति देवगन्धर्वसहिताः सततं प्रजाः॥ ८

तेषु पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।
नाधयो व्याधयो वापि सर्वकालसुखं हि तत्॥ ९

तेषां नद्यस्तु सप्तैव वर्षाणां च समुद्रगाः।
नामतस्ताः प्रवक्ष्यामि श्रुताः पापं हरन्ति याः॥ १०

अनुतप्ता शिखी चैव विपाशा त्रिदिवाक्लमा।
अमृता सुकृता चैव सप्तैतास्तत्र निम्नगाः॥ ११

श्रीपराशरजी बोले— जिस प्रकार जम्बूद्वीप क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ है उसी प्रकार क्षारसमुद्रको घेरे हुए प्लक्षद्वीप स्थित है॥ १॥ जम्बूद्वीपका विस्तार एक लक्ष योजन है; और हे ब्रह्मन्! प्लक्षद्वीपका उससे दूना कहा जाता है॥ २॥ प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके सात पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़ा शान्तहय था और उससे छोटा शिशिर॥ ३॥ उनके अनन्तर क्रमशः सुखोदय, आनन्द, शिव और क्षेमक थे तथा सातवाँ ध्रुव था। ये सब प्लक्षद्वीपके अधीश्वर हुए॥ ४॥ [उनके अपने-अपने अधिकृत वर्षोंमें] प्रथम शान्तहयवर्ष है तथा अन्य शिशिरवर्ष, सुखोदयवर्ष, आनन्दवर्ष, शिववर्ष, क्षेमकवर्ष और ध्रुववर्ष हैं॥ ५॥ तथा उनकी मर्यादा निश्चित करनेवाले अन्य सात पर्वत हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! उनके नाम ये हैं, सुनो—॥ ६॥ गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और सातवाँ वैभ्राज॥ ७॥

इन अति सुरम्य वर्ष-पर्वतों और वर्षोंमें देवता और गन्धर्वोंके सहित सदा निष्पाप प्रजा निवास करती है॥ ८॥ वहाँके निवासीगण पुण्यवान् होते हैं और वे चिरकालतक जीवित रहकर मरते हैं; उनको किसी प्रकारकी आधि-व्याधि नहीं होती, निरन्तर सुख ही रहता है॥ ९॥ उन वर्षोंकी सात ही समुद्रगामिनी नदियाँ हैं। उनके नाम मैं तुम्हें बतलाता हूँ जिनके श्रवणमात्रसे वे पापोंको दूर कर देती हैं॥ १०॥ वहाँ अनुतप्ता, शिखी, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता—ये ही सात नदियाँ हैं॥ ११॥

अ० ४ ] * द्वितीय अंश * १२१


एते शैलास्तथा नद्यः प्रधानाः कथितास्तव ।
क्षुद्रशैलास्तथा नद्यस्तत्र सन्ति सहस्रशः ।
ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते ॥ १२
अपसर्पिणी न तेषां वै न चैवोत्सर्पिणी द्विज ।
न त्वेवास्ति युगावस्था तेषु स्थानेषु सप्तसु ॥ १३
त्रेतायुगसमः कालः सर्वदैव महामते ।
प्लक्षद्वीपादिषु ब्रह्मञ्छाकद्वीपान्तिकेषु वै ॥ १४
पञ्च वर्षसहस्राणि जना जीवन्त्यनामयाः ।
धर्माः पञ्च तथैतेषु वर्णाश्रमविभागशः ॥ १५
वर्णांश्च तत्र चत्वारस्तान्निबोध वदामि ते ॥ १६
आर्यकाः कुरराश्चैव विदिश्या भाविनश्च ते ।
विप्रक्षत्रियवैश्यास्ते शूद्राश्च मुनिसत्तम ॥ १७
जम्बूवृक्षप्रमाणस्तु तन्मध्ये सुमहांस्तरुः ।
प्लक्षस्तन्नामसंज्ञोऽयं प्लक्षद्वीपो द्विजोत्तम ॥ १८
इज्यते तत्र भगवांस्तैर्वर्णैरार्यकादिभिः ।
सोमरूपी जगत्स्रष्टा सर्वः सर्वेश्वरो हरिः ॥ १९
प्लक्षद्वीपप्रमाणेण प्लक्षद्वीपः समावृतः ।
तथैवेक्षुरसोदेन परिवेषानुकारिणा ॥ २०
इत्येवं तव मैत्रेय प्लक्षद्वीप उदाहृतः ।
सङ्क्षेपेण मया भूयः शाल्मलं मे निशामय ॥ २१
शाल्मलस्येश्वरो वीरो वपुष्मांस्तत्सुताञ्छृणु ।
तेषां तु नामसंज्ञानि सप्तवर्षाणि तानि वै ॥ २२
श्वेतोऽथ हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा ।
वैद्युतो मानसश्चैव सुप्रभश्च महामुने ॥ २३
शाल्मलेन समुद्रोऽसौ द्वीपेनेक्षुरसोदकः ।
विस्तारद्विगुणेनाथ सर्वतः संवृतः स्थितः ॥ २४
तत्रापि पर्वताः सप्त विज्ञेया रत्नयोनयः ।
वर्षाभिव्यञ्जका ये तु तथा सप्त च निम्नगाः ॥ २५
कुमुदश्चोन्नतश्चैव तृतीयश्च बलाहकः ।
द्रोणो यत्र महौषध्यः स चतुर्थो महीधरः ॥ २६
कङ्कस्तु पञ्चमः षष्ठो महिषः सप्तमस्तथा ।
ककुद्मान्पर्वतवरः सरिन्नामानि मे शृणु ॥ २७


यह मैंने तुमसे प्रधान-प्रधान पर्वत और नदियोंका वर्णन किया है; वहाँ छोटे-छोटे पर्वत और नदियाँ तो और भी सहस्रों हैं। उस देशके हृष्ट-पुष्ट लोग सदा उन नदियोंका जल पान करते हैं॥१२॥ हे द्विज! उन लोगोंमें ह्रास अथवा वृद्धि नहीं होती और न उन सात वर्षोंमें युगकी ही कोई अवस्था है॥१३॥ हे महामते! हे ब्रह्मन्! प्लक्षद्वीपसे लेकर शाकद्वीपपर्यन्त छहों द्वीपोंमें सदा त्रेतायुगके समान समय रहता है॥१४॥ इन द्वीपोंके मनुष्य सदा नीरोग रहकर पाँच हजार वर्षतक जीते हैं और इनमें वर्णाश्रम-विभागानुसार पाँचों धर्म (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) वर्तमान रहते हैं॥१५॥
वहाँ जो चार वर्ण हैं वह मैं तुमको सुनाता हूँ॥१६॥ हे मुनिसत्तम! उस द्वीपमें जो आर्यक, कुरर, विदिश्य और भावी नामक जातियाँ हैं; वे ही क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं॥१७॥ हे द्विजोत्तम! उसीमें जम्बूवृक्षके ही परिमाणवाला एक प्लक्ष (पाकर)-का वृक्ष है, जिसके नामसे उसकी संज्ञा प्लक्षद्वीप हुई है॥१८॥ वहाँ आर्यकादि वर्णोंद्वारा जगत्स्रष्टा, सर्वरूप, सर्वेश्वर भगवान् हरिका सोमरूपसे यजन किया जाता है॥१९॥ प्लक्षद्वीप अपने ही बराबर परिमाणवाले वृत्ताकार इक्षुरसके समुद्रसे घिरा हुआ है॥२०॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपमें प्लक्षद्वीपका वर्णन किया, अब तुम शाल्मलद्वीपका विवरण सुनो॥२१॥
शाल्मलद्वीपके स्वामी वीरवर वपुष्मान् थे। उनके पुत्रोंके नाम सुनो—हे महामुने! वे श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ थे। उनके सात वर्ष उन्हींके नामानुसार संज्ञावाले हैं॥२२-२३॥ यह (प्लक्षद्वीपको घेरनेवाला) इक्षुरसका समुद्र अपनेसे दूने विस्तारवाले इस शाल्मलद्वीपसे चारों ओरसे घिरा हुआ है॥२४॥ वहाँ भी रत्नोंके उद्भवस्थानरूप सात पर्वत हैं, जो उसके सातों वर्षोंके विभाजक हैं तथा सात नदियाँ हैं॥२५॥ पर्वतोंमें पहला कुमुद, दूसरा उन्नत और तीसरा बलाहक है तथा चौथा द्रोणाचल है, जिसमें नाना प्रकारकी महौषधियाँ हैं॥२६॥ पाँचवाँ कंक, छठा महिष और सातवाँ गिरिवर ककुद्मान् है। अब नदियोंके नाम सुनो॥२७॥

