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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

१३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते।<br>ध्रुवस्तथा हि मैत्रेय तत्रैव परिवर्तते॥ ४०हे मैत्रेय! जिस प्रकार कुलाल-चक्रकी नाभि अपने स्थानपर ही घूमती रहती है, उसी प्रकार ध्रुव भी अपने स्थानपर ही घूमता रहता है॥ ४०॥
उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु।<br>दिवा नक्तं च सूर्यस्य मन्दा शीघ्रा च वै गतिः॥ ४१इस प्रकार उत्तर तथा दक्षिण सीमाओंके मध्यमें मण्डलाकार घूमते रहनेसे सूर्यकी गति दिन अथवा रात्रिके समय मन्द अथवा शीघ्र हो जाती है॥ ४१॥
मन्दाह्नि यस्मिन्नयने शीघ्रा नक्तं तदा गतिः।<br>शीघ्रा निशि यदा चास्य तदा मन्दा दिवा गतिः॥ ४२जिस अयनमें सूर्यकी गति दिनके समय मन्द होती है उसमें रात्रिके समय शीघ्र होती है तथा जिस समय रात्रि-कालमें शीघ्र होती है उस समय दिनमें मन्द हो जाती है॥ ४२॥
एकप्रमाणमेवैष मार्गं याति दिवाकरः।<br>अहोरात्रेण यो भुङ्क्ते समस्ता राशयो द्विज॥ ४३हे द्विज! सूर्यको सदा एक बराबर मार्ग ही पार करना पड़ता है; एक दिन-रात्रिमें यह समस्त राशियोंका भोग कर लेता है॥ ४३॥
षडेव रात्रीन् यो भुङ्क्ते रात्रावन्यांश्च षड्दिवा॥ ४४<br>राशिप्रमाणजनिता दीर्घह्रस्वात्मता दिने।<br>तथा निशायां राशीनां प्रमाणैर्लघुदीर्घता॥ ४५सूर्य छः राशियोंको रात्रिके समय भोगता है और छःको दिनके समय। राशियोंके परिमाणानुसार ही दिनका बढ़ना-घटना होता है तथा रात्रिकी लघुता-दीर्घता भी राशियोंके परिमाणसे ही होती है॥ ४४-४५॥
दिनादेर्दीर्घह्रस्वत्वं तद्भोगेनेव जायते।<br>उत्तरे प्रक्रमे शीघ्रा निशि मन्दा गतिर्दिवा॥ ४६<br>दक्षिणे त्वयने चैव विपरीता विवस्वतः॥ ४७राशियोंके भोगानुसार ही दिन अथवा रात्रिकी लघुता अथवा दीर्घता होती है। उत्तरायणमें सूर्यकी गति रात्रिकालमें शीघ्र होती है तथा दिनमें मन्द। दक्षिणायनमें उसकी गति इसके विपरीत होती है॥ ४६-४७॥
उषा रात्रिः समाख्याता व्युष्टिश्चाप्युच्यते दिनम्।<br>प्रोच्यते च तथा सन्ध्या उषाव्युष्ट्योर्यदन्तरम्॥ ४८रात्रि उषा कहलाती है तथा दिन व्युष्टि (प्रभात) कहा जाता है; इन उषा तथा व्युष्टिके बीचके समयको सन्ध्या कहते हैं*॥ ४८॥
सन्ध्याकाले च सम्प्राप्ते रौद्रे परमदारुणे।<br>मन्देहा राक्षसा घोराः सूर्यमिच्छन्ति खादितुम्॥ ४९इस अति दारुण और भयानक सन्ध्याकालके उपस्थित होनेपर मन्देहा नामक भयंकर राक्षसगण सूर्यको खाना चाहते हैं॥ ४९॥
प्रजापतिकृतः शापस्तेषां मैत्रेय रक्षसाम्।<br>अक्षयत्वं शरीराणां मरणं च दिने दिने॥ ५०हे मैत्रेय! उन राक्षसोंको प्रजापतिका यह शाप है कि उनका शरीर अक्षय रहकर भी मरण नित्यप्रति हो॥ ५०॥
ततः सूर्यस्य तैर्युद्धं भवत्यत्यन्तदारुणम्।<br>ततो द्विजोत्तमास्तोयं संक्षिपन्ति महामुने॥ ५१<br>ॐकारब्रह्मसंयुक्तं गायत्र्या चाभिमन्त्रितम्।<br>तेन दह्यन्ति ते पापा वज्रीभूतेन वारिणा॥ ५२अतः सन्ध्याकालमें उनका सूर्यसे अति भीषण युद्ध होता है; हे महामुने! उस समय द्विजोत्तमगण जो ब्रह्मस्वरूप ॐकार तथा गायत्रीसे अभिमन्त्रित जल छोड़ते हैं, उस वज्रस्वरूप जलसे वे दुष्ट राक्षस दग्ध हो जाते हैं॥ ५१-५२॥
अग्निहोत्रे हूयते या समन्त्रा प्रथमाहुतिः।<br>सूर्यो ज्योतिः सहस्त्रांशुस्तया दीप्यति भास्करः॥ ५३अग्निहोत्रमें जो ‘सूर्यो ज्योतिः’ इत्यादि मन्त्रसे प्रथम आहुति दी जाती है उससे सहस्त्रांशु दिननाथ देदीप्यमान हो जाते हैं॥ ५३॥
ओङ्कारो भगवान्विष्णुस्त्रिधामा वचसां पतिः।<br>तदुच्चारणतस्ते तु विनाशं यान्ति राक्षसाः॥ ५४ॐकार विश्व, तैजस् और प्राज्ञरूप तीन धामोंसे युक्त भगवान् विष्णु है तथा सम्पूर्ण वाणियों (वेदों)-का अधिपति है, उसके उच्चारणमात्रसे ही वे राक्षसगण नष्ट हो जाते हैं॥ ५४॥
वैष्णवोंऽशः परः सूर्यो योऽन्तर्ज्योतिरसम्प्लवम्।<br>अभिधायक ॐकारस्तस्य तत्प्रेरकः परः॥ ५५सूर्य विष्णुभगवान्‌का अति श्रेष्ठ अंश और विकाररहित अन्तर्ज्योतिःस्वरूप है। ॐकार उसका वाचक है और वह उसे उन राक्षसोंके वधमें अत्यन्त प्रेरित करनेवाला है॥ ५५॥

* 'व्युष्टि' और 'उषा' दिन और रात्रिके वैदिक नाम हैं; यथा—'रात्रिर्वा उषा अहर्व्युष्टिः।'

अ० ८ ] * द्वितीय अंश * १३९


तेन सम्प्रेरितं ज्योतिरोङ्कारेणाय दीप्तिमत् ।
दहत्यशेषरक्षांसि मन्देहाख्यान्यघानि वै ॥ ५६
तस्मान्नोल्लङ्घनं कार्यं सन्ध्योपासनकर्मणः ।
स हन्ति सूर्यं सन्ध्याया नोपास्तिं कुरुते तु यः ॥ ५७
ततः प्रयाति भगवान्ब्राह्मणैरभिरक्षितः ।
बालखिल्यादिभिश्चैव जगतः पालनोद्यतः ॥ ५८
काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव
त्रिंशच्च काष्ठा गणयेत्कलां च ।
त्रिंशत्कलश्चैव भवेन्मुहूर्त-
स्तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते ॥ ५९
ह्रासवृद्धी त्वहर्भागैर्दिवसानां यथाक्रमम् ।
सन्ध्या मुहूर्तमात्रा वै ह्रासवृद्ध्योः समा स्मृता ॥ ६०
रेखाप्रभृत्यथादित्ये त्रिमुहूर्तगते रवौ ।
प्रातः स्मृतस्ततः कालो भागश्चाह्नः स पञ्चमः ॥ ६१
तस्मात्प्रातस्तनात्कालात्त्रिमुहूर्तस्तु सङ्गवः ।
मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तस्तु तस्मात्कालात्तु सङ्गवात् ॥ ६२
तस्मान्माध्याह्निकात्कालादपराह्न इति स्मृतः ।
त्रय एव मुहूर्तास्तु कालभागः स्मृतो बुधैः ॥ ६३
अपराह्ने व्यतीते तु कालः सायाह्न एव च ।
दशपञ्चमुहूर्ता वै मुहूर्तास्त्रय एव च ॥ ६४
दशपञ्चमुहूर्तं वै अहर्वैषुवतं स्मृतम् ॥ ६५
वर्द्धते ह्रसते चैवाप्ययने दक्षिणोत्तरे ।
अहस्तु ग्रसते रात्रिं रात्रिर्ग्रसति वासरम् ॥ ६६
शरद्वसन्तयोर्मध्ये विषुवं तु विभाव्यते ।
तुलामेषगते भानौ समरात्रिदिनं तु तत् ॥ ६७
कर्कटावस्थिते भानौ दक्षिणायनमुच्यते ।
उत्तरायणमप्युक्तं मकरस्थे दिवाकरे ॥ ६८
त्रिंशन्मुहूर्तं कथितमहोरात्रं तु यन्मया ।
तानि पञ्चदश ब्रह्मन् पक्ष इत्यभिधीयते ॥ ६९
मासः पक्षद्वयेनोक्तो द्वौ मासौ चार्कजावृतुः ।
ऋतुत्रयं चाप्ययनं द्वेऽयने वर्षसंज्ञिते ॥ ७०


उस ॐकारकी प्रेरणासे अति प्रदीप्त होकर वह ज्योति मन्देहा नामक सम्पूर्ण पापी राक्षसोंको दग्ध कर देती है॥ ५६॥ इसलिये सन्ध्योपासन-कर्मका उल्लङ्घन कभी न करना चाहिये। जो पुरुष सन्ध्योपासन नहीं करता वह भगवान् सूर्यका घात करता है॥ ५७॥ तदनन्तर [उन राक्षसोंका वध करनेके पश्चात्] भगवान् सूर्य संसारके पालनमें प्रवृत्त हो बालखिल्यादि ब्राह्मणोंसे सुरक्षित होकर गमन करते हैं॥ ५८॥

पन्द्रह निमेषकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाकी एक कला गिनी जाती है। तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तोंके सम्पूर्ण रात्रि-दिन होते हैं॥ ५९॥ दिनोंका ह्रास अथवा वृद्धि क्रमशः प्रातःकाल, मध्याह्नकाल आदि दिवसांशोंके ह्रास-वृद्धिके कारण होते हैं; किन्तु दिनोंके घटते-बढ़ते रहनेपर भी सन्ध्या सर्वदा समान भावसे एक मुहूर्तकी ही होती है॥ ६०॥ उदयसे लेकर सूर्यकी तीन मुहूर्तकी गतिके कालको 'प्रातःकाल' कहते हैं, यह सम्पूर्ण दिनका पाँचवाँ भाग होता है॥ ६१॥ इस प्रातःकालके अनन्तर तीन मुहूर्तका समय 'संगव' कहलाता है तथा संगवकालके पश्चात् तीन मुहूर्तका 'मध्याह्न' होता है॥ ६२॥ मध्याह्नकालसे पीछेका समय 'अपराह्न' कहलाता है इस काल-भागको भी बुधजन तीन मुहूर्तका ही बताते हैं॥ ६३॥ अपराह्नके बीतनेपर 'सायाह्न' आता है। इस प्रकार [सम्पूर्ण दिनमें] पन्द्रह मुहूर्त और [प्रत्येक दिवसांशमें] तीन मुहूर्त होते हैं॥ ६४॥

वैषुवत दिवस पन्द्रह मुहूर्तका होता है, किन्तु उत्तरायण और दक्षिणायनमें क्रमशः उसके वृद्धि और ह्रास होने लगते हैं। इस प्रकार उत्तरायणमें दिन रात्रिका ग्रास करने लगता है और दक्षिणायनमें रात्रि दिनका ग्रास करती रहती है॥ ६५-६६॥ शरद् और वसन्त-ऋतुके मध्यमें सूर्यके तुला अथवा मेषराशिमें जानेपर 'विषुव' होता है। उस समय दिन और रात्रि समान होते हैं॥ ६७॥ सूर्यके कर्कराशिमें उपस्थित होनेपर दक्षिणायन कहा जाता है और उसके मकरराशिपर आनेसे उत्तरायण कहलाता है॥ ६८॥

हे ब्रह्मन्! मैंने जो तीस मुहूर्तके एक रात्रि-दिन कहे हैं, ऐसे पन्द्रह रात्रि-दिवसका एक 'पक्ष' कहा जाता है॥ ६९॥ दो पक्षका एक मास होता है, दो सौरमासकी एक ऋतु और तीन ऋतुका एक अयन होता है तथा दो अयन ही [मिलाकर] एक वर्ष कहे जाते हैं॥ ७०॥

१४०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ८

संवत्सरादयः पञ्च चतुर्मासविकल्पिताः।
निश्चयः सर्वकालस्य युगमित्यभिधीयते ॥ ७१
[सौर, सावन, चान्द्र तथा नाक्षत्र—इन] चार प्रकारके मासोंके अनुसार विविधरूपसे कल्पित संवत्सरादि पाँच प्रकारके वर्ष 'युग' कहलाते हैं यह युग ही [मलमासादि] सब प्रकारके काल-निर्णयका कारण कहा जाता है॥ ७१॥


संवत्सरस्तु प्रथमो द्वितीयः परिवत्सरः।
इद्वत्सरस्तृतीयस्तु चतुर्थश्चानुवत्सरः।
वत्सरः पञ्चमश्चात्र कालोऽयं युगसंज्ञितः ॥ ७२
उनमें पहला संवत्सर, दूसरा परिवत्सर, तीसरा इद्वत्सर, चौथा अनुवत्सर और पाँचवाँ वत्सर है। यह काल 'युग' नामसे विख्यात है॥ ७२॥


यः श्वेतोत्तरः शैलः शृङ्गवानिति विश्रुतः।
त्रीणि तस्य तु शृङ्गाणि यैरयं शृङ्गवान्स्मृतः ॥ ७३
श्वेतवर्षके उत्तरमें जो शृंगवान् नामसे विख्यात पर्वत है उसके तीन शृंग हैं, जिनके कारण यह शृंगवान् कहा जाता है॥ ७३॥


