भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 558 में से

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पृष्ठ 175

१६४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


निदाघ उवाच<br>हे हे शालिनि मद्गेहे यत्किञ्चिदतिशोभनम्।<br>भक्ष्योपसाधनं मृष्टं तेनास्यान्नं प्रसाधय॥ १४तब निदाघने [ अपनी स्त्रीसे ] कहा—हे गृहदेवि!<br>हमारे घरमें जो अच्छी-से-अच्छी वस्तु हो उसीसे इनके<br>लिये अति स्वादिष्ट भोजन बनाओ॥ १४॥
ब्राह्मण उवाच<br>इत्युक्ता तेन सा पत्नी मृष्टमन्नं द्विजस्य यत्।<br>प्रसाधितवती तद्वै भर्तुर्वचनगौरवात्॥ १५ब्राह्मण (जडभरत)-ने कहा—उसके ऐसा<br>कहनेपर उसकी पत्नीने अपने पतिकी आज्ञासे उन विप्रवरके<br>लिये अति स्वादिष्ट अन्न तैयार किया॥ १५॥
तं भुक्तवन्तमिच्छातो मृष्टमन्नं महामुनिम्।<br>निदाघः प्राह भूपाल प्रश्रयावनतः स्थितः॥ १६हे राजन्! ऋभुके यथेच्छ भोजन कर चुकनेपर<br>निदाघने अति विनीत होकर उन महामुनिसे कहा॥ १६॥
निदाघ उवाच<br>अपि ते परमा तृप्तिरुत्पन्ना तुष्टिरेव च।<br>अपि ते मानसं स्वस्थमाहारेण कृतं द्विज॥ १७निदाघ बोले—हे द्विज! कहिये भोजन करके<br>आपका चित्त स्वस्थ हुआ न? आप पूर्णतया तृप्त और<br>सन्तुष्ट हो गये न?॥ १७॥ हे विप्रवर! कहिये आप
क्व निवासो भवान्विप्र क्व च गन्तुं समुद्यतः।<br>आगम्यते च भवता यतस्तच्च द्विजोच्यताम्॥ १८कहाँ रहनेवाले हैं? कहाँ जानेकी तैयारीमें हैं? और कहाँसे<br>पधारे हैं?॥ १८॥
ऋभुरुवाच<br>क्षुद्यस्य तस्य भुक्तेऽन्ने तृप्तिर्ब्राह्मण जायते।<br>न मे क्षुन्नाभवत्तृप्तिः कस्मान्मां परिपृच्छसि॥ १९ऋभु बोले—हे ब्राह्मण! जिसको क्षुधा लगती है<br>उसीकी तृप्ति भी हुआ करती है। मुझको तो कभी क्षुधा<br>ही नहीं लगी, फिर तृप्तिके विषयमें तुम क्या पूछते<br>हो?॥ १९॥ जठराग्निके द्वारा पार्थिव (ठोस) धातुओंके
वह्निना पार्थिवे धातौ क्षपिते क्षुत्समुद्भवः।<br>भवत्यम्भसि च क्षीणे नृणां तृड्पि जायते॥ २०क्षीण हो जानेसे मनुष्यको क्षुधाकी प्रतीति होती है और<br>जलके क्षीण होनेसे तृषाका अनुभव होता है॥ २०॥ हे
क्षुत्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज।<br>ततः क्षुत्सम्भवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा॥ २१द्विज! ये क्षुधा और तृषा तो देहके ही धर्म हैं, मेरे नहीं;<br>अतः कभी क्षुधित न होनेके कारण मैं तो सर्वदा तृप्त ही<br>हूँ॥ २१॥ स्वस्थता और तुष्टि भी मनहीमें होते हैं, अतः
मनसः स्वस्थता तुष्टिश्चित्तधर्माविमौ द्विज।<br>चेतसो यस्य तत्पृच्छ पुमानेभिर्न युज्यते॥ २२ये मनहीके धर्म हैं; पुरुष (आत्मा)-से इनका कोई<br>सम्बन्ध नहीं है। इसलिये हे द्विज! ये जिसके धर्म हैं<br>उसीसे इनके विषयमें पूछो॥ २२॥ और तुमने जो पूछा
क्व निवासस्तवेत्युक्तं क्व गन्तासि च यत्त्वया।<br>कुतश्चागम्यते तत्र त्रितयेऽपि निबोध मे॥ २३कि 'आप कहाँ रहनेवाले हैं? कहाँ जा रहे हैं? तथा<br>कहाँसे आये हैं' सो इन तीनोंके विषयमें मेरा मत<br>सुनो—॥ २३॥ आत्मा सर्वगत है, क्योंकि यह आकाशके
पुमान्सर्वगतो व्यापी आकाशवदयं यतः।<br>कुतः कुत्र क्व गन्तासीत्येतदप्यर्थवत्कथम्॥ २४समान व्यापक है; अतः 'कहाँसे आये हो, कहाँ रहते हो<br>और कहाँ जाओगे?' यह कथन भी कैसे सार्थक हो<br>सकता है?॥ २४॥ मैं तो न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ<br>और न किसी एक स्थानपर रहता हूँ। [तू, मैं और
सोऽहं गन्ता न चागन्ता नैकदेशनिकेतनः।<br>त्वं चान्ये च न च त्वं च नान्ये नैवाहमप्यहम्॥ २५अन्य पुरुष भी देहादिके कारण जैसे पृथक्-पृथक्<br>दिखायी देते हैं वास्तवमें वैसे नहीं हैं] वस्तुतः तू तू नहीं<br>है, अन्य अन्य नहीं है और मैं मैं नहीं हूँ॥ २५॥
मृष्टं न मृष्टमप्येषा जिज्ञासा मे कृता तव।<br>किं वक्ष्यसीति तत्रापि श्रूयतां द्विजसत्तम॥ २६वास्तवमें मधुर मधुर है भी नहीं; देखो, मैंने<br>तुमसे जो मधुर अन्नकी याचना की थी उससे भी मैं<br>यही देखना चाहता था कि 'तुम क्या कहते हो'। हे<br>द्विजश्रेष्ठ! भोजन करनेवालेके लिये स्वादु और अस्वादु
किमस्वाद्वथ वा मृष्टं भुञ्जतोऽस्ति द्विजोत्तम।<br>मृष्टमेव यदामृष्टं तदेवोद्वेगकारकम्॥ २७भी क्या है? क्योंकि स्वादिष्ट पदार्थ ही जब समयान्तरसे<br>अस्वादु हो जाता है तो वही उद्वेगजनक होने लगता<br>है॥ २६-२७॥

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