भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० १२ ] * द्वितीय अंश * १५१

ग्रहर्क्षताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषतः ।<br>भ्रमन्त्युचितचारेण मैत्रेयानिलरश्मिभिः ॥ २५<br>यावन्त्यश्चैव तारास्तास्तावन्तो वातरश्मयः ।<br>सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम् ॥ २६<br>तैलपीडा यथा चक्रं भ्रमन्तो भ्रामयन्ति वै ।<br>तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातविद्धानि सर्वशः ॥ २७<br>अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु ।<br>यस्माज्ज्योतींषि वहति प्रवहस्तेन स स्मृतः ॥ २८<br>शिशुमारस्तु यः प्रोक्तः स ध्रुवो यत्र तिष्ठति ।<br>सन्निवेशं च तस्यापि शृणुष्व मुनिसत्तम ॥ २९<br>यदह्ना कुरुते पापं तं दृष्ट्वा निशि मुच्यते ।<br>यावन्त्यश्चैव तारास्ताः शिशुमाश्रिता दिवि ।<br>तावन्त्येव तु वर्षाणि जीवत्यभ्यधिकानि च ॥ ३०<br>उत्तानपादस्तस्याधो विज्ञेयो ह्युत्तरो हनुः ।<br>यज्ञोऽधरश्च विज्ञेयो धर्मो मूर्द्धानमाश्रितः ॥ ३१<br>हृदि नारायणश्चास्ते अश्विनौ पूर्वपादयोः ।<br>वरुणश्चार्यमा चैव पश्चिमे तस्य सक्थिनी ॥ ३२<br>शिश्नः संवत्सरस्तस्य मित्रोऽपानं समाश्रितः ॥ ३३<br>पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च कश्यपोऽथ ततो ध्रुवः ।<br>तारका शिशुमारस्य नास्तमेति चतुष्टयम् ॥ ३४<br>इत्येष सन्निवेशोऽयं पृथिव्या ज्योतिषsingleं तथा ।<br>द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां च कीर्तितः ॥ ३५<br>वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै ।<br>तेषां स्वरूपमाख्यातं सङ्क्षेपः श्रूयतां पुनः ॥ ३६<br>यदम्बु वैष्णवः कायस्ततो विप्र वसुन्धरा ।<br>पद्माकारा समुद्भूता पर्वताब्ध्यादिसंयुता ॥ ३७<br>ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु-<br>र्वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च ।<br>नद्यः समुद्राश्च स एव सर्वं<br>यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्य ॥ ३८<br>ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा-<br>वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः ।हे मैत्रेय! समस्त ग्रह, नक्षत्र और तारामण्डल वायुमयी रज्जुसे ध्रुवके साथ बँधे हुए यथोचित प्रकारसे घूमते रहते हैं॥ २५॥ जितने तारागण हैं उतनी ही वायुमयी डोरियाँ हैं। उनसे बँधकर वे सब स्वयं घूमते तथा ध्रुवको घुमाते रहते हैं॥ २६॥ जिस प्रकार तेली लोग स्वयं घूमते हुए कोल्हूको भी घुमाते रहते हैं उसी प्रकार समस्त ग्रहगण वायुसे बँधकर घूमते रहते हैं॥ २७॥ क्योंकि इस वायुचक्रसे प्रेरित होकर समस्त ग्रहगण अलातचक्र (बनैती)-के समान घूमा करते हैं, इसलिये यह 'प्रवह' कहलाता है॥ २८॥<br>जिस शिशुमारचक्रका पहले वर्णन कर चुके हैं, तथा जहाँ ध्रुव स्थित है, हे मुनिश्रेष्ठ! अब तुम उसकी स्थितिका वर्णन सुनो॥ २९॥ रात्रिके समय उनका दर्शन करनेसे मनुष्य दिनमें जो कुछ पापकर्म करता है उनसे मुक्त हो जाता है तथा आकाशमण्डलमें जितने तारे इसके आश्रित हैं उतने ही अधिक वर्ष वह जीवित रहता है॥ ३०॥ उत्तानपाद उसकी ऊपरकी हनु (ठोड़ी) है और यज्ञ नीचेकी तथा धर्मने उसके मस्तकपर अधिकार कर रखा है॥ ३१॥ उसके हृदय-देशमें नारायण हैं, दोनों चरणोंमें अश्विनीकुमार हैं तथा जंघाओंमें वरुण और अर्यमा हैं॥ ३२॥ संवत्सर उसका शिश्न है, मित्रने उसके अपान-देशको आश्रित कर रखा है, तथा अग्नि, महेन्द्र, कश्यप और ध्रुव पुच्छभागमें स्थित हैं। शिशुमारके पुच्छभागमें स्थित ये अग्नि आदि चार तारे कभी अस्त नहीं होते॥ ३३-३४॥ इस प्रकार मैंने तुमसे पृथिवी, ग्रहगण, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष और नदियोंका तथा जो-जो उनमें बसते हैं उन सभीके स्वरूपका वर्णन कर दिया। अब इसे संक्षेपसे फिर सुनो॥ ३५-३६॥<br>हे विप्र! भगवान् विष्णुका जो मूर्तरूप जल है उससे पर्वत और समुद्रादिके सहित कमलके समान आकारवाली पृथिवी उत्पन्न हुई॥ ३७॥ हे विप्रवर्य! तारागण, त्रिभुवन, वन, पर्वत, दिशाएँ, नदियाँ और समुद्र सभी भगवान् विष्णु ही हैं तथा और भी जो कुछ है अथवा नहीं है वह सब भी एकमात्र वे ही हैं॥ ३८॥ क्योंकि भगवान् विष्णु ज्ञानस्वरूप हैं इसलिये वे सर्वमय हैं, परिच्छिन्न