विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ६ ] * द्वितीय अंश * १२९
| सुरापो ब्रह्महा हर्ता सुवर्णस्य च सूकरे।<br>प्रयान्ति नरके यश्च तैः संसर्गमुपैति वै॥ ९<br><br>राजन्यवैश्यहा ताले तथैव गुरुतल्पगः।<br>तप्तकुण्डे स्वसृगामी हन्ति राजभटांश्च यः॥ १०<br><br>साध्वीविक्रयकृद्वन्धपालः केसरिविक्री।<br>तप्तलोहे पतन्त्येते यश्च भक्तं परित्यजेत्॥ ११<br><br>स्नुषां सुतां चापि गत्वा महाज्वाले निपात्यते।<br>अवमन्ता गुरूणां यो यश्चाक्रोष्टा नराधमः॥ १२<br><br>वेददूषयिता यश्च वेदविक्रयिकश्च यः।<br>अगम्यगामी यश्च स्यात्ते यान्ति लवणं द्विज॥ १३<br><br>चोरो विलोहे पतति मर्यादादूषकस्तथा॥ १४<br><br>देवद्विजपितृद्वेष्टा रत्नदूषयिता च यः।<br>स याति कृमिभक्षे वै कृमीशे च दुरिष्टकृत्॥ १५<br><br>पितृदेवातिथींस्त्यक्त्वा पर्यश्नाति नराधमः।<br>लालाभक्षे स यात्युग्रे शरकर्त्ता च वेधके॥ १६<br><br>करोति कर्णिंनो यश्च यश्च खड्गादिकृन्नरः।<br>प्रयान्त्येते विशसने नरके भृशदारुणे॥ १७<br><br>असत्प्रतिगृहीता तु नरके यात्यधोमुखे।<br>अयाज्ययाजकश्चैव तथा नक्षत्रसूचकः॥ १८<br><br>वेगी पूयवहे चैको याति मिष्टान्नभुङ्नरः॥ १९<br><br>लाक्षामांसरसानां च तिलानां लवणस्य च।<br>विक्रेता ब्राह्मणो याति तमेव नरकं द्विज॥ २०<br><br>मार्जारकुक्कुटच्छागश्ववराहविहङ्गमान् ।<br>पोषयन्नरकं याति तमेव द्विजसत्तम॥ २१<br><br>रङ्गोपजीवी कैवर्त्तः कुण्डाशी गरदस्तथा।<br>सूची माहिषकश्चैव पर्वकारी च यो द्विजः॥ २२ | मद्य-पान करनेवाला, ब्रह्मघाती, सुवर्ण चुरानेवाला तथा जो पुरुष इनका संग करता है ये सब सूकरनरकमें जाते हैं॥ ९॥ क्षत्रिय अथवा वैश्यका वध करनेवाला तालनरकमें तथा गुरु-स्त्रीके साथ गमन करनेवाला, भगिनीगामी और राजदूतोंको मारनेवाला पुरुष तप्तकुण्डनरकमें पड़ता है॥ १०॥ सती स्त्रीको बेचनेवाला, कारागृहरक्षक, अश्वविक्रेता और भक्तपुरुषका त्याग करनेवाला—ये सब लोग तप्तलोहनरकमें गिरते हैं॥ ११॥ पुत्रवधू और पुत्रीके साथ विषय करनेवाला पुरुष महाज्वालनरकमें गिराया जाता है, तथा जो नराधम गुरुजनोंका अपमान करनेवाला और उनसे दुर्वचन बोलनेवाला होता है तथा जो वेदकी निन्दा करनेवाला, वेद बेचनेवाला या अगम्या स्त्रीसे सम्भोग करता है, हे द्विज! वे सब लवणनरकमें जाते हैं॥ १२-१३॥ चोर तथा मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला पुरुष विलोहितनरकमें गिरता है॥ १४॥ देव, द्विज और पितृगणसे द्वेष करनेवाला तथा रत्नको दूषित करनेवाला कृमिभक्षनरकमें और अनिष्ट यज्ञ करनेवाला कृमीशनरकमें जाता है॥ १५॥<br><br>जो नराधम पितृगण, देवगण और अतिथियोंको छोड़कर उनसे पहले भोजन कर लेता है वह अति उग्र लालाभक्षनरकमें पड़ता है; और बाण बनानेवाला वेधकनरकमें जाता है॥ १६॥ जो मनुष्य कर्णी नामक बाण बनाते हैं और जो खड्गादि शस्त्र बनानेवाले हैं वे अति दारुण विशसननरकमें गिरते हैं॥ १७॥ असत्-प्रतिग्रह (दूषित उपायोंसे धन-संग्रह) करनेवाला, अयाज्य-याजक और नक्षत्रोपजीवी (नक्षत्र-विद्याको न जानकर भी उसका ढोंग रचनेवाला) पुरुष अधोमुखनरकमें पड़ता है॥ १८॥ साहस (निष्ठुर कर्म) करनेवाला पुरुष पूयवहनरकमें जाता है, तथा [पुत्र-मित्रादिकी वंचना करके] अकेले ही स्वादु भोजन करनेवाला और लाख, मांस, रस, तिल तथा लवण आदि बेचनेवाला ब्राह्मण भी उसी (पूयवह) नरकमें गिरता है॥ १९-२०॥ हे द्विजश्रेष्ठ! बिलाव, कुक्कुट, छाग, अश्व, शूकर तथा पक्षियोंको [जीविकाके लिये] पालनेसे भी पुरुष उसी नरकमें जाता है॥ २१॥ नट या मल्लवृत्तिसे रहनेवाला, धीवरका कर्म करनेवाला, कुण्ड (उपपतिसे उत्पन्न सन्तान)-का अन्न खानेवाला, विष देनेवाला, चुगलखोर, स्त्रीकी असद्वृत्तिके आश्रय रहनेवाला, धन आदिके लोभसे बिना पर्वके अमावास्या आदि पर्वदिनोंका कार्य करानेवाला |