१२२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४

योनस्तोया वितृष्णा च चन्द्रा मुक्ता विमोचनी ।<br>निवृत्तिः सप्तमी तासां स्मृतास्ताः पापशान्तिदाः ॥ २८<br>श्वेतञ्च हरितं चैव वैद्युतं मानसं तथा ।<br>जीमूतं रोहितं चैव सुप्रभं चापि शोभनम् ।<br>सप्तैतानि तु वर्षाणि चातुर्वर्ण्ययुतानि वै ॥ २९<br>शाल्मले ये तु वर्णाश्च वसन्त्येते महामुने ।<br>कपिलाश्चारुणाः पीताः कृष्णाश्चैव पृथक् पृथक् ॥ ३०<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव यजन्ति तम्।<br>भगवन्तं समस्तस्य विष्णुमात्मानमव्ययम् ।<br>वायुभूतं मखश्रेष्ठैर्यज्वानो यज्ञसंस्थितिम् ॥ ३१<br>देवानामात्र सान्निध्यमतीव सुमनोहरे ।<br>शाल्मलिः सुमहावृक्षो नाम्ना निर्वृतिकारकः ॥ ३२<br>एष द्वीपः समुद्रेण सुरोदेन समावृतः ।<br>विस्ताराच्छाल्मलस्यैव समेन तु समन्ततः ॥ ३३<br>सुरोदकः परिवृतः कुशद्वीपेन सर्वतः ।<br>शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः ॥ ३४<br>ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे सप्त पुत्राञ्छृणुष्व तान् ॥ ३५<br>उद्भिदो वेणुमांश्चैव वैरथो लम्बनो धृतिः ।<br>प्रभाकरोऽथ कपिलस्तन्नामा वर्षपद्धतिः ॥ ३६<br>तस्मिन्वसन्ति मनुजाः सह दैतेयदानवैः ।<br>तथैव देवगन्धर्वयक्षकिम्पुरुषादयः ॥ ३७<br>वर्णास्तत्रापि चत्वारो निजानुष्ठानतत्पराः ।<br>दमिनः शुष्मिणः स्नेहा मन्देहाश्च महामुने ॥ ३८<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चानुक्रमोदिताः ॥ ३९<br>यथोक्तकर्मकर्तृत्वात्स्वाधिकारक्षयाय ते ।<br>तत्रैव तं कुशद्वीपे ब्रह्मरूपं जनार्दनम् ।<br>यजन्तः क्षपयन्त्युग्रमधिकारफलप्रदम् ॥ ४०<br>विद्रुमो हेमशैलश्च द्युतिमान् पुष्पवांस्तथा ।<br>कुशेशयो हरिश्चैव सप्तमो मन्दराचलः ॥ ४१<br>वर्षाचलास्तु सप्तैते तत्र द्वीपे महामुने ।<br>नद्यश्च सप्त तासां तु शृणु नामान्यनुक्रमात् ॥ ४२<br>धूतपापा शिवा चैव पवित्रा सम्मतिस्तथा ।<br>विद्युदम्भा मही चान्या सर्वपापहरास्त्विमाः ॥ ४३वे योनि, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, मुक्ता, विमोचनी और निवृत्ति हैं तथा स्मरणमात्रसे ही सारे पापोंको शान्त कर देनेवाली हैं ॥ २८ ॥ श्वेत, हरित, वैद्युत, मानस, जीमूत, रोहित और अति शोभायमान सुप्रभ—ये उसके चारों वर्णोंसे युक्त सात वर्ष हैं ॥ २९ ॥ हे महामुने! शाल्मलद्वीपमें कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण—ये चार वर्ण निवास करते हैं जो पृथक्-पृथक् क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। ये यजनशील लोग सबके आत्मा, अव्यय और यज्ञके आश्रय वायुरूप विष्णुभगवान्‌का श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं॥ ३०-३१॥ इस अत्यन्त मनोहर द्वीपमें देवगण सदा विराजमान रहते हैं। इसमें शाल्मल (सेमल)-का एक महान् वृक्ष है जो अपने नामसे ही अत्यन्त शान्तिदायक है ॥ ३२ ॥ यह द्वीप अपने समान ही विस्तारवाले एक मदिराके समुद्रसे सब ओरसे पूर्णतया घिरा हुआ है ॥ ३३ ॥ और यह सुरासमुद्र शाल्मलद्वीपसे दूने विस्तारवाले कुशद्वीपद्वारा सब ओरसे परिवेष्टित है ॥ ३४ ॥<br>कुशद्वीपमें [वहाँके अधिपति] ज्योतिष्मान्‌के सात पुत्र थे, उनके नाम सुनो। वे उद्भिद, वेणुमान्, वैरथ, लम्बन, धृति, प्रभाकर और कपिल थे। उनके नामानुसार ही वहाँके वर्षोंके नाम पड़े ॥ ३५-३६ ॥ उसमें दैत्य और दानवोंके सहित मनुष्य तथा देव, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर आदि निवास करते हैं ॥ ३७ ॥ हे महामुने! वहाँ भी अपने-अपने कर्मोंमें तत्पर दमी, शुष्मी, स्नेह और मन्देहनामक चार ही वर्ण हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ही हैं॥ ३८-३९॥ अपने प्रारब्धक्षयके निमित्त शास्त्रानुकूल कर्म करते हुए वहाँ कुशद्वीपमें ही वे ब्रह्मरूप जनार्दनकी उपासनाद्वारा अपने प्रारब्धफलके देनेवाले अत्युग्र अहंकारका क्षय करते हैं ॥ ४० ॥ हे महामुने! उस द्वीपमें विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि और सातवाँ मन्दराचल—ये सात वर्षपर्वत हैं। तथा उसमें सात ही नदियाँ हैं, उनके नाम क्रमशः सुनो— ॥ ४१-४२ ॥ वे धूतपापा, शिवा, पवित्रा, सम्मति, विद्युत्, अम्भा और मही हैं। ये सम्पूर्ण पापोंको हरनेवाली हैं ॥ ४३ ॥

अ० ४ ] * द्वितीय अंश * १२३


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
अन्याः सहस्त्रशस्तत्र क्षुद्रनद्यस्तथाचलाः।<br>कुशद्वीपे कुशस्तम्बः संज्ञया तस्य तत्स्मृतम्॥ ४४वहाँ और भी सहस्रों छोटी-छोटी नदियाँ और पर्वत हैं। कुशद्वीपमें एक कुशका झाड़ है। उसीके कारण इसका यह नाम पड़ा है॥ ४४॥ यह द्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा हुआ है और वह घृत-समुद्र क्रौञ्चद्वीपसे परिवेष्टित है॥ ४५॥
तत्प्रमाणेन स द्वीपो घृतोदेन समावृतः।<br>घृतोदश्च समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ॥ ४५
क्रौञ्चद्वीपो महाभाग श्रूयताञ्चापरो महान्।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणो यस्य विस्तरः ॥ ४६हे महाभाग! अब इसके अगले क्रौञ्चनामक महाद्वीपके विषयमें सुनो, जिसका विस्तार कुशद्वीपसे दूना है॥ ४६॥ क्रौञ्चद्वीपमें महात्मा द्युतिमान्के जो पुत्र थे; उनके नामानुसार ही महाराज द्युतिमान्ने उनके वर्षोंके नाम रखे॥ ४७॥ हे मुने! उसके कुशल, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात पुत्र थे॥ ४८॥ वहाँ भी देवता और गन्धर्वोंसे सेवित अति मनोहर सात वर्षपर्वत हैं। हे महाबुद्धे! उनके नाम सुनो— ॥ ४९॥ उनमें पहला क्रौंच, दूसरा वामन, तीसरा अन्धकारक, चौथा घोड़ीके मुखके समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, पाँचवाँ दिवावृत्, छठा पुण्डरीकवान् और सातवाँ महापर्वत दुन्दुभि है। वे द्वीप परस्पर एक-दूसरेसे दूने हैं; और उन्हींकी भाँति उनके पर्वत भी [उत्तरोत्तर द्विगुण] हैं॥ ५०-५१॥
क्रौञ्चद्वीपे द्युतिमतः पुत्रास्तस्य महात्मनः।<br>तन्नामानि च वर्षाणि तेषां चक्रे महीपतिः॥ ४७
कुशलो मन्दगश्चोष्णः पीवरोऽथान्धकारकः।<br>मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सप्तैते तत्सुता मुने ॥ ४८
तत्रापि देवगन्धर्वसेविताः सुमनोहराः।<br>वर्षाचला महाबुद्धे तेषां नामानि मे शृणु ॥ ४९
क्रौञ्चश्च वामनश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः।<br>चतुर्थो रत्नशैलश्च स्वाहिनी हयसन्निभः॥ ५०
दिवावृत्पञ्चमश्चात्र तथान्यः पुण्डरीकवान्।<br>दुन्दुभिश्च महाशैलो द्विगुणास्ते परस्परम्।<br>द्वीपा द्वीपेषु ये शैला यथा द्वीपेषु ते तथा ॥ ५१
वर्षेष्वेतेषु रम्येषु तथा शैलवरेषु च।<br>निवसन्ति निरातङ्काः सह देवगणैः प्रजाः॥ ५२इन सुरम्य वर्षों और पर्वतश्रेष्ठोंमें देवगणोंके सहित सम्पूर्ण प्रजा निर्भय होकर रहती है॥ ५२॥ हे महामुने! वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमसे पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिष्य कहलाते हैं॥ ५३॥ हे मैत्रेय! वहाँ जिनका जल पान किया जाता है उन नदियोंका विवरण सुनो। उस द्वीपमें सात प्रधान तथा अन्य सैकड़ों क्षुद्र नदियाँ हैं॥ ५४॥ वे सात वर्षनदियाँ गौरी, कुमुद्वती, सन्ध्या, रात्रि, मनोजवा, क्षान्ति और पुण्डरीका हैं॥ ५५॥ वहाँ भी रुद्ररूपी जनार्दन भगवान् विष्णुकी पुष्करादि वर्णोंद्वारा यज्ञादिसे पूजा की जाती है॥ ५६॥ यह क्रौञ्चद्वीप चारों ओरसे अपने तुल्य परिमाणवाले दधिमण्ड (मट्ठे)-के समुद्रसे घिरा हुआ है॥ ५७॥ और हे महामुने! यह मट्ठेका समुद्र भी शाकद्वीपसे घिरा हुआ है, जो विस्तारमें क्रौञ्चद्वीपसे दूना है॥ ५८॥
पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्याख्याश्च महामुने।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चानुक्रमोदिताः ॥ ५३
नदीमैत्रेय ते तत्र याः पिबन्ति शृणुष्व ताः।<br>सप्तप्रधानाः शतशस्तत्रान्याः क्षुद्रनिम्नगाः॥ ५४
गौरी कुमुद्वती चैव सन्ध्या रात्रिर्मनोजवा।<br>क्षान्तिश्च पुण्डरीका च सप्तैता वर्षनिम्नगाः ॥ ५५
तत्रापि विष्णुर्भगवान्पुष्कराद्यैर्जनार्दनः।<br>यागै रुद्रस्वरूपश्च इज्यते यज्ञसन्निधौ ॥ ५६
क्रौञ्चद्वीपः समुद्रेण दधिमण्डोदकेन च।<br>आवृतः सर्वतः क्रौञ्चद्वीपतुल्येन मानतः ॥ ५७
दधिमण्डोदकश्चापि शाकद्वीपेन संवृतः।<br>क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन महामुने ॥ ५८
शाकद्वीपेश्वरस्यापि भव्यस्य सुमहात्मनः।<br>सप्तैव तनयास्तेषां ददौ वर्षाणि सप्त सः ॥ ५९शाकद्वीपके राजा महात्मा भव्यके भी सात ही पुत्र थे। उनको भी उन्होंने पृथक्-पृथक् सात वर्ष दिये॥ ५९॥
१२४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ४
जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मरीचकः ।<br>कुसुमोदश्च मौदाकिः सप्तमश्च महाद्रुमः ॥ ६०<br>तत्संज्ञान्येव तत्रापि सप्त वर्षाण्यनुक्रमात् ।<br>तत्रापि पर्वताः सप्त वर्षविच्छेदकारिणः ॥ ६१<br>पूर्वस्तत्रोदयगिरिर्जलाधारस्तथापरः ।<br>तथा रैवतकः श्यामस्तथैवास्तगिरिर्द्विज ।<br>आम्बिकेयस्तथा रम्यः केसरी पर्वतोत्तमः ॥ ६२<br>शाकस्तत्र महावृक्षः सिद्धगन्धर्वसेवितः ।<br>यत्रत्यवातसंस्पर्शादाह्लादो जायते परः ॥ ६३<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः ।<br>नद्यश्चात्र महापुण्याः सर्वपापभयापहाः ॥ ६४<br>सुकुमारी कुमारी च नलिनी धेनुका च या ।<br>इक्षुश्च वेणुका चैव गभस्ती सप्तमी तथा ॥ ६५<br>अन्याश्च शतशस्तत्र क्षुद्रनद्यो महामुने ।<br>महीधरास्तथा सन्ति शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६६<br>ताः पिबन्ति मुदा युक्ता जलदादिषु ये स्थिताः ।<br>वर्षेषु ते जनपदाः स्वर्गादभ्येत्य मेदिनीम् ॥ ६७<br>धर्महानिर्न तेष्वस्ति न सङ्घर्षः परस्परम् ।<br>मर्यादाव्युत्क्रमो नापि तेषु देशेषु सप्तसु ॥ ६८<br>मगाश्च मागधाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा ।<br>मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मागधाः क्षत्रियास्तथा ।<br>वैश्यास्तु मानसास्तेषां शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः ॥ ६९<br>शाकद्वीपे तु तैर्विष्णुः सूर्यरूपधरो मुने ।<br>यथोक्तैरिज्यते सम्यक्कर्मभिर्नियतात्मभिः ॥ ७०<br>शाकद्वीपस्तु मैत्रेय क्षीरोदेन समावृतः ।<br>शाकद्वीपप्रमाणेन वलयेनेव वेष्टितः ॥ ७१<br>क्षीराब्धिः सर्वतो ब्रह्मन्पुष्कराख्येन वेष्टितः ।<br>द्वीपेन शाकद्वीपात्तु द्विगुणेन समन्ततः ॥ ७२<br>पुष्करे सवनस्यापि महावीरोऽभवत्सुतः ।<br>धातकिश्च तयोस्तत्र द्वे वर्षे नामचिह्निते ।<br>महावीरं तथैवान्यद्धातकीखण्डसंज्ञितम् ॥ ७३<br>एकश्चात्र महाभाग प्रख्यातो वर्षपर्वतः ।<br>मानसोत्तरसंज्ञो वै मध्यतो वलयाकृतिः ॥ ७४वे सात पुत्र जलद, कुमार, सुकुमार, मरीचक, कुसुमोद, मौदाकि और महाद्रुम थे। उन्हींके नामानुसार वहाँ क्रमशः सात वर्ष हैं और वहाँ भी वर्षोंका विभाग करनेवाले सात ही पर्वत हैं ॥ ६०-६१ ॥ हे द्विज! वहाँ पहला पर्वत उदयाचल है और दूसरा जलाधार; तथा अन्य पर्वत रैवतक, श्याम, अस्ताचल, आम्बिकेय और अति सुरम्य गिरिश्रेष्ठ केसरी हैं ॥ ६२ ॥ वहाँ सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित एक अति महान् शाकवृक्ष है, जिसके वायुका स्पर्श करनेसे हृदयमें परम आह्लाद उत्पन्न होता है ॥ ६३ ॥ वहाँ चातुर्वर्ण्यसे युक्त अति पवित्र देश और समस्त पाप तथा भयको दूर करनेवाली सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, वेणुका और गभस्ती—ये सात महापवित्र नदियाँ हैं ॥ ६४-६५ ॥ हे महामुने ! इनके सिवा उस द्वीपमें और भी सैकड़ों छोटी-छोटी नदियाँ और सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं ॥ ६६ ॥ स्वर्ग-भोगके अनन्तर जिन्होंने पृथिवी-तलपर आकर जलद आदि वर्षोंमें जन्म ग्रहण किया है वे लोग प्रसन्न होकर उनका जल पान करते हैं ॥ ६७ ॥ उन सातों वर्षोंमें धर्मका ह्रास पारस्परिक संघर्ष (कलह) अथवा मर्यादाका उल्लंघन कभी नहीं होता ॥ ६८ ॥ वहाँ मग, मागध, मानस और मन्दग—ये चार वर्ण हैं। इनमें मग सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, मागध क्षत्रिय हैं, मानस वैश्य हैं तथा मन्दग शूद्र हैं ॥ ६९ ॥ हे मुने ! शाकद्वीपमें शास्त्रानुकूल कर्म करनेवाले पूर्वोक्त चारों वर्णोंद्वारा संयत चित्तसे विधिपूर्वक सूर्यरूपधारी भगवान् विष्णुकी उपासना की जाती है ॥ ७० ॥ हे मैत्रेय ! वह शाकद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले मण्डलाकार दुग्धके समुद्रसे घिरा हुआ है ॥ ७१ ॥ और हे ब्रह्मन् ! वह क्षीर-समुद्र शाकद्वीपसे दूने परिमाणवाले पुष्करद्वीपसे परिवेष्टित है ॥ ७२ ॥<br>पुष्करद्वीपमें वहाँके अधिपति महाराज सवनके महावीर और धातकि नामक दो पुत्र हुए। अतः उन दोनोंके नामानुसार उसमें महावीर-खण्ड और धातकी-खण्ड नामक दो वर्ष हैं ॥ ७३ ॥ हे महाभाग ! इसमें मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष-पर्वत कहा जाता है जो इसके मध्यमें वलयाकार स्थित है तथा पचास सहस्र

