भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 558 में से

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पृष्ठ 136

अ० ४ ] * द्वितीय अंश * १२५

योजनानां सहस्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः ।<br>तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः ॥ ७५<br>पुष्करद्वीपवलयं मध्येन विभजन्निव ।<br>स्थितोऽसौ तेन विच्छिन्नं जातं तद्वर्षकद्वयम् ॥ ७६<br>वलयाकारमेकैकं तयोर्वर्षं तथा गिरिः ॥ ७७<br>दशवर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः ।<br>निरामया विशोकाश्च रागद्वेषादिवर्जिताः ॥ ७८<br>अधमोत्तमौ न तेष्वास्तां न वध्यवधकौ द्विज ।<br>नेर्ष्यासूया भयं द्वेषो दोषो लोभादिको न च ॥ ७९<br>महावीरं बहिर्वर्षं धातकीखण्डमन्ततः ।<br>मानसोत्तरशैलस्य देवदैत्यादिसेवितम् ॥ ८०<br>सत्यानृते न तत्रास्तां द्वीपे पुष्करसंज्ञिते ।<br>न तत्र नद्यः शैला वा द्वीपे वर्षद्वयान्विते ॥ ८१<br>तुल्यवेषास्तु मनुजा देवास्तत्रैकरूपिणः ।<br>वर्णाश्रमाचारहीनं धर्माचरणवर्जितम् ॥ ८२<br>त्रयी वार्ता दण्डनीतिशुश्रूषारहितञ्च यत् ।<br>वर्षद्वयं तु मैत्रेय भौमः स्वर्गोऽयमुत्तमः ॥ ८३<br>सर्वर्तुसुखदः कालो जरारोगादिवर्जितः ।<br>धातकीखण्डसंज्ञेऽथ महावीरे च वै मुने ॥ ८४<br>न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।<br>तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः ॥ ८५<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवेष्टितः ।<br>समेन पुष्करस्यैव विस्तारान्मण्डलं तथा ॥ ८६<br>एवं द्वीपाः समुद्रैश्च सप्त सप्तभिरावृताः ।<br>द्वीपश्चैव समुद्रश्च समानौ द्विगुणौ परौ ॥ ८७<br>पयांसि सर्वदा सर्वसमुद्रेषु समानि वै ।<br>न्यूनातिरिक्तता तेषां कदाचिन्नैव जायते ॥ ८८<br>स्थालीस्थमग्निसंयोगादुद्रेकि सलिलं यथा ।<br>तथेन्दुवृद्धौ सलिलमम्भोधौ मुनिसत्तम ॥ ८९<br>अन्यूनानतिरिक्ताश्च वर्धन्त्यापो ह्रसन्ति च ।<br>उदयास्तमनेष्विन्दोः पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः ॥ ९०योजन ऊँचा और इतना ही सब ओर गोलाकार फैला हुआ है ॥ ७४-७५ ॥ यह पर्वत पुष्करद्वीपरूप गोलेको मानो बीचमेंसे विभक्त कर रहा है और इससे विभक्त होनेसे उसमें दो वर्ष हो गये हैं; उनमेंसे प्रत्येक वर्ष और वह पर्वत वलयाकार ही है ॥ ७६-७७ ॥ वहाँके मनुष्य रोग, शोक और राग-द्वेषादिसे रहित हुए दस सहस्र वर्षतक जीवित रहते हैं ॥ ७८ ॥ हे द्विज ! उनमें उत्तम-अधम अथवा वध्य-वधक आदि (विरोधी) भाव नहीं हैं और न उनमें ईर्ष्या, असूया, भय, द्वेष और लोभादि दोष ही हैं ॥ ७९ ॥ महावीरवर्ष मानसोत्तर पर्वतके बाहरकी ओर है और धातकी-खण्ड भीतरकी ओर। इनमें देव और दैत्य आदि निवास करते हैं ॥ ८० ॥ दो खण्डोंसे युक्त उस पुष्करद्वीपमें सत्य और मिथ्याका व्यवहार नहीं है और न उसमें पर्वत तथा नदियाँ ही हैं ॥ ८१ ॥ वहाँके मनुष्य और देवगण समान वेष और समान रूपवाले होते हैं। हे मैत्रेय ! वर्णाश्रमाचारसे हीन, काम्य कर्मोंसे रहित तथा वेदत्रयी, कृषि, दण्डनीति और शुश्रूषा आदिसे शून्य वे दोनों वर्ष तो मानो अत्युत्तम भौम (पृथिवीके) स्वर्ग हैं ॥ ८२-८३ ॥ हे मुने ! उन महावीर और धातकी-खण्ड नामक वर्षोंमें काल (समय) समस्त ऋतुओंमें सुखदायक और जरा तथा रोगादिसे रहित रहता है ॥ ८४ ॥ पुष्करद्वीपमें ब्रह्माजीका उत्तम निवासस्थान एक न्यग्रोध (वट)-का वृक्ष है, जहाँ देवता और दानवादिसे पूजित श्रीब्रह्माजी विराजते हैं ॥ ८५ ॥ पुष्करद्वीप चारों ओरसे अपने ही समान विस्तारवाले मीठे पानीके समुद्रसे मण्डलके समान घिरा हुआ है ॥ ८६ ॥<br>इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं और वे द्वीप तथा [उन्हें घेरनेवाले] समुद्र परस्पर समान हैं, और उत्तरोत्तर दूने होते गये हैं ॥ ८७ ॥ सभी समुद्रोंमें सदा समान जल रहता है, उसमें कभी न्यूनता अथवा अधिकता नहीं होती ॥ ८८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! पात्रका जल जिस प्रकार अग्निका संयोग होनेसे उबलने लगता है उसी प्रकार चन्द्रमाकी कलाओंके बढ़नेसे समुद्रका जल भी बढ़ने लगता है ॥ ८९ ॥ शुक्ल और कृष्ण पक्षोंमें चन्द्रमाके उदय और अस्तसे न्यूनाधिक न होते हुए ही जल घटता और बढ़ता है ॥ ९० ॥
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