विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
पिबन्ति द्विकलाकारं शिष्टा तस्य कला तु या।
सुधामृतमयी पुण्या तामिन्दोः पितरो मुने॥ १२
निस्सृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः सुधामृतम्।
मासं तृप्तिमवाप्याग्र्यां पितरः सन्ति निर्वृताः।
सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ते त्रिधा॥ १३
एवं देवान् सिते पक्षे कृष्णपक्षे तथा पितॄन्।
वीरुधश्चामृतमयैः शीतैरप्परमाणुभिः॥ १४
वीरुधौषधिनिष्पत्त्या मनुष्यपशुकीटकान्।
आप्याययति शीतांशुः प्राकाश्याह्लादनेन तु॥ १५
वाय्वग्निद्रव्यसम्भूतो रथश्चन्द्रसुतस्य च।
पिशङ्गैस्तुरगैर्युक्तः सोऽष्टाभिर्वायुवेगिभिः॥ १६
सवरूथः सानुकर्षो युक्तो भूसम्भवैर्हयैः।
सोपासङ्गपताकस्तु शुक्रस्यापि रथो महान्॥ १७
अष्टाश्वः काञ्चनः श्रीमान्भौमस्यापि रथो महान्।
पद्मरागारुणैरश्वैः संयुक्तो वह्निसम्भवैः॥ १८
अष्टाभिः पाण्डुरैर्युक्तो वाजिभिः काञ्चनो रथः।
तस्मिंस्तिष्ठति वर्षान्ते राशौ राशौ बृहस्पतिः॥ १९
आकाशसम्भवैरश्वैः शबलैः स्यन्दनं युतम्।
तमारुह्य शनैर्याति मन्दगामी शनैश्चरः॥ २०
स्वर्भानोस्तुरगा ह्यष्टौ भृङ्गाभा धूसरं रथम्।
सकृद्युक्तास्तु मैत्रेय वहन्त्यविरतं सदा॥ २१
आदित्यान्निस्सृतो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु।
आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु॥ २२
तथा केतुरथस्याश्वा अप्यष्टौ वातरंहसः।
पलालधूमवर्णाभा लाक्षारसनिभारुणाः॥ २३
एते मया ग्रहाणां वै तवाख्याता रथा नव।
सर्वे ध्रुवे महाभाग प्रबद्धा वायुरश्मिभिः॥ २४
हे मुने! उस समय उस द्विकलाकार चन्द्रमाकी बची हुई अमृतमयी एक कलाका वे पितृगण पान करते हैं॥ १२॥ अमावास्याके दिन चन्द्र-रश्मिसे निकले हुए उस सुधामृतका पान करके अत्यन्त तृप्त हुए सौम्य, बर्हिषद् और अग्निष्वात्त तीन प्रकारके पितृगण एक मासपर्यन्त सन्तुष्ट रहते हैं॥ १३॥ इस प्रकार चन्द्रदेव शुक्लपक्षमें देवताओंकी और कृष्णपक्षमें पितृगणकी पुष्टि करते हैं तथा अमृतमय शीतल जलकणोंसे लता-वृक्षादिका और लता-ओषधि आदि उत्पन्न करके तथा अपनी चन्द्रिकाद्वारा आह्लादित करके वे मनुष्य, पशु एवं कीट-पतंगादि सभी प्राणियोंका पोषण करते हैं॥ १४-१५॥
चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ वायु और अग्निमय द्रव्यका बना हुआ है और उसमें वायुके समान वेगशाली आठ पिशंगवर्ण घोड़े जुते हैं॥ १६॥ वरूथ$^१$, अनुकर्ष$^२$, उपासंग$^३$ और पताका तथा पृथिवीसे उत्पन्न हुए घोड़ोंके सहित शुक्रका रथ भी अति महान् है॥ १७॥ तथा मंगलका अति शोभायमान सुवर्ण-निर्मित महान् रथ भी अग्निसे उत्पन्न हुए, पद्मराग-मणिके समान, अरुणवर्ण, आठ घोड़ोंसे युक्त है॥ १८॥ जो आठ पाण्डुरवर्ण घोड़ोंसे युक्त सुवर्णका रथ है उसमें वर्षके अन्तमें प्रत्येक राशिमें बृहस्पतिजी विराजमान होते हैं॥ १९॥ आकाशसे उत्पन्न हुए विचित्रवर्ण घोड़ोंसे युक्त रथमें आरूढ होकर मन्दगामी शनैश्चरजी धीरे-धीरे चलते हैं॥ २०॥
राहुका रथ धूसर (मटियाले) वर्णका है, उसमें भ्रमरके समान कृष्णवर्ण आठ घोड़े जुते हुए हैं। हे मैत्रेय! एक बार जोत दिये जानेपर वे घोड़े निरन्तर चलते रहते हैं॥ २१॥ चन्द्रपर्वों (पूर्णिमा)-पर यह राहु सूर्यसे निकलकर चन्द्रमाके पास आता है तथा सौरपर्वों (अमावास्या)-पर यह चन्द्रमासे निकलकर सूर्यके निकट जाता है॥ २२॥ इसी प्रकार केतुके रथके वायुवेगशाली आठ घोड़े भी पुआलके धुएँकी-सी आभावाले तथा लाखके समान लाल रंगके हैं॥ २३॥
हे महाभाग! मैंने तुमसे यह नवों ग्रहोंके रथोंका वर्णन किया; ये सभी वायुमयी डोरीसे ध्रुवके साथ बँधे हुए हैं॥ २४॥
$^१.$ रथकी रक्षाके लिये बना हुआ लोहेका आवरण। $^२.$ रथका नीचेका भाग। $^३.$ शस्त्र रखनेका स्थान।
अ० १२ ] * द्वितीय अंश * १५१
| ग्रहर्क्षताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषतः ।<br>भ्रमन्त्युचितचारेण मैत्रेयानिलरश्मिभिः ॥ २५<br>यावन्त्यश्चैव तारास्तास्तावन्तो वातरश्मयः ।<br>सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम् ॥ २६<br>तैलपीडा यथा चक्रं भ्रमन्तो भ्रामयन्ति वै ।<br>तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातविद्धानि सर्वशः ॥ २७<br>अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु ।<br>यस्माज्ज्योतींषि वहति प्रवहस्तेन स स्मृतः ॥ २८<br>शिशुमारस्तु यः प्रोक्तः स ध्रुवो यत्र तिष्ठति ।<br>सन्निवेशं च तस्यापि शृणुष्व मुनिसत्तम ॥ २९<br>यदह्ना कुरुते पापं तं दृष्ट्वा निशि मुच्यते ।<br>यावन्त्यश्चैव तारास्ताः शिशुमाश्रिता दिवि ।<br>तावन्त्येव तु वर्षाणि जीवत्यभ्यधिकानि च ॥ ३०<br>उत्तानपादस्तस्याधो विज्ञेयो ह्युत्तरो हनुः ।<br>यज्ञोऽधरश्च विज्ञेयो धर्मो मूर्द्धानमाश्रितः ॥ ३१<br>हृदि नारायणश्चास्ते अश्विनौ पूर्वपादयोः ।<br>वरुणश्चार्यमा चैव पश्चिमे तस्य सक्थिनी ॥ ३२<br>शिश्नः संवत्सरस्तस्य मित्रोऽपानं समाश्रितः ॥ ३३<br>पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च कश्यपोऽथ ततो ध्रुवः ।<br>तारका शिशुमारस्य नास्तमेति चतुष्टयम् ॥ ३४<br>इत्येष सन्निवेशोऽयं पृथिव्या ज्योतिषsingleं तथा ।<br>द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां च कीर्तितः ॥ ३५<br>वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै ।<br>तेषां स्वरूपमाख्यातं सङ्क्षेपः श्रूयतां पुनः ॥ ३६<br>यदम्बु वैष्णवः कायस्ततो विप्र वसुन्धरा ।<br>पद्माकारा समुद्भूता पर्वताब्ध्यादिसंयुता ॥ ३७<br>ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु-<br>र्वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च ।<br>नद्यः समुद्राश्च स एव सर्वं<br>यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्य ॥ ३८<br>ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा-<br>वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः । | हे मैत्रेय! समस्त ग्रह, नक्षत्र और तारामण्डल वायुमयी रज्जुसे ध्रुवके साथ बँधे हुए यथोचित प्रकारसे घूमते रहते हैं॥ २५॥ जितने तारागण हैं उतनी ही वायुमयी डोरियाँ हैं। उनसे बँधकर वे सब स्वयं घूमते तथा ध्रुवको घुमाते रहते हैं॥ २६॥ जिस प्रकार तेली लोग स्वयं घूमते हुए कोल्हूको भी घुमाते रहते हैं उसी प्रकार समस्त ग्रहगण वायुसे बँधकर घूमते रहते हैं॥ २७॥ क्योंकि इस वायुचक्रसे प्रेरित होकर समस्त ग्रहगण अलातचक्र (बनैती)-के समान घूमा करते हैं, इसलिये यह 'प्रवह' कहलाता है॥ २८॥<br>जिस शिशुमारचक्रका पहले वर्णन कर चुके हैं, तथा जहाँ ध्रुव स्थित है, हे मुनिश्रेष्ठ! अब तुम उसकी स्थितिका वर्णन सुनो॥ २९॥ रात्रिके समय उनका दर्शन करनेसे मनुष्य दिनमें जो कुछ पापकर्म करता है उनसे मुक्त हो जाता है तथा आकाशमण्डलमें जितने तारे इसके आश्रित हैं उतने ही अधिक वर्ष वह जीवित रहता है॥ ३०॥ उत्तानपाद उसकी ऊपरकी हनु (ठोड़ी) है और यज्ञ नीचेकी तथा धर्मने उसके मस्तकपर अधिकार कर रखा है॥ ३१॥ उसके हृदय-देशमें नारायण हैं, दोनों चरणोंमें अश्विनीकुमार हैं तथा जंघाओंमें वरुण और अर्यमा हैं॥ ३२॥ संवत्सर उसका शिश्न है, मित्रने उसके अपान-देशको आश्रित कर रखा है, तथा अग्नि, महेन्द्र, कश्यप और ध्रुव पुच्छभागमें स्थित हैं। शिशुमारके पुच्छभागमें स्थित ये अग्नि आदि चार तारे कभी अस्त नहीं होते॥ ३३-३४॥ इस प्रकार मैंने तुमसे पृथिवी, ग्रहगण, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष और नदियोंका तथा जो-जो उनमें बसते हैं उन सभीके स्वरूपका वर्णन कर दिया। अब इसे संक्षेपसे फिर सुनो॥ ३५-३६॥<br>हे विप्र! भगवान् विष्णुका जो मूर्तरूप जल है उससे पर्वत और समुद्रादिके सहित कमलके समान आकारवाली पृथिवी उत्पन्न हुई॥ ३७॥ हे विप्रवर्य! तारागण, त्रिभुवन, वन, पर्वत, दिशाएँ, नदियाँ और समुद्र सभी भगवान् विष्णु ही हैं तथा और भी जो कुछ है अथवा नहीं है वह सब भी एकमात्र वे ही हैं॥ ३८॥ क्योंकि भगवान् विष्णु ज्ञानस्वरूप हैं इसलिये वे सर्वमय हैं, परिच्छिन्न |
| १५२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १२ |
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| ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा-<br>ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ ३९<br>यदा तु शुद्धं निजरूपि सर्वं<br>कर्मक्षये ज्ञानमपास्तदोषम्।<br>तदा हि सङ्कल्पतरोः फलानि<br>भवन्ति नो वस्तुषु वस्तु भेदाः ॥ ४० | पदार्थाकार नहीं हैं। अतः इन पर्वत, समुद्र और पृथिवी आदि भेदोंको तुम एकमात्र विज्ञानका ही विलास जानो ॥ ३९ ॥ जिस समय जीव आत्मज्ञानके द्वारा दोषरहित होकर सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय हो जानेसे अपने शुद्ध-स्वरूपमें स्थित हो जाता है उस समय आत्मवस्तुमें संकल्पवृक्षके फलरूप पदार्थ-भेदोंकी प्रतीति नहीं होती ॥ ४० ॥ |
| वस्त्वस्ति किं कुत्रचिदादिमध्य-<br>पर्यन्तहीनं सततैकरूपम्।<br>यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूयो<br>न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ ४१ | हे द्विज ! कोई भी घटादि वस्तु है ही कहाँ ? आदि, मध्य और अन्तसे रहित नित्य एकरूप चित् ही तो सर्वत्र व्याप्त है। जो वस्तु पुनः-पुनः बदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं रहती, उसमें वास्तविकता ही क्या है ? ॥ ४१ ॥ |
