भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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१३६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८

उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे। विदिशासु त्वशेषासु तथा ब्रह्मन् दिशासु च॥ १३

यैर्यत्र दृश्यते भास्वान्स तेषामुदयः स्मृतः। तिरोभावं च यत्रैति तत्रैवास्तमनं रवेः॥ १४

नैवास्तमनमर्कस्य नोदयः सर्वदा सतः। उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवेः॥ १५

शक्रादीनां पुरे तिष्ठन् स्पृशत्येष पुरत्रयम्। विकौणौ द्वौ विकोणस्थस्त्रीन् कोणान्द्वे पुरे तथा॥ १६

उदितो वर्द्धमानाभिरामध्याह्नात्तपन् रविः। ततः परं ह्रसन्तीभीर्गोभिरस्तं नियच्छति॥ १७

उदयास्तमनाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे दिशौ। यावत्पुरस्तात्तपति तावत्पृष्ठे च पार्श्वयोः॥ १८

ऋतेऽमरगिरेर्मेरोरुपरि ब्रह्मणः सभाम्। ये ये मरीचयोऽर्कस्य प्रयान्ति ब्रह्मणः सभाम्। ते ते निरस्तास्तद्भासा प्रतीपमुपयान्ति वै॥ १९

तस्माद्दिश्युत्तरस्यां वै दिवारात्रिः सदैव हि। सर्वेषां द्वीपवर्षाणां मेरुरुत्तरतो यतः॥ २०

प्रभा विवस्वतो रात्रावस्तं गच्छति भास्करे। विशत्यग्निमतौ रात्रौ वह्निर्दूरात्प्रकाशते॥ २१

वह्नेः प्रभा तथा भानुर्दिनेष्वाविशति द्विज। अतीव वह्निसंयोगादतः सूर्यः प्रकाशते॥ २२

तेजसी भास्कराग्नेये प्रकाशोष्णास्वरूपिणी। परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥ २३

दक्षिणोत्तरभूम्यर्द्धे समुत्तिष्ठति भास्करे। अहोरात्रं विशत्यम्भस्तमःप्राकाश्यशीलवत्॥ २४

आताम्रा हि भवन्त्यापो दिवा नक्तप्रवेशनात्। दिनं विशति चैवाम्भो भास्करेऽस्तमुपेयुषि। तस्माच्छुक्ला भवन्त्यापो नक्तमह्नः प्रवेशनात्॥ २५


इसी प्रकार उदय और अस्त भी सदा एक-दूसरेके सम्मुख ही होते हैं। हे ब्रह्मन्! समस्त दिशा और विदिशाओंमें जहाँके लोग [रात्रिका अन्त होनेपर] सूर्यको जिस स्थानपर देखते हैं उनके लिये वहाँ उसका उदय होता है और जहाँ दिनके अन्तमें सूर्यका तिरोभाव होता है वहीं उसका अस्त कहा जाता है॥ १३-१४॥ सर्वदा एक रूपसे स्थित सूर्यदेवका वास्तवमें न उदय होता है और न अस्त; बस, उनका देखना और न देखना ही उनके उदय और अस्त हैं॥ १५॥ मध्याह्नकालमें इन्द्रादिमेंसे किसीकी पुरीपर प्रकाशित होते हुए सूर्यदेव [पार्श्ववर्ती दो पुरियोंके सहित] तीन पुरियों और दो कोणों (विदिशाओं)-को प्रकाशित करते हैं, इसी प्रकार अग्नि आदि कोणोंमेंसे किसी एक कोणमें प्रकाशित होते हुए वे [पार्श्ववर्ती दो कोणोंके सहित] तीन कोण और दो पुरियोंको प्रकाशित करते हैं॥ १६॥ सूर्यदेव उदय होनेके अनन्तर मध्याह्नपर्यन्त अपनी बढ़ती हुई किरणोंसे तपते हैं और फिर क्षीण होती हुई किरणोंसे अस्त हो जाते हैं *॥ १७॥

सूर्यके उदय और अस्तसे ही पूर्व तथा पश्चिम दिशाओंकी व्यवस्था हुई है। वास्तवमें तो, वे जिस प्रकार पूर्वमें प्रकाश करते हैं उसी प्रकार पश्चिम तथा पार्श्ववर्तिनी [उत्तर और दक्षिण] दिशाओंमें भी करते हैं॥ १८॥ सूर्यदेव देवपर्वत सुमेरुके ऊपर स्थित ब्रह्माजीकी सभाके अतिरिक्त और सभी स्थानोंको प्रकाशित करते हैं; उनकी जो किरणें ब्रह्माजीकी सभामें जाती हैं वे उसके तेजसे निरस्त होकर उलटी लौट आती हैं॥ १९॥ सुमेरुपर्वत समस्त द्वीप और वर्षोके उत्तरमें है इसलिये उत्तरदिशामें (मेरुपर्वतपर) सदा [एक ओर] दिन और [दूसरी ओर] रात रहते हैं॥ २०॥ रात्रिके समय सूर्यके अस्त हो जानेपर उसका तेज अग्निमें प्रविष्ट हो जाता है; इसलिये उस समय अग्नि दूरहीसे प्रकाशित होने लगता है॥ २१॥ इसी प्रकार, हे द्विज! दिनके समय अग्निका तेज सूर्यमें प्रविष्ट हो जाता है; अतः अग्निके संयोगसे ही सूर्य अत्यन्त प्रखरतासे प्रकाशित होता है॥ २२॥ इस प्रकार सूर्य और अग्निके प्रकाश तथा उष्णतामय तेज परस्पर मिलकर दिन-रातमें वृद्धिको प्राप्त होते रहते हैं॥ २३॥

मेरुके दक्षिणी और उत्तरी भूम्यर्द्धमें सूर्यके प्रकाशित होते समय अन्धकारमयी रात्रि और प्रकाशमय दिन क्रमशः जलमें प्रवेश कर जाते हैं॥ २४॥ दिनके समय रात्रिके प्रवेश करनेसे ही जल कुछ ताम्रवर्ण दिखायी देता


* किरणोंकी वृद्धि, ह्रास एवं तीव्रता-मन्दता आदि सूर्यके समीप और दूर होनेसे मनुष्यके अनुभवके अनुसार कही गयी हैं।