दक्षिणं चोत्तरं चैव मध्यं वैषुवतं तथा।
शरद्वसन्तयोर्मध्ये तद्भानुः प्रतिपद्यते।
मेषादौ च तुलादौ च मैत्रेय विषुवत्स्थितः ॥ ७४
तदा तुल्यमहोरात्रं करोति तिमिरापहः।
दशपञ्चमुहूर्तं वै तदेतदुभयं स्मृतम् ॥ ७५
उनमेंसे एक शृंग उत्तरमें, एक दक्षिणमें तथा एक मध्यमें है। मध्यशृंग ही 'वैषुवत' है। शरद् और वसन्त-ऋतुके मध्यमें सूर्य इस वैषुवतशृंगपर आते हैं; अतः हे मैत्रेय! मेष अथवा तुलाराशिके आरम्भमें तिमिरापहारी सूर्यदेव विषुवत्पर स्थित होकर दिन और रात्रिको समान परिमाण कर देते हैं। उस समय ये दोनों पन्द्रह-पन्द्रह मुहूर्तके होते हैं॥ ७४-७५॥


प्रथमे कृत्तिकाभागे यदा भास्वांस्तदा शशी।
विशाखानां चतुर्थेऽंशे मुने तिष्ठत्यसंशयम् ॥ ७६
विशाखानां यदा सूर्यश्चरत्यंशं तृतीयकम्।
तदा चन्द्रं विजानीयात्कृत्तिकाशिरसि स्थितम् ॥ ७७
तदैव विषुवाख्योऽयं कालः पुण्योऽभिधीयते।
तदा दानानि देयानि देवेभ्यः प्रयतात्मभिः ॥ ७८
ब्राह्मणेभ्यः पितृभ्यश्च मुखमेतत्तु दानजम्।
दत्तदानस्तु विषुवे कृतकृत्योऽभिजायते ॥ ७९
हे मुने! जिस समय सूर्य कृत्तिकानक्षत्रके प्रथम भाग अर्थात् मेषराशिके अन्तमें तथा चन्द्रमा निश्चय ही विशाखाके चतुर्थांश [अर्थात् वृश्चिकके आरम्भ]-में हों; अथवा जिस समय सूर्य विशाखाके तृतीय भाग अर्थात् तुलाके अन्तिमांशका भोग करते हों और चन्द्रमा कृत्तिकाके प्रथम भाग अर्थात् मेषान्तमें स्थित जान पड़ें तभी यह 'विषुव' नामक अति पवित्र काल कहा जाता है; इस समय देवता, ब्राह्मण और पितृगणके उद्देश्यसे संयतचित्त होकर दानादि देने चाहिये। यह समय दानग्रहणके लिये मानो देवताओंके खुले हुए मुखके समान है। अतः 'विषुव' कालमें दान करनेवाला मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है॥ ७६-७९॥


अहोरात्रार्द्धमासास्तु कलाःकाष्ठाःक्षणास्तथा।
पौर्णमासी तथा ज्ञेया अमावास्या तथैव च।
सिनीवाली कुहूश्चैव राका चानुमतिस्तथा ॥ ८०
यागादिके काल-निर्णयके लिये दिन, रात्रि, पक्ष, कला, काष्ठा और क्षण आदिका विषय भली प्रकार जानना चाहिये। राका और अनुमति दो प्रकारकी पूर्णमासी¹ तथा सिनीवाली और कुहू दो प्रकारकी अमावास्या² होती हैं॥ ८०॥


तपस्तपस्यौ मधुमाधवौ च
शुक्रः शुचिश्चायनमुत्तरं स्यात्।
नभोनभस्यौ च इषस्तथोर्ज-
स्सहःसहस्याविति दक्षिणं तत् ॥ ८१
माघ-फाल्गुन, चैत्र-वैशाख तथा ज्येष्ठ-आषाढ़—ये छः मास उत्तरायण होते हैं और श्रावण-भाद्र, आश्विन-कार्तिक तथा अगहन-पौष—ये छः दक्षिणायन कहलाते हैं॥ ८१॥


¹-जिस पूर्णिमामें पूर्णचन्द्र विराजमान होता है वह 'राका' कहलाती है तथा जिसमें एक कलाहीन होती है वह 'अनुमति' कही जाती है।
²-दृष्टचन्द्रा अमावास्याका नाम 'सिनीवाली' है और नष्टचन्द्राका नाम 'कुहू' है।

अ० ८ ] * द्वितीय अंश * १४१

लोकालोकश्च यश्शैलः प्रागुक्तो भवतो मया । लोकपालास्तु चत्वारस्तत्र तिष्ठन्ति सुव्रताः ॥ ८२ सुधामा शङ्खपाच्चैव कर्दमस्यात्मजो द्विज । हिरण्यरोमा चैवान्यश्चतुर्थः केतुमानपि ॥ ८३ निर्द्वन्द्वा निरभिमाना निस्तन्द्रा निष्परिग्रहाः । लोकपालाः स्थिता ह्येते लोकालोके चतुर्दिशम् ॥ ८४ उत्तरं यदगस्त्यस्य अजवीथ्याश्च दक्षिणम् । पितृयानः स वै पन्था वैश्वानरपथाद्बहिः ॥ ८५ तत्रासते महात्मान ऋषयो येऽग्निहोत्रिणः । भूतारम्भकृतं ब्रह्म शंसन्तो ऋत्विगुद्यताः । प्रारभन्ते तु ये लोकास्तेषां पन्थाः स दक्षिणः ॥ ८६ चलितं ते पुनर्ब्रह्म स्थापयन्ति युगे युगे । सन्तत्या तपसा चैव मर्यादाभिः श्रुतेन च ॥ ८७ जायमानास्तु पूर्वे च पश्चिमानां गृहेषु वै । पश्चिमाश्चैव पूर्वेषां जायन्ते निधनेष्विह ॥ ८८ एवमावर्तमानास्ते तिष्ठन्ति नियतव्रताः । सवितुर्दक्षिणं मार्गं श्रिता ह्याचन्द्रतारकम् ॥ ८९ नागवीथ्युत्तरं यच्च सप्तर्षिभ्यश्च दक्षिणम् । उत्तरः सवितुः पन्था देवयानश्च स स्मृतः ॥ ९० तत्र ते वशिनः सिद्धा विमला ब्रह्मचारिणः । सन्ततिं ते जुगुप्सन्ति तस्मान्मृत्युर्जितश्च तैः ॥ ९१ अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । उदक्पन्थानमर्यम्णः स्थितान्याभूतसम्प्लवम् ॥ ९२ तेऽसम्प्रयोगाल्लोभस्य मैथुनस्य च वर्जनात् । इच्छाद्वेषाप्रवृत्त्या च भूतारम्भविवर्जनात् ॥ ९३ पुनश्च कामासंयोगाच्छब्दादेर्दोषदर्शनात् । इत्येभिः कारणैः शुद्धास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे ॥ ९४ आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते । त्रैलोक्यस्थितिकालोऽयमपुनर्मार उच्यते ॥ ९५ ब्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां पापपुण्यकृतो विधिः । आभूतसम्प्लवान्तन्तु फलमुक्तं तयोर्द्विज ॥ ९६

मैंने पहले तुमसे जिस लोकालोकपर्वतका वर्णन किया है, उसीपर चार व्रतशील लोकपाल निवास करते हैं ॥ ८२ ॥ हे द्विज ! सुधामा, कर्दमके पुत्र शंखपाद और हिरण्यरोमा तथा केतुमान्—ये चारों निर्द्वन्द्व, निरभिमान, निरालस्य और निष्परिग्रह लोकपालगण लोकालोक-पर्वतकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं ॥ ८३-८४ ॥

जो अगस्त्यके उत्तर तथा अजवीथीके दक्षिणमें वैश्वानरमार्गसे भिन्न [ मृगवीथी नामक ] मार्ग है वही पितृयानपथ है ॥ ८५ ॥ उस पितृयानमार्गमें महात्मा-मुनिजन रहते हैं। जो लोग अग्निहोत्री होकर प्राणियोंकी उत्पत्तिके आरम्भक ब्रह्म (वेद)-की स्तुति करते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये उद्यत हो कर्मका आरम्भ करते हैं वह (पितृयान) उनका दक्षिणमार्ग है ॥ ८६ ॥ वे युग-युगान्तरमें विच्छिन्न हुए वैदिक धर्मकी सन्तान, तपस्या, वर्णाश्रम-मर्यादा और विविध शास्त्रोंके द्वारा पुनः स्थापना करते हैं ॥ ८७ ॥ पूर्वतन धर्मप्रवर्तक ही अपनी उत्तरकालीन सन्तानके यहाँ उत्पन्न होते हैं और फिर उत्तरकालीन धर्म-प्रचारकगण अपने यहाँ सन्तानरूपसे उत्पन्न हुए अपने पितृगणके कुलोंमें जन्म लेते हैं ॥ ८८ ॥ इस प्रकार, वे व्रतशील महर्षिगण चन्द्रमा और तारागणकी स्थितिपर्यन्त सूर्यके दक्षिणमार्गमें पुनः-पुनः आते-जाते रहते हैं ॥ ८९ ॥

नागवीथीके उत्तर और सप्तर्षियोंके दक्षिणमें जो सूर्यका उत्तरीय मार्ग है उसे देवयानमार्ग कहते हैं ॥ ९० ॥ उसमें जो प्रसिद्ध निर्मलस्वभाव और जितेन्द्रिय ब्रह्मचारिगण निवास करते हैं वे सन्तानकी इच्छा नहीं करते, अतः उन्होंने मृत्युको जीत लिया है ॥ ९१ ॥ सूर्यके उत्तरमार्गमें अस्सी हजार ऊर्ध्वरेता मुनिगण प्रलयकालपर्यन्त निवास करते हैं ॥ ९२ ॥ उन्होंने लोभके असंयोग, मैथुनके त्याग, इच्छा और द्वेषकी अप्रवृत्ति, कर्मानुष्ठानके त्याग, काम-वासनाके असंयोग और शब्दादि विषयोंके दोषदर्शन इत्यादि कारणोंसे शुद्धचित्त होकर अमरता प्राप्त कर ली है ॥ ९३-९४ ॥ भूतोंके प्रलयपर्यन्त स्थिर रहनेको ही अमरता कहते हैं। त्रिलोकीकी स्थितितकके इस कालको ही अपुनर्मार (पुनर्मृत्युरहित) कहा जाता है ॥ ९५ ॥ हे द्विज ! ब्रह्महत्या और अश्वमेधयज्ञसे जो पाप और पुण्य होते हैं उनका फल प्रलयपर्यन्त कहा गया है ॥ ९६ ॥

१४२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ८
संस्कृतहिन्दी
यावन्मात्रे प्रदेशे तु मैत्रेयावस्थितो ध्रुवः।<br>क्षयमायाति तावत्तु भूमेराभूतसम्प्लवात्॥ ९७हे मैत्रेय! जितने प्रदेशमें ध्रुव स्थित है, पृथिवीसे लेकर उस प्रदेशपर्यन्त सम्पूर्ण देश प्रलयकालमें नष्ट हो जाता है॥ ९७॥
ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्र व्यवस्थितः।<br>एतद्विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भासुरम्॥ ९८सप्तर्षियोंसे उत्तर-दिशामें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव स्थित है वह अति तेजोमय स्थान ही आकाशमें विष्णुभगवान्‌का तीसरा दिव्यधाम है॥ ९८॥
निर्धूतदोषपङ्कानां यतीनां संयतात्मनाम्।<br>स्थानं तत्परमं विप्र पुण्यपापपरिक्षये॥ ९९हे विप्र! पुण्य-पापके क्षीण हो जानेपर दोष-पंकशून्य संयतात्मा मुनिजनोंका यही परमस्थान है॥ ९९॥
अपुण्यपुण्योपरमे क्षीणाशेषाप्तिहेतवः।<br>यत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १००पाप-पुण्यके निवृत्त हो जाने तथा देह-प्राप्तिके सम्पूर्ण कारणोंके नष्ट हो जानेपर प्राणिगण जिस स्थानपर जाकर फिर शोक नहीं करते वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १००॥
धर्मध्रुवाद्यास्तिष्ठन्ति यत्र ते लोकसाक्षिणः।<br>तत्साष्ट्र्योत्पन्नयोगोद्भास्तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १०१जहाँ भगवान्‌की समान ऐश्वर्यतासे प्राप्त हुए योगद्वारा सतेज होकर धर्म और ध्रुव आदि लोक-साक्षिगण निवास करते हैं वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १०१॥
यत्रोतमेतत्प्रोतं च यद्भूतं सचराचरम्।<br>भाव्यं च विश्वं मैत्रेय तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १०२हे मैत्रेय! जिसमें यह भूत, भविष्यत् और वर्तमान चराचर जगत् ओत-प्रोत हो रहा है वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १०२॥
दिवीव चक्षुराततं योगिनां तन्मयात्मनाम्।<br>विवेकज्ञानदृष्टं च तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १०३जो तल्लीन योगिजनोंने आकाश-मण्डलमें देदीप्यमान सूर्यके समान सबके प्रकाशकरूपसे प्रतीत होता है तथा जिसका विवेक-ज्ञानसे ही प्रत्यक्ष होता है वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १०३॥
यस्मिन्प्रतिष्ठितो भास्वान्मेढीभूतः स्वयं ध्रुवः।<br>ध्रुवे च सर्वज्योतींषि ज्योतिःष्वाम्भोमुचो द्विज॥ १०४<br><br>मेघेषु सङ्गता वृष्टिर्वृष्टेः सृष्टेश्च पोषणम्।<br>आप्यायनं च सर्वेषां देवादीनां महामुने॥ १०५हे द्विज! उस विष्णुपदमें ही सबके आधारभूत परम तेजस्वी ध्रुव स्थित हैं, तथा ध्रुवजीमें समस्त नक्षत्र, नक्षत्रोंमें मेघ और मेघोंमें वृष्टि आश्रित है। हे महामुने! उस वृष्टिसे ही समस्त सृष्टिका पोषण और सम्पूर्ण देव-मनुष्यादि प्राणियोंकी पुष्टि होती है॥ १०४-१०५॥
ततश्चाज्याहुतिद्वारा पोषितास्ते हविर्भुजः।<br>वृष्टेः कारणतां यान्ति भूतानां स्थितये पुनः॥ १०६तदनन्तर गौ आदि प्राणियोंसे उत्पन्न दुग्ध और घृत आदिकी आहुतियोंसे परितुष्ट अग्निदेव ही प्राणियोंकी स्थितिके लिये पुनःवृष्टिके कारण होते हैं॥ १०६॥
एवमेतत्पदं विष्णोस्तृतीयममलात्मकम्।<br>आधारभूतं लोकानां त्रयाणां वृष्टिकारणम्॥ १०७इस प्रकार विष्णुभगवान्‌का यह निर्मल तृतीय लोक (ध्रुव) ही त्रिलोकीका आधारभूत और वृष्टिका आदिकारण है॥ १०७॥
ततः प्रभवति ब्रह्मन्सर्वपापहरा सरित्।<br>गङ्गा देवाङ्गनाङ्गानामनुलेपनपिञ्जरा॥ १०८हे ब्रह्मन्! इस विष्णुपदसे ही देवांगनाओंके अंगरागसे पाण्डुवर्ण हुई-सी सर्वपापापहारिणी श्रीगंगाजी उत्पन्न हुई हैं॥ १०८॥
वामपादाम्बुजाङ्गुष्ठनखस्रोतोविनिर्गताम्।<br>विष्णोर्बिभर्ति यां भक्त्या शिरसाहर्निशं ध्रुवः॥ १०९विष्णुभगवान्‌के वाम चरण-कमलके अँगूठेके नखरूप स्रोतसे निकली हुई उन गंगाजीको ध्रुव दिन-रात अपने मस्तकपर धारण करता है॥ १०९॥
ततः सप्तर्षयो यस्याः प्राणायामपरायणाः।<br>तिष्ठन्ति वीचिमालाभिरुह्यमानजटा जले॥ ११०तदनन्तर जिनके जलमें खड़े होकर प्राणायाम-परायण सप्तर्षिगण उनकी तरंगभंगीसे जटाकलापके कम्पायमान होते हुए, अघमर्षण-मन्त्रका जप करते हैं
वार्योघैः सन्ततैैर्यस्याः प्लावितं शशिमण्डलम्।<br>भूयोऽधिकतरां कान्तिं वहत्येतदुह क्षये॥ १११तथा जिनके विस्तृत जलसमूहसे आप्लावित