| मही घटत्वं घटतः कपालिका<br>कपालिका चूर्णरजस्ततोऽणुः।<br>जनैः स्वकर्मस्तिमित आत्मनिश्चयै-<br>रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु ॥ ४२ | देखो, मृत्तिका ही घटरूप हो जाती है और फिर वही घटसे कपाल, कपालसे चूर्णरज और रजसे अणुरूप हो जाती है। तो फिर बताओ अपने कर्मोंके वशीभूत हुए मनुष्य आत्मस्वरूपको भूलकर इसमें कौन-सी सत्य वस्तु देखते हैं ॥ ४२ ॥ |
| तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चित्-<br>क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्।<br>विज्ञानमेकं निजकर्मभेद-<br>विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ ४३ | अतः हे द्विज ! विज्ञानसे अतिरिक्त कभी कहीं कोई पदार्थादि नहीं हैं। अपने-अपने कर्मोंके भेदसे भिन्न-भिन्न चित्तोंद्वारा एक ही विज्ञान नाना प्रकारसे मान लिया गया है ॥ ४३ ॥ |
| ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोक-<br>मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् ।<br>एकं सदेकं परमः परेशः<br>स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ४४ | वह विज्ञान अति विशुद्ध, निर्मल, निःशोक और लोभादि समस्त दोषोंसे रहित है। वही एक सत्यस्वरूप परम परमेश्वर वासुदेव है, जिससे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥ ४४ ॥ |
| सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो<br>ज्ञानं यथा सत्यमसत्यमन्यत्।<br>एतत्तु यत्संव्यवहारभूतं<br>तत्रापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥ ४५ | इस प्रकार मैंने तुमसे यह परमार्थका वर्णन किया है, केवल एक ज्ञान ही सत्य है, उससे भिन्न और सब असत्य है। इसके अतिरिक्त जो केवल व्यवहारमात्र है उस त्रिभुवनके विषयमें भी मैं तुमसे कह चुका ॥ ४५ ॥ |
| यज्ञः पशुर्वह्निरशेषऋत्विक्<br>सोमः सुराः स्वर्गमयश्च कामः।<br>इत्यादिकर्माश्रितमार्गदृष्टं<br>भूरादिभोगाश्च फलानि तेषाम् ॥ ४६ | [ इस ज्ञान-मार्गके अतिरिक्त] मैंने कर्म-मार्ग-सम्बन्धी यज्ञ, पशु, वह्नि, समस्त ऋत्विक्, सोम, सुरगण तथा स्वर्गमय कामना आदिका भी दिग्दर्शन करा दिया। भूर्लोकादिके सम्पूर्ण भोग इन कर्म-कलापोंके ही फल हैं ॥ ४६ ॥ |
| यच्चैतद्भुवनगतं मया तवोक्तं<br>सर्वत्र व्रजति हि तत्र कर्मवश्यः।<br>ज्ञात्वैवं ध्रुवमचलं सदैकरूपं<br>तत्कुर्याद्विशति हि येन वासुदेवम् ॥ ४७ | यह जो मैंने तुमसे त्रिभुवनगत लोकोंका वर्णन किया है इन्हींमें जीव कर्मवश घूमा करता है, ऐसा जानकर इससे विरक्त हो मनुष्यको वही करना चाहिये जिससे ध्रुव, अचल एवं सदा एकरूप भगवान् वासुदेवमें लीन हो जाय ॥ ४७ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
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</div>अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५३
तेरहवाँ अध्याय
भरत-चरित्र
श्रीमैत्रेय उवाच
भगवन्सम्पग्याख्यातं यत्पृष्टोऽसि मया किल।
भूसमुद्रादिसरितां संस्थानं ग्रहसंस्थितिः॥ १
विश्ववाधारं यथा चैतत्तैलोक्यं समवस्थितम्।
परमार्थस्तु ते प्रोक्तो यथा ज्ञानं प्रधानतः॥ २
यत्त्वेतद्भगवान्ाह भरतस्य महीपतेः।
श्रोतुमिच्छामि चरितं तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ ३
भरतः स महीपालः शालग्रामेऽवसत्किल।
योगयुक्तः समाधाय वासुदेवे सदा मनः॥ ४
पुण्यदेशप्रभावेण ध्यायताश्च सदा हरिम्।
कथं तु नाऽभवन्मुक्तिर्यदभूत्स द्विजः पुनः॥ ५
विप्रत्वे च कृतं तेन यद्भूयः सुमहात्मना।
भरतेन मुनिश्रेष्ठ तत्सर्वं वक्तुमर्हसि॥ ६
श्रीपराशर उवाच
शालग्रामे महाभागो भगवन्न्यस्तमानसः।
स उवास चिरं कालं मैत्रेय पृथिवीपतिः॥ ७
अहिंसादिष्वशेषेषु गुणेषु गुणिनां वरः।
अवाप परमां काष्ठां मनसश्चापि संयमे॥ ८
यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।
कृष्ण विष्णो हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ ९
इति राजाह भरतो हरेर्नामानि केवलम्।
नान्यज्जगाद मैत्रेय किञ्चित्स्वप्नान्तरेऽपि च।
एतत्पदं तदर्थं च विना नान्यदचिन्तयत्॥ १०
समित्पुष्पकुशादानं चक्रे देवक्रियाकृते।
नान्यानि चक्रे कर्माणि निस्सङ्गो योगतापसः॥ ११
जगाम सोऽभिषेकार्थमेकदा तु महानदीम्।
सस्नौ तत्र तदा चक्रे स्नानस्यानन्तरक्रियाः॥ १२
अथाजगाम तत्तीरं जलं पातुं पिपासिता।
आसन्नप्रसवा ब्रह्मन्नेकैव हरिणी वनात्॥ १३
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे भगवन्! मैंने पृथिवी, समुद्र, नदियों और ग्रहगणकी स्थिति आदिके विषयमें जो कुछ पूछा था सो सब आपने वर्णन कर दिया॥ १॥ उसके साथ ही आपने यह भी बतला दिया कि किस प्रकार यह समस्त त्रिलोकी भगवान् विष्णुके ही आश्रित है और कैसे परमार्थस्वरूप ज्ञान ही सबमें प्रधान है॥ २॥ किन्तु भगवन्! आपने पहले जिसकी चर्चा की थी वह राजा भरतका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ, कृपा करके कहिये॥ ३॥ कहते हैं, वे राजा भरत निरन्तर योगयुक्त होकर भगवान् वासुदेवमें चित्त लगाये शालग्रामक्षेत्रमें रहा करते थे॥ ४॥ इस प्रकार पुण्यदेशके प्रभाव और हरिचिन्तनसे भी उनकी मुक्ति क्यों नहीं हुई, जिससे उन्हें फिर ब्राह्मणका जन्म लेना पड़ा॥ ५॥ हे मुनिश्रेष्ठ! ब्राह्मण होकर भी उन महात्मा भरतजीने फिर जो कुछ किया वह सब आप कृपा करके मुझसे कहिये॥ ६॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! वे महाभाग पृथिवीपति भरतजी भगवान्में चित्त लगाये चिरकालतक शालग्रामक्षेत्रमें रहे॥ ७॥ गुणवानोंमें श्रेष्ठ उन भरतजीने अहिंसा आदि सम्पूर्ण गुण और मनके संयममें परम उत्कर्ष लाभ किया॥ ८॥ ‘हे यज्ञेश! हे अच्युत! हे गोविन्द! हे माधव! हे अनन्त! हे केशव! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे हृषीकेश! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है’—इस प्रकार राजा भरत निरन्तर केवल भगवन्नामोंका ही उच्चारण किया करते थे। हे मैत्रेय! वे स्वप्नमें भी इस पदके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहते थे और न कभी इसके अर्थके अतिरिक्त और कुछ चिन्तन ही करते थे॥ ९-१०॥ वे निःसंग, योगयुक्त और तपस्वी राजा भगवान्की पूजाके लिये केवल समिध, पुष्प और कुशाका ही संचय करते थे। इसके अतिरिक्त वे और कोई कर्म नहीं करते थे॥ ११॥
एक दिन वे स्नानके लिये नदीपर गये और वहाँ स्नान करनेके अनन्तर उन्होंने स्नानोत्तर क्रियाएँ कीं॥ १२॥ हे ब्रह्मन्! इतनेहीमें उस नदी-तीरपर एक आसन्नप्रसवा (शीघ्र ही बच्चा जननेवाली) प्यासी हरिणी वनमेंसे जल पीनेके लिये आयी॥ १३॥
| १५४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ ] |
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ततः सम्भवत्तत्र पीतप्राये जले तथा।
सिंहस्य नादः सुमहान्सर्वप्राणिभयङ्करः ॥ १४
ततः सा सहसा त्रासादाप्लुता निम्नगातटम्।
अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात ह॥ १५
तमूह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिप्लुतम्।
जग्राह स नृपो गर्भात्पतितं मृगपोतकम् ॥ १६
गर्भप्रच्युतिदोषेण प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च।
मैत्रेय सापि हरिणी पपात च ममार च॥ १७
हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः।
मृगपोतं समादाय निजमाश्रममागतः ॥ १८
चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः।
पोषणं पुष्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने ॥ १९
चचाराश्रमपर्यन्ते तृणानि गहनेषु सः।
दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासादभ्यायायौ पुनः ॥ २०
प्रातर्गत्वातिदूरं च सायमायात्यथाश्रमम्।
पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमस्योटजाजिरे ॥ २१
तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि।
आसीच्चेतः समासक्तं न ययावन्यतो द्विज ॥ २२
विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबान्धवः।
ममत्वं स चकारोच्चैस्तस्मिन्हरिणबालके ॥ २३
किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः।
चिरायमाणे निष्क्रान्ते तस्यासीदिति मानसम् ॥ २४
एषा वसुमती तस्य खुराग्रक्षतकर्कुरा।
प्रीतये मम जातोऽसौ क्व ममैणकबालकः ॥ २५
विषाणाग्रेण मद्बाहुं कण्डूयनपरो हि सः।
क्षेमेणाभ्यागतोऽरण्यादपि मां सुखयिष्यति ॥ २६
एते लूनशिखास्तस्य दशनैरचिरोद्गतैः।
कुशाः काशा विराजन्ते बटवः सामगा इव ॥ २७
इत्थं चिरगते तस्मिन्स चक्रे मानसं मुनिः।
प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन्मृगे ॥ २८
हिन्दी अनुवाद
उस समय जब वह प्रायः जल पी चुकी थी, वहाँ सब प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली सिंहकी गम्भीर गर्जना सुनायी पड़ी ॥ १४ ॥ तब वह अत्यन्त भयभीत हो अकस्मात् उछलकर नदीके तटपर चढ़ गयी; अतः अत्यन्त उच्च स्थानपर चढ़नेके कारण उसका गर्भ नदीमें गिर गया ॥ १५ ॥
नदीकी तरंगमालाओंमें पड़कर बहते हुए उस गर्भ-भ्रष्ट मृगबालकको राजा भरतने पकड़ लिया ॥ १६ ॥ हे मैत्रेय ! गर्भपातके दोषसे तथा बहुत ऊँचे उछलनेके कारण वह हरिणी भी पछाड़ खाकर गिर पड़ी और मर गयी ॥ १७ ॥ उस हरिणीको मरी हुई देख तपस्वी भरत उसके बच्चेको अपने आश्रमपर ले आये ॥ १८ ॥
हे मुने! फिर राजा भरत उस मृगछौनेका नित्यप्रति पालन-पोषण करने लगे और वह भी उनसे पोषित होकर दिन-दिन बढ़ने लगा ॥ १९ ॥ वह बच्चा कभी तो उस आश्रमके आस-पास ही घास चरता रहता और कभी वनमें दूरतक जाकर फिर सिंहके भयसे लौट आता ॥ २० ॥ प्रातःकाल वह बहुत दूर भी चला जाता, तो भी सायंकालको फिर आश्रममें ही लौट आता और भरतजीके आश्रमकी पर्णशालाके आँगनमें पड़ रहता ॥ २१ ॥
