विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] * द्वितीय अंश * १६५
अमृष्टं जायते मृष्टं मृष्टादुद्विजते जनः। आदिमध्यावसानेषु किमन्नं रुचिकारकम्॥ २८
मृण्मयं हि गृहं यद्वन्मृदा लिप्तं स्थिरं भवेत्। पार्थिवोऽयं तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ॥ २९
यवगोधूममुद्गादि घृतं तैलं पयो दधि। गुडं फलादीनि तथा पार्थिवाः परमाणवः ॥ ३०
तदेतद्भवता ज्ञात्वा मृष्टामृष्टविचारि यत्। तन्मनस्समतालम्बि कार्यं साम्यं हि मुक्तये ॥ ३१
ब्राह्मण उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य परमार्थाश्रितं नृप। प्रणिपत्य महाभागो निदाघो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३२
प्रसीद मद्धितार्थाय कथ्यतां यत्त्वमागतः। नष्टो मोहस्तवाकर्ण्य वचांस्येतानि मे द्विज ॥ ३३
ऋभुरुवाच
ऋभुरस्मि तवाचार्यः प्रज्ञादानाय ते द्विज। इहागतोऽहं यास्यामि परमार्थस्तवोदितः ॥ ३४
एवमेकमिदं विद्धि न भेदि सकलं जगत्। वासुदेवाभिधेयस्य स्वरूपं परमात्मनः ॥ ३५
ब्राह्मण उवाच
तथेत्युक्त्वा निदाघेन प्रणिपातपुरःसरम्। पूजितः परया भक्त्या इच्छात्तः प्रययावृभुः ॥ ३६
इसी प्रकार कभी अरुचिकर पदार्थ रुचिकर हो जाते हैं और रुचिकर पदार्थोंसे मनुष्यको उद्वेग हो जाता है। ऐसा अन्न भला कौन-सा है जो आदि, मध्य और अन्त तीनों कालमें रुचिकर ही हो ? ॥ २८ ॥ जिस प्रकार मिट्टीका घर मिट्टीसे लीपने-पोतनेसे दृढ़ होता है, उसी प्रकार यह पार्थिव देह पार्थिव अन्नके परमाणुओंसे पुष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ जौ, गेहूँ, मूँग, घृत, तैल, दूध, दही, गुड़ और फल आदि सभी पदार्थ पार्थिव परमाणु ही तो हैं। [इनमेंसे किसको स्वादु कहें और किसको अस्वादु ?] ॥ ३० ॥ अतः ऐसा जानकर तुम्हें इस स्वादु-अस्वादुका विचार करनेवाले चित्तको समदर्शी बनाना चाहिये, क्योंकि मोक्षका एकमात्र उपाय समता ही है ॥ ३१ ॥
**ब्राह्मण बोले—**हे राजन् ! उनके ऐसे परमार्थमय वचन सुनकर महाभाग निदाघने उन्हें प्रणाम करके कहा— ॥ ३२ ॥ "प्रभो ! आप प्रसन्न होइये ! कृपया बतलाइये, मेरे कल्याणकी कामनासे आये हुए आप कौन हैं? हे द्विज ! आपके इन वचनोंको सुनकर मेरा सम्पूर्ण मोह नष्ट हो गया है'' ॥ ३३ ॥
**ऋभु बोले—**हे द्विज ! मैं तेरा गुरु ऋभु हूँ; तुझको सदसद्विवेकिनी बुद्धि प्रदान करनेके लिये मैं यहाँ आया था। अब मैं जाता हूँ; जो कुछ परमार्थ है वह मैंने तुझसे कह ही दिया है ॥ ३४ ॥ इस परमार्थतत्त्वका विचार करते हुए तू इस सम्पूर्ण जगत्को एक वासुदेव परमात्माहीका स्वरूप जान; इसमें भेद-भाव बिलकुल नहीं है ॥ ३५ ॥
**ब्राह्मण बोले—**तदनन्तर निदाघने 'बहुत अच्छा' कह उन्हें प्रणाम किया और फिर उससे परम भक्तिपूर्वक पूजित हो ऋभु स्वेच्छानुसार चले गये ॥ ३६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
ऋभुकी आज्ञासे निदाघका अपने घरको लौटना
ब्राह्मण उवाच
ऋभुर्वर्षसहस्रे तु समतीते नरेश्वर। निदाघज्ञानदानाय तदेव नगरं ययौ॥ १
नगरस्य बहिः सोऽथ निदाघं ददृशे मुनिः। महाबलपरीवारे पुरं विशति पार्थिवे॥ २
**ब्राह्मण बोले—**हे नरेश्वर ! तदनन्तर सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर महर्षि ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश करनेके लिये फिर उसी नगरको गये ॥ १ ॥ वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने देखा कि वहाँका राजा बहुत-सी सेना आदिके साथ बड़ी धूम-धामसे नगरमें प्रवेश कर