अ० ४ ] * द्वितीय अंश * १२५

योजनानां सहस्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः ।<br>तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः ॥ ७५<br>पुष्करद्वीपवलयं मध्येन विभजन्निव ।<br>स्थितोऽसौ तेन विच्छिन्नं जातं तद्वर्षकद्वयम् ॥ ७६<br>वलयाकारमेकैकं तयोर्वर्षं तथा गिरिः ॥ ७७<br>दशवर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः ।<br>निरामया विशोकाश्च रागद्वेषादिवर्जिताः ॥ ७८<br>अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां न वध्यवधकौ द्विज ।<br>नेर्ष्यासूया भयं द्वेषो दोषो लोभादिको न च ॥ ७९<br>महावीरं बहिर्वर्षं धातकीखण्डमन्ततः ।<br>मानसोत्तरशैलस्य देवदैत्यादिसेवितम् ॥ ८०<br>सत्यानृते न तत्रास्तां द्वीपे पुष्करसंज्ञिते ।<br>न तत्र नद्यः शैला वा द्वीपे वर्षद्वयान्विते ॥ ८१<br>तुल्यवेषास्तु मनुजा देवास्तत्रैकरूपिणः ।<br>वर्णाश्रमाचारहीनं धर्माचरणवर्जितम् ॥ ८२<br>त्रयी वार्ता दण्डनीतिशुश्रूषारहितञ्च यत् ।<br>वर्षद्वयं तु मैत्रेय भौमः स्वर्गोऽयमुत्तमः ॥ ८३<br>सर्वर्तुसुखदः कालो जरारोगादिवर्जितः ।<br>धातकीखण्डसंज्ञेऽथ महावीरे च वै मुने ॥ ८४<br>न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।<br>तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः ॥ ८५<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवेष्टितः ।<br>समेन पुष्करस्यैव विस्तारान्मण्डलं तथा ॥ ८६<br>एवं द्वीपाः समुद्रैश्च सप्त सप्तभिरावृताः ।<br>द्वीपश्चैव समुद्रश्च समानौ द्विगुणौ परौ ॥ ८७<br>पयांसि सर्वदा सर्वसमुद्रेषु समानि वै ।<br>न्यूनातिरिक्तता तेषां कदाचिन्नैव जायते ॥ ८८<br>स्थालीस्थमग्निसंयोगादुद्रेकि सलिलं यथा ।<br>तथेन्दुवृद्धौ सलिलमम्भोधौ मुनिसत्तम ॥ ८९<br>अन्यूनानतिरिक्ताश्च वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च ।<br>उदयास्तमनेष्विन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ ९०योजन ऊँचा और इतना ही सब ओर गोलाकार फैला हुआ है ॥ ७४-७५ ॥ यह पर्वत पुष्करद्वीपरूप गोलेको मानो बीचमेंसे विभक्त कर रहा है और इससे विभक्त होनेसे उसमें दो वर्ष हो गये हैं; उनमेंसे प्रत्येक वर्ष और वह पर्वत वलयाकार ही है ॥ ७६-७७ ॥ वहाँके मनुष्य रोग, शोक और राग-द्वेषादिसे रहित हुए दस सहस्र वर्षतक जीवित रहते हैं ॥ ७८ ॥ हे द्विज ! उनमें उत्तम-अधम अथवा वध्य-वधक आदि (विरोधी) भाव नहीं हैं और न उनमें ईर्ष्या, असूया, भय, द्वेष और लोभादि दोष ही हैं ॥ ७९ ॥ महावीरवर्ष मानसोत्तर पर्वतके बाहरकी ओर है और धातकी-खण्ड भीतरकी ओर। इनमें देव और दैत्य आदि निवास करते हैं ॥ ८० ॥ दो खण्डोंसे युक्त उस पुष्करद्वीपमें सत्य और मिथ्याका व्यवहार नहीं है और न उसमें पर्वत तथा नदियाँ ही हैं ॥ ८१ ॥ वहाँके मनुष्य और देवगण समान वेष और समान रूपवाले होते हैं। हे मैत्रेय ! वर्णाश्रमाचारसे हीन, काम्य कर्मोंसे रहित तथा वेदत्रयी, कृषि, दण्डनीति और शुश्रूषा आदिसे शून्य वे दोनों वर्ष तो मानो अत्युत्तम भौम (पृथिवीके) स्वर्ग हैं ॥ ८२-८३ ॥ हे मुने ! उन महावीर और धातकी-खण्ड नामक वर्षोंमें काल (समय) समस्त ऋतुओंमें सुखदायक और जरा तथा रोगादिसे रहित रहता है ॥ ८४ ॥ पुष्करद्वीपमें ब्रह्माजीका उत्तम निवासस्थान एक न्यग्रोध (वट)-का वृक्ष है, जहाँ देवता और दानवादिसे पूजित श्रीब्रह्माजी विराजते हैं ॥ ८५ ॥ पुष्करद्वीप चारों ओरसे अपने ही समान विस्तारवाले मीठे पानीके समुद्रसे मण्डलके समान घिरा हुआ है ॥ ८६ ॥<br>इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं और वे द्वीप तथा [उन्हें घेरनेवाले] समुद्र परस्पर समान हैं, और उत्तरोत्तर दूने होते गये हैं ॥ ८७ ॥ सभी समुद्रोंमें सदा समान जल रहता है, उसमें कभी न्यूनता अथवा अधिकता नहीं होती ॥ ८८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! पात्रका जल जिस प्रकार अग्निका संयोग होनेसे उबलने लगता है उसी प्रकार चन्द्रमाकी कलाओंके बढ़नेसे समुद्रका जल भी बढ़ने लगता है ॥ ८९ ॥ शुक्ल और कृष्ण पक्षोंमें चन्द्रमाके उदय और अस्तसे न्यूनाधिक न होते हुए ही जल घटता और बढ़ता है ॥ ९० ॥

