विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 149, कुल 558 में से
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१३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते।<br>ध्रुवस्तथा हि मैत्रेय तत्रैव परिवर्तते॥ ४० | हे मैत्रेय! जिस प्रकार कुलाल-चक्रकी नाभि अपने स्थानपर ही घूमती रहती है, उसी प्रकार ध्रुव भी अपने स्थानपर ही घूमता रहता है॥ ४०॥ |
| उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु।<br>दिवा नक्तं च सूर्यस्य मन्दा शीघ्रा च वै गतिः॥ ४१ | इस प्रकार उत्तर तथा दक्षिण सीमाओंके मध्यमें मण्डलाकार घूमते रहनेसे सूर्यकी गति दिन अथवा रात्रिके समय मन्द अथवा शीघ्र हो जाती है॥ ४१॥ |
| मन्दाह्नि यस्मिन्नयने शीघ्रा नक्तं तदा गतिः।<br>शीघ्रा निशि यदा चास्य तदा मन्दा दिवा गतिः॥ ४२ | जिस अयनमें सूर्यकी गति दिनके समय मन्द होती है उसमें रात्रिके समय शीघ्र होती है तथा जिस समय रात्रि-कालमें शीघ्र होती है उस समय दिनमें मन्द हो जाती है॥ ४२॥ |
| एकप्रमाणमेवैष मार्गं याति दिवाकरः।<br>अहोरात्रेण यो भुङ्क्ते समस्ता राशयो द्विज॥ ४३ | हे द्विज! सूर्यको सदा एक बराबर मार्ग ही पार करना पड़ता है; एक दिन-रात्रिमें यह समस्त राशियोंका भोग कर लेता है॥ ४३॥ |
| षडेव रात्रीन् यो भुङ्क्ते रात्रावन्यांश्च षड्दिवा॥ ४४<br>राशिप्रमाणजनिता दीर्घह्रस्वात्मता दिने।<br>तथा निशायां राशीनां प्रमाणैर्लघुदीर्घता॥ ४५ | सूर्य छः राशियोंको रात्रिके समय भोगता है और छःको दिनके समय। राशियोंके परिमाणानुसार ही दिनका बढ़ना-घटना होता है तथा रात्रिकी लघुता-दीर्घता भी राशियोंके परिमाणसे ही होती है॥ ४४-४५॥ |
| दिनादेर्दीर्घह्रस्वत्वं तद्भोगेनेव जायते।<br>उत्तरे प्रक्रमे शीघ्रा निशि मन्दा गतिर्दिवा॥ ४६<br>दक्षिणे त्वयने चैव विपरीता विवस्वतः॥ ४७ | राशियोंके भोगानुसार ही दिन अथवा रात्रिकी लघुता अथवा दीर्घता होती है। उत्तरायणमें सूर्यकी गति रात्रिकालमें शीघ्र होती है तथा दिनमें मन्द। दक्षिणायनमें उसकी गति इसके विपरीत होती है॥ ४६-४७॥ |
| उषा रात्रिः समाख्याता व्युष्टिश्चाप्युच्यते दिनम्।<br>प्रोच्यते च तथा सन्ध्या उषाव्युष्ट्योर्यदन्तरम्॥ ४८ | रात्रि उषा कहलाती है तथा दिन व्युष्टि (प्रभात) कहा जाता है; इन उषा तथा व्युष्टिके बीचके समयको सन्ध्या कहते हैं*॥ ४८॥ |
| सन्ध्याकाले च सम्प्राप्ते रौद्रे परमदारुणे।<br>मन्देहा राक्षसा घोराः सूर्यमिच्छन्ति खादितुम्॥ ४९ | इस अति दारुण और भयानक सन्ध्याकालके उपस्थित होनेपर मन्देहा नामक भयंकर राक्षसगण सूर्यको खाना चाहते हैं॥ ४९॥ |
| प्रजापतिकृतः शापस्तेषां मैत्रेय रक्षसाम्।<br>अक्षयत्वं शरीराणां मरणं च दिने दिने॥ ५० | हे मैत्रेय! उन राक्षसोंको प्रजापतिका यह शाप है कि उनका शरीर अक्षय रहकर भी मरण नित्यप्रति हो॥ ५०॥ |
| ततः सूर्यस्य तैर्युद्धं भवत्यत्यन्तदारुणम्।<br>ततो द्विजोत्तमास्तोयं संक्षिपन्ति महामुने॥ ५१<br>ॐकारब्रह्मसंयुक्तं गायत्र्या चाभिमन्त्रितम्।<br>तेन दह्यन्ति ते पापा वज्रीभूतेन वारिणा॥ ५२ | अतः सन्ध्याकालमें उनका सूर्यसे अति भीषण युद्ध होता है; हे महामुने! उस समय द्विजोत्तमगण जो ब्रह्मस्वरूप ॐकार तथा गायत्रीसे अभिमन्त्रित जल छोड़ते हैं, उस वज्रस्वरूप जलसे वे दुष्ट राक्षस दग्ध हो जाते हैं॥ ५१-५२॥ |
| अग्निहोत्रे हूयते या समन्त्रा प्रथमाहुतिः।<br>सूर्यो ज्योतिः सहस्त्रांशुस्तया दीप्यति भास्करः॥ ५३ | अग्निहोत्रमें जो ‘सूर्यो ज्योतिः’ इत्यादि मन्त्रसे प्रथम आहुति दी जाती है उससे सहस्त्रांशु दिननाथ देदीप्यमान हो जाते हैं॥ ५३॥ |
| ओङ्कारो भगवान्विष्णुस्त्रिधामा वचसां पतिः।<br>तदुच्चारणतस्ते तु विनाशं यान्ति राक्षसाः॥ ५४ | ॐकार विश्व, तैजस् और प्राज्ञरूप तीन धामोंसे युक्त भगवान् विष्णु है तथा सम्पूर्ण वाणियों (वेदों)-का अधिपति है, उसके उच्चारणमात्रसे ही वे राक्षसगण नष्ट हो जाते हैं॥ ५४॥ |
| वैष्णवोंऽशः परः सूर्यो योऽन्तर्ज्योतिरसम्प्लवम्।<br>अभिधायक ॐकारस्तस्य तत्प्रेरकः परः॥ ५५ | सूर्य विष्णुभगवान्का अति श्रेष्ठ अंश और विकाररहित अन्तर्ज्योतिःस्वरूप है। ॐकार उसका वाचक है और वह उसे उन राक्षसोंके वधमें अत्यन्त प्रेरित करनेवाला है॥ ५५॥ |
* 'व्युष्टि' और 'उषा' दिन और रात्रिके वैदिक नाम हैं; यथा—'रात्रिर्वा उषा अहर्व्युष्टिः।'