भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

अ० ४ ] * द्वितीय अंश * १२३


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
अन्याः सहस्त्रशस्तत्र क्षुद्रनद्यस्तथाचलाः।<br>कुशद्वीपे कुशस्तम्बः संज्ञया तस्य तत्स्मृतम्॥ ४४वहाँ और भी सहस्रों छोटी-छोटी नदियाँ और पर्वत हैं। कुशद्वीपमें एक कुशका झाड़ है। उसीके कारण इसका यह नाम पड़ा है॥ ४४॥ यह द्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा हुआ है और वह घृत-समुद्र क्रौञ्चद्वीपसे परिवेष्टित है॥ ४५॥
तत्प्रमाणेन स द्वीपो घृतोदेन समावृतः।<br>घृतोदश्च समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ॥ ४५
क्रौञ्चद्वीपो महाभाग श्रूयताञ्चापरो महान्।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणो यस्य विस्तरः ॥ ४६हे महाभाग! अब इसके अगले क्रौञ्चनामक महाद्वीपके विषयमें सुनो, जिसका विस्तार कुशद्वीपसे दूना है॥ ४६॥ क्रौञ्चद्वीपमें महात्मा द्युतिमान्के जो पुत्र थे; उनके नामानुसार ही महाराज द्युतिमान्ने उनके वर्षोंके नाम रखे॥ ४७॥ हे मुने! उसके कुशल, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात पुत्र थे॥ ४८॥ वहाँ भी देवता और गन्धर्वोंसे सेवित अति मनोहर सात वर्षपर्वत हैं। हे महाबुद्धे! उनके नाम सुनो— ॥ ४९॥ उनमें पहला क्रौंच, दूसरा वामन, तीसरा अन्धकारक, चौथा घोड़ीके मुखके समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, पाँचवाँ दिवावृत्, छठा पुण्डरीकवान् और सातवाँ महापर्वत दुन्दुभि है। वे द्वीप परस्पर एक-दूसरेसे दूने हैं; और उन्हींकी भाँति उनके पर्वत भी [उत्तरोत्तर द्विगुण] हैं॥ ५०-५१॥
क्रौञ्चद्वीपे द्युतिमतः पुत्रास्तस्य महात्मनः।<br>तन्नामानि च वर्षाणि तेषां चक्रे महीपतिः॥ ४७
कुशलो मन्दगश्चोष्णः पीवरोऽथान्धकारकः।<br>मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सप्तैते तत्सुता मुने ॥ ४८
तत्रापि देवगन्धर्वसेविताः सुमनोहराः।<br>वर्षाचला महाबुद्धे तेषां नामानि मे शृणु ॥ ४९
क्रौञ्चश्च वामनश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः।<br>चतुर्थो रत्नशैलश्च स्वाहिनी हयसन्निभः॥ ५०
दिवावृत्पञ्चमश्चात्र तथान्यः पुण्डरीकवान्।<br>दुन्दुभिश्च महाशैलो द्विगुणास्ते परस्परम्।<br>द्वीपा द्वीपेषु ये शैला यथा द्वीपेषु ते तथा ॥ ५१
वर्षेष्वेतेषु रम्येषु तथा शैलवरेषु च।<br>निवसन्ति निरातङ्काः सह देवगणैः प्रजाः॥ ५२इन सुरम्य वर्षों और पर्वतश्रेष्ठोंमें देवगणोंके सहित सम्पूर्ण प्रजा निर्भय होकर रहती है॥ ५२॥ हे महामुने! वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमसे पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिष्य कहलाते हैं॥ ५३॥ हे मैत्रेय! वहाँ जिनका जल पान किया जाता है उन नदियोंका विवरण सुनो। उस द्वीपमें सात प्रधान तथा अन्य सैकड़ों क्षुद्र नदियाँ हैं॥ ५४॥ वे सात वर्षनदियाँ गौरी, कुमुद्वती, सन्ध्या, रात्रि, मनोजवा, क्षान्ति और पुण्डरीका हैं॥ ५५॥ वहाँ भी रुद्ररूपी जनार्दन भगवान् विष्णुकी पुष्करादि वर्णोंद्वारा यज्ञादिसे पूजा की जाती है॥ ५६॥ यह क्रौञ्चद्वीप चारों ओरसे अपने तुल्य परिमाणवाले दधिमण्ड (मट्ठे)-के समुद्रसे घिरा हुआ है॥ ५७॥ और हे महामुने! यह मट्ठेका समुद्र भी शाकद्वीपसे घिरा हुआ है, जो विस्तारमें क्रौञ्चद्वीपसे दूना है॥ ५८॥
पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्याख्याश्च महामुने।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चानुक्रमोदिताः ॥ ५३
नदीमैत्रेय ते तत्र याः पिबन्ति शृणुष्व ताः।<br>सप्तप्रधानाः शतशस्तत्रान्याः क्षुद्रनिम्नगाः॥ ५४
गौरी कुमुद्वती चैव सन्ध्या रात्रिर्मनोजवा।<br>क्षान्तिश्च पुण्डरीका च सप्तैता वर्षनिम्नगाः ॥ ५५
तत्रापि विष्णुर्भगवान्पुष्कराद्यैर्जनार्दनः।<br>यागै रुद्रस्वरूपश्च इज्यते यज्ञसन्निधौ ॥ ५६
क्रौञ्चद्वीपः समुद्रेण दधिमण्डोदकेन च।<br>आवृतः सर्वतः क्रौञ्चद्वीपतुल्येन मानतः ॥ ५७
दधिमण्डोदकश्चापि शाकद्वीपेन संवृतः।<br>क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन महामुने ॥ ५८
शाकद्वीपेश्वरस्यापि भव्यस्य सुमहात्मनः।<br>सप्तैव तनयास्तेषां ददौ वर्षाणि सप्त सः ॥ ५९शाकद्वीपके राजा महात्मा भव्यके भी सात ही पुत्र थे। उनको भी उन्होंने पृथक्-पृथक् सात वर्ष दिये॥ ५९॥