१२६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ५


दशोत्तराणि पञ्चैव ह्यङ्गुलानां शतानि वै।
अपां वृद्धिक्षयौ दृष्टौ सामुद्रीणां महामुने॥ ९१
भोजनं पुष्करद्वीपे तत्र स्वयमुपस्थितम्।
षड्रसं भुञ्जते विप्र प्रजाः सर्वाः सदैव हि॥ ९२
स्वादूदकस्य परितो दृश्यतेऽलोकसंस्थितिः।
द्विगुणा काञ्चनी भूमिः सर्वजन्तुविवर्जिता॥ ९३
लोकालोकस्ततश्शैलो योजनायुतविस्तृतः।
उच्छ्रायेणापि तावन्ति सहस्राण्यचलो हि सः॥ ९४
ततस्तमः समावृत्य तं शैलं सर्वतः स्थितम्।
तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात्परिवेष्टितम्॥ ९५
पञ्चाशत्कोटिविस्तारा सेयमूर्वी महामुने।
सहैवाण्डकटाहेन सद्वीपाब्धिमहीधरा॥ ९६
सेयं धात्री विधात्री च सर्वभूतगुणाधिका।
आधारभूता सर्वेषां मैत्रेय जगतामिति॥ ९७

हे महामुने! समुद्रके जलकी वृद्धि और क्षय पाँच सौ दस (५१०) अंगुलतक देखी जाती है॥९१॥ हे विप्र! पुष्करद्वीपमें सम्पूर्ण प्रजावर्ग सर्वदा [बिना प्रयत्नके] अपने-आप ही प्राप्त हुए षड्रस भोजनका आहार करते हैं॥९२॥
स्वादूदक (मीठे पानीके) समुद्रके चारों ओर लोक-निवाससे शून्य और समस्त जीवोंसे रहित उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिखायी देती है॥९३॥ वहाँ दस सहस्र योजन विस्तारवाला लोकालोक-पर्वत है। वह पर्वत ऊँचाईमें भी उतने ही सहस्र योजन है॥९४॥ उसके आगे उस पर्वतको सब ओरसे आवृतकर घोर अन्धकार छाया हुआ है, तथा वह अन्धकार चारों ओरसे ब्रह्माण्ड-कटाहसे आवृत है॥९५॥ हे महामुने! अण्डकटाहके सहित द्वीप, समुद्र और पर्वतादियुक्त यह समस्त भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तारवाला है॥९६॥ हे मैत्रेय! आकाशादि समस्त भूतोंसे अधिक गुणवाली यह पृथिवी सम्पूर्ण जगत्‌की आधारभूता और उसका पालन तथा उद्भव करनेवाली है॥९७॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥


पाँचवाँ अध्याय

सात पाताललोकोंका वर्णन

श्रीपराशर उवाच

विस्तार एष कथितः पृथिव्या भवतो मया।
सप्ततिस्तु सहस्राणि द्विजोच्छ्रायोऽपि कथ्यते॥ १
दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम।
अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत्।
महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम्॥ २
शुक्लकृष्णारुणाः पीताः शर्कराः शैलकाञ्चनाः।
भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः॥ ३
तेषु दानवदैतेया यक्षाश्च शतशस्तथा।
निवसन्ति महानागजातयश्च महामुने॥ ४
स्वर्लोकादपि रम्याणि पातालानीति नारदः।
प्राह स्वर्गसदां मध्ये पातालाभ्यागतो दिवि॥ ५
आह्लादकारिणः शुभ्रा मणयो यत्र सुप्रभाः।
नागाभरणभूषासु पातालं केन तत्समम्॥ ६

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! मैंने तुमसे यह पृथिवीका विस्तार कहा; इसकी ऊँचाई भी सत्तर सहस्र योजन कही जाती है॥१॥ हे मुनिसत्तम! अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल और पाताल—इन सातोंमेंसे प्रत्येक दस-दस सहस्र योजनकी दूरीपर है॥२॥ हे मैत्रेय! सुन्दर महलोंसे सुशोभित वहाँकी भूमियाँ शुक्ल, कृष्ण, अरुण और पीत वर्णकी तथा शर्करामयी (कँकरीली), शैली (पत्थरकी) और सुवर्णमयी है॥३॥ हे महामुने! उनमें दानव, दैत्य, यक्ष और बड़े-बड़े नाग आदिकोंकी सैकड़ों जातियाँ निवास करती हैं॥४॥
एक बार नारदजीने पाताललोकसे स्वर्गमें आकर वहाँके निवासियोंसे कहा था कि 'पाताल तो स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर है'॥५॥ जहाँ नागगणके आभूषणोंमें सुन्दर प्रभावुक्त आह्लादकारिणी शुभ्र मणियाँ जड़ी हुई हैं उस पातालको किसके समान कहें?॥६॥

अ० ५ ] * द्वितीय अंश * १२७


दैत्यदानवकन्याभिरितश्चेतश्च शोभिते। पाताले कस्य न प्रीतिर्विमुक्तस्यापि जायते ॥ ७

दिवाकररश्मयो यत्र प्रभां तन्वन्ति नातपम्। शशिरश्मिर्न शीताय निशि द्योताय केवलम् ॥ ८

भक्ष्यभोज्यमहापानमुदितैरपि भोगिभिः। यत्र न ज्ञायते कालो गतोऽपि दनुजादिभिः ॥ ९

वनानि नद्यो रम्याणि सरांसि कमलाकराः। पुंस्कोकिलाभिलापाश्च मनोज्ञान्यम्बराणि च ॥ १०

भूषणान्यतिशुभ्राणि गन्धाढ्यं चानुलेपनम्। वीणावेणुमृदङ्गानां स्वनास्तूर्याणि च द्विज ॥ ११

एतान्यन्यानि चोदारभाग्यभोग्यानि दानवैः। दैत्योरगैश्च भुज्यन्ते पातालान्तरगोचरैः ॥ १२

पातालानामधश्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्यदानवाः ॥ १३

योऽनन्तः पठ्यते सिद्धैर्देवो देवर्षिपूजितः। स सहस्रशिरा व्यक्तस्वस्तिकामलभूषणः ॥ १४

फणामणिसहस्रेण यः स विद्योतयन्दिशः। सर्वान्करोति निर्वीर्यान् हिताय जगतोऽसुरान् ॥ १५

मदाघूर्णितनेत्रोऽसौ यः सदैवैककुण्डलः। किरीटी स्रग्धरो भाति साग्निः श्वेत इवाचलः ॥ १६

नीलवासा मदोत्सिक्तः श्वेतहारोपशोभितः। साभ्रगङ्गाप्रवाहोऽसौ कैलासाद्रिरिवापरः ॥ १७

लाङ्गलासक्तहस्ताग्रो बिभ्रन्मुसलमुत्तमम्। उपास्यते स्वयं कान्त्या यो वारुण्या च मूर्त्तया ॥ १८

कल्पान्ते यस्य वक्त्रेभ्यो विषानलशिखोज्ज्वलः। संकर्षणात्मको रुद्रो निष्क्रम्यात्ति जगत्त्रयम् ॥ १९

स बिभ्रच्छेखरीभूतमशेषं क्षितिमण्डलम्। आस्ते पातालमूलस्थः शेषोऽशेषसुरार्चितः ॥ २०

तस्य वीर्यं प्रभावश्च स्वरूपं रूपमेव च। न हि वर्णयितुं शक्यं ज्ञातुं च त्रिदशैरपि ॥ २१

यस्यैषा सकला पृथ्वी फणामणिशिखारुणा। आस्ते कुसुममालेव कस्तद्वीर्यं वदिष्यति ॥ २२


जहाँ-तहाँ दैत्य और दानवोंकी कन्याओंसे सुशोभित पाताललोकमें किस मुक्त पुरुषकी भी प्रीति न होगी॥ ७॥ जहाँ दिनमें सूर्यकी किरणें केवल प्रकाश ही करती हैं, घाम नहीं करतीं; तथा रातमें चन्द्रमाकी किरणोंसे शीत नहीं होता, केवल चाँदनी ही फैलती है॥ ८॥ जहाँ भक्ष्य, भोज्य और महापानादिके भोगोंसे आनन्दित सर्पों तथा दानवादिकोंको समय जाता हुआ भी प्रतीत नहीं होता॥ ९॥ जहाँ सुन्दर वन, नदियाँ, रमणीय सरोवर और कमलोंके वन हैं, जहाँ नरकोकिलोंकी सुमधुर कूक गूँजती है एवं आकाश मनोहारी है॥ १०॥ और हे द्विज! जहाँ पातालनिवासी दैत्य, दानव एवं नागगणद्वारा अति स्वच्छ आभूषण, सुगन्धमय अनुलेपन, वीणा, वेणु और मृदंगादिके स्वर तथा तूर्य—ये सब एवं भाग्यशालियोंके भोगनेयोग्य और भी अनेक भोग भोगे जाते हैं॥ ११-१२॥

पातालोंके नीचे विष्णुभगवान्‌का शेष नामक जो तमोमय विग्रह है उसके गुणोंका दैत्य अथवा दानवगण भी वर्णन नहीं कर सकते॥ १३॥ जिन देवर्षिपूजित देवका सिद्धगण 'अनन्त' कहकर बखान करते हैं वे अति निर्मल, स्पष्ट स्वस्तिक चिह्नोंसे विभूषित तथा सहस्र सिरवाले हैं॥ १४॥ जो अपने फणोंकी सहस्र मणियोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए संसारके कल्याणके लिये समस्त असुरोंको वीर्यहीन करते रहते हैं॥ १५॥ मदके कारण अरुण नयन, सदैव एक ही कुण्डल पहने हुए तथा मुकुट और माला आदि धारण किये जो अग्नियुक्त श्वेत पर्वतके समान सुशोभित हैं॥ १६॥ मदसे उन्मत्त हुए जो नीलाम्बर तथा श्वेत हारोंसे सुशोभित होकर मेघमाला और गंगाप्रवाहसे युक्त दूसरे कैलास-पर्वतके समान विराजमान हैं॥ १७॥ जो अपने हाथोंमें हल और उत्तम मूसल धारण किये हैं तथा जिनकी उपासना शोभा और वारुणी देवी स्वयं मूर्तिमती होकर करती हैं॥ १८॥ कल्पान्तमें जिनके मुखोंसे विषाग्निशिखाके समान देदीप्यमान संकर्षण नामक रुद्र निकलकर तीनो लोकोंका भक्षण कर जाता है॥ १९॥ व समस्त देवगणोंसे वन्दित शेषभगवान् अशेष भूमण्डलको मुकुटवत् धारण किये हुए पाताल-तलमें विराजमान हैं॥ २०॥ उनका बल-वीर्य, प्रभाव, स्वरूप (तत्त्व) और रूप (आकार) देवताओंसे भी नहीं जाना और कहा जा सकता॥ २१॥ जिनके फणोंकी मणियोंकी आभासे अरुण वर्ण हुई यह समस्त पृथिवी फूलोंकी मालाके समान रखी हुई है उनके बल-वीर्यका वर्णन भला कौन करेगा?॥ २२॥