अ० ९ ] * द्वितीय अंश * १४३

मेरुपृष्ठे पतत्युच्चैर्निष्क्रान्ता शशिमण्डलात्। जगतः पावनार्थाय प्रयाति च चतुर्दिशम्॥ ११२

सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भद्रा च संस्थिता। एकैव या चतुर्भेदा दिग्भेदगतिलक्षणा॥ ११३

भेदं चालकनन्दाख्यं यस्याः शर्वोऽपि दक्षिणम्। दधार शिरसा प्रीत्या वर्षाणामधिकं शतम्॥ ११४

शम्भोर्जटाकलापाच्च विनिष्क्रान्तास्थिशर्कराः। प्लावयित्वा दिवं निन्ये या पापान्सगरात्मजान्॥ ११५

स्नातस्य सलिले यस्याः सद्यः पापं प्रणश्यति। अपूर्वपुण्यप्राप्तिश्च सद्यो मैत्रेय जायते॥ ११६

दत्ताः पितृभ्यो यत्रापस्तनयैः श्रद्धयान्वितैः। समाशतं प्रयच्छन्ति तृप्तिं मैत्रेय दुर्लभाम्॥ ११७

यस्यामिष्ट्वा महायज्ञैर्यज्ञेशं पुरुषोत्तमम्। द्विज भूपाः परां सिद्धिमवापुर्दिवि चेह च॥ ११८

स्नानाद्विधूतपापाश्च यज्जलैर्यतयस्तथा। केशवासक्तमनसः प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्॥ ११९

श्रुताऽभिलषिता दृष्टा स्पृष्टा पीताऽवगाहिता। या पावयति भूतानि कीर्तिता च दिने दिने॥ १२०

गङ्गा गङ्गेति यैर्नाम योजनानां शतेष्वपि। स्थितैरुच्चारितं हन्ति पापं जन्मत्रयार्जितम्॥ १२१

यतः सा पावनायालं त्रयाणां जगतामपि। समुद्भूता परं तत्त तृतीयं भगवत्पदम्॥ १२२

होकर चन्द्रमण्डल क्षयके अनन्तर पुनः पहलेसे भी अधिक कान्ति धारण करता है, वे श्रीगंगाजी चन्द्रमण्डलसे निकलकर मेरुपर्वतके ऊपर गिरती हैं और संसारको पवित्र करनेके लिये चारों दिशाओंमें जाती हैं॥ ११०-११२॥ चारों दिशाओंमें जानेसे वे एक ही सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा—इन चार भेदोंवाली हो जाती हैं॥ ११३॥ जिसके अलकनन्दा नामक दक्षिणीय भेदको भगवान् शंकरने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सौ वर्षसे भी अधिक अपने मस्तकपर धारण किया था, जिसने श्रीशंकरके जटाकलापसे निकलकर पापी सगरपुत्रोंके अस्थिचूर्णको आप्लावित कर उन्हें स्वर्गमें पहुँचा दिया। हे मैत्रेय! जिसके जलमें स्नान करनेसे शीघ्र ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अपूर्व पुण्यकी प्राप्ति होती है॥ ११४-११६॥ जिसके प्रवाहमें पुत्रोंद्वारा पितरोंके लिये श्रद्धापूर्वक किया हुआ एक दिनका भी तर्पण उन्हें सौ वर्षतक दुर्लभ तृप्ति देता है॥ ११७॥ हे द्विज! जिसके तटपर राजाओंने महायज्ञोंसे यज्ञेश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका यजन करके इहलोक और स्वर्गलोकमें परमसिद्धि लाभ की है॥ ११८॥ जिसके जलमें स्नान करनेसे निष्पाप हुए यतिजनोंने भगवान् केशवमें चित्त लगाकर अत्युत्तम निर्वाणपद प्राप्त किया है॥ ११९॥ जो अपना श्रवण, इच्छा, दर्शन, स्पर्श, जलपान, स्नान तथा यशोगान करनेसे ही नित्यप्रति प्राणियोंको पवित्र करती रहती है॥ १२०॥ तथा जिसका 'गंगा, गंगा' ऐसा नाम सौ योजनकी दूरीसे भी उच्चारण किये जानेपर [ जीवके ] तीन जन्मोंके संचित पापोंको नष्ट कर देता है॥ १२१॥ त्रिलोकीको पवित्र करनेमें समर्थ वह गंगा जिससे उत्पन्न हुई है, वही भगवान्का तीसरा परमपद है॥ १२२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


नवाँ अध्याय

ज्योतिष्चक्र और शिशुमारचक्र

श्रीपराशर उवाच

तारामयं भगवतः शिशुमाराकृति प्रभोः।
दिवि रूपं हरेर्यत्तु तस्य पुच्छे स्थितो ध्रुवः॥ १

सैष भ्रमन् भ्रामयति चन्द्रादित्यादिकान् ग्रहान्।
भ्रमन्तमनु तं यान्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्॥ २

श्रीपराशरजी बोले— आकाशमें भगवान् विष्णुका जो शिशुमार (गिरगिट अथवा गोधा)—के समान आकार-वाला तारामय स्वरूप देखा जाता है, उसके पुच्छ-भागमें ध्रुव अवस्थित है॥ १॥ यह ध्रुव स्वयं घूमता हुआ चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंको घुमाता है। उस भ्रमणशील ध्रुवके साथ नक्षत्रगण भी चक्रके समान घूमते रहते हैं॥ २॥

१४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सूर्याचन्द्रमसौ तारा नक्षत्राणि ग्रहैः सह।<br/>वातानीकमयैर्बन्धैर्ध्रुवे बद्धानि तानि वै॥ ३<br/>शिशुमाराकृति प्रोक्तं यद्रूपं ज्योतिषां दिवि।<br/>नारायणोऽयनं धाम्नां तस्याधारः स्वयं हृदि॥ ४<br/>उत्तानपादपुत्रस्तु तमाराध्य जगत्पतिम्।<br/>स ताराशिशुमारस्य ध्रुवः पुच्छे व्यवस्थितः॥ ५<br/>आधारः शिशुमारस्य सर्वाध्यक्षो जनार्दनः।<br/>ध्रुवस्य शिशुमारस्तु ध्रुवे भानुर्व्यवस्थितः॥ ६<br/>तदाधारं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्॥ ७<br/>येन विप्र विधानेन तन्ममैकमनाः शृणु।<br/>विवस्वानष्टभिर्मासैरादायापो रसात्मिकाः।<br/>वर्षत्यम्बु ततश्चान्रमन्नादप्यखिलं जगत्॥ ८<br/>विवस्वांशुभिस्तीक्ष्णैरादाय जगतो जलम्।<br/>सोमं पुष्णात्यथेन्दुश्च वायुनाडीमयैर्दिवि।<br/>नालैर्विक्षिप्ततेऽभ्रेषु धूमाग्न्यनिलमूर्तिषु॥ ९<br/>न भ्रश्यन्ति यतस्तेभ्यो जलान्यभ्राणि तान्यतः।<br/>अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः।<br/>संस्कारं कालजनितं मैत्रेयासाद्य निर्मलाः॥ १०<br/>सरित्समुद्रभौमास्तु तथापः प्राणिसम्भवाः।<br/>चतुष्प्रकारा भगवानादत्ते सविता मुने॥ ११<br/>आकाशगङ्गासलिलं तथादाय गभस्तिमान्।<br/>अनभ्रगतमेवोर्व्यां सद्यः क्षिपति रश्मिभिः॥ १२<br/>तस्य संस्पर्शनिर्धूतपापपङ्को द्विजोत्तम।<br/>न याति नरकं मर्त्यो दिव्यं स्नानं हि तत्स्मृतम्॥ १३<br/>दृष्टसूर्ये हि यद्वारि पतत्यभ्रैर्विना दिवः।<br/>आकाशगङ्गासलिलं तद्गोभिः क्षिप्यते रवेः॥ १४<br/>कृत्तिकादिषु ऋक्षेषु विषमेषु च यद्दिवः।<br/>दृष्टार्कपतितं ज्ञेयं तद्गाङ्गं दिग्गजोझितम्॥ १५<br/>युग्मर्क्षेषु च यत्तोयं पतत्यर्कोज्झितं दिवः।<br/>तत्सूर्यरश्मिभिः सर्वं समादाय निरस्यते॥ १६<br/>उभयं पुण्यमत्यर्थं नृणां पापभयापहम्।<br/>आकाशगङ्गासलिलं दिव्यं स्नानं महामुने॥ १७सूर्य, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र और अन्यान्य समस्त ग्रहगण वायु-मण्डलमयी डोरीसे ध्रुवके साथ बँधे हुए हैं॥ ३॥<br/>मैंने तुमसे आकाशमें ग्रहगणके जिस शिशुमार-स्वरूपका वर्णन किया है, अनन्त तेजके आश्रय स्वयं भगवान् नारायण ही उसके हृदयस्थित आधार हैं॥ ४॥ उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने उन जगत्पतिकी आराधना करके तारामय शिशुमारके पुच्छस्थानमें स्थिति प्राप्त की है॥ ५॥ शिशुमारके आधार सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, शिशुमार ध्रुवका आश्रय है और ध्रुवमें सूर्यदेव स्थित हैं तथा हे विप्र! जिस प्रकार देव, असुर और मनुष्यादिके सहित यह सम्पूर्ण जगत् सूर्यके आश्रित है, वह तुम एकाग्र होकर सुनो। सूर्य आठ मासतक अपनी किरणोंसे छः रसोंसे युक्त जलको ग्रहण करके उसे चार महीनोंमें बरसा देता है उससे अन्नकी उत्पत्ति होती है और अन्नहीसे सम्पूर्ण जगत् पोषित होता है॥ ६–८॥ सूर्य अपनी तीक्ष्ण रश्मियोंसे संसारका जल खींचकर उससे चन्द्रमाका पोषण करता है और चन्द्रमा आकाशमें वायुमयी नाड़ियोंके मार्गसे उसे धूम, अग्नि और वायुमय मेघोंमें पहुँचा देता है॥ ९॥ यह चन्द्रमाद्वारा प्राप्त जल मेघोंसे तुरन्त ही भ्रष्ट नहीं होता इसलिये 'अभ्र' कहलाता है। हे मैत्रेय! कालजनित संस्कारके प्राप्त होनेपर यह अभ्रस्थ जल निर्मल होकर वायुकी प्रेरणासे पृथिवीपर बरसने लगता है ॥ १०॥<br/>हे मुने! भगवान् सूर्यदेव नदी, समुद्र, पृथिवी तथा प्राणियोंसे उत्पन्न—इन चार प्रकारके जलोंका आकर्षण करते हैं॥ ११॥ तथा आकाशगंगाके जलको ग्रहण करके वे उसे बिना मेघादिके अपनी किरणोंसे ही तुरन्त पृथिवीपर बरसा देते हैं॥ १२॥ हे द्विजोत्तम! उसके स्पर्शमात्रसे पाप-पंकके धुल जानेसे मनुष्य नरकमें नहीं जाता। अतः वह दिव्य-स्नान कहलाता है॥ १३॥ सूर्यके दिखलायी देते हुए, बिना मेघोंके ही जो जल बरसता है वह सूर्यकी किरणोंद्वारा बरसाया हुआ आकाशगंगाका ही जल होता है॥ १४॥ कृत्तिका आदि विषम (अयुग्म) नक्षत्रोंमें जो जल सूर्यके प्रकाशित रहते हुए बरसता है उसे दिग्गजोंद्वारा बरसाया हुआ आकाशगंगाका जल समझना चाहिये॥ १५॥ [रोहिणी और आर्द्रा आदि] सम संख्यावाले नक्षत्रोंमें जिस जलको सूर्य बरसाता है वह सूर्यरश्मियोंद्वारा [आकाशगंगासे] ग्रहण करके ही बरसाया जाता है॥ १६॥ हे महामुने! आकाशगंगाके ये [सम तथा विषम नक्षत्रोंमें बरसनेवाले ] दोनों प्रकारके जलमय दिव्य स्नान अत्यन्त पवित्र और मनुष्योंके पाप-भयको दूर करनेवाले हैं॥ १७॥

