भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

१२६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ५


दशोत्तराणि पञ्चैव ह्यङ्गुलानां शतानि वै।
अपां वृद्धिक्षयौ दृष्टौ सामुद्रीणां महामुने॥ ९१
भोजनं पुष्करद्वीपे तत्र स्वयमुपस्थितम्।
षड्रसं भुञ्जते विप्र प्रजाः सर्वाः सदैव हि॥ ९२
स्वादूदकस्य परितो दृश्यतेऽलोकसंस्थितिः।
द्विगुणा काञ्चनी भूमिः सर्वजन्तुविवर्जिता॥ ९३
लोकालोकस्ततश्शैलो योजनायुतविस्तृतः।
उच्छ्रायेणापि तावन्ति सहस्राण्यचलो हि सः॥ ९४
ततस्तमः समावृत्य तं शैलं सर्वतः स्थितम्।
तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात्परिवेष्टितम्॥ ९५
पञ्चाशत्कोटिविस्तारा सेयमूर्वी महामुने।
सहैवाण्डकटाहेन सद्वीपाब्धिमहीधरा॥ ९६
सेयं धात्री विधात्री च सर्वभूतगुणाधिका।
आधारभूता सर्वेषां मैत्रेय जगतामिति॥ ९७

हे महामुने! समुद्रके जलकी वृद्धि और क्षय पाँच सौ दस (५१०) अंगुलतक देखी जाती है॥९१॥ हे विप्र! पुष्करद्वीपमें सम्पूर्ण प्रजावर्ग सर्वदा [बिना प्रयत्नके] अपने-आप ही प्राप्त हुए षड्रस भोजनका आहार करते हैं॥९२॥
स्वादूदक (मीठे पानीके) समुद्रके चारों ओर लोक-निवाससे शून्य और समस्त जीवोंसे रहित उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिखायी देती है॥९३॥ वहाँ दस सहस्र योजन विस्तारवाला लोकालोक-पर्वत है। वह पर्वत ऊँचाईमें भी उतने ही सहस्र योजन है॥९४॥ उसके आगे उस पर्वतको सब ओरसे आवृतकर घोर अन्धकार छाया हुआ है, तथा वह अन्धकार चारों ओरसे ब्रह्माण्ड-कटाहसे आवृत है॥९५॥ हे महामुने! अण्डकटाहके सहित द्वीप, समुद्र और पर्वतादियुक्त यह समस्त भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तारवाला है॥९६॥ हे मैत्रेय! आकाशादि समस्त भूतोंसे अधिक गुणवाली यह पृथिवी सम्पूर्ण जगत्‌की आधारभूता और उसका पालन तथा उद्भव करनेवाली है॥९७॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥


पाँचवाँ अध्याय

सात पाताललोकोंका वर्णन

श्रीपराशर उवाच

विस्तार एष कथितः पृथिव्या भवतो मया।
सप्ततिस्तु सहस्राणि द्विजोच्छ्रायोऽपि कथ्यते॥ १
दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम।
अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत्।
महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम्॥ २
शुक्लकृष्णारुणाः पीताः शर्कराः शैलकाञ्चनाः।
भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः॥ ३
तेषु दानवदैतेया यक्षाश्च शतशस्तथा।
निवसन्ति महानागजातयश्च महामुने॥ ४
स्वर्लोकादपि रम्याणि पातालानीति नारदः।
प्राह स्वर्गसदां मध्ये पातालाभ्यागतो दिवि॥ ५
आह्लादकारिणः शुभ्रा मणयो यत्र सुप्रभाः।
नागाभरणभूषासु पातालं केन तत्समम्॥ ६

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! मैंने तुमसे यह पृथिवीका विस्तार कहा; इसकी ऊँचाई भी सत्तर सहस्र योजन कही जाती है॥१॥ हे मुनिसत्तम! अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल और पाताल—इन सातोंमेंसे प्रत्येक दस-दस सहस्र योजनकी दूरीपर है॥२॥ हे मैत्रेय! सुन्दर महलोंसे सुशोभित वहाँकी भूमियाँ शुक्ल, कृष्ण, अरुण और पीत वर्णकी तथा शर्करामयी (कँकरीली), शैली (पत्थरकी) और सुवर्णमयी है॥३॥ हे महामुने! उनमें दानव, दैत्य, यक्ष और बड़े-बड़े नाग आदिकोंकी सैकड़ों जातियाँ निवास करती हैं॥४॥
एक बार नारदजीने पाताललोकसे स्वर्गमें आकर वहाँके निवासियोंसे कहा था कि 'पाताल तो स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर है'॥५॥ जहाँ नागगणके आभूषणोंमें सुन्दर प्रभावुक्त आह्लादकारिणी शुभ्र मणियाँ जड़ी हुई हैं उस पातालको किसके समान कहें?॥६॥