१२८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ६

यदा विजृम्भतेऽनन्तो मदाघूर्णितलोचनः।
तदा चलति भूरेषा साब्धितोया सकानना॥ २३
गन्धर्वाप्सरसः सिद्धाः किन्नरोरगचारणाः।
नान्तं गुणानां गच्छन्ति तेनानन्तोऽयमव्ययः॥ २४
यस्य नागवधूहस्तैर्लेपितं हरिचन्दनम्।
मुहुः श्वासानिलापास्तं याति दिक्ष्वदवासताम्॥ २५
यमाराध्य पुराणर्षिर्गर्गो ज्योतींषि तत्त्वतः।
ज्ञातवान्सकलं चैव निमित्तपठितं फलम्॥ २६
तेनेयं नागवर्येण शिरसा विधृता मही।
बिभर्ति मालां लोकानां सदेवासुरमानुषाम्॥ २७

जिस समय मदमत्तनयन शेषजी जमुहाई लेते हैं उस समय समुद्र और वन आदिके सहित यह सम्पूर्ण पृथिवी चलायमान हो जाती है॥ २३॥ इनके गुणोंका अन्त गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर, नाग और चारण आदि कोई भी नहीं पा सकते; इसलिये ये अविनाशी देव 'अनन्त' कहलाते हैं॥ २४॥ जिनका नाग-वधुओंद्वारा लेपित हरिचन्दन पुनः-पुनः श्वास-वायुसे छूट-छूटकर दिशाओंको सुगन्धित करता रहता है॥ २५॥ जिनकी आराधनासे पूर्वकालीन महर्षि गर्गने समस्त ज्योतिर्मण्डल (ग्रह-नक्षत्रादि) और शकुन-अपशकुनादि नैमित्तिक फलोंको तत्त्वतः जाना था॥ २६॥ उन नागश्रेष्ठ शेषजीने इस पृथिवीको अपने मस्तकपर धारण किया हुआ है, जो स्वयं भी देव, असुर और मनुष्योंके सहित सम्पूर्ण लोकमाला (पातालादि समस्त लोकों)-को धारण किये हुए हैं॥ २७॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥


छठा अध्याय

भिन्न-भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन

श्रीपराशर उवाच
ततश्च नरका विप्र भुवोऽधः सलिलस्य च।
पापिनो येषु पात्यन्ते ताञ्छृणुष्व महामुने॥ १
रौरवः सूकरो रोधस्तालो विशसनस्तथा।
महाज्वालस्तप्तकुम्भो लवणोऽथ विलोहितः॥ २
रुधिराम्भो वैतरणिः कृमीशः कृमिभोजनः।
असिपत्रवनं कृष्णो लालाभक्षश्च दारुणः॥ ३
तथा पूयवहः पापो वह्निज्वालो ह्यधःशिराः।
सन्दंशः कालसूत्रश्च तमश्चावीचिरेव च॥ ४
श्वभोजनोऽथाप्रतिष्ठश्चाप्रचिश्च तथा परः।
इत्येवमादयश्चान्ये नरका भृशदारुणाः॥ ५
यमस्य विषये घोराः शस्त्राग्निभयदायिनः।
पतन्ति येषु पुरुषाः पापकर्मरतास्तु ये॥ ६
कूटसाक्षी तथाऽसम्यक्पक्षपातेन यो वदेत्।
यश्चान्यदनृतं वक्ति स नरो याति रौरवम्॥ ७
भ्रूणहा पुरहन्ता च गोघ्नश्च मुनिसत्तम।
यान्ति ते नरकं रोधं यश्चोच्छ्वासनिरोधकः॥ ८

श्रीपराशरजी बोले— हे विप्र! तदनन्तर पृथिवी और जलके नीचे नरक हैं जिनमें पापी लोग गिराये जाते हैं। हे महामुने! उनका विवरण सुनो॥ १॥ रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विलोहित, रुधिराम्भ, वैतरणि, कृमीश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, लालाभक्ष, दारुण, पूयवह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कालसूत्र, तमस्, आवीचि, श्वभोजन, अप्रतिष्ठ और अप्रचि—ये सब तथा इनके सिवा और भी अनेकों महाभयंकर नरक हैं, जो यमराजके शासनाधीन हैं और अति दारुण शस्त्र-भय तथा अग्नि-भय देनेवाले हैं और जिनमें जो पुरुष पापरत होते हैं वे ही गिरते हैं॥ २—६॥

जो पुरुष कूटसाक्षी (झूठा गवाह अर्थात् जानकर भी न बतलानेवाला या कुछ-का-कुछ कहनेवाला) होता है अथवा जो पक्षपातसे यथार्थ नहीं बोलता और जो मिथ्याभाषण करता है वह रौरवनरकमें जाता है॥ ७॥

हे मुनिसत्तम! भ्रूण (गर्भ) नष्ट करनेवाले, ग्रामनाशक और गो-हत्यारे लोग रोध नामक नरकमें जाते हैं जो श्वासोच्छ्वासको रोकनेवाला है॥ ८॥

अ० ६ ] * द्वितीय अंश * १२९


सुरापो ब्रह्महा हर्ता सुवर्णस्य च सूकरे।<br>प्रयान्ति नरके यश्च तैः संसर्गमुपैति वै॥ ९<br><br>राजन्यवैश्यहा ताले तथैव गुरुतल्पगः।<br>तप्तकुण्डे स्वसृगामी हन्ति राजभटांश्च यः॥ १०<br><br>साध्वीविक्रयकृद्वन्धपालः केसरिविक्री।<br>तप्तलोहे पतन्त्येते यश्च भक्तं परित्यजेत्॥ ११<br><br>स्नुषां सुतां चापि गत्वा महाज्वाले निपात्यते।<br>अवमन्ता गुरूणां यो यश्चाक्रोष्टा नराधमः॥ १२<br><br>वेददूषयिता यश्च वेदविक्रयिकश्च यः।<br>अगम्यगामी यश्च स्यात्ते यान्ति लवणं द्विज॥ १३<br><br>चोरो विलोहे पतति मर्यादादूषकस्तथा॥ १४<br><br>देवद्विजपितृद्वेष्टा रत्नदूषयिता च यः।<br>स याति कृमिभक्षे वै कृमीशे च दुरिष्टकृत्॥ १५<br><br>पितृदेवातिथींस्त्यक्त्वा पर्यश्नाति नराधमः।<br>लालाभक्षे स यात्युग्रे शरकर्त्ता च वेधके॥ १६<br><br>करोति कर्णिंनो यश्च यश्च खड्गादिकृन्नरः।<br>प्रयान्त्येते विशसने नरके भृशदारुणे॥ १७<br><br>असत्प्रतिगृहीता तु नरके यात्यधोमुखे।<br>अयाज्ययाजकश्चैव तथा नक्षत्रसूचकः॥ १८<br><br>वेगी पूयवहे चैको याति मिष्टान्नभुङ्नरः॥ १९<br><br>लाक्षामांसरसानां च तिलानां लवणस्य च।<br>विक्रेता ब्राह्मणो याति तमेव नरकं द्विज॥ २०<br><br>मार्जारकुक्कुटच्छागश्ववराहविहङ्गमान् ।<br>पोषयन्नरकं याति तमेव द्विजसत्तम॥ २१<br><br>रङ्गोपजीवी कैवर्त्तः कुण्डाशी गरदस्तथा।<br>सूची माहिषकश्चैव पर्वकारी च यो द्विजः॥ २२मद्य-पान करनेवाला, ब्रह्मघाती, सुवर्ण चुरानेवाला तथा जो पुरुष इनका संग करता है ये सब सूकरनरकमें जाते हैं॥ ९॥ क्षत्रिय अथवा वैश्यका वध करनेवाला तालनरकमें तथा गुरु-स्त्रीके साथ गमन करनेवाला, भगिनीगामी और राजदूतोंको मारनेवाला पुरुष तप्तकुण्डनरकमें पड़ता है॥ १०॥ सती स्त्रीको बेचनेवाला, कारागृहरक्षक, अश्वविक्रेता और भक्तपुरुषका त्याग करनेवाला—ये सब लोग तप्तलोहनरकमें गिरते हैं॥ ११॥ पुत्रवधू और पुत्रीके साथ विषय करनेवाला पुरुष महाज्वालनरकमें गिराया जाता है, तथा जो नराधम गुरुजनोंका अपमान करनेवाला और उनसे दुर्वचन बोलनेवाला होता है तथा जो वेदकी निन्दा करनेवाला, वेद बेचनेवाला या अगम्या स्त्रीसे सम्भोग करता है, हे द्विज! वे सब लवणनरकमें जाते हैं॥ १२-१३॥ चोर तथा मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला पुरुष विलोहितनरकमें गिरता है॥ १४॥ देव, द्विज और पितृगणसे द्वेष करनेवाला तथा रत्नको दूषित करनेवाला कृमिभक्षनरकमें और अनिष्ट यज्ञ करनेवाला कृमीशनरकमें जाता है॥ १५॥<br><br>जो नराधम पितृगण, देवगण और अतिथियोंको छोड़कर उनसे पहले भोजन कर लेता है वह अति उग्र लालाभक्षनरकमें पड़ता है; और बाण बनानेवाला वेधकनरकमें जाता है॥ १६॥ जो मनुष्य कर्णी नामक बाण बनाते हैं और जो खड्गादि शस्त्र बनानेवाले हैं वे अति दारुण विशसननरकमें गिरते हैं॥ १७॥ असत्-प्रतिग्रह (दूषित उपायोंसे धन-संग्रह) करनेवाला, अयाज्य-याजक और नक्षत्रोपजीवी (नक्षत्र-विद्याको न जानकर भी उसका ढोंग रचनेवाला) पुरुष अधोमुखनरकमें पड़ता है॥ १८॥ साहस (निष्ठुर कर्म) करनेवाला पुरुष पूयवहनरकमें जाता है, तथा [पुत्र-मित्रादिकी वंचना करके] अकेले ही स्वादु भोजन करनेवाला और लाख, मांस, रस, तिल तथा लवण आदि बेचनेवाला ब्राह्मण भी उसी (पूयवह) नरकमें गिरता है॥ १९-२०॥ हे द्विजश्रेष्ठ! बिलाव, कुक्कुट, छाग, अश्व, शूकर तथा पक्षियोंको [जीविकाके लिये] पालनेसे भी पुरुष उसी नरकमें जाता है॥ २१॥ नट या मल्लवृत्तिसे रहनेवाला, धीवरका कर्म करनेवाला, कुण्ड (उपपतिसे उत्पन्न सन्तान)-का अन्न खानेवाला, विष देनेवाला, चुगलखोर, स्त्रीकी असद्वृत्तिके आश्रय रहनेवाला, धन आदिके लोभसे बिना पर्वके अमावास्या आदि पर्वदिनोंका कार्य करानेवाला
१३०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ६

