भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

अ० ८] * द्वितीय अंश * १३७

एवं पुष्करमध्येन यदा याति दिवाकरः । त्रिंशद्भागन्तु मेदिन्यास्तदा मौहूर्तकी गतिः ॥ २६

कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमन्नेष दिवाकरः । करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन्मेदिनीं द्विज ॥ २७

अयनस्योत्तरस्यादौ मकरं याति भास्करः । ततः कुम्भं च मीनं च राशे राश्यन्तरं द्विज ॥ २८

त्रिष्वेतेष्वथ भुक्तेषु ततो वैषुवतीं गतिम् । प्रयाति सविता कुर्वन्नहोरात्रं ततः समम् ॥ २९

ततो रात्रिः क्षयं याति वर्द्धतेऽनुदिनं दिनम् ॥ ३०

ततश्च मिथुनस्यान्ते परां काष्ठामुपागतः । राशिं कर्कटकं प्राप्य कुरुते दक्षिणायनम् ॥ ३१

कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्त्तते । दक्षिणप्रक्रमे सूर्यस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते ॥ ३२

अतिवेगितया कालं वायुवेगबलाच्चरन् । तस्मात्प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति ॥ ३३

सूर्यो द्वादशभिः शैघ्र्यान्मुहूर्तैर्दक्षिणायने । त्रयोदशार्द्धमृक्षाणामह्ना तु चरति द्विज । मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन् ॥ ३४

कुलालचक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति । तथोगयने सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः ॥ ३५

तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिमल्पां तु गच्छति । अष्टादशमुहूर्त्तं यदुत्तरायणपश्चिमम् ॥ ३६

अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रमः ॥ ३७

त्रयोदशार्द्धमह्ना तु ऋक्षाणां चरते रविः । मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि रात्रौ द्वादशभिश्चरन् ॥ ३८

अतो मन्दतरं नाभ्यां चक्रं भ्रमति वै यथा । मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रुवो भ्रमति वै तथा ॥ ३९

है, किन्तु सूर्य-अस्त हो जानेपर उसमें दिनका प्रवेश हो जाता है; इसलिये दिनके प्रवेशके कारण ही रात्रिके समय वह शुक्लवर्ण हो जाता है ॥ २५ ॥

इस प्रकार जब सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमें पहुँचकर पृथ्वीका तीसवाँ भाग पार कर लेता है तो उसकी वह गति एक मुहूर्तकी होती है । [ अर्थात् उतने भागके अतिक्रमण करनेमें उसे जितना समय लगता है वही मुहूर्त कहलाता है ] ॥ २६ ॥ हे द्विज ! कुलाल-चक्र (कुम्हारके चाक) के सिरेपर घूमते हुए जीवके समान भ्रमण करता हुआ यह सूर्य पृथ्वीके तीसों भागोंका अतिक्रमण करनेपर एक दिन-रात्रि करता है ॥ २७ ॥ हे द्विज ! उत्तरायणके आरम्भमें सूर्य सबसे पहले मकरराशिमें जाता है, उसके पश्चात् वह कुम्भ और मीन राशियोंमें एक राशिसे दूसरी राशिमें जाता है ॥ २८ ॥ इन तीनों राशियोंको भोग चुकनेपर सूर्य रात्रि और दिनको समान करता हुआ वैषुवती गतिका अवलम्बन करता है, [ अर्थात् वह भूमध्य-रेखाके बीचमें ही चलता है ] ॥ २९ ॥ उसके अनन्तर नित्यप्रति रात्रि क्षीण होने लगती है और दिन बढ़ने लगता है।

फिर [ मेष तथा वृष राशिका अतिक्रमण कर ] मिथुनराशिसे निकलकर उत्तरायणकी अन्तिम सीमापर उपस्थित हो वह कर्कराशिमें पहुँचकर दक्षिणायनका आरम्भ करता है ॥ ३०-३१ ॥ जिस प्रकार कुलाल-चक्रके सिरेपर स्थित जीव अति शीघ्रतासे घूमता है उसी प्रकार सूर्य भी दक्षिणायनको पार करनेमें अति शीघ्रतासे चलता है ॥ ३२ ॥ अतः वह अति शीघ्रतापूर्वक वायुवेगसे चलते हुए अपने उत्कृष्ट मार्गको थोड़े समयमें ही पार कर लेता है ॥ ३३ ॥ हे द्विज ! दक्षिणायनमें दिनके समय शीघ्रतापूर्वक चलनेसे उस समयके साढ़े तेरह नक्षत्रोंको सूर्य बारह मुहूर्तोंमें पार कर लेता है, किन्तु रात्रिके समय (मन्दगामी होनेसे) उतने ही नक्षत्रोंको अठारह मुहूर्तोंमें पार करता है ॥ ३४ ॥ कुलाल-चक्रके मध्यमें स्थित जीव जिस प्रकार धीरे-धीरे चलता है उसी प्रकार उत्तरायणके समय सूर्य मन्दगतिसे चलता है ॥ ३५ ॥ इसलिये उस समय वह थोड़ी-सी भूमि भी अति दीर्घकालमें पार करता है, अतः उत्तरायणका अन्तिम दिन अठारह मुहूर्तका होता है, उस दिन भी सूर्य अति मन्दगतिसे चलता है और ज्योतिषचक्रार्धके साढ़े तेरह नक्षत्रोंको एक दिनमें पार करता है किन्तु रात्रिके समय वह उतने ही (साढ़े तेरह) नक्षत्रोंको बारह मुहूर्तोंमें ही पार कर लेता है ॥ ३६-३८ ॥ अतः जिस प्रकार नाभिदेशमें चक्रके मन्द-मन्द घूमनेसे वहाँका मृत्-पिण्ड भी मन्दगतिसे घूमता है उसी प्रकार ज्योतिषचक्रके मध्यमें स्थित ध्रुव अति मन्द गतिसे घूमता है ॥ ३९ ॥