हे द्विज! इस प्रकार कभी पास और कभी दूर रहनेवाले उस मृगमें ही राजाका चित्त सर्वदा आसक्त रहने लगा, वह अन्य विषयोंकी ओर जाता ही नहीं था ॥ २२ ॥ जिन्होंने सम्पूर्ण राज-पाट और अपने पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंको छोड़ दिया था वे ही भरतजी उस हरिणके बच्चेपर अत्यन्त ममता करने लगे ॥ २३ ॥ उसे बाहर जानेके अनन्तर यदि लौटनेमें देरी हो जाती तो वे मन-ही-मन सोचने लगते —'अहो! उस बच्चेको आज किसी भेड़ियेने तो नहीं खा लिया? किसी सिंहके पंजेमें तो आज वह नहीं पड़ गया? ॥ २४ ॥ देखो, उसके खुरोंके चिह्नोंसे यह पृथिवी कैसी चित्रित हो रही है? मेरी ही प्रसन्नताके लिये उत्पन्न हुआ वह मृगछौना न जाने आज कहाँ रह गया है? ॥ २५ ॥ क्या वह वनसे कुशलपूर्वक लौटकर अपने सींगोंसे मेरी भुजाको खुजलाकर मुझे आनन्दित करेगा? ॥ २६ ॥ देखो, उसके नवजात दाँतोंसे कटी हुई शिखावाले ये कुश और काश सामाध्यायी [शिखाहीन] ब्रह्मचारियोंके समान कैसे सुशोभित हो रहे हैं? ॥ २७ ॥ देरके गये हुए उस बच्चेके निमित्त भरत मुनि इसी प्रकार चिन्ता करने लगते थे और जब वह उनके निकट आ जाता तो उसके प्रेमसे उनका मुख खिल जाता था ॥ २८ ॥
अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५५
समाधिभङ्गस्तस्यासीत्तन्मयत्वादृतात्मनः।
सन्त्यक्तराज्यभोगर्द्धिश्वजनस्यापि भूपतेः॥ २९
इस प्रकार उसीमें आसक्तचित्त रहनेसे, राज्य, भोग, समृद्धि और स्वजनोंको त्याग देनेवाले भी राजा भरतकी समाधि भंग हो गयी॥ २९॥
चपलं चपले तस्मिन्दूरगं दूरगामिनि।
मृगपोतेऽभवच्चित्तं स्थैर्यवत्तस्य भूपतेः॥ ३०
उस राजाका स्थिरचित्त उस मृगके चंचल होनेपर चंचल हो जाता और दूर चले जानेपर दूर चला जाता॥ ३०॥
कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः।
पितेव सास्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः॥ ३१
कालान्तरमें राजा भरतने, उस मृगबालकद्वारा पुत्रके सजल नयनोंसे देखे जाते हुए पिताके समान अपने प्राणोंका त्याग किया॥ ३१॥
मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजन्प्राणानसावपि।
तन्मयत्वेन मैत्रेय नान्यत्किञ्चिदचिन्तयत्॥ ३२
हे मैत्रेय! राजा भी प्राण छोड़ते समय स्नेहवश उस मृगको ही देखता रहा तथा उसीमें तन्मय रहनेसे उसने और कुछ भी चिन्तन नहीं किया॥ ३२॥
ततश्च तत्कालकृतां भावनां प्राप्य तादृशीम्।
जम्बूमार्गे महारण्ये जातो जातिस्मरो मृगः॥ ३३
तदनन्तर, उस समयकी सुदृढ़ भावनाके कारण वह जम्बूमार्ग (कालंजरपर्वत)-के घोर वनमें अपने पूर्वजन्मकी स्मृतिसे युक्त एक मृग हुआ॥ ३३॥
जातिस्मरत्वादुद्विग्नः संसारस्य द्विजोत्तम।
विहाय मातरं भूयः शालग्राममुपाययौ॥ ३४
हे द्विजोत्तम! अपने पूर्वजन्मका स्मरण रहनेके कारण वह संसारसे उपरत हो गया और अपनी माताको छोड़कर फिर शालग्रामक्षेत्रमें आकर ही रहने लगा॥ ३४॥
शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णैः स कुर्वन्नात्मपोषणम्।
मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ॥ ३५
वहाँ सूखे घास-फूस और पत्तोंसे ही अपना शरीर-पोषण करता हुआ वह अपने मृगत्व-प्राप्तिके हेतुभूत कर्मोंका निराकरण करने लगा॥ ३५॥
तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः।
सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले॥ ३६
तदनन्तर, उस शरीरको छोड़कर उसने सदाचार-सम्पन्न योगियोंके पवित्र कुलमें ब्राह्मण-जन्म ग्रहण किया। उस देहमें भी उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा॥ ३६॥
सर्वविज्ञानसम्पन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित्।
अपश्यत्स च मैत्रेय आत्मानं प्रकृतेः परम्॥ ३७
हे मैत्रेय! वह सर्वविज्ञानसम्पन्न और समस्त शास्त्रोंके मर्मको जाननेवाला था तथा अपने आत्माको निरन्तर प्रकृतिसे परे देखता था॥ ३७॥
आत्मनोऽधिगतज्ञानो देवादीनि महामुने।
सर्वभूतान्यभेदेन स ददर्श तदात्मनः॥ ३८
हे महामुने! आत्मज्ञानसम्पन्न होनेके कारण वह देवता आदि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेसे अभिन्नरूपसे देखता था॥ ३८॥
न पपाठ गुरुप्रोक्तं कृतोपनयनः श्रुतिम्।
न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च॥ ३९
उपनयन-संस्कार हो जानेपर वह गुरुके पढ़ानेपर भी वेद-पाठ नहीं करता था तथा न किसी कर्मकी ओर ध्यान देता और न कोई अन्य शास्त्र ही पढ़ता था॥ ३९॥
उक्तोऽपि बहुशः किञ्चिज्जडवाक्यमभाषत।
तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यवाक्योक्तिसंश्रितम्॥ ४०
जब कोई उससे बहुत पूछताछ करता तो जडके समान कुछ असंस्कृत, असार एवं ग्रामीण वाक्योंसे मिले हुए वचन बोल देता॥ ४०॥
अपध्वस्तवपुः सोऽपि मलिनाम्बरधृग्द्विजः।
क्लिन्नदन्तान्तरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः॥ ४१
निरन्तर मैला-कुचैला शरीर, मलिन वस्त्र और अपरिमार्जित दन्तयुक्त रहनेके कारण वह ब्राह्मण सदा अपने नगरनिवासियोंसे अपमानित होता रहता था॥ ४१॥
सम्मानना परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः।
जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विन्दति॥ ४२
हे मैत्रेय! योगश्रीके लिये सबसे अधिक हानिकारक सम्मान ही है, जो योगी अन्य मनुष्योंसे अपमानित होता है वह शीघ्र ही सिद्धि लाभ कर लेता है॥ ४२॥
१५६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३
तस्माच्चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन्।
जना यथावमन्येरन्नाच्छेयुर्नैव सङ्गतिम्॥ ४३
हिरण्यगर्भवचनं विचिन्त्येत्थं महामतिः।
आत्मानं दर्शयामास जडोन्मत्ताकृतिं जने॥ ४४
भुङ्क्ते कुल्माषव्रीह्यादिशाकं वन्यं फलं कणान्।
यद्यदाप्नोति सुबहु तदत्ते कालसंयमम्॥ ४५
पितर्युपरते सोऽथ भ्रातृभ्रातृव्यबान्धवैः।
कारितः क्षेत्रकर्मादि कदन्नाहारपोषितः॥ ४६
सतूक्ष्पीनावयवो जडकारी च कर्मणि।
सर्वलोकोपकरणं बभूवाहारवेतनः॥ ४७
तं तादृशमसंस्कारं विप्राकृतिविचेष्टितम्।
क्षत्ता पृषतराजस्य काल्यै पशुमकल्पयत्॥ ४८
रात्रौ तं समलङ्कृत्य वैशसस्य विधानतः।
अधिष्ठितं महाकाली ज्ञात्वा योगेश्वरं तथा॥ ४९
ततः खड्गं समादाय निशितं निशि सा तथा।
क्षत्तारं क्रूरकर्माणमच्छिनत्कण्ठमूलतः।
स्वपार्षदयुता देवी पपौ रुधिरमुल्बणम्॥ ५०
ततस्सौवीरराजस्य प्रयातस्य महात्मनः।
विष्टिकर्तार्थ मन्येत विष्टियोग्योऽयमित्यपि॥ ५१
तं तादृशं महात्मानं भस्मच्छन्नमिवानलम्।
क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यममन्यत॥ ५२
स राजा शिबिकारूढो गन्तुं कृतमतिर्द्विज।
बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलर्षेर्वराश्रमम्॥ ५३
श्रेयः किमत्र संसारे दुःखप्राये नृणामिति।
प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम्॥ ५४
उवाह शिबिकां तस्य क्षत्तृवचनचोदितः।
नृणां विष्टिगृहीतानामन्येषां सोऽपि मध्यगः॥ ५५
गृहीतो विष्टिना विप्रः सर्वज्ञानैकभाजनः।
जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम्॥ ५६
ययौ जडमतिः सोऽथ युगमात्रावलोकनम्।
कुर्वन्मतिमतां श्रेष्ठस्तदन्ये त्वरितं ययुः॥ ५७
अतः योगीको, सन्मार्गको दूषित न करते हुए ऐसा आचरण करना चाहिये जिससे लोग अपमान करें और संगतिसे दूर रहें॥ ४३॥ हिरण्यगर्भके इस सारयुक्त वचनको स्मरण रखते हुए वे महामति विप्रवर अपने-आपको लोगोंमें जड और उन्मत्त-सा ही प्रकट करते थे॥ ४४॥ कुल्माष (जौ आदि) धान, शाक, जंगली फल अथवा कण आदि जो कुछ भक्ष्य मिल जाता उस थोड़े-सेको भी बहुत मानकर वे उसीको खा लेते और अपना कालक्षेप करते रहते॥ ४५॥
फिर पिताके शान्त हो जानेपर उनके भाई-बन्धु उनका सड़े-गले अन्नसे पोषण करते हुए उनसे खेती-बारीका कार्य कराने लगे॥ ४६॥ वे बैलके समान पुष्ट शरीरवाले और कर्ममें जडवत् निश्चेष्ट थे। अतः केवल आहारमात्रसे ही वे सब लोगोंके यन्त्र बन जाते थे। [अर्थात् सभी लोग उन्हें आहारमात्र देकर अपना-अपना काम निकाल लिया करते थे]॥ ४७॥
उन्हें इस प्रकार संस्कारशून्य और ब्राह्मणवेषके विरुद्ध आचरणवाला देख रात्रिके समय पृषतराजके सेवकोंने बलिकी विधिसे सुसज्जितकर कालीका बलिपशु बनाया। किन्तु इस प्रकार एक परम योगीश्वरको बलिके लिये उपस्थित देख महाकालीने एक तीक्ष्ण खड्ग ले उस क्रूरकर्मा राजसेवकका गला काट डाला और अपने पार्षदोंसहित उसका तीखा रुधिर पान किया॥ ४८–५०॥
तदनन्तर, एक दिन महात्मा सौवीरराज कहीं जा रहे थे। उस समय उनके बेगारियोंने समझा कि यह भी बेगारके ही योग्य है॥ ५१॥ राजाके सेवकोंने भी भस्ममें छिपे हुए अग्निके समान उन महात्माका रंग-ढंग देखकर उन्हें बेगारके योग्य समझा॥ ५२॥ हे द्विज! उन सौवीरराजने मोक्षधर्मके ज्ञाता महामुनि कपिलसे यह पूछनेके लिये कि 'इस दुःखमय संसारमें मनुष्योंका श्रेय किसमें है' शिबिकापर चढ़कर इक्षुमती नदीके किनारे उन महर्षिके आश्रमपर जानेका विचार किया॥ ५३–५४॥
तब राजसेवकके कहनेसे भरत मुनि भी उसकी पालकीको अन्य बेगारियोंके बीचमें लगकर वहन करने लगे॥ ५५॥ इस प्रकार बेगारमें पकड़े जाकर अपने पूर्वजन्मका स्मरण रखनेवाले, सम्पूर्ण विज्ञानके एकमात्र पात्र वे विप्रवर अपने पापमय प्रारब्धका क्षय करनेके लिये उस शिबिकाको उठाकर चलने लगे॥ ५६॥ वे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ द्विजवर तो चार हाथ भूमि देखते हुए मन्द-गतिसे चलते थे, किन्तु उनके अन्य साथी जल्दी-जल्दी चल रहे थे॥ ५७॥
अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५७
