विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१६६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६
| दूरे स्थितं महाभागं जनसम्मर्दवर्जकम्।<br/>क्षुत्क्षामकण्ठमायान्तमरण्यात्ससमित्कुशम्॥ ३<br/>दृष्ट्वा निदाघं स ऋभुरुपगम्याभिवाद्य च।<br/>उवाच कस्मादेकान्ते स्थीयते भवता द्विज॥ ४ | रहा है और वनसे कुशा तथा समिध लेकर आया हुआ महाभाग निदाघ जनसमूहसे हटकर भूखा-प्यासा दूर खड़ा है॥ २-३॥<br/>निदाघको देखकर ऋभु उसके निकट गये और उसका अभिवादन करके बोले—'हे द्विज! यहाँ एकान्तमें आप कैसे खड़े हैं'॥ ४॥ |
| निदाघ उवाच<br/>भो विप्र जनसम्मर्दो महानेष नरेश्वरः।<br/>प्रविविक्षुः पुरं रम्यं तेनात्र स्थीयते मया॥ ५ | निदाघ बोले—हे विप्रवर! आज इस अति रमणीक नगरमें राजा जाना चाहता है, सो मार्गमें बड़ी भीड़ हो रही है; इसलिये मैं यहाँ खड़ा हूँ॥ ५॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>नराधिपोऽत्र कतमः कतमश्चेत्तरो जनः।<br/>कथ्यतां मे द्विजश्रेष्ठ त्वमभिज्ञो मतो मम॥ ६ | ऋभु बोले—हे द्विजश्रेष्ठ! मालूम होता है आप यहाँकी सब बातें जानते हैं। अतः कहिये इनमें राजा कौन है? और अन्य पुरुष कौन हैं?॥ ६॥ |
| निदाघ उवाच<br/>योऽयं गजेन्द्रमुन्मत्तमद्रिशृंगसमुच्छ्रितम्।<br/>अधिरूढो नरेन्द्रोऽयं परिलोकस्तथेतरः॥ ७ | निदाघ बोले—यह जो पर्वतके समान ऊँचे मत्त गजराजपर चढ़ा हुआ है वही राजा है तथा दूसरे लोग परिजन हैं॥ ७॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>एतौ हि गजराजानौ युगपद्दर्शितौ मम।<br/>भवता न विशेषेण पृथक्चिह्नोपलक्षणौ॥ ८<br/>तत्कथ्यतां महाभाग विशेषो भवतानयोः।<br/>ज्ञातुमिच्छाम्यहं कोऽत्र गजः को वा नराधिपः॥ ९ | ऋभु बोले—आपने राजा और गज, दोनों एक साथ ही दिखाये, किंतु इन दोनोंके पृथक्-पृथक् विशेष चिह्न अथवा लक्षण नहीं बतलाये॥ ८॥ अतः हे महाभाग! इन दोनोंमें क्या-क्या विशेषताएँ हैं, यह बतलाइये। मैं यह जानना चाहता हूँ कि इनमें कौन राजा है और कौन गज है?॥ ९॥ |
| निदाघ उवाच<br/>गजो योऽयमधो ब्रह्मन्नुपर्यस्यैष भूपतिः।<br/>वाह्यवाहकसबन्धं को न जानाति वै द्विज॥ १० | निदाघ बोले—इनमें जो नीचे है वह गज है और उसके ऊपर राजा है। हे द्विज! इन दोनोंका वाह्य-वाहक-सम्बन्ध है—इस बातको कौन नहीं जानता?॥ १०॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>जानाम्यहं यथा ब्रह्मंस्तथा मामवबोधय।<br/>अधःशब्दनिगद्यं हि किं चोर्ध्वमभिधीयते॥ ११ | ऋभु बोले—[ठीक है, किन्तु] हे ब्रह्मन्! मुझे इस प्रकार समझाइये, जिससे मैं यह जान सकूँ कि 'नीचे' इस शब्दका वाच्य क्या है? और 'ऊपर' किसे कहते हैं॥ ११॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br/>इत्युक्तः सहसारुह्य निदाघः प्राह तमृभुम्।<br/>श्रूयतां कथयाम्येष यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ १२<br/>उपर्यहं यथा राजा त्वमधः कुञ्जरो यथा।<br/>अवबोधाय ते ब्रह्मन्दृष्टान्तो दर्शितो मया॥ १३ | ब्राह्मणने कहा—ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने अकस्मात् उनके ऊपर चढ़कर कहा—"सुनिये, आपने जो पूछा है वही बतलाता हूँ—॥ १२॥ इस समय राजाकी भाँति मैं तो ऊपर हूँ और गजकी भाँति आप नीचे हैं। हे ब्रह्मन्! आपको समझानेके लिये ही मैंने यह दृष्टान्त दिखलाया है"॥ १३॥ |
| ऋभुरुवाच<br/>त्वं राजेव द्विजश्रेष्ठ स्थितोऽहं गजवद्यदि।<br/>तदेतत्त्वं समाचक्ष्व कतमस्त्वमहं तथा॥ १४ | ऋभु बोले—हे द्विजश्रेष्ठ! यदि आप राजाके समान हैं और मैं गजके समान हूँ तो यह बताइये कि आप कौन हैं? और मैं कौन हूँ?॥ १४॥ |