विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 558 में से
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* द्वितीय अंश *
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ब्राह्मण उवाच
इत्युक्तः सत्वरं तस्य प्रगृह्य चरणावुभौ।
निदाघस्त्वाह भगवानाचार्यस्त्वमृभुर्भुवम् ॥ १५
नान्यस्याद्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा।
यथाचार्यस्य तेन त्वां मन्ये प्राप्तमहं गुरुम् ॥ १६
ब्राह्मणने कहा— ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने तुरन्त ही उनके दोनों चरण पकड़ लिये और कहा— 'निश्चय ही आप आचार्यचरण महर्षि ऋभु हैं॥ १५॥ हमारे आचार्यजीके समान अद्वैत-संस्कारयुक्त चित्त और किसीका नहीं है; अतः मेरा विचार है कि आप हमारे गुरुजी ही आकर उपस्थित हुए हैं' ॥ १६ ॥
ऋभुरुवाच
तवोपदेशदानाय पूर्वशुश्रूषणादृतः।
गुरुस्नेहादृभुर्नाम निदाघ समुपागतः ॥ १७
तदेतदुपदिष्टं ते सङ्क्षेपेण महामते।
परमार्थसारभूतं यत्तदद्वैतमशेषतः ॥ १८
ऋभु बोले— हे निदाघ! पहले तुमने सेवा-शुश्रूषा करके मेरा बहुत आदर किया था अतः तुम्हारे स्नेहवश मैं ऋभु नामक तुम्हारा गुरु ही तुमको उपदेश देनेके लिये आया हूँ॥ १७॥ हे महामते! 'समस्त पदार्थोंमें अद्वैत-आत्म-बुद्धि रखना' यही परमार्थका सार है जो मैंने तुम्हें संक्षेपमें उपदेश कर दिया ॥ १८ ॥
ब्राह्मण उवाच
एवमुक्त्वा ययौ विद्वान्निदाघं स ऋभुर्गुरुः।
निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ १९
सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मनः।
यथा ब्रह्मपरो मुक्तिमवाप परमां द्विजः ॥ २०
तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबान्धवः।
भव सर्वगतं जानन्नात्मानमवनीपते ॥ २१
सितनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः।
भ्रान्तिदृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक्पृथक् ॥ २२
एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि-
त्तदच्युतो नास्ति परं ततोऽन्यत्।
सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत-
दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ॥ २३
ब्राह्मण बोले— निदाघसे ऐसा कह परम विद्वान् गुरुवर भगवान् ऋभु चले गये और उनके उपदेशसे निदाघ भी अद्वैत-चिन्तनमें तत्पर हो गया ॥ १९॥ और समस्त प्राणियोंको अपनेसे अभिन्न देखने लगा हे धर्मज्ञ! हे पृथ्वीपते! जिस प्रकार उस ब्रह्मपरायण ब्राह्मणने परम मोक्षपद प्राप्त किया, उसी प्रकार तू भी आत्मा, शत्रु और मित्रादिमें समान भाव रखकर अपनेको सर्वगत जानता हुआ मुक्ति लाभ कर ॥ २०-२१ ॥ जिस प्रकार एक ही आकाश श्वेत-नील आदि भेदोंवाला दिखायी देता है, उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टियोंको एक ही आत्मा पृथक्-पृथक् दीखता है ॥ २२ ॥ इस संसारमें जो कुछ है वह सब एक आत्मा ही है और वह अविनाशी है, उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है; मैं, तू और ये सब आत्मस्वरूप ही हैं। अतः भेद-ज्ञानरूप मोहको छोड़ ॥ २३ ॥
श्रीपराशर उवाच
इतीरितस्तेन स राजवर्य-
स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः।
स चापि जातिस्मरणाप्तबोध-
स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥ २४
इति भरतनरेन्द्रसारवृत्तं
कथयति यश्च शृणोति भक्तियुक्तः।
स विमलमतिरेति नात्ममोहं
भवति च संसरणेषु मुक्तियोग्यः ॥ २५
श्रीपराशरजी बोले— उनके ऐसा कहनेपर सौवीरराजने परमार्थदृष्टिका आश्रय लेकर भेद-बुद्धिको छोड़ दिया और वे जातिस्मर ब्राह्मणश्रेष्ठ भी बोधयुक्त होनेसे उसी जन्ममें मुक्त हो गये ॥ २४॥ इस प्रकार महाराज भरतके इतिहासके इस सारभूत वृत्तान्तको जो पुरुष भक्तिपूर्व कहता या सुनता है उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है, उसे कभी आत्म-विस्मृति नहीं होती और वह जन्म-जन्मान्तरमें मुक्तिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है ॥ २५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके
श्रीमति विष्णुमहापुराणे द्वितीयोऽंशः समाप्तः ॥