विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ६ |
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आगारदाही मित्रघ्नः शाकुनिर्ग्रामयाजकः ।<br>रुधिरान्धे पतन्त्येते सोमं विक्रीणते च ये ॥ २३<br>मखहा ग्रामहन्ता च याति वैतरणीं नरः ॥ २४<br>रेतःपातादिकर्त्तारो मर्यादाभेदिनो हि ये ।<br>ते कृष्णे यान्त्यशौचाश्च कुहकाजीविनश्च ये ॥ २५<br>असिपत्रवनं याति वनच्छेदी वृथैव यः ।<br>औरभ्रिको मृगव्याधो वह्निज्वाले पतन्ति वै ॥ २६<br>यान्त्येते द्विज तत्रैव ये चापाकेषु वह्निदाः ॥ २७<br>व्रतानां लोपको यश्च स्वाश्रमाद्विच्युतश्च यः ।<br>सन्दंशयातनामध्ये पततस्तावुभावपि ॥ २८<br>दिवा स्वप्ने च स्कन्दन्ते ये नरा ब्रह्मचारिणः ।<br>पुत्रैरध्यापिता ये च ते पतन्ति श्वभोजने ॥ २९<br>एते चान्ये च नरकाः शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>येषु दुष्कृतकर्माणः पच्यन्ते यातनागताः ॥ ३०<br>यथैव पापान्येतानि तथान्यानि सहस्रशः ।<br>भुज्यन्ते तानि पुरुषैर्नरकान्तरगोचरैः ॥ ३१<br>वर्णाश्रमविरुद्धं च कर्म कुर्वन्ति ये नराः ।<br>कर्मणा मनसा वाचा निरयेषु पतन्ति ते ॥ ३२<br>अधःशिरोभिर्दृश्यन्ते नारकैर्दिवि देवताः ।<br>देवाश्चाधोमुखान्सर्वानधः पश्यन्ति नारकान् ॥ ३३<br>स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च पक्षिणः पशवो नराः ।<br>धार्मिकास्त्रिदशास्तद्वन्मोक्षिणश्च यथाक्रमम् ॥ ३४<br>सहस्रभागप्रथमा द्वितीयानुक्रमास्तथा ।<br>सर्वे होते महाभाग यावन्मुक्तिसमाश्रयाः ॥ ३५<br>यावन्तो जन्तवः स्वर्गे तावन्तो नरकौकसः ।<br>पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः ॥ ३६<br>पापानामनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथा ।<br>तथा तथैव संस्मृत्य प्रोक्तानि परमर्षिभिः ॥ ३७<br>पापे गुरूणि गुरूणि स्वल्पान्यल्पे च तद्विदः ।<br>प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवादयः ॥ ३८<br>प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तपःकर्मात्मकानि वै ।<br>यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम् ॥ ३९ | द्विज, घरमें आग लगानेवाला, मित्रकी हत्या करनेवाला, शकुन आदि बतानेवाला, ग्रामका पुरोहित तथा सोम (मदिरा) बेचने-वाला—ये सब रुधिरान्धनरकमें गिरते हैं॥ २२-२३॥ यज्ञ अथवा ग्रामको नष्ट करनेवाला पुरुष वैतरणीनरकमें जाता है, तथा जो लोग वीर्यपातादि करनेवाले, खेतोंकी बाड़ तोड़नेवाले, अपवित्र और छलवृत्तिके आश्रय रहनेवाले होते हैं वे कृष्णनरकमें गिरते हैं॥ २४-२५॥<br>जो वृथा ही वनोंको काटता है वह असिपत्रवननरकमें जाता है। मेषोपजीवी (गड़रिये) और व्याधगण वह्निज्वालनरकमें गिरते हैं तथा हे द्विज! जो कच्चे घड़ों अथवा ईंट आदिको पकानेके लिये उनमें अग्नि डालते हैं, वे भी उस (वह्निज्वालनरक)-में ही जाते हैं॥ २६-२७॥ व्रतोंको लोप करनेवाले तथा अपने आश्रमसे पतित दोनों ही प्रकारके पुरुष सन्दंश नामक नरकमें गिरते हैं॥ २८॥ जिन ब्रह्मचारियोंका दिनमें तथा सोते समय [बुरी भावनासे] वीर्यपात हो जाता है, अथवा जो अपने ही पुत्रोंसे पढ़ते हैं वे लोग श्वभोजननरकमें गिरते हैं॥ २९॥<br>इस प्रकार, ये तथा अन्य सैकड़ों-हजारों नरक हैं, जिनमें दुष्कर्मी लोग नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगा करते हैं॥ ३०॥ इन उपर्युक्त पापोंके समान और भी सहस्रों पाप-कर्म हैं, उनके फल मनुष्य भिन्न-भिन्न नरकोंमें भोगा करते हैं॥ ३१॥ जो लोग अपने वर्णाश्रम-धर्मके विरुद्ध मन, वचन अथवा कर्मसे कोई आचरण करते हैं वे नरकमें गिरते हैं॥ ३२॥ अधोमुखनरक निवासियोँको स्वर्गलोकमें देवगण दिखायी दिया करते हैं और देवता लोग नीचेके लोकोंमें नारकी जीवोंको देखते हैं॥ ३३॥ पापी लोग नरकभोगके अनन्तर क्रमसे स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक पुरुष, देवगण तथा मुमुक्षु होकर जन्म ग्रहण करते हैं॥ ३४॥ हे महाभाग! मुमुक्षुपर्यन्त इन सबमें दूसरोंकी अपेक्षा पहले प्राणी [संख्यामें] सहस्र गुण अधिक हैं॥ ३५॥ जितन जी स्वर्गमें हैं उतने ही नरकमें हैं, जो पापी पुरुष [अपने पापका] प्रायश्चित्त नहीं करते वे ही नरकमें जाते हैं॥ ३६॥<br>भिन्न-भिन्न पापोंके अनुरूप जो-जो प्रायश्चित्त हैं उन्हीं-उन्हींको महर्षियोंने वेदार्थका स्मरण करके बताया है॥ ३७॥ हे मैत्रेय! स्वायम्भुवमनु आदि स्मृतिकारोंने महान् पापोंके लिये महान् और अल्पोंके लिये अल्प प्रायश्चित्तोंकी व्यवस्था की है॥ ३८॥ किन्तु जितने भी तपस्यात्मक और कर्मात्मक प्रायश्चित्त हैं उन सबमें श्रीकृष्णस्मरण सर्वश्रेष्ठ है॥ ३९॥