विलोक्य नृपतिःसोऽथ विषमां शिबिकागतिम्। किमेतदित्याह समं गम्यतां शिबिकावहाः ॥ ५८ पुनस्तथैव शिबिकां विलोक्य विषमां हि सः। नृपः किमेतदित्याह भवद्भिर्गम्यतेऽन्यथा ॥ ५९ भूपतेर्वदतस्तस्य श्रुत्वेत्थं बहुशो वचः। शिबिकावाहकाः प्रोचुरयं यातीत्यसत्वरम् ॥ ६० राजोवाच किं श्रान्तोऽस्यल्पमध्वानं त्वयोढा शिबिका मम। किमायासासहो न त्वं पीवानसि निरीक्ष्यसे ॥ ६१ ब्राह्मण उवाच नाहं पीवान्न चैवोढा शिबिका भवतो मया। न श्रान्तोऽस्मि न चायासो सोढव्योऽस्ति महीपते॥ ६२ राजोवाच प्रत्यक्षं दृश्यसे पीवानद्यापि शिबिका त्वयि। श्रमश्च भारोद्वहने भवत्येव हि देहिनाम् ॥ ६३ ब्राह्मण उवाच प्रत्यक्षं भवता भूप यद्द्दष्टं मम तद्वद। बलवानबलश्चेति वाच्यं पश्चाद्विशेषणम् ॥ ६४ त्वयोढा शिबिका चेति त्वय्यद्यापि च संस्थिता। मिथ्यैतदत्र तु भवाञ्छृणोतु वचनं मम ॥ ६५ भूमौ पादयुगं त्वास्ते जङ्घे पादद्वये स्थिते। ऊर्वोर्जङ्घाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ॥ ६६ वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कन्धौ चोदरसंस्थितौ। स्कन्धाश्रितेयं शिबिका मम भारोऽत्र किं कृतः ॥ ६७ शिबिकायां स्थितं चेदं वपुस्त्वदुपलक्षितम्। तत्र त्वमहमप्यत्र प्रोच्यते चेदमन्यथा ॥ ६८ अहं त्वं च तथान्ये च भूतैरुह्याम पार्थिव। गुणप्रवाहपतितो भूतवर्गोऽपि यात्ययम् ॥ ६९ कर्मवश्या गुणाश्चैते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते। अविद्यासञ्चितं कर्म तच्चाशेषेषु जन्तुषु ॥ ७० आत्मा शुद्धोऽक्षरः शान्तो निर्गुणः प्रकृतेः परः। प्रवृद्ध्यपचयौ नास्य एकस्याखिलजन्तुषु ॥ ७१
इस प्रकार शिबिकाकी विषम-गति देखकर राजाने कहा—"अरे शिबिकावाहको ! यह क्या करते हो ? समान गतिसे चलो"॥ ५८॥ किन्तु फिर भी उसकी गति उसी प्रकार विषम देखकर राजाने फिर कहा—"अरे क्या है? इस प्रकार असमान भावसे क्यों चलते हो ?"॥ ५९॥ राजाके बार-बार ऐसे वचन सुनकर वे शिबिकावाहक [भरतजीको दिखाकर] कहने लगे—"हममेंसे एक यही धीरे-धीरे चलता है"॥ ६०॥
राजाने कहा—अरे, तूने तो अभी मेरी शिबिकाको थोड़ी ही दूर वहन किया है; क्या इतनेहीमें थक गया ? तू वैसे तो बहुत मोटा-मुष्टण्डा दिखायी देता है, फिर क्या तुझसे इतना भी श्रम नहीं सहा जाता ? ॥ ६१॥
ब्राह्मण बोले—राजन् ! मैं न मोटा हूँ और न मैंने आपकी शिबिका ही उठा रखी है। मैं थका भी नहीं हूँ और न मुझे श्रम सहन करनेकी ही आवश्यकता है॥ ६२॥
राजा बोले—अरे, तू तो प्रत्यक्ष ही मोटा दिखायी दे रहा है, इस समय भी शिबिका तेरे कन्धेपर रखी हुई है और बोझा ढोनेसे देहधारियोंको श्रम होता ही है॥ ६३॥
ब्राह्मण बोले—राजन् ! तुम्हें प्रत्यक्ष क्या दिखायी दे रहा है, मुझे पहले यही बताओ। उसके 'बलवान्' अथवा 'अबलवान्' आदि विशेषणोंकी बात तो पीछे करना॥ ६४॥ 'तूने मेरी शिबिकाका वहन किया है, इस समय भी वह तेरे ही कन्धोंपर रखी हुई है'—तुम्हारा ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है, अच्छा मेरी बात सुनो—॥ ६५॥ देखो, पृथिवीपर तो मेरे पैर रखे हैं, पैरोंके ऊपर जंघाएँ हैं और जंघाओंके ऊपर दोनों ऊरु तथा ऊरुओंके ऊपर उदर है॥ ६६॥ उदरके ऊपर वक्षःस्थल, बाहु और कन्धोंकी स्थिति है तथा कन्धोंके ऊपर यह शिबिका रखी है। इसमें मेरे ऊपर कैसे बोझा रहा ? ॥ ६७॥ इस शिबिकामें जिसे तुम्हारा कहा जाता है वह शरीर रखा हुआ है। वास्तवमें तो 'तुम वहाँ (शिबिकामें) हो और मैं यहाँ (पृथिवीपर) हूँ'—ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है॥ ६८॥ हे राजन् ! मैं, तुम और अन्य भी समस्त जीव पंचभूतोंसे ही वहन किये जाते हैं। तथा यह भूतवर्ग भी गुणोंके प्रवाहमें पड़कर ही बहा जा रहा है॥ ६९॥ हे पृथिवीपते ! ये सत्त्वादि गुण भी कर्मोंके वशीभूत हैं और समस्त जीवोंमें कर्म अविद्याजन्य ही हैं॥ ७०॥ आत्मा तो शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृतिसे परे है तथा समस्त जीवोंमें वह एक ही ओत-प्रोत है। अतः उसके वृद्धि अथवा क्षय कभी नहीं होते॥ ७१॥
| १५८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १३ |
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यदा नोपचयस्तस्य न चैवापचयो नृप।<br>तदा पीवानसीतीत्थं कया युक्त्या त्वयेरितम् ॥ ७२ | हे नृप ! जब उसके उपचय (वृद्धि), अपचय (क्षय) ही नहीं होते तो तुमने यह बात किस युक्तिसे कही कि 'तू मोटा है?' ॥ ७२ ॥ यदि क्रमशः पृथिवी, पाद, जंघा, कटि, ऊरु और उदरपर स्थित कन्धोंपर रखी हुई यह शिबिका मेरे लिये भाररूप हो सकती है तो उसी प्रकार तुम्हारे लिये भी तो हो सकती है? [क्योंकि ये पृथिवी आदि तो जैसे तुमसे पृथक् हैं वैसे ही मुझ आत्मासे भी सर्वथा भिन्न हैं] ॥ ७३ ॥ तथा इस युक्तिसे तो अन्य समस्त जीवोंने भी केवल शिबिका ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, गृह और पृथिवी आदिका भार उठा रखा है ॥ ७४ ॥ हे राजन् ! जब प्रकृतिजन्य कारणोंसे पुरुष सर्वथा भिन्न है तो उसका परिश्रम भी मुझको कैसे हो सकता है? ॥ ७५ ॥ और जिस द्रव्यसे यह शिबिका बनी हुई है उसीसे यह आपका, मेरा अथवा और सबका शरीर भी बना है; जिसमें कि ममत्वका आरोप किया हुआ है ॥ ७६ ॥ भूपादजङ्घाकट्यूरूजठरादिषु संस्थिते।<br>शिबिकेयं यथा स्कन्धे तथा भारः समस्त्वया॥ ७३ | तथान्यैर्जन्तुभिर्भूप शिबिकोढा न केवलम्।<br>शैलद्रुमगृहोत्थोऽपि पृथिवी सम्भवोऽपि वा ॥ ७४ | यदा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः कारणैर्नृप।<br>सोढव्यस्तु तदायासः कथं वा नृपते मया ॥ ७५ | यद्द्रव्या शिबिका चेयं तद्द्रव्यो भूतसंग्रहः।<br>भवतो मेऽखिलस्यास्य ममत्वेनोपबृंहितः ॥ ७६ | श्रीपराशर उवाच<br>एवमुक्तवाभवन्मौनी स वहञ्छिबिकां द्विज।<br>सोऽपि राजावतीर्योर्व्यां तत्पादौ जगृहे त्वरन् ॥ ७७ | श्रीपराशरजी बोले— ऐसा कह वे द्विजवर शिबिकाको धारण किये हुए ही मौन हो गये; और राजाने भी तुरन्त पृथिवीपर उतरकर उनके चरण पकड़ लिये ॥ ७७ ॥ राजोवाच<br>भो भो विसृज्य शिबिकां प्रसादं कुरु मे द्विज।<br>कथ्यतां को भवानत्र जाल्मरूपधरः स्थितः ॥ ७८ | राजा बोला— अहो द्विजराज ! इस शिबिकाको छोड़कर आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये। प्रभो ! कृपया बताइये, इस जडवेषको धारण किये आप कौन हैं? ॥ ७८ ॥ हे विद्वन् ! आप कौन हैं? किस निमित्तसे यहाँ आपका आना हुआ? तथा आनेका क्या कारण है? यह सब आप मुझसे कहिये। मुझे आपके विषयमें सुननेकी बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ ७९ ॥ यो भवान्यन्निमित्तं वा यदागमनकारणम्।<br>तत्सर्वं कथ्यतां विद्वन्मह्यं शुश्रूषवे त्वया ॥ ७९ | ब्राह्मण उवाच<br>श्रूयतां सोऽहमित्येतद्वक्तुं भूप न शक्यते।<br>उपभोगनिमित्तं च सर्वत्रागमनक्रिया ॥ ८० | ब्राह्मण बोले— हे राजन् ! सुनो, मैं अमुक हूँ— यह बात कही नहीं जा सकती और तुमने जो मेरे यहाँ आनेका कारण पूछा सो आना-जाना आदि सभी क्रियाएँ कर्मफलके उपभोगके लिये ही हुआ करती हैं ॥ ८० ॥ सुख-दुःखका भोग ही देह आदिकी प्राप्ति करानेवाला है तथा धर्माधर्मजन्य सुख-दुःखोंको भोगनेके लिये ही जीव देहादि धारण करता है ॥ ८१ ॥ हे भूपाल ! समस्त जीवोंकी सम्पूर्ण अवस्थाओंके कारण ये धर्म और अधर्म ही हैं, फिर विशेषरूपसे मेरे आगमनका कारण तुम क्यों पूछते हो ? ॥ ८२ ॥ सुखदुःखोपभोगौ तु तौ देहाद्युपपादकौ।<br>धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जन्तुर्देहादिमृच्छति ॥ ८१ | सर्वस्यैव हि भूपाल जन्तोः सर्वत्र कारणम्।<br>धर्माधर्मौ यतः कस्मात्कारणं पृच्छ्यते त्वया ॥ ८२ | राजोवाच<br>धर्माधर्मौ न सन्देहस्सर्वकार्येषु कारणम्।<br>उपभोगनिमित्तं च देहाद्देहान्तरागमः ॥ ८३ | राजा बोला— अवश्य ही, समस्त कार्योंमें धर्म और अधर्म ही कारण हैं और कर्मफलके उपभोगके लिये ही एक देहसे दूसरे देहमें जाना होता है ॥ ८३ ॥ किन्तु आपने जो कहा कि 'मैं कौन हूँ— यह नहीं बताया जा सकता' इसी बातको सुननेकी मुझे इच्छा हो रही है ॥ ८४ ॥ यस्त्वेतद्भवता प्रोक्तं सोऽहमित्येतदात्मनः।<br>वक्तुं न शक्यते श्रोतुं तन्ममेच्छा प्रवर्तते ॥ ८४ |
अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५९
योऽस्ति सोऽहमिति ब्रह्मन्कथं वक्तुं न शक्यते।
आत्मन्येष न दोषाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ॥ ८५
ब्राह्मण उवाच
शब्दोऽहमिति दोषाय नात्मन्येष तथैव तत्।
अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा भ्रान्तिलक्षणः ॥ ८६
जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दन्तोष्ठौ तालुके नृप।
एते नाहं यतः सर्वे वाङ्निष्पादनहेतवः ॥ ८७
किं हेतुभिर्वदत्येषा वागेवाह्ममिति स्वयम्।
अतः पीवानसीत्येतद्वक्तुमित्थं न युज्यते ॥ ८८
पिण्डः पृथग्यतः पुंसः शिरःपाण्यादिलक्षणः।
ततोऽहमिति कुत्रैतां संज्ञां राजन्करोम्यहम् ॥ ८९
यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम।
तदैषोऽहमयं चान्यो वक्तुमेवमपीष्यते ॥ ९०
यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थितः।
तदा हि को भवान्सोऽहमित्येतद्विफलं वचः ॥ ९१
त्वं राजा शिबिका चेयमिमे वाहाः पुरःसराः।
अयं च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ॥ ९२
वृक्षाद्दारु ततश्चेयं शिबिका त्वदधिष्ठिता।
किं वृक्षसंज्ञा वास्याः स्याद्दारुसंज्ञाथ वा नृप ॥ ९३
वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति ते जनः।
न च दारुणि सर्वस्त्वां ब्रवीति शिबिकागतम् ॥ ९४
शिबिका दारुसङ्घातो रचनास्थितिसंस्थितः।
अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठ तद्भेद शिबिका त्वया ॥ ९५
