भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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१५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२


पिबन्ति द्विकलाकारं शिष्टा तस्य कला तु या।
सुधामृतमयी पुण्या तामिन्दोः पितरो मुने॥ १२

निस्सृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः सुधामृतम्।
मासं तृप्तिमवाप्याग्र्यां पितरः सन्ति निर्वृताः।
सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ते त्रिधा॥ १३

एवं देवान् सिते पक्षे कृष्णपक्षे तथा पितॄन्।
वीरुधश्चामृतमयैः शीतैरप्परमाणुभिः॥ १४

वीरुधौषधिनिष्पत्त्या मनुष्यपशुकीटकान्।
आप्याययति शीतांशुः प्राकाश्याह्लादनेन तु॥ १५

वाय्वग्निद्रव्यसम्भूतो रथश्चन्द्रसुतस्य च।
पिशङ्गैस्तुरगैर्युक्तः सोऽष्टाभिर्वायुवेगिभिः॥ १६

सवरूथः सानुकर्षो युक्तो भूसम्भवैर्हयैः।
सोपासङ्गपताकस्तु शुक्रस्यापि रथो महान्॥ १७

अष्टाश्वः काञ्चनः श्रीमान्भौमस्यापि रथो महान्।
पद्मरागारुणैरश्वैः संयुक्तो वह्निसम्भवैः॥ १८

अष्टाभिः पाण्डुरैर्युक्तो वाजिभिः काञ्चनो रथः।
तस्मिंस्तिष्ठति वर्षान्ते राशौ राशौ बृहस्पतिः॥ १९

आकाशसम्भवैरश्वैः शबलैः स्यन्दनं युतम्।
तमारुह्य शनैर्याति मन्दगामी शनैश्चरः॥ २०

स्वर्भानोस्तुरगा ह्यष्टौ भृङ्गाभा धूसरं रथम्।
सकृद्युक्तास्तु मैत्रेय वहन्त्यविरतं सदा॥ २१

आदित्यान्निस्सृतो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु।
आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु॥ २२

तथा केतुरथस्याश्वा अप्यष्टौ वातरंहसः।
पलालधूमवर्णाभा लाक्षारसनिभारुणाः॥ २३

एते मया ग्रहाणां वै तवाख्याता रथा नव।
सर्वे ध्रुवे महाभाग प्रबद्धा वायुरश्मिभिः॥ २४


हे मुने! उस समय उस द्विकलाकार चन्द्रमाकी बची हुई अमृतमयी एक कलाका वे पितृगण पान करते हैं॥ १२॥ अमावास्याके दिन चन्द्र-रश्मिसे निकले हुए उस सुधामृतका पान करके अत्यन्त तृप्त हुए सौम्य, बर्हिषद् और अग्निष्वात्त तीन प्रकारके पितृगण एक मासपर्यन्त सन्तुष्ट रहते हैं॥ १३॥ इस प्रकार चन्द्रदेव शुक्लपक्षमें देवताओंकी और कृष्णपक्षमें पितृगणकी पुष्टि करते हैं तथा अमृतमय शीतल जलकणोंसे लता-वृक्षादिका और लता-ओषधि आदि उत्पन्न करके तथा अपनी चन्द्रिकाद्वारा आह्लादित करके वे मनुष्य, पशु एवं कीट-पतंगादि सभी प्राणियोंका पोषण करते हैं॥ १४-१५॥

चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ वायु और अग्निमय द्रव्यका बना हुआ है और उसमें वायुके समान वेगशाली आठ पिशंगवर्ण घोड़े जुते हैं॥ १६॥ वरूथ$^१$, अनुकर्ष$^२$, उपासंग$^३$ और पताका तथा पृथिवीसे उत्पन्न हुए घोड़ोंके सहित शुक्रका रथ भी अति महान् है॥ १७॥ तथा मंगलका अति शोभायमान सुवर्ण-निर्मित महान् रथ भी अग्निसे उत्पन्न हुए, पद्मराग-मणिके समान, अरुणवर्ण, आठ घोड़ोंसे युक्त है॥ १८॥ जो आठ पाण्डुरवर्ण घोड़ोंसे युक्त सुवर्णका रथ है उसमें वर्षके अन्तमें प्रत्येक राशिमें बृहस्पतिजी विराजमान होते हैं॥ १९॥ आकाशसे उत्पन्न हुए विचित्रवर्ण घोड़ोंसे युक्त रथमें आरूढ होकर मन्दगामी शनैश्चरजी धीरे-धीरे चलते हैं॥ २०॥

राहुका रथ धूसर (मटियाले) वर्णका है, उसमें भ्रमरके समान कृष्णवर्ण आठ घोड़े जुते हुए हैं। हे मैत्रेय! एक बार जोत दिये जानेपर वे घोड़े निरन्तर चलते रहते हैं॥ २१॥ चन्द्रपर्वों (पूर्णिमा)-पर यह राहु सूर्यसे निकलकर चन्द्रमाके पास आता है तथा सौरपर्वों (अमावास्या)-पर यह चन्द्रमासे निकलकर सूर्यके निकट जाता है॥ २२॥ इसी प्रकार केतुके रथके वायुवेगशाली आठ घोड़े भी पुआलके धुएँकी-सी आभावाले तथा लाखके समान लाल रंगके हैं॥ २३॥

हे महाभाग! मैंने तुमसे यह नवों ग्रहोंके रथोंका वर्णन किया; ये सभी वायुमयी डोरीसे ध्रुवके साथ बँधे हुए हैं॥ २४॥


$^१.$ रथकी रक्षाके लिये बना हुआ लोहेका आवरण। $^२.$ रथका नीचेका भाग। $^३.$ शस्त्र रखनेका स्थान।