अ० १० ] * द्वितीय अंश * १४५

यत्तु मेघैः समुत्सृष्टं वारि तत्प्राणिनां द्विज।<br>पुष्णात्योषधयः सर्वा जीवनायामृतं हि तत्॥ १८हे द्विज! जो जल मेघोंद्वारा बरसाया जाता है वह प्राणियोंके जीवनके लिये अमृतरूप होता है और ओषधियोंका पोषण करता है॥ १८॥
तेन वृद्धिं परां नीतः सकलश्चौषधीगणः।<br>साधकः फलपाकान्तः प्रजानां द्विज जायते॥ १९हे विप्र! उस वृष्टिके जलसे परम वृद्धिको प्राप्त होकर समस्त ओषधियाँ और फल पकनेपर सूख जानेवाले [गोधूम, यव आदि अन्न] प्रजावर्गके [शरीरकी उत्पत्ति एवं पोषण आदिके] साधक होते हैं॥ १९॥
तेन यज्ञान्यथाप्रोक्तान्मानवाः शास्त्रचक्षुषः।<br>कुर्वन्त्यहरहस्तैश्च देवानाप्याययन्ति ते॥ २०उनके द्वारा शास्त्रविद् मनीषीगण नित्यप्रति यथाविधि यज्ञानुष्ठान करके देवताओंको सन्तुष्ट करते हैं॥ २०॥
एवं यज्ञाश्च वेदाश्च वर्णाश्च वृष्टिपूर्वकाः।<br>सर्वे देवनिकायाश्च सर्वे भूतगणाश्च ये॥ २१इस प्रकार सम्पूर्ण यज्ञ, वेद, ब्राह्मणादि वर्ण, समस्त देवसमूह और प्राणिगण वृष्टिके ही आश्रित हैं॥ २१॥
वृष्ट्या धृतमिदं सर्वमन्नं निष्पाद्यते यया।<br>सापि निष्पाद्यते वृष्टिः सवित्रा मुनिसत्तम॥ २२हे मुनिश्रेष्ठ! अन्नको उत्पन्न करनेवाली वृष्टि ही इन सबको धारण करती है तथा उस वृष्टिकी उत्पत्ति सूर्यसे होती है॥ २२॥
आधारभूतः सवितुर्ध्रुवो मुनिवरोत्तम।<br>ध्रुवस्य शिशुमारोऽसौ सोऽपि नारायणात्मकः॥ २३हे मुनिवरोत्तम! सूर्यका आधार ध्रुव है, ध्रुवका शिशुमार है तथा शिशुमारके आश्रय श्रीनारायण हैं॥ २३॥
हृदि नारायणस्तस्य शिशुमारस्य संस्थितः।<br>बिभर्ति सर्वभूतानामादिभूतः सनातनः॥ २४उस शिशुमारके हृदयमें श्रीनारायण स्थित हैं जो समस्त प्राणियोंके पालनकर्ता तथा आदिभूत सनातन पुरुष हैं॥ २४॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥


दसवाँ अध्याय

द्वादश सूर्योंके नाम एवं अधिकारियोंका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
साशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं द्वयोः।<br>आरोहणावरोहाभ्यां भानोरब्देन या गतिः॥ १आरोह और अवरोहके द्वारा सूर्यकी एक वर्षमें जितनी गति है उस सम्पूर्ण मार्गकी दोनों काष्ठाओंका अन्तर एक सौ अस्सी मण्डल है॥ १॥
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्ऋषिभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ २सूर्यका रथ [प्रति मास] भिन्न-भिन्न आदित्य, ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, सर्प और राक्षसगणोंसे अधिष्ठित होता है॥ २॥
धाता क्रतुस्थला चैव पुलस्त्यो वासुकिस्तथा।<br>रथभृद्ग्रामणीर्हेतिस्तुम्बुरुश्चैव सप्तमः॥ ३हे मैत्रेय! मधुमास चैत्रमें सूर्यके रथमें सर्वदा धाता नामक आदित्य, क्रतुस्थला अप्सरा, पुलस्त्य ऋषि, वासुकि सर्प, रथभृत् यक्ष, हेति राक्षस और तुम्बुरु गन्धर्व—ये सात मासाधिकारी रहते हैं॥ ३-४॥
एते वसन्ति वै चैत्रे मधुमासे सदैव हि।<br>मैत्रेय स्यन्दने भानोः सप्त मासाधिकारिणः॥ ४
अर्यमा पुलहश्चैव रथौजाः पुञ्जिकस्थला।<br>प्रहेतिः कच्छवीरश्च नारदश्च रथे रवेः॥ ५तथा अर्यमा नामक आदित्य, पुलह ऋषि, रथौजा यक्ष, पुंजिकस्थला अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छवीर सर्प और नारद नामक गन्धर्व—ये वैशाख-मासमें सूर्यके रथपर निवास करते हैं। हे मैत्रेय! अब ज्येष्ठ-मासमें [निवास करनेवालोंके नाम] सुनो॥ ५-६॥
माधवे निवसन्त्येते शुचिसंज्ञे निबोध मे॥ ६
१४६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १०

मित्रोऽत्रिस्तक्षको रक्षः पौरुषेयोऽथ मेनका।
हाहा रथस्वनश्चैव मैत्रेयैते वसन्ति वै॥ ७
वरुणो वसिष्ठो नागश्च सहजन्या हूहू रथः।
रथचित्रस्तथा शुक्रे वसन्त्याषाढसंज्ञके॥ ८
इन्द्रो विश्वावसुः स्रोत एलापुत्रस्तथाङ्गिराः।
प्रम्लोचा च नभस्येते सर्पिश्चार्के वसन्ति वै॥ ९
विवस्वानुग्रसेनश्च भृगुरापूरणस्तथा।
अनुम्लोचा शङ्खपालो व्याघ्रो भाद्रपदे तथा॥ १०
पूषा वसुरुचिर्वातो गौतमोऽथ धनञ्जयः।
सुषेणोऽन्यो घृताची च वसन्त्याश्वयुजे रवौ॥ ११
विश्वावसुर्भरद्वाजः पर्जन्यैरावतौ तथा।
विश्वाची सेनजिच्चापः कार्तिके च वसन्ति वै॥ १२
अंशकाश्यपताक्ष्र्यास्तु महापद्मस्तथोर्वशी।
चित्रसेनस्तथा विद्युन्मार्गशीर्षेऽधिकारिणः॥ १३
ऋतुर्भगस्तथोर्णायुः स्फूर्जः कर्कोटकस्तथा।
अरिष्टनेमिश्चैवान्या पूर्वचित्तिर्वराप्सराः॥ १४
पौषमासे वसन्त्येते सप्त भास्करमण्डले।
लोकप्रकाशनार्थाय विप्रवर्याधिकारिणः॥ १५
त्वष्टाथ जमदग्निश्च कम्बलोऽथ तिलोत्तमा।
ब्रह्मोपेतोऽथ ऋतजिद् धृतराष्ट्रोऽथ सप्तमः॥ १६
माघमासे वसन्त्येते सप्त मैत्रेय भास्करे।
श्रूयतां चापरे सूर्ये फाल्गुने निवसन्ति ये॥ १७
विष्णुरश्वतरो रम्भा सूर्यवर्चाश्च सत्यजित्।
विश्वामित्रस्तथा रक्षो यज्ञोपेतो महामुने॥ १८
मासेष्वेतेषु मैत्रेय वसन्त्येते तु सप्तकाः।
सवितुर्मण्डले ब्रह्मन्विष्णुशक्त्युपबृंहिताः॥ १९
स्तुवन्ति मुनयः सूर्य गन्धर्वैर्गीयते पुरः।
नृत्यन्त्यप्सरसो यान्ति सूर्यस्यानु निशाचराः॥ २०
वहन्ति पन्नगा यक्षैः क्रियतेऽभीषुसङ्ग्रहः॥ २१


हिन्दी अनुवाद

उस समय मित्र नामक आदित्य, अत्रि ऋषि, तक्षक सर्प, पौरुषेय राक्षस, मेनका अप्सरा, हाहा गन्धर्व और रथस्वन नामक यक्ष—ये उस रथमें वास करते हैं॥ ७॥ तथा आषाढ़-मासमें वरुण नामक आदित्य, वसिष्ठ ऋषि, नाग सर्प, सहजन्या अप्सरा, हूहू गन्धर्व, रथ राक्षस और रथचित्र नामक यक्ष उसमें रहते हैं॥ ८॥

श्रावण-मासमें इन्द्र नामक आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, स्रोत यक्ष, एलापुत्र सर्प, अंगिरा ऋषि, प्रम्लोचा अप्सरा और सर्पि नामक राक्षस सूर्यके रथमें बसते हैं॥ ९॥ तथा भाद्रपदमें विवस्वान् नामक आदित्य, उग्रसेन गन्धर्व, भृगु ऋषि, आपूरण यक्ष, अनुम्लोचा अप्सरा, शंखपाल सर्प और व्याघ्र नामक राक्षसका उसमें निवास होता है॥ १०॥

आश्विन-मासमें पूषा नामक आदित्य, वसुरुचि गन्धर्व, वात राक्षस, गौतम ऋषि, धनंजय सर्प, सुषेण गन्धर्व और घृताची नामकी अप्सराका उसमें वास होता है॥ ११॥ कार्तिक-मासमें उसमें विश्वावसु नामक गन्धर्व, भरद्वाज ऋषि, पर्जन्य आदित्य, ऐरावत सर्प, विश्वाची अप्सरा, सेनजित् यक्ष तथा आप नामक राक्षस रहते हैं॥ १२॥

मार्गशीर्षके अधिकारी अंश नामक आदित्य, कश्यप ऋषि, तार्क्ष्य यक्ष, महापद्म सर्प, उर्वशी अप्सरा, चित्रसेन गन्धर्व और विद्युत् नामक राक्षस हैं॥ १३॥ हे विप्रवर! पौष-मासमें ऋतु ऋषि, भग आदित्य, ऊर्णायु गन्धर्व, स्फूर्ज राक्षस, कर्कोटक सर्प, अरिष्टनेमि यक्ष तथा पूर्वचित्ति अप्सरा जगत्‌को प्रकाशित करनेके लिये सूर्यमण्डलमें रहते हैं॥ १४-१५॥

हे मैत्रेय! त्वष्टा नामक आदित्य, जमदग्नि ऋषि, कम्बल सर्प, तिलोत्तमा अप्सरा, ब्रह्मोपेत राक्षस, ऋतजित् यक्ष और धृतराष्ट्र गन्धर्व—ये सात माघ-मासमें भास्करमण्डलमें रहते हैं। अब, जो फाल्गुन-मासमें सूर्यके रथमें रहते हैं उनके नाम सुनो॥ १६-१७॥ हे महामुने! वे विष्णु नामक आदित्य, अश्वतर सर्प, रम्भा अप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्व, सत्यजित् यक्ष, विश्वामित्र ऋषि और यज्ञोपेत नामक राक्षस हैं॥ १८॥

हे ब्रह्मन्! इस प्रकार विष्णुभगवान्‌की शक्तिसे तेजोमय हुए ये सात-सात गण एक-एक मासतक सूर्यमण्डलमें रहते हैं॥ १९॥ मुनिगण सूर्यकी स्तुति करते हैं, गन्धर्व सम्मुख रहकर उनका यशोगान करते हैं, अप्सराएँ नृत्य करती हैं, राक्षस रथके पीछे चलते हैं, सर्प वहन करनेके अनुकूल रथको सुसज्जित करते हैं और यक्षगण रथकी बागडोर सँभालते हैं॥ २०-२१॥

अ० ११ ] * द्वितीय अंश * १४७

बालखिल्यास्तथैवैनं परिवार्य समासते॥ २२ सोऽयं सप्तगणः सूर्यमण्डले मुनिसत्तम। हिमोष्णवारिवृष्टीनां हेतुः स्वसमयं गतः॥ २३

तथा नित्यसेवक बालखिल्यादि इसे सब ओरसे घेरे रहते हैं॥ २०—२२॥ हे मुनिसत्तम! सूर्यमण्डलके ये सात-सात गण ही अपने-अपने समयपर उपस्थित होकर शीत, ग्रीष्म और वर्षा आदिके कारण होते हैं॥ २३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे दशमोऽध्यायः॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

सूर्यशक्ति एवं वैष्णवी शक्तिका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाच

यदेतद्भगवानाह गणः सप्तविधो रवेः।
मण्डले हिमतापादेः कारणं तन्मया श्रुतम्॥ १
व्यापारश्चापि कथितो गन्धर्वोरगरक्षसाम्।
ऋषीणां बालखिल्यानां तथैवाप्सरसां गुरो॥ २
यक्षाणां च रथे भानोर्विष्णुशक्तिधृतात्मनाम्।
किं चादित्यस्य यत्कर्म तन्नात्रोक्तं त्वया मुने॥ ३
यदि सप्तगणो वारि हिममुष्णं च वर्षति।
तत्किमत्र रवेर्येन वृष्टिः सूर्यादितीर्यते॥ ४
विवस्वानुदितो मध्ये यात्यस्तमिति किं जनः।
ब्रवीत्येतत्समं कर्म यदि सप्तगणस्य तत्॥ ५

**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! आपने जो कहा कि सूर्यमण्डलमें स्थित सातों गण शीत-ग्रीष्म आदिके कारण होते हैं, सो मैंने सुना॥ १॥ हे गुरो! आपने सूर्यके रथमें स्थित और विष्णु-शक्तिसे प्रभावित गन्धर्व, सर्प, राक्षस, ऋषि, बालखिल्यादि, अप्सरा तथा यक्षोंके तो पृथक्-पृथक् व्यापार बतलाये, किंतु हे मुने! यह नहीं बतलाया कि सूर्यका कार्य क्या है?॥ २-३॥ यदि सातों गण ही शीत, ग्रीष्म और वर्षाके करनेवाले हैं तो फिर सूर्यका क्या प्रयोजन है? और यह कैसे कहा जाता है कि वृष्टि सूर्यसे होती है?॥ ४॥ यदि सातों गणोंका यह वृष्टि आदि कार्य समान ही है तो 'सूर्य उदय हुआ, अब मध्यमें है, अब अस्त होता है' ऐसा लोग क्यों कहते हैं?॥ ५॥