एवं छत्रशलाकानां पृथग्भावे विमृश्यताम्।
क्व यातं छत्रमित्येष न्यायस्त्वयि तथा मयि ॥ ९६
पुमान्स्त्री गौरजो वाजी कुञ्जरो विहगस्तरुः।
देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु ॥ ९७
पुमान्न देवो न नरो न पशुर्न च पादपः।
शरीराकृतिभेदास्तु भूपैते कर्मयोनयः ॥ ९८
हे ब्रह्मन्! 'जो है [अर्थात् जो आत्मा कर्त्ता-भोक्त्तारूपसे प्रतीत होता हुआ सदा सत्तारूपसे वर्तमान है] वही मैं हूँ'—ऐसा क्यों नहीं कहा जा सकता? हे द्विज! यह 'अहम्' शब्द तो आत्मामें किसी प्रकारके दोषका कारण नहीं होता ॥ ८५ ॥
**ब्राह्मण बोले—**हे राजन्! तुमने जो कहा कि 'अहम्' शब्दसे आत्मामें कोई दोष नहीं आता सो ठीक ही है, किन्तु अनात्मामें ही आत्मत्वका ज्ञान करानेवाला भ्रान्तिमूलक 'अहम्' शब्द ही दोषका कारण है ॥ ८६ ॥ हे नृप! 'अहम्' शब्दका उच्चारण जिह्वा, दन्त, ओष्ठ और तालुसे ही होता है, किन्तु ये सब उस शब्दके उच्चारणके कारण हैं, 'अहम्' (मैं) नहीं ॥ ८७ ॥ तो क्या जिह्वादि कारणोंके द्वारा यह वाणी ही स्वयं अपनेको 'अहम्' कहती है? नहीं। अतः ऐसी स्थितिमें 'तू मोटा है' ऐसा कहना भी उचित नहीं है ॥ ८८ ॥ सिर तथा कर-चरणादिरूप यह शरीर भी आत्मासे पृथक् ही है। अतः हे राजन्! इस 'अहम्' शब्दका मैं कहाँ प्रयोग करूँ? ॥ ८९ ॥ तथा हे नृपश्रेष्ठ! यदि मुझसे भिन्न कोई और भी सजातीय आत्मा हो तो भी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है'—ऐसा कहा जा सकता था ॥ ९० ॥ किन्तु, जब समस्त शरीरोंमें एक ही आत्मा विराजमान है तब 'आप कौन हैं? मैं वह हूँ।' ये सब वाक्य निष्फल ही हैं ॥ ९१ ॥
'तू राजा है, यह शिबिका है, ये सामने शिबिकावाहक हैं तथा ये सब तेरी प्रजा हैं'—हे नृप! इनमेंसे कोई भी बात परमार्थतः सत्य नहीं है ॥ ९२ ॥ हे राजन्! वृक्षसे लकड़ी हुई और उससे तेरी यह शिबिका बनी; तो बता इसे लकड़ी कहा जाय या वृक्ष? ॥ ९३ ॥ किन्तु 'महाराज वृक्षपर बैठे हैं' ऐसा कोई नहीं कहता और न कोई तुझे लकड़ीपर बैठा हुआ ही बताता है! सब लोग शिबिकामें बैठा हुआ ही कहते हैं ॥ ९४ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! रचनाविशेषमें स्थित लकड़ियोंका समूह ही तो शिबिका है। यदि वह उससे कोई भिन्न वस्तु है तो काष्ठको अलग करके उसे ढूँढ़ो ॥ ९५ ॥ इसी प्रकार छत्रकी शलाकाओंको अलग रखकर छत्रका विचार करो कि वह कहाँ रहता है। यही न्याय तुममें और मुझमें लागू होता है [अर्थात् मेरे और तुम्हारे शरीर भी पंचभूतसे अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं हैं] ॥ ९६ ॥ पुरुष, स्त्री, गौ, अज (बकरा), अश्व, गज, पक्षी और वृक्ष आदि लौकिक संज्ञाओंका प्रयोग कर्महेतुक शरीरोंमें ही जानना चाहिये ॥ ९७ ॥ हे राजन्! पुरुष (जीव) तो न देवता है, न मनुष्य है, न पशु है और न वृक्ष है। ये सब तो कर्मजन्य शरीरोंकी आकृतियोंके ही भेद हैं ॥ ९८ ॥
१६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४
| वस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभटात्मकम्।<br>तथान्यच्च नृपेत्थं तन्न सत्सङ्कल्पनामयम्॥ ९९ | लोकमें धन, राजा, राजाके सैनिक तथा और भी जो-जो वस्तुएँ हैं, हे राजन्! वे परमार्थतः सत्य नहीं हैं, केवल कल्पनामय ही हैं॥ ९९॥ जिस वस्तुकी |
| यत्तु कालान्तरेणापि नान्यां संज्ञामुपैति वै।<br>परिणामादिसम्भूतां तद्वस्तु नृप तच्च किम्॥ १०० | परिणामादिके कारण होनेवाली कोई संज्ञा कालान्तरमें भी नहीं होती, वही परमार्थ-वस्तु है। हे राजन्! ऐसी वस्तु कौन-सी है? ॥ १००॥ [तू अपनेहीको देख] समस्त |
| त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः।<br>पत्न्याः पतिः पिता सूनोः किं त्वां भूप वदाम्यहम्॥ १०१ | प्रजाके लिये तू राजा है, पिताके लिये पुत्र है, शत्रुके लिये शत्रु है, पत्नीका पति है और पुत्रका पिता है। हे राजन्! बतला, मैं तुझे क्या कहूँ? ॥ १०१॥ हे महीपते! तू |
| त्वं किमेतच्छिरः किं नु ग्रीवा तव तथोदरम्।<br>किमु पादादिकं त्वं वा तवैतत्किं महीपते॥ १०२ | क्या यह सिर है, अथवा ग्रीवा है या पेट अथवा पादादिमेंसे कोई है? तथा ये सिर आदि भी 'तेरे' क्या हैं? ॥ १०२॥ |
| समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथग्भूय व्यवस्थितः।<br>कोऽहमित्यत्र निपुणो भूत्वा चिन्तय पार्थिव॥ १०३ | हे पृथिवीश्वर! तू इन समस्त अवयवोंसे पृथक् है; अतः सावधान होकर विचार कि 'मैं कौन हूँ' ॥ १०३॥ |
| एवं व्यवस्थिते तत्त्वे मयाहमिति भाषितुम्।<br>पृथक्करणनिष्पाद्यं शक्यते नृपते कथम्॥ १०४ | हे महाराज! आत्मतत्त्व इस प्रकार व्यवस्थित है। उसे सबसे पृथक् करके ही बताया जा सकता है। तो फिर, मैं उसे 'अहम्' शब्दसे कैसे बतला सकता हूँ? ॥ १०४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—उनके ये परमार्थमय वचन |
|---|---|
| निशम्य तस्येति वचः परमार्थसमन्वितम्।<br>प्रश्रयावनतो भूत्वा तमाह नृपतिर्द्विजम्॥ १ | सुनकर राजाने विनयावनत होकर उन विप्रवरसे कहा॥ १॥ |
| राजोवाच | राजा बोले—भगवन्! आपने जो परमार्थमय |
| भगवन्यत्तवया प्रोक्तं परमार्थमयं वचः।<br>श्रुते तस्मिन्भ्रमन्तीव मनसो मम वृत्तयः॥ २ | वचन कहे हैं उन्हें सुनकर मेरी मनोवृत्तियाँ भ्रान्त-सी हो गयी हैं॥ २॥ हे विप्र! आपने सम्पूर्ण जीवोंमें व्याप्त |
| एतद्विवेकविज्ञानं यदशेषेषु जन्तुषु।<br>भवता दर्शितं विप्र तत्परं प्रकृतेर्महत्॥ ३ | जिस असंग विज्ञानका दिग्दर्शन कराया है वह प्रकृतिसे परे ब्रह्म ही है [इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है] ॥ ३॥ |
| नाहं वहामि शिबिकां शिबिका न मयि स्थिता।<br>शरीरमन्यदस्मत्तो येनेयं शिबिका धृता॥ ४ | परंतु आपने जो कहा कि मैं शिबिकाको वहन नहीं कर रहा हूँ, शिबिका मेरे ऊपर नहीं है, जिसने इसे उठा रखा है वह शरीर मुझसे अत्यन्त पृथक् है। जीवोंकी |
| गुणप्रवृत्त्या भूतानां प्रवृत्तिः कर्मचोदिता।<br>प्रवर्तन्ते गुणा ह्येते किं ममेति त्वयोदितम्॥ ५ | प्रवृत्ति गुणों (सत्त्व, रज, तम)-की प्रेरणासे होती है और गुण कर्मोंसे प्रेरित होकर प्रवृत्त होते हैं—इसमें मेरा कर्तृत्व कैसे माना जा सकता है? ॥ ४-५॥ हे परमार्थज्ञ! |
| एतस्मिन्परमार्थज्ञ मम श्रोत्रपथं गते।<br>मनो विह्वलतामेति परमार्थार्थितां गतम्॥ ६ | यह बात मेरे कानोंमें पड़ते ही मेरा मन परमार्थका जिज्ञासु होकर बड़ा उतावला हो रहा है॥ ६॥ |
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अ० १४ ] * द्वितीय अंश * १६१
पूर्वमेव महाभागं कपिलर्षिमहं द्विज।
प्रष्टुमभ्युद्यतो गत्वा श्रेयः किं त्वत्र शंस मे॥ ७
तदन्तरे च भवता यदेतद्वाक्यमीरितम्।
तेनैव परमार्थार्थं त्वयि चेतः प्रधावति॥ ८
कपिलर्षिर्भगवतः सर्वभूतस्य वै द्विज।
विष्णोरंशो जगन्मोहनाशायोर्वीमुपागतः॥ ९
स एव भगवान्नू नमस्माकं हितकाम्यया।
प्रत्यक्षतामत्र गतो यथैतद्भवतोच्यते॥ १०
तन्मह्यं प्रणताय त्वं यच्छ्रेयः परमं द्विज।
तद्वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर्भवान्॥ ११
ब्राह्मण उवाच
भूप पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थं नु पृच्छसि।
श्रेयांस्यपरमार्थानि अशेषानि च भूपते॥ १२
देवताराधनं कृत्वा धनसम्पदमिच्छति।
पुत्रानिच्छति राज्यं च श्रेयस्तस्यैव तन्नृप॥ १३
कर्म यज्ञात्मकं श्रेयः फलं स्वर्गाप्तिलक्षणम्।
श्रेयः प्रधानं च फले तदेवानभिसंहिते॥ १४
आत्मा ध्येयः सदा भूप योगयुक्तैस्तथा परम्।
श्रेयस्तस्यैव संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः॥ १५
श्रेयांस्येवमनेकानि शतशोऽथ सहस्रशः।
सन्त्यत्र परमार्थस्तु न त्वेते श्रूयतां च मे॥ १६
धर्माय त्यज्यते किन्नु परमार्थो धनं यदि।
व्ययश्च क्रियते कस्मात्कामप्राप्त्युपलक्षणः॥ १७
पुत्रश्चेत्परमार्थः स्यात्सोऽप्यन्यस्य नरेश्वर।
परमार्थभूतः सोऽन्यस्य परमार्थो हि तत्पिता॥ १८
एवं न परमार्थोऽस्ति जगत्यस्मिञ्चराचरे।
परमार्थो हि कार्याणि कारणानामशेषतः॥ १९
राज्यादिप्राप्तिरत्रोक्ता परमार्थतया यदि।
परमार्था भवन्त्यत्र न भवन्ति च वै ततः॥ २०
ऋग्यजुःसामनिष्पाद्यं यज्ञकर्म मतं तव।
परमार्थभूतं तत्रापि श्रूयतां गदतो मम॥ २१
हे द्विज! मैं तो पहले ही महाभाग कपिल मुनिसे यह पूछनेके लिये कि बताइये 'संसारमें मनुष्योंका श्रेय किसमें है' उनके पास जानेको तत्पर हुआ हूँ॥ ७॥ किन्तु बीचहीमें, आपने जो वाक्य कहे हैं उन्हें सुनकर मेरा चित्त परमार्थ-श्रवण करनेके लिये आपकी ओर झुक गया है॥ ८॥ हे द्विज! ये कपिल मुनि सर्वभूत भगवान् विष्णुके ही अंश हैं। इन्होंने संसारका मोह दूर करनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है॥ ९॥ किन्तु आप जो इस प्रकार भाषण कर रहे हैं उससे मुझे निश्चय होता है कि वे ही भगवान् कपिलदेव मेरे हितकी कामनासे यहाँ आपके रूपमें प्रकट हो गये हैं॥ १०॥ अतः हे द्विज! हमारा जो परम श्रेय हो वह आप मुझ विनीतसे कहिये। हे प्रभो! आप सम्पूर्ण विज्ञान-तरंगोंके मानो समुद्र ही हैं॥ ११॥
ब्राह्मण बोले—हे राजन्! तुम श्रेय पूछना चाहते हो या परमार्थ? क्योंकि हे भूपते! श्रेय तो सब अपारमार्थिक ही हैं॥ १२॥ हे नृप! जो पुरुष देवताओंकी आराधना करके धन, सम्पत्ति, पुत्र और राज्यादिकी इच्छा करता है उसके लिये तो वे ही परम श्रेय हैं॥ १३॥ जिसका फल स्वर्गलोककी प्राप्ति है वह यज्ञात्मक कर्म भी श्रेय है; किन्तु प्रधान श्रेय तो उसके फलकी इच्छा न करनेमें ही है॥ १४॥ अतः हे राजन्! योगयुक्त पुरुषोंको प्रकृति आदिसे अतीत उस आत्माका ही ध्यान करना चाहिये, क्योंकि उस परमात्माका संयोगरूप श्रेय ही वास्तविक श्रेय है॥ १५॥