आगारदाही मित्रघ्नः शाकुनिर्ग्रामयाजकः ।<br>रुधिरान्धे पतन्त्येते सोमं विक्रीणते च ये ॥ २३<br>मखहा ग्रामहन्ता च याति वैतरणीं नरः ॥ २४<br>रेतःपातादिकर्त्तारो मर्यादाभेदिनो हि ये ।<br>ते कृष्णे यान्त्यशौचाश्च कुहकाजीविनश्च ये ॥ २५<br>असिपत्रवनं याति वनच्छेदी वृथैव यः ।<br>औरभ्रिको मृगव्याधो वह्निज्वाले पतन्ति वै ॥ २६<br>यान्त्येते द्विज तत्रैव ये चापाकेषु वह्निदाः ॥ २७<br>व्रतानां लोपको यश्च स्वाश्रमाद्विच्युतश्च यः ।<br>सन्दंशयातनामध्ये पततस्तावुभावपि ॥ २८<br>दिवा स्वप्ने च स्कन्दन्ते ये नरा ब्रह्मचारिणः ।<br>पुत्रैरध्यापिता ये च ते पतन्ति श्वभोजने ॥ २९<br>एते चान्ये च नरकाः शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>येषु दुष्कृतकर्माणः पच्यन्ते यातनागताः ॥ ३०<br>यथैव पापान्येतानि तथान्यानि सहस्रशः ।<br>भुज्यन्ते तानि पुरुषैर्नरकान्तरगोचरैः ॥ ३१<br>वर्णाश्रमविरुद्धं च कर्म कुर्वन्ति ये नराः ।<br>कर्मणा मनसा वाचा निरयेषु पतन्ति ते ॥ ३२<br>अधःशिरोभिर्दृश्यन्ते नारकैर्दिवि देवताः ।<br>देवाश्चाधोमुखान्सर्वानधः पश्यन्ति नारकान् ॥ ३३<br>स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च पक्षिणः पशवो नराः ।<br>धार्मिकास्त्रिदशास्तद्वन्मोक्षिणश्च यथाक्रमम् ॥ ३४<br>सहस्रभागप्रथमा द्वितीयानुक्रमास्तथा ।<br>सर्वे होते महाभाग यावन्मुक्तिसमाश्रयाः ॥ ३५<br>यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः ।<br>पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः ॥ ३६<br>पापानामनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथा ।<br>तथा तथैव संस्मृत्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः ॥ ३७<br>पापे गुरूणि गुरूणि स्वल्पान्यल्पे च तद्विदः ।<br>प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवादयः ॥ ३८<br>प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तपःकर्मात्मकानि वै ।<br>यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम् ॥ ३९ | द्विज, घरमें आग लगानेवाला, मित्रकी हत्या करनेवाला, शकुन आदि बतानेवाला, ग्रामका पुरोहित तथा सोम (मदिरा) बेचने-वाला—ये सब रुधिरान्धनरकमें गिरते हैं॥ २२-२३॥ यज्ञ अथवा ग्रामको नष्ट करनेवाला पुरुष वैतरणीनरकमें जाता है, तथा जो लोग वीर्यपातादि करनेवाले, खेतोंकी बाड़ तोड़नेवाले, अपवित्र और छलवृत्तिके आश्रय रहनेवाले होते हैं वे कृष्णनरकमें गिरते हैं॥ २४-२५॥<br>जो वृथा ही वनोंको काटता है वह असिपत्रवननरकमें जाता है। मेषोपजीवी (गड़रिये) और व्याधगण वह्निज्वालनरकमें गिरते हैं तथा हे द्विज! जो कच्चे घड़ों अथवा ईंट आदिको पकानेके लिये उनमें अग्नि डालते हैं, वे भी उस (वह्निज्वालनरक)-में ही जाते हैं॥ २६-२७॥ व्रतोंको लोप करनेवाले तथा अपने आश्रमसे पतित दोनों ही प्रकारके पुरुष सन्दंश नामक नरकमें गिरते हैं॥ २८॥ जिन ब्रह्मचारियोंका दिनमें तथा सोते समय [बुरी भावनासे] वीर्यपात हो जाता है, अथवा जो अपने ही पुत्रोंसे पढ़ते हैं वे लोग श्वभोजननरकमें गिरते हैं॥ २९॥<br>इस प्रकार, ये तथा अन्य सैकड़ों-हजारों नरक हैं, जिनमें दुष्कर्मी लोग नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगा करते हैं॥ ३०॥ इन उपर्युक्त पापोंके समान और भी सहस्रों पाप-कर्म हैं, उनके फल मनुष्य भिन्न-भिन्न नरकोंमें भोगा करते हैं॥ ३१॥ जो लोग अपने वर्णाश्रम-धर्मके विरुद्ध मन, वचन अथवा कर्मसे कोई आचरण करते हैं वे नरकमें गिरते हैं॥ ३२॥ अधोमुखनरक निवासियोँको स्वर्गलोकमें देवगण दिखायी दिया करते हैं और देवता लोग नीचेके लोकोंमें नारकी जीवोंको देखते हैं॥ ३३॥ पापी लोग नरकभोगके अनन्तर क्रमसे स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक पुरुष, देवगण तथा मुमुक्षु होकर जन्म ग्रहण करते हैं॥ ३४॥ हे महाभाग! मुमुक्षुपर्यन्त इन सबमें दूसरोंकी अपेक्षा पहले प्राणी [संख्यामें] सहस्र गुण अधिक हैं॥ ३५॥ जितन जी स्वर्गमें हैं उतने ही नरकमें हैं, जो पापी पुरुष [अपने पापका] प्रायश्चित्त नहीं करते वे ही नरकमें जाते हैं॥ ३६॥<br>भिन्न-भिन्न पापोंके अनुरूप जो-जो प्रायश्चित्त हैं उन्हीं-उन्हींको महर्षियोंने वेदार्थका स्मरण करके बताया है॥ ३७॥ हे मैत्रेय! स्वायम्भुवमनु आदि स्मृतिकारोंने महान् पापोंके लिये महान् और अल्पोंके लिये अल्प प्रायश्चित्तोंकी व्यवस्था की है॥ ३८॥ किन्तु जितने भी तपस्यात्मक और कर्मात्मक प्रायश्चित्त हैं उन सबमें श्रीकृष्णस्मरण सर्वश्रेष्ठ है॥ ३९॥

अ० ६ ] * द्वितीय अंश * १३१


कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते।
प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम्॥ ४०

प्रातर्निशि तथा सन्ध्यामध्याह्नादिषु संस्मरन्।
नारायणमवाप्नोति सद्यः पापक्षयान्नरः॥ ४१

विष्णुसंस्मरणात्क्षीणसमस्तक्लेशसञ्चयः।
मुक्तिं प्रयाति स्वर्गाप्तिस्तस्य विघ्नोऽनुमीयते॥ ४२

वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु।
तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रत्वादिकं फलम्॥ ४३

क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम्।
क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ४४

तस्मादहर्निशं विष्णुं संस्मरन्पुरुषो मुने।
न याति नरकं मर्त्यः सङ्क्षीणाखिलपातकः॥ ४५

मनःप्रीतिकरः स्वर्गो नरकस्तद्विपर्ययः।
नरकस्वर्गसंज्ञे वै पापपुण्ये द्विजोत्तम॥ ४६

वस्त्वेकमेव दुःखाय सुखायेर्ष्यागमाय च।
कोपाय च यतस्तस्माद्वस्तु वस्वात्मकं कुतः॥ ४७

तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय जायते।
तदेव कोपाय यतः प्रसादाय च जायते॥ ४८

तस्माद्दुःखात्मकं नास्ति न च किञ्चित्सुखात्मकम्।
मनसः परिणामोऽयं सुखदुःखादिलक्षणः॥ ४९

ज्ञानमेव परं ब्रह्म ज्ञानं बन्धाय चेष्यते।
ज्ञानात्मकमिदं विश्वं न ज्ञानाद्विद्यते परम्॥ ५०
विद्याविद्येति मैत्रेय ज्ञानमेवोपधारय॥ ५१

एवमेतन्मयाख्यातं भवतो मण्डलं भुवः।
पातालानि च सर्वाणि तथैव नरका द्विज॥ ५२

समुद्राः पर्वताश्चैव द्वीपा वर्षाणि निम्नगाः।
सङ्क्षेपात्सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ५३


जिस पुरुषके चित्तमें पाप-कर्मके अनन्तर पश्चात्ताप होता है उसके लिये ही प्रायश्चित्तोंका विधान है। किंतु यह हरिस्मरण तो एकमात्र स्वयं ही परम प्रायश्चित्त है॥ ४०॥

प्रातःकाल, सायंकाल, रात्रिमें अथवा मध्याह्नमें किसी भी समय श्रीनारायणका स्मरण करनेसे पुरुषके समस्त पाप तत्काल क्षीण हो जाते हैं॥ ४१॥

श्रीविष्णुभगवान्‌के स्मरणसे समस्त पापराशिके भस्म हो जानेसे पुरुष मोक्षपद प्राप्त कर लेता है, स्वर्ग-लाभ तो उसके लिये विघ्नरूप माना जाता है॥ ४२॥

हे मैत्रेय! जिसका चित्त जप, होम और अर्चानादि करते हुए निरन्तर भगवान् वासुदेवमें लगा रहता है उसके लिये इन्द्रपद आदि फल तो अन्तराय (विघ्न) हैं॥ ४३॥

कहाँ तो पुनर्जन्मके चक्रमें डालनेवाली स्वर्ग-प्राप्ति और कहाँ मोक्षका सर्वोत्तम बीज 'वासुदेव' नामका जप!॥ ४४॥

इसलिये हे मुने! श्रीविष्णुभगवान्‌का अहर्निश स्मरण करनेसे सम्पूर्ण पाप क्षीण हो जानेके कारण मनुष्य फिर नरकमें नहीं जाता॥ ४५॥

चित्तको प्रिय लगनेवाला ही स्वर्ग है और उसके विपरीत (अप्रिय लगनेवाला) ही नरक है। हे द्विजोत्तम! पाप और पुण्यहीके दूसरे नाम नरक और स्वर्ग हैं॥ ४६॥

जब कि एक ही वस्तु सुख और दुःख तथा ईर्ष्या और कोपका कारण हो जाती है तो उसमें वस्तुता (नियत स्वभावत्व) ही कहाँ है?॥ ४७॥

क्योंकि एक ही वस्तु कभी प्रीतिका कारण होती है तो वही दूसरे समय दुःखदायिनी हो जाती है और वही कभी क्रोधकी हेतु होती है तो कभी प्रसन्नता देनेवाली हो जाती है॥ ४८॥

अतः कोई भी पदार्थ दुःखमय नहीं है और न कोई सुखमय है। ये सुख-दुःख तो मनके ही विकार हैं॥ ४९॥

[परमार्थतः] ज्ञान ही परब्रह्म है और [अविद्याकी उपाधिसे] वही बन्धनका कारण है। यह सम्पूर्ण विश्व ज्ञानमय ही है; ज्ञानसे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है। हे मैत्रेय! विद्या और अविद्याको भी तुम ज्ञान ही समझो॥ ५०-५१॥