श्रीपराशर उवाच

मैत्रेय श्रूयतामेतद्यद्भवन्परिपृच्छति।
यथा सप्तगणोऽप्येकः प्राधान्येनाधिको रविः॥ ६
सर्वशक्तिः परा विष्णोर्ऋग्यजुःसामसंज्ञिता।
सैषा त्रयी तपत्यंहो जगतश्च हिनस्ति या॥ ७
सैष विष्णुः स्थितः स्थित्यां जगतः पालनोद्यतः।
ऋग्यजुःसामभूतोऽन्तः सवितुर्द्विज तिष्ठति॥ ८
मासि मासि रविर्यो यस्तत्र तत्र हि सा परा।
त्रयीमयी विष्णुशक्तिरवस्थानं करोति वै॥ ९
ऋचः स्तुवन्ति पूर्वाह्ने मध्याह्नेऽथ यजूंषि वै।
बृहद्रथन्तरादीनि सामान्याह्नः क्षये रविम्॥ १०

**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! जो कुछ तुमने पूछा है उसका उत्तर सुनो, सूर्य सात गणोंमेंसे ही एक हैं तथापि उनमें प्रधान होनेसे उनकी विशेषता है॥ ६॥ भगवान् विष्णुकी जो सर्वशक्तिमयी ऋक्, यजुः, साम नामकी परा शक्ति है वह वेदत्रयी ही सूर्यको ताप प्रदान करती है और [उपासना किये जानेपर] संसारके समस्त पापोंको नष्ट कर देती है॥ ७॥ हे द्विज! जगत्की स्थिति और पालनके लिये वे ऋक्, यजुः और सामरूप विष्णु सूर्यके भीतर निवास करते हैं॥ ८॥ प्रत्येक मासमें जो-जो सूर्य होता है उसी-उसीमें वह वेदत्रयीरूपिणी विष्णुकी परा शक्ति निवास करती है॥ ९॥ पूर्वाह्नमें ऋक्, मध्याह्नमें बृहद्रथन्तरादि यजुः तथा सायंकालमें सामश्रुतियाँ सूर्यकी स्तुति करती हैं *॥ १०॥


* इस विषयमें यह श्रुति भी है—
‘ऋचः पूर्वाह्ने दिवि देव ईयते यजुर्वेदे तिष्ठति मध्ये अह्नः सामवेदेनास्तमये महीयते।’

१४८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ११

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अङ्गमेषा त्रयी विष्णोर्ऋग्यजुःसामसंज्ञिता।<br>विष्णुशक्तिरवस्थानं सदादित्ये करोति सा॥ ११<br>न केवलं रवेः शक्तिर्वैष्णवी सा त्रयीमयी।<br>ब्रह्माथ पुरुषो रुद्रस्त्रयमेतत्तत्रयीमयम्॥ १२<br>सर्गादौ ऋङ्मयो ब्रह्मा स्थितौ विष्णुर्यजुर्मयः।<br>रुद्रः साममयोऽन्ताय तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः॥ १३<br>एवं सा सात्त्विकी शक्तिर्वैष्णवी या त्रयीमयी।<br>आत्मसप्तगणस्थं तं भास्वन्तमधितिष्ठति॥ १४<br>तया चाधिष्ठितः सोऽपि जाज्वलीति स्वरश्मिभिः।<br>तमः समस्तजगतां नाशं नयति चाखिलम्॥ १५<br>स्तुवन्ति चैनं मुनयो गन्धर्वैर्गीयते पुरः।<br>नृत्यन्त्योऽप्सरसो यान्ति तस्य चानु निशाचराः॥ १६<br>वहन्ति पन्नगा यक्षैः क्रियतेऽभीषुसङ्ग्रहः।<br>बालखिल्यास्तथैवैनं परिवार्य समासते॥ १७<br>नोदेता नास्तमेता च कदाचिच्छक्तिरूपधृक्।<br>विष्णुर्विष्णोः पृथक् तस्य गणस्सप्तविधोऽप्ययम्॥ १८<br>स्तम्भस्थदर्पणस्येव योऽयमासन्नतां गतः।<br>छायादर्शनसंयोगं स तं प्राप्नोत्यथात्मनः॥ १९<br>एवं सा वैष्णवी शक्तिर्नैवापैति ततो द्विज।<br>मासानुमासं भास्वन्तमध्यास्ते तत्र संस्थितम्॥ २०<br>पितृदेवमनुष्यादीन्स सदाप्याययन्प्रभुः।<br>परिवर्तत्यहोरात्रकारणं सविता द्विज॥ २१<br>सूर्यरश्मिः सुषुम्णा यस्तर्पितस्तेन चन्द्रमाः।<br>कृष्णापक्षेऽमरैः शश्वत्पीयते वै सुधामयः॥ २२<br>पीतं तं द्विक्लं सोमं कृष्णपक्षक्षये द्विज।<br>पिबन्ति पितरस्तेषां भास्करात्तर्पणं तथा॥ २३<br>आदत्ते रश्मिभिर्यन्तु क्षितिसंस्थं रसं रविः।<br>तमुत्सृजति भूतानां पुष्ट्यर्थं सस्यवृद्धये॥ २४यह ऋक्-यजुः-सामस्वरूपिणी वेदत्रयी भगवान् विष्णुका ही अंग है। यह विष्णु-शक्ति सर्वदा आदित्यमें रहती है॥ ११॥<br>यह त्रयीमयी वैष्णवी शक्ति केवल सूर्यहीकी अधिष्ठात्री हो, सो नहीं; बल्कि ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी त्रयीमय ही हैं॥ १२॥ सर्गके आदिमें ब्रह्मा ऋङ्मय हैं, उसकी स्थितिके समय विष्णु यजुर्मय हैं तथा अन्तकालमें रुद्र साममय हैं। इसीलिये सामगानकी ध्वनि अपवित्र* मानी गयी है॥ १३॥ इस प्रकार वह त्रयीमयी सात्त्विकी वैष्णवी शक्ति अपने सप्तगणोंमें स्थित आदित्यमें ही [अतिशयरूपसे] अवस्थित होती है॥ १४॥ उससे अधिष्ठित सूर्यदेव भी अपनी प्रखर रश्मियोंसे अत्यन्त प्रज्वलित होकर संसारके सम्पूर्ण अन्धकारको नष्ट कर देते हैं॥ १५॥<br>उन सूर्यदेवकी मुनिगण स्तुति करते हैं, गन्धर्वगण उनके सम्मुख यशोगान करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हुई चलती हैं, राक्षस रथके पीछे रहते हैं, सर्पगण रथका साज सजाते हैं और यक्ष घोड़ोंकी बागडोर सँभालते हैं तथा बालखिल्यादि रथको सब ओरसे घेरे रहते हैं॥ १६-१७॥ त्रयीशक्तिरूप भगवान् विष्णुका न कभी उदय होता है और न अस्त [अर्थात् वे स्थायीरूपसे सदा विद्यमान रहते हैं]; ये सात प्रकारके गण तो उनसे पृथक् हैं॥ १८॥ स्तम्भमें लगे हुए दर्पणके निकट जो कोई जाता है उसीको अपनी छाया दिखायी देने लगती है॥ १९॥ हे द्विज! इसी प्रकार वह वैष्णवी शक्ति सूर्यके रथसे कभी चलायमान नहीं होती और प्रत्येक मासमें पृथक्-पृथक् सूर्यके [परिवर्तित होकर] उसमें स्थित होनेपर वह उसकी अधिष्ठात्री होती है॥ २०॥<br>हे द्विज! दिन और रात्रिके कारणस्वरूप भगवान् सूर्य पितृगण, देवगण और मनुष्यादिको सदा तृप्त करते घूमते रहते हैं॥ २१॥ सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है उससे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाका पोषण होता है और फिर कृष्णपक्षमें उस अमृतमय चन्द्रमाकी एक-एक कलाका देवगण निरन्तर पान करते हैं॥ २२॥ हे द्विज! कृष्णपक्षके क्षय होनेपर [चतुर्दशीके अनन्तर] दो कलायुक्त चन्द्रमाका पितृगण पान करते हैं। इस प्रकार सूर्यद्वारा पितृगणका तर्पण होता है॥ २३॥<br>सूर्य अपनी किरणोंसे पृथिवीसे जितना जल खींचता है उस सबको प्राणियोंकी पुष्टि और अन्नकी वृद्धिके लिये बरसा देता है॥ २४॥

* रुद्रके नाशकारी होनेसे उनका नाम अपवित्र माना गया है अतः सामगानके समय (रातमें) ऋक् तथा यजुर्वेदके अध्ययनका निषेध किया गया है। इसमें गौतमकी स्मृति प्रमाण है—'न सामध्वनावृग्यजुषी' अर्थात् सामगानके समय ऋक्-यजुःका अध्ययन न करे।

अ० १२ ] * द्वितीय अंश * १४९


तेन प्रीणात्यशेषाणि भूतानि भगवान् रविः ।
पितृदेवमनुष्यादीनेवमाप्याययत्यसौ ॥ २५
पक्षतृप्तिं तु देवानां पितॄणां चैव मासिकीम् ।
शश्वत्तृप्तिं च मर्त्यानां मैत्रेयार्कः प्रयच्छति ॥ २६

उससे भगवान् सूर्य समस्त प्राणियोंको आनन्दित कर देते हैं और इस प्रकार वे देव, मनुष्य और पितृगण आदि सभीका पोषण करते हैं ॥ २५ ॥ हे मैत्रेय ! इस रीतिसे सूर्यदेव देवताओंकी पाक्षिक, पितृगणकी मासिक तथा मनुष्योंकी नित्यप्रति तृप्ति करते रहते हैं ॥ २६ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेंऽशे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥


बारहवाँ अध्याय

नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तरसम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार

श्रीपराशर उवाच
रथस्त्रिचक्रः सोमस्य कुन्दाभास्तस्य वाजिनः ।
वामदक्षिणतो युक्ता दश तेन चरत्यसौ ॥ १
वीथ्याश्रयाणि ऋक्षाणि ध्रुवाधारेण वेगिना ।
ह्रासवृद्धिक्रमस्तस्य रश्मीनां सवितुर्यथा ॥ २
अर्कस्येव हि तस्याश्वाः सकृद्युक्ता वहन्ति ते ।
कल्पमेकं मुनिश्रेष्ठ वारिगर्भसमुद्भवाः ॥ ३
क्षीशं पीतं सुरैः सोममाप्याययति दीप्तिमान् ।
मैत्रेयैककलं सन्तं रश्मिनैकेन भास्करः ॥ ४
क्रमेण येन पीतोऽसौ देवैस्तेन निशाकरम् ।
आप्याययत्यनुदिनं भास्करो वारितस्करः ॥ ५
सम्भृतं सार्धमासेन तत्सोमस्थं सुधामृतम् ।
पिबन्ति देवा मैत्रेय सुधाद्वारा यतोऽमराः ॥ ६
त्रयस्त्रिंशत्सहस्त्राणि त्रयस्त्रिंशच्छतानि च ।
त्रयस्त्रिंशत्तथा देवाः पिबन्ति क्षणदाकरम् ॥ ७
कलाद्वयावशिष्टस्तु प्रविष्टः सूर्यमण्डलम् ।
अमाख्यरश्मौ वसति अमावास्या ततः स्मृता ॥ ८
अप्सु तस्मिन्नहोरात्रे पूर्वं विशति चन्द्रमाः ।
ततो वीरुत्सु वसति प्रयात्यर्कं ततः क्रमात् ॥ ९
छिनत्ति वीरुधो यस्तु वीरुत्संस्थे निशाकरे ।
पत्रं वा पातयत्येकं ब्रह्महत्यां स विन्दति ॥ १०
सोमं पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छिष्टे कलात्मके ।
अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते ॥ ११

श्रीपराशरजी बोले— चन्द्रमाका रथ तीन पहियोंवाला है, उसके वाम तथा दक्षिण ओर कुन्द-कुसुमके समान श्वेतवर्ण दस घोड़े जुते हुए हैं। ध्रुवके आधारपर स्थित उस वेगशाली रथसे चन्द्रदेव भ्रमण करते हैं और नागवीथीपर आश्रित अश्विनी आदि नक्षत्रोंका भोग करते हैं। सूर्यके समान इनकी किरणोंके भी घटने-बढ़नेका निश्चित क्रम है ॥ १-२ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! सूर्यके समान समुद्रगर्भसे उत्पन्न हुए उसके घोड़े भी एक बार जोत दिये जानेपर एक कल्पपर्यन्त रथ खींचते रहते हैं ॥ ३ ॥ हे मैत्रेय ! सुरगणके पान करते रहनेसे क्षीण हुए कलामात्र चन्द्रमाका प्रकाशमय सूर्यदेव अपनी एक किरणसे पुनः पोषण करते हैं ॥ ४ ॥ जिस क्रमसे देवगण चन्द्रमाका पान करते हैं उसी क्रमसे जलापहारी सूर्यदेव उन्हें शुक्ला प्रतिपदासे प्रतिदिन पुष्ट करते हैं ॥ ५ ॥ हे मैत्रेय ! इस प्रकार आधे महीनेमें एकत्रित हुए चन्द्रमाके अमृतको देवगण फिर पीने लगते हैं क्योंकि देवताओंका आहार तो अमृत ही है ॥ ६ ॥ तैंतीस हजार, तैंतीस सौ, तैंतीस (३६३३३) देवगण चन्द्रस्थ अमृतका पान करते हैं ॥ ७ ॥ जिस समय दो कलामात्र रहा हुआ चन्द्रमा सूर्यमण्डलमें प्रवेश करके उसकी अमा नामक किरणमें रहता है वह तिथि अमावास्या कहलाती है ॥ ८ ॥ उस दिन रात्रिमें वह पहले तो जलमें प्रवेश करता है, फिर वृक्ष-लता आदिमें निवास करता है और तदनन्तर क्रमसे सूर्यमें चला जाता है ॥ ९ ॥ वृक्ष और लता आदिमें चन्द्रमाकी स्थितिके समय [अमावास्याको] जो उन्हें काटता है अथवा उनका एक पत्ता भी तोड़ता है उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ १० ॥ केवल पन्द्रहवीं कलारूप यत्किंचित् भागके बच रहनेपर उस क्षीण चन्द्रमाको पितृगण मध्याह्नोत्तर कालमें चारों ओरसे घेर लेते हैं ॥ ११ ॥

१५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२


पिबन्ति द्विकलाकारं शिष्टा तस्य कला तु या।
सुधामृतमयी पुण्या तामिन्दोः पितरो मुने॥ १२