इस प्रकार श्रेय तो सैकड़ों-हजारों प्रकारके अनेकों हैं, किंतु ये सब परमार्थ नहीं हैं। अब जो परमार्थ है सो सुनो—॥ १६ यदि धन ही परमार्थ है तो धर्मके लिये उसका त्याग क्यों किया जाता है? तथा इच्छित भोगोंकी प्राप्तिके लिये उसका व्यय क्यों किया जाता है? [अतः वह परमार्थ नहीं है] ॥ १७॥ हे नरेश्वर! यदि पुत्रको परमार्थ कहा जाय तो वह तो अन्य (अपने पिता)-का परमार्थभूत है, तथा उसका पिता भी दूसरेका पुत्र होनेके कारण उस (अपने पिता)-का परमार्थ होगा॥ १८॥ अतः इस चराचर जगत्में पिताका कार्यरूप पुत्र भी परमार्थ नहीं है। क्योंकि फिर तो सभी कारणोंके कार्य परमार्थ हो जायँगे॥ १९॥ यदि संसारमें राज्यादिकी प्राप्तिको परमार्थ कहा जाय तो ये कभी रहते हैं और कभी नहीं रहते। अतः परमार्थ भी आगमापायी हो जायगा। [इसलिये राज्यादि भी परमार्थ नहीं हो सकते] ॥ २०॥ यदि ऋक्, यजुः और सामरूप वेदत्रयीसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्मको परमार्थ मानते हो तो उसके विषयमें मेरा ऐसा विचार है—॥ २१॥
१६२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४
यत्तु निष्पाद्यते कार्यं मृदा कारणभूतया। तत्कारणानुगमनाज्ज्ञायते नृप मृण्मयम् ॥ २२
एवं विनाशभिर्द्रव्यैः समिदाज्यकुशादिभिः। निष्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनाशिनी ॥ २३
अनाशी परमार्थश्च प्राज्ञैरभ्युपगम्यते। तत्तु नाशि न सन्देहो नाशिद्रव्योपपादितम् ॥ २४
तदेवाफलदं कर्म परमार्थो मतस्तव। मुक्तिसाधनभूतत्वात्परमार्थो न साधनम् ॥ २५
ध्यानं चैवात्मनो भूप परमार्थार्थशब्दितम्। भेदकारि परेभ्यस्तु परमार्थो न भेदवान् ॥ २६
परमात्मात्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते। मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः ॥ २७
तस्माच्छ्रेयांस्यशेषाणि नृपैतानि न संशयः। परमार्थस्तु भूपाल संक्षेपाच्छ्रूयतां मम ॥ २८
एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतेः परः। जन्मवृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतोऽव्ययः ॥ २९
परज्ञानमयोऽसद्भिर्नामजात्यादिभिर्विभुः। न योगवान्न युक्तोऽभून्नैव पार्थिव योक्ष्यते ॥ ३०
तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येक मयं हि यत्। विज्ञानं परमार्थोऽसौ द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥ ३१
वेणुरन्ध्रप्रभेदेन भेदः षड्जादिसंज्ञितः। अभेदव्यापिनो वायोस्तथास्य परमात्मनः ॥ ३२
एकस्वरूपभेदश्च बाह्यकर्मप्रवृत्तिजः। देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्येवावरणे हि सः ॥ ३३
हे नृप! जो वस्तु कारणरूपा मृत्तिकाका कार्य होती है वह कारणकी अनुगामिनी होनेसे मृत्तिकारूप ही जानी जाती है ॥ २२ ॥ अतः जो क्रिया समिध, घृत और कुशा आदि नाशवान् द्रव्योंसे सम्पन्न होती है वह भी नाशवान् ही होगी ॥ २३ ॥ किन्तु परमार्थको तो प्राज्ञ पुरुष अविनाशी बतलाते हैं और नाशवान् द्रव्योंसे निष्पन्न होनेके कारण कर्म [ अथवा उनसे निष्पन्न होनेवाले स्वर्गादि] नाशवान् ही हैं—इसमें सन्देह नहीं ॥ २४ ॥ यदि फलाशासे रहित निष्कामकर्मको परमार्थ मानते हो तो वह तो मुक्तिरूप फलका साधन होनेसे साधन ही है, परमार्थ नहीं ॥ २५॥ यदि देहादिसे आत्माका पार्थक्य विचारकर उसके ध्यान करनेको परमार्थ कहा जाय तो वह तो अनात्मासे आत्माका भेद करनेवाला है और परमार्थमें भेद है नहीं [अतः वह भी परमार्थ नहीं हो सकता] ॥ २६ ॥ यदि परमात्मा और जीवात्माके संयोगको परमार्थ कहें तो ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि अन्य द्रव्यसे अन्य द्रव्यकी एकता कभी नहीं हो सकती* ॥ २७ ॥
अतः हे राजन्! निःसन्देह ये सब श्रेय ही हैं, [परमार्थ नहीं] अब जो परमार्थ है वह मैं संक्षेपसे सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ २८ ॥ आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृतिसे परे है; वह जन्म-वृद्धि आदिसे रहित, सर्वव्यापी और अव्यय है ॥ २९ ॥ हे राजन्! वह परम ज्ञानमय है, असत् नाम और जाति आदिसे उस सर्वव्यापकका संयोग न कभी हुआ, न है और न होगा ॥ ३० ॥ 'वह, अपने और अन्य प्राणियोंके शरीरमें विद्यमान रहते हुए भी, एक ही है'—इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान है वही परमार्थ है; द्वैत भावनावाले पुरुष तो अपरमार्थदर्शी हैं ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार अभिन्न भावसे व्याप्त एक ही वायुके बाँसुरीके छिद्रोंके भेदसे षड्ज आदि भेद होते हैं उसी प्रकार [शरीरादि उपाधियोंके कारण] एक ही परमात्माके [देवता-मनुष्यादि] अनेक भेद प्रतीत होते हैं ॥ ३२ ॥ एकरूप आत्माके जो नाना भेद हैं वे बाह्य देहादिकी कर्मप्रवृत्तिके कारण ही हुए हैं। देवादि शरीरोंके भेदका निराकरण हो जानेपर वह नहीं रहता। उसकी स्थिति तो अविद्याके आवरणतक ही है ॥ ३३ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
* अर्थात् यदि आत्मा परमात्मासे भिन्न है तब तो गौ और अश्वके समान उनकी एकता हो नहीं सकती और यदि बिम्ब-प्रतिबिम्बकी भाँति अभिन्न है तो उपाधिके निराकरणके अतिरिक्त और उनका संयोग ही क्या होगा ?
अ० १५ ] * द्वितीय अंश * [ १६३
पन्द्रहवाँ अध्याय
ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ते मौनिनं भूयश्चिन्तयानं महीपतिम्।
प्रत्युवाचाथ विप्रोऽसावद्वैतान्तर्गतां कथाम्॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! ऐसा कहनेपर, राजाको मौन होकर मन-ही-मन सोच-विचार करते देख वे विप्रवर यह अद्वैत-सम्बन्धिनी कथा सुनाने लगे॥ १॥
ब्राह्मण उवाच
श्रूयतां नृपशार्दूल यद्गीतमृभुणा पुरा।
अवबोधं जनयता निदाघस्य महात्मनः॥ २
ऋभुर्नामाऽभवत्पुत्रो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
विज्ञाततत्त्वसद्भावो निसर्गादेव भूपते॥ ३
तस्य शिष्यो निदाघोऽभूत्पुलस्त्यतनयः पुरा।
प्रादादशेषविज्ञानं स तस्मै परया मुदा॥ ४
अवाप्तज्ञानतन्त्रस्य न तस्याद्वैतवासना।
स ऋभुस्तर्कयामास निदाघस्य नरेश्वर॥ ५
देविकायास्तटे वीरनगरं नाम वै पुरम्।
समृद्धमभिरम्यं च पुलस्त्येन निवेशितम्॥ ६
रम्योपवनपर्यन्ते स तस्मिन्पार्थिवोत्तम।
निदाघो नाम योगज्ञ ऋभुशिष्योऽवसत्पुरा॥ ७
दिव्ये वर्षसहस्रे तु समतीतेऽस्य तत्पुरम्।
जगाम स ऋभुः शिष्यं निदाघमवलोककः॥ ८
स तस्य वैश्वदेवान्ते द्वारालोकनगोचरे।
स्थितस्तेन गृहीतार्यो निजवेश्म प्रवेशितः॥ ९
प्रक्षालिताङ्घ्रिपाणिं च कृतासनपरिग्रहम्।
उवाच स द्विजश्रेष्ठो भुज्यतामिति सादरम्॥ १०
ब्राह्मण बोले— हे राजशार्दूल! पूर्वकालमें महर्षि ऋभुने महात्मा निदाघको उपदेश करते हुए जो कुछ कहा था वह सुनो॥ २॥ हे भूपते! परमेष्ठी श्रीब्रह्माजीका ऋभु नामक एक पुत्र था, वह स्वभावसे ही परमार्थतत्त्वको जाननेवाला था॥ ३॥ पूर्वकालमें महर्षि पुलस्त्यका पुत्र निदाघ उन ऋभुका शिष्य था। उसे उन्होंने अति प्रसन्न होकर सम्पूर्ण तत्त्वज्ञानका उपदेश दिया था॥ ४॥ हे नरेश्वर! ऋभुने देखा कि सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान होते हुए भी निदाघकी अद्वैतमें निष्ठा नहीं है॥ ५॥
उस समय देविकानदीके तीरपर पुलस्त्यजीका बसाया हुआ वीरनगर नामक एक अति रमणीक और समृद्धि-सम्पन्न नगर था॥ ६॥ हे पार्थिवोत्तम! रम्य उपवनोंसे सुशोभित उस पुरमें पूर्वकालमें ऋभुका शिष्य योगवेत्ता निदाघ रहता था॥ ७॥ महर्षि ऋभु अपने शिष्य निदाघको देखनेके लिये एक सहस्र दिव्यवर्ष बीतनेपर उस नगरमें गये॥ ८॥ जिस समय निदाघ बलिवैश्वदेवके अनन्तर अपने द्वारपर [अतिथियोंकी] प्रतीक्षा कर रहा था, वे उसके दृष्टिगोचर हुए और वह उन्हें द्वारपर पहुँच अर्घ्यदानपूर्वक अपने घरमें ले गया॥ ९॥ उस द्विजश्रेष्ठने उनके हाथ-पैर धुलाये और फिर आसनपर बिठाकर आदरपूर्वक कहा—'भोजन कीजिये'॥ १०॥
ऋभुरुवाच
भो विप्रवर्य भोक्तव्यं यदन्नं भवतो गृहे।
तत्कथ्यतां कदन्नेषु न प्रीतिः सततं मम॥ ११
ऋभु बोले— हे विप्रवर! आपके यहाँ क्या-क्या अन्न भोजन करना होगा—यह बताइये, क्योंकि कुत्सित अन्नमें मेरी रुचि नहीं है॥ ११॥
निदाघ उवाच
सक्तुयावकवाट्यानामपूपानां च मे गृहे।
यद्रोचते द्विजश्रेष्ठ तत्तवं भुङ्क्ष्व यथेच्छया॥ १२
निदाघने कहा— हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे घरमें सत्तू, जौकी लप्सी, कन्द-मूल-फलादि तथा पूए बने हैं। आपको इनमेंसे जो कुछ रुचे वही भोजन कीजिये॥ १२॥
ऋभुरुवाच
कदन्नानि द्विजैतानि मृष्टमन्नं प्रयच्छ मे।
संयावपायसादीनि द्रप्सफाणितवन्ति च॥ १३
ऋभु बोले— हे द्विज! ये तो सभी कुत्सित अन्न हैं, मुझे तो तुम हलवा, खीर तथा मट्ठा और खाँड़से बने स्वादिष्ट भोजन कराओ॥ १३॥
१६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५
| निदाघ उवाच<br>हे हे शालिनि मद्गेहे यत्किञ्चिदतिशोभनम्।<br>भक्ष्योपसाधनं मृष्टं तेनास्यान्नं प्रसाधय॥ १४ | तब निदाघने [ अपनी स्त्रीसे ] कहा—हे गृहदेवि!<br>हमारे घरमें जो अच्छी-से-अच्छी वस्तु हो उसीसे इनके<br>लिये अति स्वादिष्ट भोजन बनाओ॥ १४॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br>इत्युक्ता तेन सा पत्नी मृष्टमन्नं द्विजस्य यत्।<br>प्रसाधितवती तद्वै भर्तुर्वचनगौरवात्॥ १५ | ब्राह्मण (जडभरत)-ने कहा—उसके ऐसा<br>कहनेपर उसकी पत्नीने अपने पतिकी आज्ञासे उन विप्रवरके<br>लिये अति स्वादिष्ट अन्न तैयार किया॥ १५॥ |
