विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| १२४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ४ |
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| जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मरीचकः ।<br>कुसुमोदश्च मौदाकिः सप्तमश्च महाद्रुमः ॥ ६०<br>तत्संज्ञान्येव तत्रापि सप्त वर्षाण्यनुक्रमात् ।<br>तत्रापि पर्वताः सप्त वर्षविच्छेदकारिणः ॥ ६१<br>पूर्वस्तत्रोदयगिरिर्जलाधारस्तथापरः ।<br>तथा रैवतकः श्यामस्तथैवास्तगिरिर्द्विज ।<br>आम्बिकेयस्तथा रम्यः केसरी पर्वतोत्तमः ॥ ६२<br>शाकस्तत्र महावृक्षः सिद्धगन्धर्वसेवितः ।<br>यत्रत्यवातसंस्पर्शादाह्लादो जायते परः ॥ ६३<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः ।<br>नद्यश्चात्र महापुण्याः सर्वपापभयापहाः ॥ ६४<br>सुकुमारी कुमारी च नलिनी धेनुका च या ।<br>इक्षुश्च वेणुका चैव गभस्ती सप्तमी तथा ॥ ६५<br>अन्याश्च शतशस्तत्र क्षुद्रनद्यो महामुने ।<br>महीधरास्तथा सन्ति शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६६<br>ताः पिबन्ति मुदा युक्ता जलदादिषु ये स्थिताः ।<br>वर्षेषु ते जनपदाः स्वर्गादभ्येत्य मेदिनीम् ॥ ६७<br>धर्महानिर्न तेष्वस्ति न सङ्घर्षः परस्परम् ।<br>मर्यादाव्युत्क्रमो नापि तेषु देशेषु सप्तसु ॥ ६८<br>मगाश्च मागधाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा ।<br>मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मागधाः क्षत्रियास्तथा ।<br>वैश्यास्तु मानसास्तेषां शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः ॥ ६९<br>शाकद्वीपे तु तैर्विष्णुः सूर्यरूपधरो मुने ।<br>यथोक्तैरिज्यते सम्यक्कर्मभिर्नियतात्मभिः ॥ ७०<br>शाकद्वीपस्तु मैत्रेय क्षीरोदेन समावृतः ।<br>शाकद्वीपप्रमाणेन वलयेनेव वेष्टितः ॥ ७१<br>क्षीराब्धिः सर्वतो ब्रह्मन्पुष्कराख्येन वेष्टितः ।<br>द्वीपेन शाकद्वीपात्तु द्विगुणेन समन्ततः ॥ ७२<br>पुष्करे सवनस्यापि महावीरोऽभवत्सुतः ।<br>धातकिश्च तयोस्तत्र द्वे वर्षे नामचिह्निते ।<br>महावीरं तथैवान्यद्धातकीखण्डसंज्ञितम् ॥ ७३<br>एकश्चात्र महाभाग प्रख्यातो वर्षपर्वतः ।<br>मानसोत्तरसंज्ञो वै मध्यतो वलयाकृतिः ॥ ७४ | वे सात पुत्र जलद, कुमार, सुकुमार, मरीचक, कुसुमोद, मौदाकि और महाद्रुम थे। उन्हींके नामानुसार वहाँ क्रमशः सात वर्ष हैं और वहाँ भी वर्षोंका विभाग करनेवाले सात ही पर्वत हैं ॥ ६०-६१ ॥ हे द्विज! वहाँ पहला पर्वत उदयाचल है और दूसरा जलाधार; तथा अन्य पर्वत रैवतक, श्याम, अस्ताचल, आम्बिकेय और अति सुरम्य गिरिश्रेष्ठ केसरी हैं ॥ ६२ ॥ वहाँ सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित एक अति महान् शाकवृक्ष है, जिसके वायुका स्पर्श करनेसे हृदयमें परम आह्लाद उत्पन्न होता है ॥ ६३ ॥ वहाँ चातुर्वर्ण्यसे युक्त अति पवित्र देश और समस्त पाप तथा भयको दूर करनेवाली सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, वेणुका और गभस्ती—ये सात महापवित्र नदियाँ हैं ॥ ६४-६५ ॥ हे महामुने ! इनके सिवा उस द्वीपमें और भी सैकड़ों छोटी-छोटी नदियाँ और सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं ॥ ६६ ॥ स्वर्ग-भोगके अनन्तर जिन्होंने पृथिवी-तलपर आकर जलद आदि वर्षोंमें जन्म ग्रहण किया है वे लोग प्रसन्न होकर उनका जल पान करते हैं ॥ ६७ ॥ उन सातों वर्षोंमें धर्मका ह्रास पारस्परिक संघर्ष (कलह) अथवा मर्यादाका उल्लंघन कभी नहीं होता ॥ ६८ ॥ वहाँ मग, मागध, मानस और मन्दग—ये चार वर्ण हैं। इनमें मग सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, मागध क्षत्रिय हैं, मानस वैश्य हैं तथा मन्दग शूद्र हैं ॥ ६९ ॥ हे मुने ! शाकद्वीपमें शास्त्रानुकूल कर्म करनेवाले पूर्वोक्त चारों वर्णोंद्वारा संयत चित्तसे विधिपूर्वक सूर्यरूपधारी भगवान् विष्णुकी उपासना की जाती है ॥ ७० ॥ हे मैत्रेय ! वह शाकद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले मण्डलाकार दुग्धके समुद्रसे घिरा हुआ है ॥ ७१ ॥ और हे ब्रह्मन् ! वह क्षीर-समुद्र शाकद्वीपसे दूने परिमाणवाले पुष्करद्वीपसे परिवेष्टित है ॥ ७२ ॥<br>पुष्करद्वीपमें वहाँके अधिपति महाराज सवनके महावीर और धातकि नामक दो पुत्र हुए। अतः उन दोनोंके नामानुसार उसमें महावीर-खण्ड और धातकी-खण्ड नामक दो वर्ष हैं ॥ ७३ ॥ हे महाभाग ! इसमें मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष-पर्वत कहा जाता है जो इसके मध्यमें वलयाकार स्थित है तथा पचास सहस्र |