भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

१२२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४

योनस्तोया वितृष्णा च चन्द्रा मुक्ता विमोचनी ।<br>निवृत्तिः सप्तमी तासां स्मृतास्ताः पापशान्तिदाः ॥ २८<br>श्वेतञ्च हरितं चैव वैद्युतं मानसं तथा ।<br>जीमूतं रोहितं चैव सुप्रभं चापि शोभनम् ।<br>सप्तैतानि तु वर्षाणि चातुर्वर्ण्ययुतानि वै ॥ २९<br>शाल्मले ये तु वर्णाश्च वसन्त्येते महामुने ।<br>कपिलाश्चारुणाः पीताः कृष्णाश्चैव पृथक् पृथक् ॥ ३०<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव यजन्ति तम्।<br>भगवन्तं समस्तस्य विष्णुमात्मानमव्ययम् ।<br>वायुभूतं मखश्रेष्ठैर्यज्वानो यज्ञसंस्थितिम् ॥ ३१<br>देवानामात्र सान्निध्यमतीव सुमनोहरे ।<br>शाल्मलिः सुमहावृक्षो नाम्ना निर्वृतिकारकः ॥ ३२<br>एष द्वीपः समुद्रेण सुरोदेन समावृतः ।<br>विस्ताराच्छाल्मलस्यैव समेन तु समन्ततः ॥ ३३<br>सुरोदकः परिवृतः कुशद्वीपेन सर्वतः ।<br>शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः ॥ ३४<br>ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे सप्त पुत्राञ्छृणुष्व तान् ॥ ३५<br>उद्भिदो वेणुमांश्चैव वैरथो लम्बनो धृतिः ।<br>प्रभाकरोऽथ कपिलस्तन्नामा वर्षपद्धतिः ॥ ३६<br>तस्मिन्वसन्ति मनुजाः सह दैतेयदानवैः ।<br>तथैव देवगन्धर्वयक्षकिम्पुरुषादयः ॥ ३७<br>वर्णास्तत्रापि चत्वारो निजानुष्ठानतत्पराः ।<br>दमिनः शुष्मिणः स्नेहा मन्देहाश्च महामुने ॥ ३८<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चानुक्रमोदिताः ॥ ३९<br>यथोक्तकर्मकर्तृत्वात्स्वाधिकारक्षयाय ते ।<br>तत्रैव तं कुशद्वीपे ब्रह्मरूपं जनार्दनम् ।<br>यजन्तः क्षपयन्त्युग्रमधिकारफलप्रदम् ॥ ४०<br>विद्रुमो हेमशैलश्च द्युतिमान् पुष्पवांस्तथा ।<br>कुशेशयो हरिश्चैव सप्तमो मन्दराचलः ॥ ४१<br>वर्षाचलास्तु सप्तैते तत्र द्वीपे महामुने ।<br>नद्यश्च सप्त तासां तु शृणु नामान्यनुक्रमात् ॥ ४२<br>धूतपापा शिवा चैव पवित्रा सम्मतिस्तथा ।<br>विद्युदम्भा मही चान्या सर्वपापहरास्त्विमाः ॥ ४३वे योनि, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, मुक्ता, विमोचनी और निवृत्ति हैं तथा स्मरणमात्रसे ही सारे पापोंको शान्त कर देनेवाली हैं ॥ २८ ॥ श्वेत, हरित, वैद्युत, मानस, जीमूत, रोहित और अति शोभायमान सुप्रभ—ये उसके चारों वर्णोंसे युक्त सात वर्ष हैं ॥ २९ ॥ हे महामुने! शाल्मलद्वीपमें कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण—ये चार वर्ण निवास करते हैं जो पृथक्-पृथक् क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। ये यजनशील लोग सबके आत्मा, अव्यय और यज्ञके आश्रय वायुरूप विष्णुभगवान्‌का श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं॥ ३०-३१॥ इस अत्यन्त मनोहर द्वीपमें देवगण सदा विराजमान रहते हैं। इसमें शाल्मल (सेमल)-का एक महान् वृक्ष है जो अपने नामसे ही अत्यन्त शान्तिदायक है ॥ ३२ ॥ यह द्वीप अपने समान ही विस्तारवाले एक मदिराके समुद्रसे सब ओरसे पूर्णतया घिरा हुआ है ॥ ३३ ॥ और यह सुरासमुद्र शाल्मलद्वीपसे दूने विस्तारवाले कुशद्वीपद्वारा सब ओरसे परिवेष्टित है ॥ ३४ ॥<br>कुशद्वीपमें [वहाँके अधिपति] ज्योतिष्मान्‌के सात पुत्र थे, उनके नाम सुनो। वे उद्भिद, वेणुमान्, वैरथ, लम्बन, धृति, प्रभाकर और कपिल थे। उनके नामानुसार ही वहाँके वर्षोंके नाम पड़े ॥ ३५-३६ ॥ उसमें दैत्य और दानवोंके सहित मनुष्य तथा देव, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर आदि निवास करते हैं ॥ ३७ ॥ हे महामुने! वहाँ भी अपने-अपने कर्मोंमें तत्पर दमी, शुष्मी, स्नेह और मन्देहनामक चार ही वर्ण हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ही हैं॥ ३८-३९॥ अपने प्रारब्धक्षयके निमित्त शास्त्रानुकूल कर्म करते हुए वहाँ कुशद्वीपमें ही वे ब्रह्मरूप जनार्दनकी उपासनाद्वारा अपने प्रारब्धफलके देनेवाले अत्युग्र अहंकारका क्षय करते हैं ॥ ४० ॥ हे महामुने! उस द्वीपमें विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि और सातवाँ मन्दराचल—ये सात वर्षपर्वत हैं। तथा उसमें सात ही नदियाँ हैं, उनके नाम क्रमशः सुनो— ॥ ४१-४२ ॥ वे धूतपापा, शिवा, पवित्रा, सम्मति, विद्युत्, अम्भा और मही हैं। ये सम्पूर्ण पापोंको हरनेवाली हैं ॥ ४३ ॥