| तं भुक्तवन्तमिच्छातो मृष्टमन्नं महामुनिम्।<br>निदाघः प्राह भूपाल प्रश्रयावनतः स्थितः॥ १६ | हे राजन्! ऋभुके यथेच्छ भोजन कर चुकनेपर<br>निदाघने अति विनीत होकर उन महामुनिसे कहा॥ १६॥ |
| निदाघ उवाच<br>अपि ते परमा तृप्तिरुत्पन्ना तुष्टिरेव च।<br>अपि ते मानसं स्वस्थमाहारेण कृतं द्विज॥ १७ | निदाघ बोले—हे द्विज! कहिये भोजन करके<br>आपका चित्त स्वस्थ हुआ न? आप पूर्णतया तृप्त और<br>सन्तुष्ट हो गये न?॥ १७॥ हे विप्रवर! कहिये आप |
| क्व निवासो भवान्विप्र क्व च गन्तुं समुद्यतः।<br>आगम्यते च भवता यतस्तच्च द्विजोच्यताम्॥ १८ | कहाँ रहनेवाले हैं? कहाँ जानेकी तैयारीमें हैं? और कहाँसे<br>पधारे हैं?॥ १८॥ |
| ऋभुरुवाच<br>क्षुद्यस्य तस्य भुक्तेऽन्ने तृप्तिर्ब्राह्मण जायते।<br>न मे क्षुन्नाभवत्तृप्तिः कस्मान्मां परिपृच्छसि॥ १९ | ऋभु बोले—हे ब्राह्मण! जिसको क्षुधा लगती है<br>उसीकी तृप्ति भी हुआ करती है। मुझको तो कभी क्षुधा<br>ही नहीं लगी, फिर तृप्तिके विषयमें तुम क्या पूछते<br>हो?॥ १९॥ जठराग्निके द्वारा पार्थिव (ठोस) धातुओंके |
| वह्निना पार्थिवे धातौ क्षपिते क्षुत्समुद्भवः।<br>भवत्यम्भसि च क्षीणे नृणां तृड्पि जायते॥ २० | क्षीण हो जानेसे मनुष्यको क्षुधाकी प्रतीति होती है और<br>जलके क्षीण होनेसे तृषाका अनुभव होता है॥ २०॥ हे |
| क्षुत्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज।<br>ततः क्षुत्सम्भवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा॥ २१ | द्विज! ये क्षुधा और तृषा तो देहके ही धर्म हैं, मेरे नहीं;<br>अतः कभी क्षुधित न होनेके कारण मैं तो सर्वदा तृप्त ही<br>हूँ॥ २१॥ स्वस्थता और तुष्टि भी मनहीमें होते हैं, अतः |
| मनसः स्वस्थता तुष्टिश्चित्तधर्माविमौ द्विज।<br>चेतसो यस्य तत्पृच्छ पुमानेभिर्न युज्यते॥ २२ | ये मनहीके धर्म हैं; पुरुष (आत्मा)-से इनका कोई<br>सम्बन्ध नहीं है। इसलिये हे द्विज! ये जिसके धर्म हैं<br>उसीसे इनके विषयमें पूछो॥ २२॥ और तुमने जो पूछा |
| क्व निवासस्तवेत्युक्तं क्व गन्तासि च यत्त्वया।<br>कुतश्चागम्यते तत्र त्रितयेऽपि निबोध मे॥ २३ | कि 'आप कहाँ रहनेवाले हैं? कहाँ जा रहे हैं? तथा<br>कहाँसे आये हैं' सो इन तीनोंके विषयमें मेरा मत<br>सुनो—॥ २३॥ आत्मा सर्वगत है, क्योंकि यह आकाशके |
| पुमान्सर्वगतो व्यापी आकाशवदयं यतः।<br>कुतः कुत्र क्व गन्तासीत्येतदप्यर्थवत्कथम्॥ २४ | समान व्यापक है; अतः 'कहाँसे आये हो, कहाँ रहते हो<br>और कहाँ जाओगे?' यह कथन भी कैसे सार्थक हो<br>सकता है?॥ २४॥ मैं तो न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ<br>और न किसी एक स्थानपर रहता हूँ। [तू, मैं और |
| सोऽहं गन्ता न चागन्ता नैकदेशनिकेतनः।<br>त्वं चान्ये च न च त्वं च नान्ये नैवाहमप्यहम्॥ २५ | अन्य पुरुष भी देहादिके कारण जैसे पृथक्-पृथक्<br>दिखायी देते हैं वास्तवमें वैसे नहीं हैं] वस्तुतः तू तू नहीं<br>है, अन्य अन्य नहीं है और मैं मैं नहीं हूँ॥ २५॥ |
| मृष्टं न मृष्टमप्येषा जिज्ञासा मे कृता तव।<br>किं वक्ष्यसीति तत्रापि श्रूयतां द्विजसत्तम॥ २६ | वास्तवमें मधुर मधुर है भी नहीं; देखो, मैंने<br>तुमसे जो मधुर अन्नकी याचना की थी उससे भी मैं<br>यही देखना चाहता था कि 'तुम क्या कहते हो'। हे<br>द्विजश्रेष्ठ! भोजन करनेवालेके लिये स्वादु और अस्वादु |
| किमस्वाद्वथ वा मृष्टं भुञ्जतोऽस्ति द्विजोत्तम।<br>मृष्टमेव यदामृष्टं तदेवोद्वेगकारकम्॥ २७ | भी क्या है? क्योंकि स्वादिष्ट पदार्थ ही जब समयान्तरसे<br>अस्वादु हो जाता है तो वही उद्वेगजनक होने लगता<br>है॥ २६-२७॥ |
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अ० १६ ] * द्वितीय अंश * १६५
अमृष्टं जायते मृष्टं मृष्टादुद्विजते जनः। आदिमध्यावसानेषु किमन्नं रुचिकारकम्॥ २८
मृण्मयं हि गृहं यद्वन्मृदा लिप्तं स्थिरं भवेत्। पार्थिवोऽयं तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ॥ २९
यवगोधूममुद्गादि घृतं तैलं पयो दधि। गुडं फलादीनि तथा पार्थिवाः परमाणवः ॥ ३०
तदेतद्भवता ज्ञात्वा मृष्टामृष्टविचारि यत्। तन्मनस्समतालम्बि कार्यं साम्यं हि मुक्तये ॥ ३१
ब्राह्मण उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य परमार्थाश्रितं नृप। प्रणिपत्य महाभागो निदाघो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३२
प्रसीद मद्धितार्थाय कथ्यतां यत्त्वमागतः। नष्टो मोहस्तवाकर्ण्य वचांस्येतानि मे द्विज ॥ ३३
ऋभुरुवाच
ऋभुरस्मि तवाचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज। इहागतोऽहं यास्यामि परमार्थस्तवोदितः ॥ ३४
एवमेकमिदं विद्धि न भेदि सकलं जगत्। वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूपं परमात्मनः ॥ ३५
ब्राह्मण उवाच
तथेत्युक्त्वा निदाघेन प्रणिपातपुरःसरम्। पूजितः परया भक्त्या इच्छात्तः प्रययावृभुः ॥ ३६
इसी प्रकार कभी अरुचिकर पदार्थ रुचिकर हो जाते हैं और रुचिकर पदार्थोंसे मनुष्यको उद्वेग हो जाता है। ऐसा अन्न भला कौन-सा है जो आदि, मध्य और अन्त तीनों कालमें रुचिकर ही हो ? ॥ २८ ॥ जिस प्रकार मिट्टीका घर मिट्टीसे लीपने-पोतनेसे दृढ़ होता है, उसी प्रकार यह पार्थिव देह पार्थिव अन्नके परमाणुओंसे पुष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ जौ, गेहूँ, मूँग, घृत, तैल, दूध, दही, गुड़ और फल आदि सभी पदार्थ पार्थिव परमाणु ही तो हैं। [इनमेंसे किसको स्वादु कहें और किसको अस्वादु ?] ॥ ३० ॥ अतः ऐसा जानकर तुम्हें इस स्वादु-अस्वादुका विचार करनेवाले चित्तको समदर्शी बनाना चाहिये, क्योंकि मोक्षका एकमात्र उपाय समता ही है ॥ ३१ ॥
**ब्राह्मण बोले—**हे राजन् ! उनके ऐसे परमार्थमय वचन सुनकर महाभाग निदाघने उन्हें प्रणाम करके कहा— ॥ ३२ ॥ "प्रभो ! आप प्रसन्न होइये ! कृपया बतलाइये, मेरे कल्याणकी कामनासे आये हुए आप कौन हैं? हे द्विज ! आपके इन वचनोंको सुनकर मेरा सम्पूर्ण मोह नष्ट हो गया है'' ॥ ३३ ॥
**ऋभु बोले—**हे द्विज ! मैं तेरा गुरु ऋभु हूँ; तुझको सदसद्विवेकिनी बुद्धि प्रदान करनेके लिये मैं यहाँ आया था। अब मैं जाता हूँ; जो कुछ परमार्थ है वह मैंने तुझसे कह ही दिया है ॥ ३४ ॥ इस परमार्थतत्त्वका विचार करते हुए तू इस सम्पूर्ण जगत्को एक वासुदेव परमात्माहीका स्वरूप जान; इसमें भेद-भाव बिलकुल नहीं है ॥ ३५ ॥
**ब्राह्मण बोले—**तदनन्तर निदाघने 'बहुत अच्छा' कह उन्हें प्रणाम किया और फिर उससे परम भक्तिपूर्वक पूजित हो ऋभु स्वेच्छानुसार चले गये ॥ ३६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
ऋभुकी आज्ञासे निदाघका अपने घरको लौटना
ब्राह्मण उवाच
ऋभुर्वर्षसहस्रे तु समतीते नरेश्वर। निदाघज्ञानदानाय तदेव नगरं ययौ॥ १
नगरस्य बहिः सोऽथ निदाघं ददृशे मुनिः। महाबलपरीवारे पुरं विशति पार्थिवे॥ २
**ब्राह्मण बोले—**हे नरेश्वर ! तदनन्तर सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर महर्षि ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश करनेके लिये फिर उसी नगरको गये ॥ १ ॥ वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने देखा कि वहाँका राजा बहुत-सी सेना आदिके साथ बड़ी धूम-धामसे नगरमें प्रवेश कर
१६६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६
| दूरे स्थितं महाभागं जनसम्मर्दवर्जकम्।<br/>क्षुत्क्षामकण्ठमायान्तमरण्यात्ससमित्कुशम्॥ ३<br/>दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुरुपगम्याभिवाद्य च।<br/>उवाच कस्मादेकान्ते स्थीयते भवता द्विज॥ ४ | रहा है और वनसे कुशा तथा समिध लेकर आया हुआ महाभाग निदाघ जनसमूहसे हटकर भूखा-प्यासा दूर खड़ा है॥ २-३॥<br/>निदाघको देखकर ऋभु उसके निकट गये और उसका अभिवादन करके बोले—'हे द्विज! यहाँ एकान्तमें आप कैसे खड़े हैं'॥ ४॥ |
| निदाघ उवाच<br/>भो विप्र जनसम्मर्दो महानेष नरेश्वरः।<br/>प्रविविक्षुः पुरं रम्यं तेनात्र स्थीयते मया॥ ५ | निदाघ बोले—हे विप्रवर! आज इस अति रमणीक नगरमें राजा जाना चाहता है, सो मार्गमें बड़ी भीड़ हो रही है; इसलिये मैं यहाँ खड़ा हूँ॥ ५॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>नराधिपोऽत्र कतमः कतमश्चेत्तरो जनः।<br/>कथ्यतां मे द्विजश्रेष्ठ त्वमभिज्ञो मतो मम॥ ६ | ऋभु बोले—हे द्विजश्रेष्ठ! मालूम होता है आप यहाँकी सब बातें जानते हैं। अतः कहिये इनमें राजा कौन है? और अन्य पुरुष कौन हैं?॥ ६॥ |
| निदाघ उवाच<br/>योऽयं गजेन्द्रमुन्मत्तमद्रिशृंगसमुच्छ्रितम्।<br/>अधिरूढो नरेन्द्रोऽयं परिलोकस्तथेतरः॥ ७ | निदाघ बोले—यह जो पर्वतके समान ऊँचे मत्त गजराजपर चढ़ा हुआ है वही राजा है तथा दूसरे लोग परिजन हैं॥ ७॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>एतौ हि गजराजानौ युगपद्दर्शितौ मम।<br/>भवता न विशेषेण पृथक्चिह्नोपलक्षणौ॥ ८<br/>तत्कथ्यतां महाभाग विशेषो भवतानयोः।<br/>ज्ञातुमिच्छाम्यहं कोऽत्र गजः को वा नराधिपः॥ ९ | ऋभु बोले—आपने राजा और गज, दोनों एक साथ ही दिखाये, किंतु इन दोनोंके पृथक्-पृथक् विशेष चिह्न अथवा लक्षण नहीं बतलाये॥ ८॥ अतः हे महाभाग! इन दोनोंमें क्या-क्या विशेषताएँ हैं, यह बतलाइये। मैं यह जानना चाहता हूँ कि इनमें कौन राजा है और कौन गज है?॥ ९॥ |