हे द्विज! इस प्रकार मैंने तुमसे समस्त भूमण्डल, सम्पूर्ण पाताललोक और नरकोंका वर्णन कर दिया॥ ५२॥
समुद्र, पर्वत, द्वीप, वर्ष और नदियाँ—इन सभीकी मैंने संक्षेपसे व्याख्या कर दी; अब, तुम और क्या सुनना चाहते हो?॥ ५३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

१३२ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० ७

सातवाँ अध्याय

भूर्भुवः आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त

श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—
कथितं भूतलं ब्रह्मन्मैतदखिलं त्वया।<br>भुवर्लोकादिकांल्लोकाञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं मुने॥ १<br>तथैव ग्रहसंस्थानं प्रमाणानि यथा तथा।<br>समाचक्ष्व महाभाग तन्मह्यं परिपृच्छते॥ २ब्रह्मन्! आपने मुझसे समस्त भूमण्डलका वर्णन किया। हे मुने! अब मैं भुवर्लोक आदि समस्त लोकोंके विषयमें सुनना चाहता हूँ॥ १॥ हे महाभाग! मुझ जिज्ञासुसे आप ग्रहगणकी स्थिति तथा उनके परिमाण आदिका यथावत् वर्णन कीजिये॥ २॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
रविचन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते ।<br>ससमुद्रसरिच्छैला तावती पृथिवी स्मृता॥ ३<br>यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तारपरिमण्डलात्।<br>नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यासमण्डलतो द्विज॥ ४<br>भूमेर्योजनलक्षे तु सौरं मैत्रेय मण्डलम्।<br>लक्षाद्दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्थितम्॥ ५<br>पूर्णे शतसहस्रे तु योजनानां निशाकरात्।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नमुपरिष्टात्प्रकाशते॥ ६<br>द्वे लक्षे चोत्तरे ब्रह्मन् बुधो नक्षत्रमण्डलात्।<br>तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशनाः स्थितः॥ ७<br>अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।<br>लक्षद्वये तु भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥ ८<br>शौरिर्बृहस्पतेश्चोर्ध्वं द्विलक्षे समवस्थितः।<br>सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमेकं द्विजोत्तम॥ ९<br>ऋषिभ्यस्तु सहस्राणां शतादूर्ध्वं व्यवस्थितः।<br>मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिश्चक्रस्य वै ध्रुवः॥ १०<br>त्रैलोक्यमेतत्कथितमुत्सेधेन महामुने।<br>इज्याफलस्य भूरेषा इज्या चात्र प्रतिष्ठिता॥ ११<br>ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोको यत्र ते कल्पवासिनः।<br>एकयोजनकोटिस्तु यत्र ते कल्पवासिनः॥ १२<br>द्वे कोटी तु जनो लोको यत्र ते ब्रह्मणः सुताः।<br>सनन्दनाद्याः प्रथिता मैत्रेयामलचेतसः॥ १३<br>चतुर्गुणोत्तरे चोर्ध्वं जनलोकात्तपः स्थितम्।<br>वैराजा यत्र ते देवाः स्थिता दाहविवर्जिताः॥ १४जितनी दूरतक सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंका प्रकाश जाता है; समुद्र, नदी और पर्वतादिसे युक्त उतना प्रदेश पृथिवी कहलाता है॥ ३॥ हे द्विज! जितना पृथिवीका विस्तार और परिमण्डल (घेरा) है उतना ही विस्तार और परिमण्डल भुवर्लोकका भी है॥ ४॥ हे मैत्रेय! पृथिवीसे एक लाख योजन दूर सूर्यमण्डल है और सूर्यमण्डलसे भी एक लक्ष योजनके अन्तरपर चन्द्रमण्डल है॥ ५॥ चन्द्रमासे पूरे सौ हजार (एक लाख) योजन ऊपर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित हो रहा है॥ ६॥<br><br>हे ब्रह्मन्! नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊपर बुध और बुधसे भी दो लक्ष योजन ऊपर शुक्र स्थित हैं॥ ७॥ शुक्रसे इतनी ही दूरीपर मंगल हैं और मंगलसे भी दो लाख योजन ऊपर बृहस्पतिजी हैं ॥ ८॥ हे द्विजोत्तम! बृहस्पतिजीसे दो लाख योजन ऊपर शनि हैं और शनिसे एक लक्ष योजनके अन्तरपर सप्तर्षिमण्डल है॥ ९॥ तथा सप्तर्षियोंसे भी सौ हजार योजन ऊपर समस्त ज्योतिश्चक्रकी नाभिरूप ध्रुवमण्डल स्थित है॥ १०॥ हे महामुने! मैंने तुमसे यह त्रिलोकीकी उच्चताके विषयमें वर्णन किया। यह त्रिलोकी यज्ञफलकी भोग-भूमि है और यज्ञानुष्ठानकी स्थिति इस भारतवर्षमें ही है॥ ११॥<br><br>ध्रुवसे एक करोड़ योजन ऊपर महर्लोक है, जहाँ कल्पान्त-पर्यन्त रहनेवाले भृगु आदि सिद्धगण रहते हैं॥ १२॥ हे मैत्रेय! उससे भी दो करोड़ योजन ऊपर जनलोक है जिसमें ब्रह्माजीके प्रख्यात पुत्र निर्मलचित्त सनकादि रहते हैं॥ १३॥ जनलोकसे चौगुना अर्थात् आठ करोड़ योजन ऊपर तपलोक है; वहाँ वैराज नामक देवगणोंका निवास है जिनका कभी दाह नहीं होता॥ १४॥

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अ० ७ ] * द्वितीय अंश * १३३


षड्गुणेन तपोलोकात्सत्यलोको विराजते।<br>अपुनर्मारका यत्र ब्रह्मलोको हि स स्मृतः॥ १५<br>पादगम्यन्तु यत्किञ्चिद्वस्तुवस्ति पृथिवीमयम्।<br>स भूर्लोकः समाख्यातो विस्तरोऽस्य मयोदितः॥ १६<br>भूमिसूर्यान्तरं यच्च सिद्धादिमुनिसेवितम्।<br>भुवर्लोकस्तु सोऽप्युक्तो द्वितीयो मुनिसत्तम॥ १७<br>ध्रुवसूर्यान्तरं यच्च नियुतानि चतुर्दश।<br>स्वर्लोकः सोऽपि गदितो लोकसंस्थानचिन्तकैः॥ १८<br>त्रैलोक्यमेतत्कृतकं मैत्रेय परिपठ्यते।<br>जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतकं त्रयम्॥ १९<br>कृतकाकृतयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृतः।<br>शून्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्तं न विनश्यति॥ २०<br>एते सप्त मया लोका मैत्रेय कथितास्तव।<br>पातालानि च सप्तैव ब्रह्माण्डस्यैष विस्तरः॥ २१<br>एतदण्डकटाहेन तिर्यक् चोर्ध्वमधस्तथा।<br>कपित्थस्य यथा बीजं सर्वतो वै समावृतम्॥ २२<br>दशोत्तरेण पयसा मैत्रेयाण्डं च तद्वृतम्।<br>सर्वोऽम्बुपरिधानोऽसौ वह्निना वेष्टितो बहिः॥ २३<br>वह्निश्च वायुना वायुर्मैत्रेय नभसा वृतः।<br>भूतादिना नभः सोऽपि महता परिवेष्टितः।<br>दशोत्तराण्यशेषाणि मैत्रेयैतानि सप्त वै॥ २४<br>महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम्।<br>अनन्तस्य न तस्यान्तः संख्यानं चापि विद्यते॥ २५<br>तदनन्तमसंख्यातप्रमाणं चापि वै यतः।<br>हेतुभूतमशेषस्य प्रकृतिः सा परा मुने॥ २६<br>अण्डानां तु सहस्राणां सहस्राण्ययुतानि च।<br>ईदृशानां तथा तत्र कोटिकोटिशतानि च॥ २७<br>दारुण्यग्निर्यथा तैलं तिले तद्वत्पुमानपि।<br>प्रधानेऽवस्थितो व्यापी चेतनात्मात्मवेदनः॥ २८<br>प्रधानं च पुमांश्र्चैव सर्वभूतात्मभूतया।<br>विष्णुशक्त्या महाबुद्धे वृतौ संश्रयधर्मिणौ॥ २९तपलोकसे छःगुना अर्थात् बारह करोड़ योजनके अन्तरपर सत्यलोक सुशोभित है जो ब्रह्मलोक भी कहलाता है और जिसमें फिर न मरनेवाले अमरगण निवास करते हैं॥ १५॥ जो भी पार्थिव वस्तु चरणसंचारके योग्य है वह भूर्लोक ही है। उसका विस्तार मैं कह चुका॥ १६॥ हे मुनिश्रेष्ठ! पृथिवी और सूर्यके मध्यमें जो सिद्धगण और मुनिगण-सेवित स्थान है, वही दूसरा भुवर्लोक है॥ १७॥ सूर्य और ध्रुवके बीचमें जो चौदह लक्ष योजनका अन्तर है, उसीको लोकस्थितिका विचार करनेवालोंने स्वर्लोक कहा है॥ १८॥ हे मैत्रेय! ये (भूः, भुवः, स्वः) 'कृतक' त्रैलोक्य कहलाते हैं और जन, तप तथा सत्य—ये तीनों 'अकृतक' लोक हैं॥ १९॥ इन कृतक और अकृतक त्रिलोकियोंके मध्यमें महर्लोक कहा जाता है, जो कल्पान्तमें केवल जनशून्य हो जाता है, अत्यन्त नष्ट नहीं होता [इसलिये यह 'कृतकाकृत' कहलाता है]॥ २०॥<br>हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे ये सात लोक और सात ही पाताल कहे। इस ब्रह्माण्डका बस इतना ही विस्तार है॥ २१॥ यह ब्रह्माण्ड कपित्थ (कैथे)-के बीजके समान ऊपर-नीचे सब ओर अण्डकटाहसे घिरा हुआ है॥ २२॥ हे मैत्रेय! यह अण्ड अपनेसे दसगुने जलसे आवृत है और वह जलका सम्पूर्ण आवरण अग्निसे घिरा हुआ है॥ २३॥ अग्नि वायुसे और वायु आकाशसे परिवेष्टित है तथा आकाश भूतोंके कारण तामस अहंकार और अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है। हे मैत्रेय! ये सातों उत्तरोत्तर एक-दूसरेसे दसगुने हैं॥ २४॥ महत्तत्त्वको भी प्रधानने आवृत कर रखा है। वह अनन्त है; तथा उसका न कभी अन्त (नाश) होता है और न कोई संख्या ही है; क्योंकि हे मुने! वह अनन्त, असंख्येय, अपरिमेय और सम्पूर्ण जगत्का कारण है और वही परा प्रकृति है॥ २५-२६॥ उसमें ऐसे-ऐसे हजारों, लाखों तथा सैकड़ों करोड़ ब्रह्माण्ड हैं॥ २७॥ जिस प्रकार काष्ठमें अग्नि और तिलमें तैल रहता है उसी प्रकार स्वप्रकाश चेतनात्मा व्यापक पुरुष प्रधानमें स्थित है॥ २८॥ हे महाबुद्धे! ये संश्रयशील (आपसमें मिले हुए) प्रधान और पुरुष भी समस्त भूतोंकी स्वरूपभूता विष्णु-शक्तिसे आवृत हैं॥ २९॥
१३४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ७

