भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

अ० ८ ] * द्वितीय अंश * १३५


आठवाँ अध्याय

सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
व्याख्यातमेतद्ब्रह्माण्डसंस्थानं तव सुव्रत।<br>ततः प्रमाणसंस्थाने सूर्यादीनां शृणुष्व मे॥ १हे सुव्रत! मैंने तुमसे यह ब्रह्माण्डकी स्थिति कही, अब सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति और उनके परिमाण सुनो॥ १॥
योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।<br>ईषादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम॥ २हे मुनिश्रेष्ठ! सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार योजन है तथा इससे दूना उसका ईषा-दण्ड (जूआ और रथके बीचका भाग) है॥ २॥
सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि वै।<br>योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम्॥ ३उसका धुरा डेढ़ करोड़ सात लाख योजन लम्बा है जिसमें उसका पहिया लगा हुआ है॥ ३॥
त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्नेमिन्यक्षयात्मके।<br>संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥ ४उस पूर्वाह्न, मध्याह्न और पराह्नरूप तीन नाभि, परिवत्सरादि पाँच अरे और षड्-ऋतुरूप छः नेमिवाले अक्षयस्वरूप संवत्सरात्मक चक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र स्थित है॥ ४॥
हयाश्च सप्तच्छन्दांसि तेषां नामानि मे शृणु।<br>गायत्री च बृहत्युष्णिग्जगती त्रिष्टुबेव च।<br>अनुष्टुप्पङ्क्तिरित्युक्ता च्छन्दांसि हरयो रवेः॥ ५सात छन्द ही उसके घोड़े हैं, उनके नाम सुनो—गायत्री, बृहती, उष्णिक़्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति—ये छन्द ही सूर्यके सात घोड़े कहे गये हैं॥ ५॥
चत्वारिंशत्सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।<br>पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य महामते॥ ६हे महामते! भगवान् सूर्यके रथका दूसरा धुरा साढ़े पैंतालीस सहस्र योजन लम्बा है॥ ६॥
अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद्युगार्द्धयोः।<br>ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्द्धेन ध्रुवाधारो रथस्य वै।<br>द्वितीयेऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले॥ ७दोनों धुरोंके परिमाणके तुल्य ही उसके युगार्द्धों (जूओं)-का परिमाण है, इनमेंसे छोटा धुरा उस रथके एक युगार्द्ध (जूए)-के सहित ध्रुवके आधारपर स्थित है और दूसरे धुरेका चक्र मानसोत्तरपर्वतपर स्थित है॥ ७॥
मानसोत्तरशैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी।<br>दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वरुणस्य च।<br>उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥ ८इस मानसोत्तरपर्वतके पूर्वमें इन्द्रकी, दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें चन्द्रमाकी पुरी है; उन पुरियोंके नाम सुनो॥ ८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा।<br>पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी॥ ९इन्द्रकी पुरी वस्वौकसारा है, यमकी संयमनी है, वरुणकी सुखा है तथा चन्द्रमाकी विभावरी है॥ ९॥
काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।<br>मैत्रेय भगवान्भानुर्ज्योतिषां चक्रसंयुतः॥ १०हे मैत्रेय! ज्योतिषचक्रके सहित भगवान् भानु दक्षिण-दिशामें प्रवेशकर छोड़े हुए बाणके समान तीव्र वेगसे चलते हैं॥ १०॥
अहोरात्रव्यवस्थानकारणं भगवान् रविः।<br>देवयानः परः पन्था योगिनां क्लेशसङ्क्षये॥ ११भगवान् सूर्यदेव दिन और रात्रिकी व्यवस्थाके कारण हैं और रागादि क्लेशोंके क्षीण हो जानेपर वे ही क्रममुक्तिभागी योगिजनोंके देवयान नामक श्रेष्ठ मार्ग हैं॥ ११॥
दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।<br>सर्वद्वीपेषु मैत्रेय निशार्द्धस्य च सम्मुखः॥ १२हे मैत्रेय! सभी द्वीपोंमें सर्वदा मध्याह्न तथा मध्यरात्रिके समय सूर्यदेव मध्य आकाशमें सामनेकी ओर रहते हैं*॥ १२॥

* अर्थात् जिस द्वीप या खण्डमें सूर्यदेव मध्याह्नके समय सम्मुख पड़ते हैं उसकी समान रेखापर दूसरी ओर स्थित द्वीपान्तरमें वे उसी प्रकार मध्यरात्रिके समय रहते हैं।