| निदाघ उवाच<br/>गजो योऽयमधो ब्रह्मन्नुपर्यस्यैष भूपतिः।<br/>वाह्यवाहकसबन्धं को न जानाति वै द्विज॥ १० | निदाघ बोले—इनमें जो नीचे है वह गज है और उसके ऊपर राजा है। हे द्विज! इन दोनोंका वाह्य-वाहक-सम्बन्ध है—इस बातको कौन नहीं जानता?॥ १०॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>जानाम्यहं यथा ब्रह्मंस्तथा मामवबोधय।<br/>अधःशब्दनिगद्यं हि किं चोर्ध्वमभिधीयते॥ ११ | ऋभु बोले—[ठीक है, किन्तु] हे ब्रह्मन्! मुझे इस प्रकार समझाइये, जिससे मैं यह जान सकूँ कि 'नीचे' इस शब्दका वाच्य क्या है? और 'ऊपर' किसे कहते हैं॥ ११॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br/>इत्युक्तः सहसारुह्य निदाघः प्राह तमृभुम्।<br/>श्रूयतां कथयाम्येष यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ १२<br/>उपर्यहं यथा राजा त्वमधः कुञ्जरो यथा।<br/>अवबोधाय ते ब्रह्मन्दृष्टान्तो दर्शितो मया॥ १३ | ब्राह्मणने कहा—ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने अकस्मात् उनके ऊपर चढ़कर कहा—"सुनिये, आपने जो पूछा है वही बतलाता हूँ—॥ १२॥ इस समय राजाकी भाँति मैं तो ऊपर हूँ और गजकी भाँति आप नीचे हैं। हे ब्रह्मन्! आपको समझानेके लिये ही मैंने यह दृष्टान्त दिखलाया है"॥ १३॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ स्थितोऽहं गजवद्यदि।<br/>तदेतत्त्वं समाचक्ष्व कतमस्त्वमहं तथा॥ १४ | ऋभु बोले—हे द्विजश्रेष्ठ! यदि आप राजाके समान हैं और मैं गजके समान हूँ तो यह बताइये कि आप कौन हैं? और मैं कौन हूँ?॥ १४॥ |
अ० १६ ]
* द्वितीय अंश *
१६७
ब्राह्मण उवाच
इत्युक्तः सत्वरं तस्य प्रगृह्य चरणावुभौ।
निदाघस्त्वाह भगवानाचार्यस्त्वमृभुर्भुवम् ॥ १५
नान्यस्याद्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा।
यथाचार्यस्य तेन त्वां मन्ये प्राप्तमहं गुरुम् ॥ १६
ब्राह्मणने कहा— ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने तुरन्त ही उनके दोनों चरण पकड़ लिये और कहा— 'निश्चय ही आप आचार्यचरण महर्षि ऋभु हैं॥ १५॥ हमारे आचार्यजीके समान अद्वैत-संस्कारयुक्त चित्त और किसीका नहीं है; अतः मेरा विचार है कि आप हमारे गुरुजी ही आकर उपस्थित हुए हैं' ॥ १६ ॥
ऋभुरुवाच
तवोपदेशदानाय पूर्वशुश्रूषणादृतः।
गुरुस्नेहादृभुर्नाम निदाघ समुपागतः ॥ १७
तदेतदुपदिष्टं ते सङ्क्षेपेण महामते।
परमार्थसारभूतं यत्तदद्वैतमशेषतः ॥ १८
ऋभु बोले— हे निदाघ! पहले तुमने सेवा-शुश्रूषा करके मेरा बहुत आदर किया था अतः तुम्हारे स्नेहवश मैं ऋभु नामक तुम्हारा गुरु ही तुमको उपदेश देनेके लिये आया हूँ॥ १७॥ हे महामते! 'समस्त पदार्थोंमें अद्वैत-आत्म-बुद्धि रखना' यही परमार्थका सार है जो मैंने तुम्हें संक्षेपमें उपदेश कर दिया ॥ १८ ॥
ब्राह्मण उवाच
एवमुक्त्वा ययौ विद्वान्निदाघं स ऋभुर्गुरुः।
निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ १९
सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मनः।
यथा ब्रह्मपरो मुक्तिमवाप परमां द्विजः ॥ २०
तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबान्धवः।
भव सर्वगतं जानन्नात्मानमवनीपते ॥ २१
सितनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः।
भ्रान्तिदृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक्पृथक् ॥ २२
एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि-
त्तदच्युतो नास्ति परं ततोऽन्यत्।
सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत-
दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ॥ २३
ब्राह्मण बोले— निदाघसे ऐसा कह परम विद्वान् गुरुवर भगवान् ऋभु चले गये और उनके उपदेशसे निदाघ भी अद्वैत-चिन्तनमें तत्पर हो गया ॥ १९॥ और समस्त प्राणियोंको अपनेसे अभिन्न देखने लगा हे धर्मज्ञ! हे पृथ्वीपते! जिस प्रकार उस ब्रह्मपरायण ब्राह्मणने परम मोक्षपद प्राप्त किया, उसी प्रकार तू भी आत्मा, शत्रु और मित्रादिमें समान भाव रखकर अपनेको सर्वगत जानता हुआ मुक्ति लाभ कर ॥ २०-२१ ॥ जिस प्रकार एक ही आकाश श्वेत-नील आदि भेदोंवाला दिखायी देता है, उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टियोंको एक ही आत्मा पृथक्-पृथक् दीखता है ॥ २२ ॥ इस संसारमें जो कुछ है वह सब एक आत्मा ही है और वह अविनाशी है, उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है; मैं, तू और ये सब आत्मस्वरूप ही हैं। अतः भेद-ज्ञानरूप मोहको छोड़ ॥ २३ ॥
श्रीपराशर उवाच
इतीरितस्तेन स राजवर्य-
स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः।
स चापि जातिस्मरणाप्तबोध-
स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥ २४
इति भरतनरेन्द्रसारवृत्तं
कथयति यश्च शृणोति भक्तियुक्तः।
स विमलमतिरेति नात्ममोहं
भवति च संसरणेषु मुक्तियोग्यः ॥ २५
श्रीपराशरजी बोले— उनके ऐसा कहनेपर सौवीरराजने परमार्थदृष्टिका आश्रय लेकर भेद-बुद्धिको छोड़ दिया और वे जातिस्मर ब्राह्मणश्रेष्ठ भी बोधयुक्त होनेसे उसी जन्ममें मुक्त हो गये ॥ २४॥ इस प्रकार महाराज भरतके इतिहासके इस सारभूत वृत्तान्तको जो पुरुष भक्तिपूर्व कहता या सुनता है उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है, उसे कभी आत्म-विस्मृति नहीं होती और वह जन्म-जन्मान्तरमें मुक्तिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है ॥ २५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके
श्रीमति विष्णुमहापुराणे द्वितीयोऽंशः समाप्तः ॥
A detailed black and white line drawing of Lord Vishnu standing on a globe. He is depicted with eight arms, each holding a symbolic object: a conch shell, a lotus flower, a bow, a sword, a mace, a discus, a lotus flower, and a mace. He wears a crown, a garland, and a tilak on his forehead. A radiant halo surrounds his head. The background features stylized clouds and a horizon line. The drawing is framed by a double-line border.
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ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः
श्रीविष्णुपुराण
तृतीय अंश
पहला अध्याय
पहले सात मन्वन्तरोंके मनु, इन्द्र, देवता, सप्तर्षि और मनुपुत्रोंका वर्णन
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
|---|---|
| कथिता गुरुणा सम्यग्भूसमुद्रादिसंस्थितिः।<br>सूर्यादीनां च संस्थानं ज्योतिषां चातिविस्तरात्॥ १ | हे गुरुदेव! आपने पृथिवी और समुद्र आदिकी स्थिति तथा सूर्य आदि ग्रहगणके संस्थानका मुझसे भली प्रकार अति विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥ १॥ |
| देवादीनां तथा सृष्टिर्ऋषीणां चापि वर्णिता।<br>चातुर्वर्ण्यस्य चोत्पत्तिस्तिर्यग्यौनिगतस्य च॥ २ | आपने देवता आदि और ऋषिगणोंकी सृष्टि तथा चातुर्वर्ण्य एवं तिर्यक्-योनिगत जीवोंकी उत्पत्तिका भी वर्णन किया॥ २॥ |
| ध्रुवप्रह्लादचरितं विस्तराच्च त्वयोदितम्।<br>मन्वन्तराण्यशेषाणि श्रोतुमिच्छाम्यनुक्रमात्॥ ३ | ध्रुव और प्रह्लादके चरित्रोंको भी आपने विस्तारपूर्वक सुना दिया। अतः हे गुरो! अब मैं आपके मुखारविन्दसे सम्पूर्ण मन्वन्तर तथा इन्द्र और देवताओंके सहित मन्वन्तरोंके अधिपति समस्त मनुओंका वर्णन सुनना चाहता हूँ [आप वर्णन कीजिये]॥ ३-४॥ |
| मन्वन्तराधिपांश्चैव शक्रदेवपुरोगमान्।<br>भवता कथितानेताञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो॥ ४ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| अतीतानागतानीह यानि मन्वन्तराणि वै।<br>तान्यहं भवतः सम्यक्कथयामि यथाक्रमम्॥ ५ | भूतकालमें जितने मन्वन्तर हुए हैं तथा आगे भी जो-जो होंगे, उन सबका मैं तुमसे क्रमशः वर्णन करता हूँ॥ ५॥ |
| स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं परः स्वारोचिषस्तथा।<br>उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ ६ | प्रथम मनु स्वायम्भुव थे। उनके अनन्तर क्रमशः स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष हुए॥ ६॥ |
| षडेते मनवोऽतीतास्साम्प्रतं तु रवेस्सुतः।<br>वैवस्वतोऽयं यस्यैतत्स्सप्तमं वर्ततेऽन्तरम्॥ ७ | ये छः मनु पूर्वकालमें हो चुके हैं। इस समय सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु हैं, जिनका यह सातवाँ मन्वन्तर वर्तमान है॥ ७॥ |
| स्वायम्भुवं तु कथितं कल्पादावन्तरं मया।<br>देवास्सप्तर्षयश्चैव यथावत्कथिता मया॥ ८ | कल्पके आदिमें जिस स्वायम्भुव-मन्वन्तरके विषयमें मैंने कहा है, उसके देवता और सप्तर्षियोंका तो मैं पहले ही यथावत् वर्णन कर चुका हूँ॥ ८॥ |
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मनोस्स्वारोचिषस्य तु।<br>मन्वन्तराधिपान्सम्यग्देवर्षींस्तत्सुतांस्तथा॥ ९ | अब आगे मैं स्वारोचिष मनुके मन्वन्तराधिकारी देवता, ऋषि और मनुपुत्रोंका स्पष्टतया वर्णन करूँगा॥ ९॥ |
| पारावतास्तुषिता देवास्स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>विपश्चित्तत्र देवेन्द्रो मैत्रेयासीन्महाबलः॥ १० | हे मैत्रेय! स्वारोचिषमन्वन्तरमें पारावत और तुषितगण देवता थे, महाबली विपश्चित् देवराज इन्द्र थे॥ १०॥ |
| ऊर्जः स्तम्भस्तथा प्राणो वातोऽथ पृषभस्तथा।<br>निरयश्च परीवांश्च तत्र सप्तर्षयोऽभवन्॥ ११ | ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, वात, पृषभ, निरय और परीवान्—ये उस समय सप्तर्षि थे॥ ११॥ |
| चैत्रकिम्पुरुषाद्याश्च सुतास्स्वारोचिषस्य तु।<br>द्वितीयमेतद्व्याख्यातमन्तरं शृणु चोत्तमम्॥ १२ | तथा चैत्र और किम्पुरुष आदि स्वारोचिषमनुके पुत्र थे। इस प्रकार तुमसे द्वितीय मन्वन्तरका वर्णन कर दिया। अब उत्तम-मन्वन्तरका विवरण सुनो॥ १२॥ |
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