तयोः सैव पृथग्भावकारणं संश्रयस्य च।
क्षोभकारणभूता च सर्गकाले महामते॥ ३०
यथा सक्तं जले वातो बिभर्त्ति कणिकाशतम्।
शक्तिः सापि तथा विष्णोः प्रधानपुरुषात्मकम्॥ ३१
यथा च पादपो मूलस्कन्धशाखादिसंयुतः।
आदिबीजात्प्रभवति बीजान्यन्यानि वै ततः॥ ३२
प्रभवन्ति ततस्तेभ्यः सम्भवन्त्यपरे द्रुमाः।
तेऽपि तल्लक्षणद्रव्यकारणानुगता मुने॥ ३३
एवमव्याकृतात्पूर्वं जायन्ते महदादयः।
विशेषांन्तास्ततस्तेभ्यः सम्भवन्त्यसुरादयः।
तेभ्यश्च पुत्रास्तेषां च पुत्राणामपरे सुताः॥ ३४
बीजाद्वृक्षप्ररोहेण यथा नापचयस्तरोः।
भूतानां भूतसर्गेण नैवास्त्यपचयस्तथा॥ ३५
सन्निधानाद्यथाकाशकालाद्याः कारणं तरोः।
तथैवापरिणामेन विश्वस्य भगवान्हरिः॥ ३६
व्रीहिबीजे यथा मूलं नालं पत्राङ्कुरौ तथा।
काण्डं कोष्ठस्तु पुष्पं च क्षीरं तद्वच्च तण्डुलाः॥ ३७
तुषाः कणाश्च सन्तो वै यान्त्याविर्भावमात्मनः।
प्ररोहहेतुसामग्रीमासाद्य मुनिसत्तम॥ ३८
तथा कर्मस्वनेकेषु देवाद्याः समवस्थिताः।
विष्णुशक्तिं समासाद्य प्ररोहमुपयान्ति वै॥ ३९
स च विष्णुः परं ब्रह्म यतः सर्वमिदं जगत्।
जगच्च यो यत्र चेदं यस्मिंश्च लयमेष्यति॥ ४०
तद्ब्रह्म तत्परं धाम सदसत्परमं पदम्।
यस्य सर्वमभेदेन यतश्चैतच्चराचरम्॥ ४१
स एव मूलप्रकृतिर्व्यक्तरूपी जगच्च सः।
तस्मिन्नेव लयं सर्वं याति तत्र च तिष्ठति॥ ४२
कर्ता क्रियाणां स च इज्यते क्रतुः
स एव तत्कर्मफलं च तस्य।
स्रुगादि यत्साधनमप्यशेषं
हरेर्न किञ्चिद्व्यतिरिक्तमस्ति॥ ४३


हे महामते! वह विष्णु-शक्ति ही [प्रलयके समय] उनके पार्थक्य और [स्थितिके समय] उनके सम्मिलनकी हेतु है तथा सर्गारम्भके समय वही उनके क्षोभकी कारण है॥ ३०॥ जिस प्रकार जलके संसर्गसे वायु सैकड़ों जल-कणोंको धारण करता है उसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति भी प्रधान-पुरुषमय जगत्को धारण करती है॥ ३१॥

हे मुने! जिस प्रकार आदि-बीजसे ही मूल, स्कन्ध और शाखा आदिके सहित वृक्ष उत्पन्न होता है और तदनन्तर उससे और भी बीज उत्पन्न होते हैं, तथा उन बीजोंसे अन्यान्य वृक्ष उत्पन्न होते हैं और वे भी उन्हीं लक्षण, द्रव्य और कारणोंसे युक्त होते हैं, उसी प्रकार पहले अव्याकृत (प्रधान)-से महत्तत्त्वसे लेकर पंचभूतपर्यन्त [सम्पूर्ण विकार] उत्पन्न होते हैं तथा उनसे देव, असुर आदिका जन्म होता है और फिर उनके पुत्र तथा उन पुत्रोंके अन्य पुत्र होते हैं॥ ३२-३४॥ अपने बीजसे अन्य वृक्षके उत्पन्न होनेसे जिस प्रकार पूर्ववृक्षकी कोई क्षति नहीं होती उसी प्रकार अन्य प्राणियोंके उत्पन्न होनेसे उनके जन्मदाता प्राणियोंका ह्रास नहीं होता॥ ३५॥

जिस प्रकार आकाश और काल आदि सन्निधिमात्रसे ही वृक्षके कारण होते हैं उसी प्रकार भगवान् श्रीहरि भी बिना परिणामके ही विश्वके कारण हैं॥ ३६॥ हे मुनिसत्तम! जिस प्रकार धानके बीजमें मूल, नाल, पत्ते, अंकुर, तना, कोष, पुष्प, क्षीर, तण्डुल, तुष और कण सभी रहते हैं; तथा अंकुरोत्पत्तिकी हेतुभूत [भूमि एवं जल आदि] सामग्रीके प्राप्त होनेपर वे प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार अपने अनेक पूर्वकर्मोंमें स्थित देवता आदि विष्णु-शक्तिका आश्रय पानेपर आविर्भूत हो जाते हैं॥ ३७-३९॥ जिससे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, जो स्वयं जगत्रूपसे स्थित है, जिसमें यह स्थित है तथा जिसमें यह लीन हो जायगा वह परब्रह्म ही विष्णुभगवान् हैं॥ ४०॥ वह ब्रह्म ही उन (विष्णु)-का परमधाम (परस्वरूप) है, वह पद सत् और असत् दोनोंसे विलक्षण है तथा उससे अभिन्न हुआ ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उससे उत्पन्न हुआ है॥ ४१॥ वही अव्यक्त मूलप्रकृति है, वही व्यक्तस्वरूप संसार है, उसीमें यह सम्पूर्ण जगत् लीन होता है तथा उसीके आश्रय स्थित है॥ ४२॥ यज्ञादि क्रियाओंका कर्ता वही है, यज्ञरूपसे उसीका यजन किया जाता है, और उन यज्ञादिका फलस्वरूप भी वही है तथा यज्ञके साधनरूप जो स्रुवा आदि हैं वे सब भी हरिसे अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं॥ ४३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


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अ० ८ ] * द्वितीय अंश * १३५


आठवाँ अध्याय

सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
व्याख्यातमेतद्ब्रह्माण्डसंस्थानं तव सुव्रत।<br>ततः प्रमाणसंस्थाने सूर्यादीनां शृणुष्व मे॥ १हे सुव्रत! मैंने तुमसे यह ब्रह्माण्डकी स्थिति कही, अब सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति और उनके परिमाण सुनो॥ १॥
योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।<br>ईषादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम॥ २हे मुनिश्रेष्ठ! सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार योजन है तथा इससे दूना उसका ईषा-दण्ड (जूआ और रथके बीचका भाग) है॥ २॥
सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि वै।<br>योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम्॥ ३उसका धुरा डेढ़ करोड़ सात लाख योजन लम्बा है जिसमें उसका पहिया लगा हुआ है॥ ३॥
त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्नेमिन्यक्षयात्मके।<br>संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥ ४उस पूर्वाह्न, मध्याह्न और पराह्नरूप तीन नाभि, परिवत्सरादि पाँच अरे और षड्-ऋतुरूप छः नेमिवाले अक्षयस्वरूप संवत्सरात्मक चक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र स्थित है॥ ४॥
हयाश्च सप्तच्छन्दांसि तेषां नामानि मे शृणु।<br>गायत्री च बृहत्युष्णिग्जगती त्रिष्टुबेव च।<br>अनुष्टुप्पङ्क्तिरित्युक्ता च्छन्दांसि हरयो रवेः॥ ५सात छन्द ही उसके घोड़े हैं, उनके नाम सुनो—गायत्री, बृहती, उष्णिक़्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति—ये छन्द ही सूर्यके सात घोड़े कहे गये हैं॥ ५॥
चत्वारिंशत्सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।<br>पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य महामते॥ ६हे महामते! भगवान् सूर्यके रथका दूसरा धुरा साढ़े पैंतालीस सहस्र योजन लम्बा है॥ ६॥
अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद्युगार्द्धयोः।<br>ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्द्धेन ध्रुवाधारो रथस्य वै।<br>द्वितीयेऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले॥ ७दोनों धुरोंके परिमाणके तुल्य ही उसके युगार्द्धों (जूओं)-का परिमाण है, इनमेंसे छोटा धुरा उस रथके एक युगार्द्ध (जूए)-के सहित ध्रुवके आधारपर स्थित है और दूसरे धुरेका चक्र मानसोत्तरपर्वतपर स्थित है॥ ७॥
मानसोत्तरशैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी।<br>दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वरुणस्य च।<br>उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥ ८इस मानसोत्तरपर्वतके पूर्वमें इन्द्रकी, दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें चन्द्रमाकी पुरी है; उन पुरियोंके नाम सुनो॥ ८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा।<br>पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी॥ ९इन्द्रकी पुरी वस्वौकसारा है, यमकी संयमनी है, वरुणकी सुखा है तथा चन्द्रमाकी विभावरी है॥ ९॥
काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।<br>मैत्रेय भगवान्भानुर्ज्योतिषां चक्रसंयुतः॥ १०हे मैत्रेय! ज्योतिषचक्रके सहित भगवान् भानु दक्षिण-दिशामें प्रवेशकर छोड़े हुए बाणके समान तीव्र वेगसे चलते हैं॥ १०॥
अहोरात्रव्यवस्थानकारणं भगवान् रविः।<br>देवयानः परः पन्था योगिनां क्लेशसङ्क्षये॥ ११भगवान् सूर्यदेव दिन और रात्रिकी व्यवस्थाके कारण हैं और रागादि क्लेशोंके क्षीण हो जानेपर वे ही क्रममुक्तिभागी योगिजनोंके देवयान नामक श्रेष्ठ मार्ग हैं॥ ११॥
दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।<br>सर्वद्वीपेषु मैत्रेय निशार्द्धस्य च सम्मुखः॥ १२हे मैत्रेय! सभी द्वीपोंमें सर्वदा मध्याह्न तथा मध्यरात्रिके समय सूर्यदेव मध्य आकाशमें सामनेकी ओर रहते हैं*॥ १२॥

* अर्थात् जिस द्वीप या खण्डमें सूर्यदेव मध्याह्नके समय सम्मुख पड़ते हैं उसकी समान रेखापर दूसरी ओर स्थित द्वीपान्तरमें वे उसी प्रकार मध्यरात्रिके समय रहते हैं।