निस्सृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः सुधामृतम्।
मासं तृप्तिमवाप्याग्र्यां पितरः सन्ति निर्वृताः।
सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ते त्रिधा॥ १३

एवं देवान् सिते पक्षे कृष्णपक्षे तथा पितॄन्।
वीरुधश्चामृतमयैः शीतैरप्परमाणुभिः॥ १४

वीरुधौषधिनिष्पत्त्या मनुष्यपशुकीटकान्।
आप्याययति शीतांशुः प्राकाश्याह्लादनेन तु॥ १५

वाय्वग्निद्रव्यसम्भूतो रथश्चन्द्रसुतस्य च।
पिशङ्गैस्तुरगैर्युक्तः सोऽष्टाभिर्वायुवेगिभिः॥ १६

सवरूथः सानुकर्षो युक्तो भूसम्भवैर्हयैः।
सोपासङ्गपताकस्तु शुक्रस्यापि रथो महान्॥ १७

अष्टाश्वः काञ्चनः श्रीमान्भौमस्यापि रथो महान्।
पद्मरागारुणैरश्वैः संयुक्तो वह्निसम्भवैः॥ १८

अष्टाभिः पाण्डुरैर्युक्तो वाजिभिः काञ्चनो रथः।
तस्मिंस्तिष्ठति वर्षान्ते राशौ राशौ बृहस्पतिः॥ १९

आकाशसम्भवैरश्वैः शबलैः स्यन्दनं युतम्।
तमारुह्य शनैर्याति मन्दगामी शनैश्चरः॥ २०

स्वर्भानोस्तुरगा ह्यष्टौ भृङ्गाभा धूसरं रथम्।
सकृद्युक्तास्तु मैत्रेय वहन्त्यविरतं सदा॥ २१

आदित्यान्निस्सृतो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु।
आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु॥ २२

तथा केतुरथस्याश्वा अप्यष्टौ वातरंहसः।
पलालधूमवर्णाभा लाक्षारसनिभारुणाः॥ २३

एते मया ग्रहाणां वै तवाख्याता रथा नव।
सर्वे ध्रुवे महाभाग प्रबद्धा वायुरश्मिभिः॥ २४


हे मुने! उस समय उस द्विकलाकार चन्द्रमाकी बची हुई अमृतमयी एक कलाका वे पितृगण पान करते हैं॥ १२॥ अमावास्याके दिन चन्द्र-रश्मिसे निकले हुए उस सुधामृतका पान करके अत्यन्त तृप्त हुए सौम्य, बर्हिषद् और अग्निष्वात्त तीन प्रकारके पितृगण एक मासपर्यन्त सन्तुष्ट रहते हैं॥ १३॥ इस प्रकार चन्द्रदेव शुक्लपक्षमें देवताओंकी और कृष्णपक्षमें पितृगणकी पुष्टि करते हैं तथा अमृतमय शीतल जलकणोंसे लता-वृक्षादिका और लता-ओषधि आदि उत्पन्न करके तथा अपनी चन्द्रिकाद्वारा आह्लादित करके वे मनुष्य, पशु एवं कीट-पतंगादि सभी प्राणियोंका पोषण करते हैं॥ १४-१५॥

चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ वायु और अग्निमय द्रव्यका बना हुआ है और उसमें वायुके समान वेगशाली आठ पिशंगवर्ण घोड़े जुते हैं॥ १६॥ वरूथ$^१$, अनुकर्ष$^२$, उपासंग$^३$ और पताका तथा पृथिवीसे उत्पन्न हुए घोड़ोंके सहित शुक्रका रथ भी अति महान् है॥ १७॥ तथा मंगलका अति शोभायमान सुवर्ण-निर्मित महान् रथ भी अग्निसे उत्पन्न हुए, पद्मराग-मणिके समान, अरुणवर्ण, आठ घोड़ोंसे युक्त है॥ १८॥ जो आठ पाण्डुरवर्ण घोड़ोंसे युक्त सुवर्णका रथ है उसमें वर्षके अन्तमें प्रत्येक राशिमें बृहस्पतिजी विराजमान होते हैं॥ १९॥ आकाशसे उत्पन्न हुए विचित्रवर्ण घोड़ोंसे युक्त रथमें आरूढ होकर मन्दगामी शनैश्चरजी धीरे-धीरे चलते हैं॥ २०॥

राहुका रथ धूसर (मटियाले) वर्णका है, उसमें भ्रमरके समान कृष्णवर्ण आठ घोड़े जुते हुए हैं। हे मैत्रेय! एक बार जोत दिये जानेपर वे घोड़े निरन्तर चलते रहते हैं॥ २१॥ चन्द्रपर्वों (पूर्णिमा)-पर यह राहु सूर्यसे निकलकर चन्द्रमाके पास आता है तथा सौरपर्वों (अमावास्या)-पर यह चन्द्रमासे निकलकर सूर्यके निकट जाता है॥ २२॥ इसी प्रकार केतुके रथके वायुवेगशाली आठ घोड़े भी पुआलके धुएँकी-सी आभावाले तथा लाखके समान लाल रंगके हैं॥ २३॥

हे महाभाग! मैंने तुमसे यह नवों ग्रहोंके रथोंका वर्णन किया; ये सभी वायुमयी डोरीसे ध्रुवके साथ बँधे हुए हैं॥ २४॥


$^१.$ रथकी रक्षाके लिये बना हुआ लोहेका आवरण। $^२.$ रथका नीचेका भाग। $^३.$ शस्त्र रखनेका स्थान।

अ० १२ ] * द्वितीय अंश * १५१

ग्रहर्क्षताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषतः ।<br>भ्रमन्त्युचितचारेण मैत्रेयानिलरश्मिभिः ॥ २५<br>यावन्त्यश्चैव तारास्तास्तावन्तो वातरश्मयः ।<br>सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम् ॥ २६<br>तैलपीडा यथा चक्रं भ्रमन्तो भ्रामयन्ति वै ।<br>तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातविद्धानि सर्वशः ॥ २७<br>अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु ।<br>यस्माज्ज्योतींषि वहति प्रवहस्तेन स स्मृतः ॥ २८<br>शिशुमारस्तु यः प्रोक्तः स ध्रुवो यत्र तिष्ठति ।<br>सन्निवेशं च तस्यापि शृणुष्व मुनिसत्तम ॥ २९<br>यदह्ना कुरुते पापं तं दृष्ट्वा निशि मुच्यते ।<br>यावन्त्यश्चैव तारास्ताः शिशुमाश्रिता दिवि ।<br>तावन्त्येव तु वर्षाणि जीवत्यभ्यधिकानि च ॥ ३०<br>उत्तानपादस्तस्याधो विज्ञेयो ह्युत्तरो हनुः ।<br>यज्ञोऽधरश्च विज्ञेयो धर्मो मूर्द्धानमाश्रितः ॥ ३१<br>हृदि नारायणश्चास्ते अश्विनौ पूर्वपादयोः ।<br>वरुणश्चार्यमा चैव पश्चिमे तस्य सक्थिनी ॥ ३२<br>शिश्नः संवत्सरस्तस्य मित्रोऽपानं समाश्रितः ॥ ३३<br>पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च कश्यपोऽथ ततो ध्रुवः ।<br>तारका शिशुमारस्य नास्तमेति चतुष्टयम् ॥ ३४<br>इत्येष सन्निवेशोऽयं पृथिव्या ज्योतिषsingleं तथा ।<br>द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां च कीर्तितः ॥ ३५<br>वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै ।<br>तेषां स्वरूपमाख्यातं सङ्क्षेपः श्रूयतां पुनः ॥ ३६<br>यदम्बु वैष्णवः कायस्ततो विप्र वसुन्धरा ।<br>पद्माकारा समुद्भूता पर्वताब्ध्यादिसंयुता ॥ ३७<br>ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु-<br>र्वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च ।<br>नद्यः समुद्राश्च स एव सर्वं<br>यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्य ॥ ३८<br>ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा-<br>वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः ।हे मैत्रेय! समस्त ग्रह, नक्षत्र और तारामण्डल वायुमयी रज्जुसे ध्रुवके साथ बँधे हुए यथोचित प्रकारसे घूमते रहते हैं॥ २५॥ जितने तारागण हैं उतनी ही वायुमयी डोरियाँ हैं। उनसे बँधकर वे सब स्वयं घूमते तथा ध्रुवको घुमाते रहते हैं॥ २६॥ जिस प्रकार तेली लोग स्वयं घूमते हुए कोल्हूको भी घुमाते रहते हैं उसी प्रकार समस्त ग्रहगण वायुसे बँधकर घूमते रहते हैं॥ २७॥ क्योंकि इस वायुचक्रसे प्रेरित होकर समस्त ग्रहगण अलातचक्र (बनैती)-के समान घूमा करते हैं, इसलिये यह 'प्रवह' कहलाता है॥ २८॥<br>जिस शिशुमारचक्रका पहले वर्णन कर चुके हैं, तथा जहाँ ध्रुव स्थित है, हे मुनिश्रेष्ठ! अब तुम उसकी स्थितिका वर्णन सुनो॥ २९॥ रात्रिके समय उनका दर्शन करनेसे मनुष्य दिनमें जो कुछ पापकर्म करता है उनसे मुक्त हो जाता है तथा आकाशमण्डलमें जितने तारे इसके आश्रित हैं उतने ही अधिक वर्ष वह जीवित रहता है॥ ३०॥ उत्तानपाद उसकी ऊपरकी हनु (ठोड़ी) है और यज्ञ नीचेकी तथा धर्मने उसके मस्तकपर अधिकार कर रखा है॥ ३१॥ उसके हृदय-देशमें नारायण हैं, दोनों चरणोंमें अश्विनीकुमार हैं तथा जंघाओंमें वरुण और अर्यमा हैं॥ ३२॥ संवत्सर उसका शिश्न है, मित्रने उसके अपान-देशको आश्रित कर रखा है, तथा अग्नि, महेन्द्र, कश्यप और ध्रुव पुच्छभागमें स्थित हैं। शिशुमारके पुच्छभागमें स्थित ये अग्नि आदि चार तारे कभी अस्त नहीं होते॥ ३३-३४॥ इस प्रकार मैंने तुमसे पृथिवी, ग्रहगण, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष और नदियोंका तथा जो-जो उनमें बसते हैं उन सभीके स्वरूपका वर्णन कर दिया। अब इसे संक्षेपसे फिर सुनो॥ ३५-३६॥<br>हे विप्र! भगवान् विष्णुका जो मूर्तरूप जल है उससे पर्वत और समुद्रादिके सहित कमलके समान आकारवाली पृथिवी उत्पन्न हुई॥ ३७॥ हे विप्रवर्य! तारागण, त्रिभुवन, वन, पर्वत, दिशाएँ, नदियाँ और समुद्र सभी भगवान् विष्णु ही हैं तथा और भी जो कुछ है अथवा नहीं है वह सब भी एकमात्र वे ही हैं॥ ३८॥ क्योंकि भगवान् विष्णु ज्ञानस्वरूप हैं इसलिये वे सर्वमय हैं, परिच्छिन्न
१५२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १२
ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा-<br>ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ ३९<br>यदा तु शुद्धं निजरूपि सर्वं<br>कर्मक्षये ज्ञानमपास्तदोषम्।<br>तदा हि सङ्कल्पतरोः फलानि<br>भवन्ति नो वस्तुषु वस्तु भेदाः ॥ ४०पदार्थाकार नहीं हैं। अतः इन पर्वत, समुद्र और पृथिवी आदि भेदोंको तुम एकमात्र विज्ञानका ही विलास जानो ॥ ३९ ॥ जिस समय जीव आत्मज्ञानके द्वारा दोषरहित होकर सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय हो जानेसे अपने शुद्ध-स्वरूपमें स्थित हो जाता है उस समय आत्मवस्तुमें संकल्पवृक्षके फलरूप पदार्थ-भेदोंकी प्रतीति नहीं होती ॥ ४० ॥
वस्त्वस्ति किं कुत्रचिदादिमध्य-<br>पर्यन्तहीनं सततैकरूपम्।<br>यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूयो<br>न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ ४१हे द्विज ! कोई भी घटादि वस्तु है ही कहाँ ? आदि, मध्य और अन्तसे रहित नित्य एकरूप चित् ही तो सर्वत्र व्याप्त है। जो वस्तु पुनः-पुनः बदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं रहती, उसमें वास्तविकता ही क्या है ? ॥ ४१ ॥
मही घटत्वं घटतः कपालिका<br>कपालिका चूर्णरजस्ततोऽणुः।<br>जनैः स्वकर्मस्तिमित आत्मनिश्चयै-<br>रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु ॥ ४२देखो, मृत्तिका ही घटरूप हो जाती है और फिर वही घटसे कपाल, कपालसे चूर्णरज और रजसे अणुरूप हो जाती है। तो फिर बताओ अपने कर्मोंके वशीभूत हुए मनुष्य आत्मस्वरूपको भूलकर इसमें कौन-सी सत्य वस्तु देखते हैं ॥ ४२ ॥
तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चित्-<br>क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्।<br>विज्ञानमेकं निजकर्मभेद-<br>विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ ४३अतः हे द्विज ! विज्ञानसे अतिरिक्त कभी कहीं कोई पदार्थादि नहीं हैं। अपने-अपने कर्मोंके भेदसे भिन्न-भिन्न चित्तोंद्वारा एक ही विज्ञान नाना प्रकारसे मान लिया गया है ॥ ४३ ॥
ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोक-<br>मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् ।<br>एकं सदेकं परमः परेशः<br>स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ४४वह विज्ञान अति विशुद्ध, निर्मल, निःशोक और लोभादि समस्त दोषोंसे रहित है। वही एक सत्यस्वरूप परम परमेश्वर वासुदेव है, जिससे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥ ४४ ॥
सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो<br>ज्ञानं यथा सत्यमसत्यमन्यत्।<br>एतत्तु यत्संव्यवहारभूतं<br>तत्रापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥ ४५इस प्रकार मैंने तुमसे यह परमार्थका वर्णन किया है, केवल एक ज्ञान ही सत्य है, उससे भिन्न और सब असत्य है। इसके अतिरिक्त जो केवल व्यवहारमात्र है उस त्रिभुवनके विषयमें भी मैं तुमसे कह चुका ॥ ४५ ॥
यज्ञः पशुर्वह्निरशेषऋत्विक्<br>सोमः सुराः स्वर्गमयश्च कामः।<br>इत्यादिकर्माश्रितमार्गदृष्टं<br>भूरादिभोगाश्च फलानि तेषाम् ॥ ४६[ इस ज्ञान-मार्गके अतिरिक्त] मैंने कर्म-मार्ग-सम्बन्धी यज्ञ, पशु, वह्नि, समस्त ऋत्विक्, सोम, सुरगण तथा स्वर्गमय कामना आदिका भी दिग्दर्शन करा दिया। भूर्लोकादिके सम्पूर्ण भोग इन कर्म-कलापोंके ही फल हैं ॥ ४६ ॥
यच्चैतद्भुवनगतं मया तवोक्तं<br>सर्वत्र व्रजति हि तत्र कर्मवश्यः।<br>ज्ञात्वैवं ध्रुवमचलं सदैकरूपं<br>तत्कुर्याद्विशति हि येन वासुदेवम् ॥ ४७यह जो मैंने तुमसे त्रिभुवनगत लोकोंका वर्णन किया है इन्हींमें जीव कर्मवश घूमा करता है, ऐसा जानकर इससे विरक्त हो मनुष्यको वही करना चाहिये जिससे ध्रुव, अचल एवं सदा एकरूप भगवान् वासुदेवमें लीन हो जाय ॥ ४७ ॥
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इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥


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अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५३

तेरहवाँ अध्याय

भरत-चरित्र

श्रीमैत्रेय उवाच

भगवन्सम्पग्याख्यातं यत्पृष्टोऽसि मया किल।
भूसमुद्रादिसरितां संस्थानं ग्रहसंस्थितिः॥ १
विश्ववाधारं यथा चैतत्तैलोक्यं समवस्थितम्।
परमार्थस्तु ते प्रोक्तो यथा ज्ञानं प्रधानतः॥ २
यत्त्वेतद्भगवान्ाह भरतस्य महीपतेः।
श्रोतुमिच्छामि चरितं तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ ३
भरतः स महीपालः शालग्रामेऽवसत्किल।
योगयुक्तः समाधाय वासुदेवे सदा मनः॥ ४
पुण्यदेशप्रभावेण ध्यायताश्च सदा हरिम्।
कथं तु नाऽभवन्मुक्तिर्यदभूत्स द्विजः पुनः॥ ५
विप्रत्वे च कृतं तेन यद्भूयः सुमहात्मना।
भरतेन मुनिश्रेष्ठ तत्सर्वं वक्तुमर्हसि॥ ६

श्रीपराशर उवाच

शालग्रामे महाभागो भगवन्न्यस्तमानसः।
स उवास चिरं कालं मैत्रेय पृथिवीपतिः॥ ७
अहिंसादिष्वशेषेषु गुणेषु गुणिनां वरः।
अवाप परमां काष्ठां मनसश्चापि संयमे॥ ८
यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।
कृष्ण विष्णो हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ ९
इति राजाह भरतो हरेर्नामानि केवलम्।
नान्यज्जगाद मैत्रेय किञ्चित्स्वप्नान्तरेऽपि च।
एतत्पदं तदर्थं च विना नान्यदचिन्तयत्॥ १०
समित्पुष्पकुशादानं चक्रे देवक्रियाकृते।
नान्यानि चक्रे कर्माणि निस्सङ्गो योगतापसः॥ ११
जगाम सोऽभिषेकार्थमेकदा तु महानदीम्।
सस्नौ तत्र तदा चक्रे स्नानस्यानन्तरक्रियाः॥ १२
अथाजगाम तत्तीरं जलं पातुं पिपासिता।
आसन्नप्रसवा ब्रह्मन्नेकैव हरिणी वनात्॥ १३


**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे भगवन्! मैंने पृथिवी, समुद्र, नदियों और ग्रहगणकी स्थिति आदिके विषयमें जो कुछ पूछा था सो सब आपने वर्णन कर दिया॥ १॥ उसके साथ ही आपने यह भी बतला दिया कि किस प्रकार यह समस्त त्रिलोकी भगवान् विष्णुके ही आश्रित है और कैसे परमार्थस्वरूप ज्ञान ही सबमें प्रधान है॥ २॥ किन्तु भगवन्! आपने पहले जिसकी चर्चा की थी वह राजा भरतका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ, कृपा करके कहिये॥ ३॥ कहते हैं, वे राजा भरत निरन्तर योगयुक्त होकर भगवान् वासुदेवमें चित्त लगाये शालग्रामक्षेत्रमें रहा करते थे॥ ४॥ इस प्रकार पुण्यदेशके प्रभाव और हरिचिन्तनसे भी उनकी मुक्ति क्यों नहीं हुई, जिससे उन्हें फिर ब्राह्मणका जन्म लेना पड़ा॥ ५॥ हे मुनिश्रेष्ठ! ब्राह्मण होकर भी उन महात्मा भरतजीने फिर जो कुछ किया वह सब आप कृपा करके मुझसे कहिये॥ ६॥

**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! वे महाभाग पृथिवीपति भरतजी भगवान्‌में चित्त लगाये चिरकालतक शालग्रामक्षेत्रमें रहे॥ ७॥ गुणवानोंमें श्रेष्ठ उन भरतजीने अहिंसा आदि सम्पूर्ण गुण और मनके संयममें परम उत्कर्ष लाभ किया॥ ८॥ ‘हे यज्ञेश! हे अच्युत! हे गोविन्द! हे माधव! हे अनन्त! हे केशव! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे हृषीकेश! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है’—इस प्रकार राजा भरत निरन्तर केवल भगवन्नामोंका ही उच्चारण किया करते थे। हे मैत्रेय! वे स्वप्नमें भी इस पदके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहते थे और न कभी इसके अर्थके अतिरिक्त और कुछ चिन्तन ही करते थे॥ ९-१०॥ वे निःसंग, योगयुक्त और तपस्वी राजा भगवान्‌की पूजाके लिये केवल समिध, पुष्प और कुशाका ही संचय करते थे। इसके अतिरिक्त वे और कोई कर्म नहीं करते थे॥ ११॥

एक दिन वे स्नानके लिये नदीपर गये और वहाँ स्नान करनेके अनन्तर उन्होंने स्नानोत्तर क्रियाएँ कीं॥ १२॥ हे ब्रह्मन्! इतनेहीमें उस नदी-तीरपर एक आसन्नप्रसवा (शीघ्र ही बच्चा जननेवाली) प्यासी हरिणी वनमेंसे जल पीनेके लिये आयी॥ १३॥

१५४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३ ]

ततः सम्भवत्तत्र पीतप्राये जले तथा।
सिंहस्य नादः सुमहान्सर्वप्राणिभयङ्करः ॥ १४

ततः सा सहसा त्रासादाप्लुता निम्नगातटम्।
अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात ह॥ १५

तमूह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिप्लुतम्।
जग्राह स नृपो गर्भात्पतितं मृगपोतकम् ॥ १६

गर्भप्रच्युतिदोषेण प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च।
मैत्रेय सापि हरिणी पपात च ममार च॥ १७

हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः।
मृगपोतं समादाय निजमाश्रममागतः ॥ १८

चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः।
पोषणं पुष्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने ॥ १९

चचाराश्रमपर्यन्ते तृणानि गहनेषु सः।
दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासादभ्यायायौ पुनः ॥ २०

प्रातर्गत्वातिदूरं च सायमायात्यथाश्रमम्।
पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमस्योटजाजिरे ॥ २१

तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि।
आसीच्चेतः समासक्तं न ययावन्यतो द्विज ॥ २२

विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबान्धवः।
ममत्वं स चकारोच्चैस्तस्मिन्हरिणबालके ॥ २३

किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः।
चिरायमाणे निष्क्रान्ते तस्यासीदिति मानसम् ॥ २४

एषा वसुमती तस्य खुराग्रक्षतकर्कुरा।
प्रीतये मम जातोऽसौ क्व ममैणकबालकः ॥ २५

विषाणाग्रेण मद्बाहुं कण्डूयनपरो हि सः।
क्षेमेणाभ्यागतोऽरण्यादपि मां सुखयिष्यति ॥ २६

एते लूनशिखास्तस्य दशनैरचिरोद्गतैः।
कुशाः काशा विराजन्ते बटवः सामगा इव ॥ २७

इत्थं चिरगते तस्मिन्स चक्रे मानसं मुनिः।
प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन्मृगे ॥ २८


हिन्दी अनुवाद

उस समय जब वह प्रायः जल पी चुकी थी, वहाँ सब प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली सिंहकी गम्भीर गर्जना सुनायी पड़ी ॥ १४ ॥ तब वह अत्यन्त भयभीत हो अकस्मात् उछलकर नदीके तटपर चढ़ गयी; अतः अत्यन्त उच्च स्थानपर चढ़नेके कारण उसका गर्भ नदीमें गिर गया ॥ १५ ॥

नदीकी तरंगमालाओंमें पड़कर बहते हुए उस गर्भ-भ्रष्ट मृगबालकको राजा भरतने पकड़ लिया ॥ १६ ॥ हे मैत्रेय ! गर्भपातके दोषसे तथा बहुत ऊँचे उछलनेके कारण वह हरिणी भी पछाड़ खाकर गिर पड़ी और मर गयी ॥ १७ ॥ उस हरिणीको मरी हुई देख तपस्वी भरत उसके बच्चेको अपने आश्रमपर ले आये ॥ १८ ॥

हे मुने! फिर राजा भरत उस मृगछौनेका नित्यप्रति पालन-पोषण करने लगे और वह भी उनसे पोषित होकर दिन-दिन बढ़ने लगा ॥ १९ ॥ वह बच्चा कभी तो उस आश्रमके आस-पास ही घास चरता रहता और कभी वनमें दूरतक जाकर फिर सिंहके भयसे लौट आता ॥ २० ॥ प्रातःकाल वह बहुत दूर भी चला जाता, तो भी सायंकालको फिर आश्रममें ही लौट आता और भरतजीके आश्रमकी पर्णशालाके आँगनमें पड़ रहता ॥ २१ ॥

हे द्विज! इस प्रकार कभी पास और कभी दूर रहनेवाले उस मृगमें ही राजाका चित्त सर्वदा आसक्त रहने लगा, वह अन्य विषयोंकी ओर जाता ही नहीं था ॥ २२ ॥ जिन्होंने सम्पूर्ण राज-पाट और अपने पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंको छोड़ दिया था वे ही भरतजी उस हरिणके बच्चेपर अत्यन्त ममता करने लगे ॥ २३ ॥ उसे बाहर जानेके अनन्तर यदि लौटनेमें देरी हो जाती तो वे मन-ही-मन सोचने लगते —'अहो! उस बच्चेको आज किसी भेड़ियेने तो नहीं खा लिया? किसी सिंहके पंजेमें तो आज वह नहीं पड़ गया? ॥ २४ ॥ देखो, उसके खुरोंके चिह्नोंसे यह पृथिवी कैसी चित्रित हो रही है? मेरी ही प्रसन्नताके लिये उत्पन्न हुआ वह मृगछौना न जाने आज कहाँ रह गया है? ॥ २५ ॥ क्या वह वनसे कुशलपूर्वक लौटकर अपने सींगोंसे मेरी भुजाको खुजलाकर मुझे आनन्दित करेगा? ॥ २६ ॥ देखो, उसके नवजात दाँतोंसे कटी हुई शिखावाले ये कुश और काश सामाध्यायी [शिखाहीन] ब्रह्मचारियोंके समान कैसे सुशोभित हो रहे हैं? ॥ २७ ॥ देरके गये हुए उस बच्चेके निमित्त भरत मुनि इसी प्रकार चिन्ता करने लगते थे और जब वह उनके निकट आ जाता तो उसके प्रेमसे उनका मुख खिल जाता था ॥ २८ ॥

अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५५


समाधिभङ्गस्तस्यासीत्तन्मयत्वादृतात्मनः।
सन्त्यक्तराज्यभोगर्द्धिश्वजनस्यापि भूपतेः॥ २९
इस प्रकार उसीमें आसक्तचित्त रहनेसे, राज्य, भोग, समृद्धि और स्वजनोंको त्याग देनेवाले भी राजा भरतकी समाधि भंग हो गयी॥ २९॥

चपलं चपले तस्मिन्दूरगं दूरगामिनि।
मृगपोतेऽभवच्चित्तं स्थैर्यवत्तस्य भूपतेः॥ ३०
उस राजाका स्थिरचित्त उस मृगके चंचल होनेपर चंचल हो जाता और दूर चले जानेपर दूर चला जाता॥ ३०॥

कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः।
पितेव सास्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः॥ ३१
कालान्तरमें राजा भरतने, उस मृगबालकद्वारा पुत्रके सजल नयनोंसे देखे जाते हुए पिताके समान अपने प्राणोंका त्याग किया॥ ३१॥

मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजन्प्राणानसावपि।
तन्मयत्वेन मैत्रेय नान्यत्किञ्चिदचिन्तयत्॥ ३२
हे मैत्रेय! राजा भी प्राण छोड़ते समय स्नेहवश उस मृगको ही देखता रहा तथा उसीमें तन्मय रहनेसे उसने और कुछ भी चिन्तन नहीं किया॥ ३२॥

ततश्च तत्कालकृतां भावनां प्राप्य तादृशीम्।
जम्बूमार्गे महारण्ये जातो जातिस्मरो मृगः॥ ३३
तदनन्तर, उस समयकी सुदृढ़ भावनाके कारण वह जम्बूमार्ग (कालंजरपर्वत)-के घोर वनमें अपने पूर्वजन्मकी स्मृतिसे युक्त एक मृग हुआ॥ ३३॥

जातिस्मरत्वादुद्विग्नः संसारस्य द्विजोत्तम।
विहाय मातरं भूयः शालग्राममुपाययौ॥ ३४
हे द्विजोत्तम! अपने पूर्वजन्मका स्मरण रहनेके कारण वह संसारसे उपरत हो गया और अपनी माताको छोड़कर फिर शालग्रामक्षेत्रमें आकर ही रहने लगा॥ ३४॥

शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णैः स कुर्वन्नात्मपोषणम्।
मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ॥ ३५
वहाँ सूखे घास-फूस और पत्तोंसे ही अपना शरीर-पोषण करता हुआ वह अपने मृगत्व-प्राप्तिके हेतुभूत कर्मोंका निराकरण करने लगा॥ ३५॥

तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः।
सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले॥ ३६
तदनन्तर, उस शरीरको छोड़कर उसने सदाचार-सम्पन्न योगियोंके पवित्र कुलमें ब्राह्मण-जन्म ग्रहण किया। उस देहमें भी उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा॥ ३६॥

सर्वविज्ञानसम्पन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित्।
अपश्यत्स च मैत्रेय आत्मानं प्रकृतेः परम्॥ ३७
हे मैत्रेय! वह सर्वविज्ञानसम्पन्न और समस्त शास्त्रोंके मर्मको जाननेवाला था तथा अपने आत्माको निरन्तर प्रकृतिसे परे देखता था॥ ३७॥

आत्मनोऽधिगतज्ञानो देवादीनि महामुने।
सर्वभूतान्यभेदेन स ददर्श तदात्मनः॥ ३८
हे महामुने! आत्मज्ञानसम्पन्न होनेके कारण वह देवता आदि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेसे अभिन्नरूपसे देखता था॥ ३८॥

न पपाठ गुरुप्रोक्तं कृतोपनयनः श्रुतिम्।
न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च॥ ३९
उपनयन-संस्कार हो जानेपर वह गुरुके पढ़ानेपर भी वेद-पाठ नहीं करता था तथा न किसी कर्मकी ओर ध्यान देता और न कोई अन्य शास्त्र ही पढ़ता था॥ ३९॥

उक्तोऽपि बहुशः किञ्चिज्जडवाक्यमभाषत।
तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यवाक्योक्तिसंश्रितम्॥ ४०
जब कोई उससे बहुत पूछताछ करता तो जडके समान कुछ असंस्कृत, असार एवं ग्रामीण वाक्योंसे मिले हुए वचन बोल देता॥ ४०॥

अपध्वस्तवपुः सोऽपि मलिनाम्बरधृग्द्विजः।
क्लिन्नदन्तान्तरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः॥ ४१
निरन्तर मैला-कुचैला शरीर, मलिन वस्त्र और अपरिमार्जित दन्तयुक्त रहनेके कारण वह ब्राह्मण सदा अपने नगरनिवासियोंसे अपमानित होता रहता था॥ ४१॥

सम्मानना परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः।
जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विन्दति॥ ४२
हे मैत्रेय! योगश्रीके लिये सबसे अधिक हानिकारक सम्मान ही है, जो योगी अन्य मनुष्योंसे अपमानित होता है वह शीघ्र ही सिद्धि लाभ कर लेता है॥ ४२॥

१५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३


तस्माच्चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन्।
जना यथावमन्येरन्नाच्छेयुर्नैव सङ्गतिम्॥ ४३
हिरण्यगर्भवचनं विचिन्त्येत्थं महामतिः।
आत्मानं दर्शयामास जडोन्मत्ताकृतिं जने॥ ४४
भुङ्क्ते कुल्माषव्रीह्यादिशाकं वन्यं फलं कणान्।
यद्यदाप्नोति सुबहु तदत्ते कालसंयमम्॥ ४५
पितर्युपरते सोऽथ भ्रातृभ्रातृव्यबान्धवैः।
कारितः क्षेत्रकर्मादि कदन्नाहारपोषितः॥ ४६
सतूक्ष्पीनावयवो जडकारी च कर्मणि।
सर्वलोकोपकरणं बभूवाहारवेतनः॥ ४७
तं तादृशमसंस्कारं विप्राकृतिविचेष्टितम्।
क्षत्ता पृषतराजस्य काल्यै पशुमकल्पयत्॥ ४८
रात्रौ तं समलङ्कृत्य वैशसस्य विधानतः।
अधिष्ठितं महाकाली ज्ञात्वा योगेश्वरं तथा॥ ४९
ततः खड्गं समादाय निशितं निशि सा तथा।
क्षत्तारं क्रूरकर्माणमच्छिनत्कण्ठमूलतः।
स्वपार्षदयुता देवी पपौ रुधिरमुल्बणम्॥ ५०
ततस्सौवीरराजस्य प्रयातस्य महात्मनः।
विष्टिकर्तार्थ मन्येत विष्टियोग्योऽयमित्यपि॥ ५१
तं तादृशं महात्मानं भस्मच्छन्नमिवानलम्।
क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यममन्यत॥ ५२
स राजा शिबिकारूढो गन्तुं कृतमतिर्द्विज।
बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलर्षेर्वराश्रमम्॥ ५३
श्रेयः किमत्र संसारे दुःखप्राये नृणामिति।
प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम्॥ ५४
उवाह शिबिकां तस्य क्षत्तृवचनचोदितः।
नृणां विष्टिगृहीतानामन्येषां सोऽपि मध्यगः॥ ५५
गृहीतो विष्टिना विप्रः सर्वज्ञानैकभाजनः।
जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम्॥ ५६
ययौ जडमतिः सोऽथ युगमात्रावलोकनम्।
कुर्वन्मतिमतां श्रेष्ठस्तदन्ये त्वरितं ययुः॥ ५७


अतः योगीको, सन्मार्गको दूषित न करते हुए ऐसा आचरण करना चाहिये जिससे लोग अपमान करें और संगतिसे दूर रहें॥ ४३॥ हिरण्यगर्भके इस सारयुक्त वचनको स्मरण रखते हुए वे महामति विप्रवर अपने-आपको लोगोंमें जड और उन्मत्त-सा ही प्रकट करते थे॥ ४४॥ कुल्माष (जौ आदि) धान, शाक, जंगली फल अथवा कण आदि जो कुछ भक्ष्य मिल जाता उस थोड़े-सेको भी बहुत मानकर वे उसीको खा लेते और अपना कालक्षेप करते रहते॥ ४५॥
फिर पिताके शान्त हो जानेपर उनके भाई-बन्धु उनका सड़े-गले अन्नसे पोषण करते हुए उनसे खेती-बारीका कार्य कराने लगे॥ ४६॥ वे बैलके समान पुष्ट शरीरवाले और कर्ममें जडवत् निश्चेष्ट थे। अतः केवल आहारमात्रसे ही वे सब लोगोंके यन्त्र बन जाते थे। [अर्थात् सभी लोग उन्हें आहारमात्र देकर अपना-अपना काम निकाल लिया करते थे]॥ ४७॥
उन्हें इस प्रकार संस्कारशून्य और ब्राह्मणवेषके विरुद्ध आचरणवाला देख रात्रिके समय पृषतराजके सेवकोंने बलिकी विधिसे सुसज्जितकर कालीका बलिपशु बनाया। किन्तु इस प्रकार एक परम योगीश्वरको बलिके लिये उपस्थित देख महाकालीने एक तीक्ष्ण खड्ग ले उस क्रूरकर्मा राजसेवकका गला काट डाला और अपने पार्षदोंसहित उसका तीखा रुधिर पान किया॥ ४८–५०॥
तदनन्तर, एक दिन महात्मा सौवीरराज कहीं जा रहे थे। उस समय उनके बेगारियोंने समझा कि यह भी बेगारके ही योग्य है॥ ५१॥ राजाके सेवकोंने भी भस्ममें छिपे हुए अग्निके समान उन महात्माका रंग-ढंग देखकर उन्हें बेगारके योग्य समझा॥ ५२॥ हे द्विज! उन सौवीरराजने मोक्षधर्मके ज्ञाता महामुनि कपिलसे यह पूछनेके लिये कि 'इस दुःखमय संसारमें मनुष्योंका श्रेय किसमें है' शिबिकापर चढ़कर इक्षुमती नदीके किनारे उन महर्षिके आश्रमपर जानेका विचार किया॥ ५३–५४॥
तब राजसेवकके कहनेसे भरत मुनि भी उसकी पालकीको अन्य बेगारियोंके बीचमें लगकर वहन करने लगे॥ ५५॥ इस प्रकार बेगारमें पकड़े जाकर अपने पूर्वजन्मका स्मरण रखनेवाले, सम्पूर्ण विज्ञानके एकमात्र पात्र वे विप्रवर अपने पापमय प्रारब्धका क्षय करनेके लिये उस शिबिकाको उठाकर चलने लगे॥ ५६॥ वे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ द्विजवर तो चार हाथ भूमि देखते हुए मन्द-गतिसे चलते थे, किन्तु उनके अन्य साथी जल्दी-जल्दी चल रहे थे॥ ५७॥

अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५७

विलोक्य नृपतिःसोऽथ विषमां शिबिकागतिम्। किमेतदित्याह समं गम्यतां शिबिकावहाः ॥ ५८ पुनस्तथैव शिबिकां विलोक्य विषमां हि सः। नृपः किमेतदित्याह भवद्भिर्गम्यतेऽन्यथा ॥ ५९ भूपतेर्वदतस्तस्य श्रुत्वेत्थं बहुशो वचः। शिबिकावाहकाः प्रोचुरयं यातीत्यसत्वरम् ॥ ६० राजोवाच किं श्रान्तोऽस्यल्पमध्वानं त्वयोढा शिबिका मम। किमायासासहो न त्वं पीवानसि निरीक्ष्यसे ॥ ६१ ब्राह्मण उवाच नाहं पीवान्न चैवोढा शिबिका भवतो मया। न श्रान्तोऽस्मि न चायासो सोढव्योऽस्ति महीपते॥ ६२ राजोवाच प्रत्यक्षं दृश्यसे पीवानद्यापि शिबिका त्वयि। श्रमश्च भारोद्वहने भवत्येव हि देहिनाम् ॥ ६३ ब्राह्मण उवाच प्रत्यक्षं भवता भूप यद्द्दष्टं मम तद्वद। बलवानबलश्चेति वाच्यं पश्चाद्विशेषणम् ॥ ६४ त्वयोढा शिबिका चेति त्वय्यद्यापि च संस्थिता। मिथ्यैतदत्र तु भवाञ्छृणोतु वचनं मम ॥ ६५ भूमौ पादयुगं त्वास्ते जङ्घे पादद्वये स्थिते। ऊर्वोर्जङ्घाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ॥ ६६ वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कन्धौ चोदरसंस्थितौ। स्कन्धाश्रितेयं शिबिका मम भारोऽत्र किं कृतः ॥ ६७ शिबिकायां स्थितं चेदं वपुस्त्वदुपलक्षितम्। तत्र त्वमहमप्यत्र प्रोच्यते चेदमन्यथा ॥ ६८ अहं त्वं च तथान्ये च भूतैरुह्याम पार्थिव। गुणप्रवाहपतितो भूतवर्गोऽपि यात्ययम् ॥ ६९ कर्मवश्या गुणाश्चैते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते। अविद्यासञ्चितं कर्म तच्चाशेषेषु जन्तुषु ॥ ७० आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो निर्गुणः प्रकृतेः परः। प्रवृद्ध्यपचयौ नास्य एकस्याखिलजन्तुषु ॥ ७१

इस प्रकार शिबिकाकी विषम-गति देखकर राजाने कहा—"अरे शिबिकावाहको ! यह क्या करते हो ? समान गतिसे चलो"॥ ५८॥ किन्तु फिर भी उसकी गति उसी प्रकार विषम देखकर राजाने फिर कहा—"अरे क्या है? इस प्रकार असमान भावसे क्यों चलते हो ?"॥ ५९॥ राजाके बार-बार ऐसे वचन सुनकर वे शिबिकावाहक [भरतजीको दिखाकर] कहने लगे—"हममेंसे एक यही धीरे-धीरे चलता है"॥ ६०॥

राजाने कहा—अरे, तूने तो अभी मेरी शिबिकाको थोड़ी ही दूर वहन किया है; क्या इतनेहीमें थक गया ? तू वैसे तो बहुत मोटा-मुष्टण्डा दिखायी देता है, फिर क्या तुझसे इतना भी श्रम नहीं सहा जाता ? ॥ ६१॥

ब्राह्मण बोले—राजन् ! मैं न मोटा हूँ और न मैंने आपकी शिबिका ही उठा रखी है। मैं थका भी नहीं हूँ और न मुझे श्रम सहन करनेकी ही आवश्यकता है॥ ६२॥

राजा बोले—अरे, तू तो प्रत्यक्ष ही मोटा दिखायी दे रहा है, इस समय भी शिबिका तेरे कन्धेपर रखी हुई है और बोझा ढोनेसे देहधारियोंको श्रम होता ही है॥ ६३॥

ब्राह्मण बोले—राजन् ! तुम्हें प्रत्यक्ष क्या दिखायी दे रहा है, मुझे पहले यही बताओ। उसके 'बलवान्' अथवा 'अबलवान्' आदि विशेषणोंकी बात तो पीछे करना॥ ६४॥ 'तूने मेरी शिबिकाका वहन किया है, इस समय भी वह तेरे ही कन्धोंपर रखी हुई है'—तुम्हारा ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है, अच्छा मेरी बात सुनो—॥ ६५॥ देखो, पृथिवीपर तो मेरे पैर रखे हैं, पैरोंके ऊपर जंघाएँ हैं और जंघाओंके ऊपर दोनों ऊरु तथा ऊरुओंके ऊपर उदर है॥ ६६॥ उदरके ऊपर वक्षःस्थल, बाहु और कन्धोंकी स्थिति है तथा कन्धोंके ऊपर यह शिबिका रखी है। इसमें मेरे ऊपर कैसे बोझा रहा ? ॥ ६७॥ इस शिबिकामें जिसे तुम्हारा कहा जाता है वह शरीर रखा हुआ है। वास्तवमें तो 'तुम वहाँ (शिबिकामें) हो और मैं यहाँ (पृथिवीपर) हूँ'—ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है॥ ६८॥ हे राजन् ! मैं, तुम और अन्य भी समस्त जीव पंचभूतोंसे ही वहन किये जाते हैं। तथा यह भूतवर्ग भी गुणोंके प्रवाहमें पड़कर ही बहा जा रहा है॥ ६९॥ हे पृथिवीपते ! ये सत्त्वादि गुण भी कर्मोंके वशीभूत हैं और समस्त जीवोंमें कर्म अविद्याजन्य ही हैं॥ ७०॥ आत्मा तो शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृतिसे परे है तथा समस्त जीवोंमें वह एक ही ओत-प्रोत है। अतः उसके वृद्धि अथवा क्षय कभी नहीं होते॥ ७१॥