भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० १६ ]
* द्वितीय अंश *
१६७


ब्राह्मण उवाच

इत्युक्तः सत्वरं तस्य प्रगृह्य चरणावुभौ।
निदाघस्त्वाह भगवानाचार्यस्त्वमृभुर्भुवम् ॥ १५
नान्यस्याद्वैतसंस्कारसंस्कृतं मानसं तथा।
यथाचार्यस्य तेन त्वां मन्ये प्राप्तमहं गुरुम् ॥ १६

ब्राह्मणने कहा— ऋभुके ऐसा कहनेपर निदाघने तुरन्त ही उनके दोनों चरण पकड़ लिये और कहा— 'निश्चय ही आप आचार्यचरण महर्षि ऋभु हैं॥ १५॥ हमारे आचार्यजीके समान अद्वैत-संस्कारयुक्त चित्त और किसीका नहीं है; अतः मेरा विचार है कि आप हमारे गुरुजी ही आकर उपस्थित हुए हैं' ॥ १६ ॥


ऋभुरुवाच

तवोपदेशदानाय पूर्वशुश्रूषणादृतः।
गुरुस्नेहादृभुर्नाम निदाघ समुपागतः ॥ १७
तदेतदुपदिष्टं ते सङ्क्षेपेण महामते।
परमार्थसारभूतं यत्तदद्वैतमशेषतः ॥ १८

ऋभु बोले— हे निदाघ! पहले तुमने सेवा-शुश्रूषा करके मेरा बहुत आदर किया था अतः तुम्हारे स्नेहवश मैं ऋभु नामक तुम्हारा गुरु ही तुमको उपदेश देनेके लिये आया हूँ॥ १७॥ हे महामते! 'समस्त पदार्थोंमें अद्वैत-आत्म-बुद्धि रखना' यही परमार्थका सार है जो मैंने तुम्हें संक्षेपमें उपदेश कर दिया ॥ १८ ॥


ब्राह्मण उवाच

एवमुक्त्वा ययौ विद्वान्निदाघं स ऋभुर्गुरुः।
निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ १९
सर्वभूतान्यभेदेन ददृशे स तदात्मनः।
यथा ब्रह्मपरो मुक्तिमवाप परमां द्विजः ॥ २०
तथा त्वमपि धर्मज्ञ तुल्यात्मरिपुबान्धवः।
भव सर्वगतं जानन्नात्मानमवनीपते ॥ २१
सितनीलादिभेदेन यथैकं दृश्यते नभः।
भ्रान्तिदृष्टिभिरात्मापि तथैकः सन्पृथक्पृथक् ॥ २२
एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि-
त्तदच्युतो नास्ति परं ततोऽन्यत्।
सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत-
दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ॥ २३

ब्राह्मण बोले— निदाघसे ऐसा कह परम विद्वान् गुरुवर भगवान् ऋभु चले गये और उनके उपदेशसे निदाघ भी अद्वैत-चिन्तनमें तत्पर हो गया ॥ १९॥ और समस्त प्राणियोंको अपनेसे अभिन्न देखने लगा हे धर्मज्ञ! हे पृथ्वीपते! जिस प्रकार उस ब्रह्मपरायण ब्राह्मणने परम मोक्षपद प्राप्त किया, उसी प्रकार तू भी आत्मा, शत्रु और मित्रादिमें समान भाव रखकर अपनेको सर्वगत जानता हुआ मुक्ति लाभ कर ॥ २०-२१ ॥ जिस प्रकार एक ही आकाश श्वेत-नील आदि भेदोंवाला दिखायी देता है, उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टियोंको एक ही आत्मा पृथक्-पृथक् दीखता है ॥ २२ ॥ इस संसारमें जो कुछ है वह सब एक आत्मा ही है और वह अविनाशी है, उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है; मैं, तू और ये सब आत्मस्वरूप ही हैं। अतः भेद-ज्ञानरूप मोहको छोड़ ॥ २३ ॥


श्रीपराशर उवाच

इतीरितस्तेन स राजवर्य-
स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः।
स चापि जातिस्मरणाप्तबोध-
स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥ २४
इति भरतनरेन्द्रसारवृत्तं
कथयति यश्च शृणोति भक्तियुक्तः।
स विमलमतिरेति नात्ममोहं
भवति च संसरणेषु मुक्तियोग्यः ॥ २५

श्रीपराशरजी बोले— उनके ऐसा कहनेपर सौवीरराजने परमार्थदृष्टिका आश्रय लेकर भेद-बुद्धिको छोड़ दिया और वे जातिस्मर ब्राह्मणश्रेष्ठ भी बोधयुक्त होनेसे उसी जन्ममें मुक्त हो गये ॥ २४॥ इस प्रकार महाराज भरतके इतिहासके इस सारभूत वृत्तान्तको जो पुरुष भक्तिपूर्व कहता या सुनता है उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है, उसे कभी आत्म-विस्मृति नहीं होती और वह जन्म-जन्मान्तरमें मुक्तिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है ॥ २५॥


इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके
श्रीमति विष्णुमहापुराणे द्वितीयोऽंशः समाप्तः ॥

A detailed black and white line drawing of Lord Vishnu standing on a globe. He is depicted with eight arms, each holding a symbolic object: a conch shell, a lotus flower, a bow, a sword, a mace, a discus, a lotus flower, and a mace. He wears a crown, a garland, and a tilak on his forehead. A radiant halo surrounds his head. The background features stylized clouds and a horizon line. The drawing is framed by a double-line border.

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ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

पहला अध्याय

पहले सात मन्वन्तरोंके मनु, इन्द्र, देवता, सप्तर्षि और मनुपुत्रोंका वर्णन


श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—
कथिता गुरुणा सम्यग्भूसमुद्रादिसंस्थितिः।<br>सूर्यादीनां च संस्थानं ज्योतिषां चातिविस्तरात्॥ १हे गुरुदेव! आपने पृथिवी और समुद्र आदिकी स्थिति तथा सूर्य आदि ग्रहगणके संस्थानका मुझसे भली प्रकार अति विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥ १॥
देवादीनां तथा सृष्टिर्ऋषीणां चापि वर्णिता।<br>चातुर्वर्ण्यस्य चोत्पत्तिस्तिर्यग्यौनिगतस्य च॥ २आपने देवता आदि और ऋषिगणोंकी सृष्टि तथा चातुर्वर्ण्य एवं तिर्यक्-योनिगत जीवोंकी उत्पत्तिका भी वर्णन किया॥ २॥
ध्रुवप्रह्लादचरितं विस्तराच्च त्वयोदितम्।<br>मन्वन्तराण्यशेषाणि श्रोतुमिच्छाम्यनुक्रमात्॥ ३ध्रुव और प्रह्लादके चरित्रोंको भी आपने विस्तारपूर्वक सुना दिया। अतः हे गुरो! अब मैं आपके मुखारविन्दसे सम्पूर्ण मन्वन्तर तथा इन्द्र और देवताओंके सहित मन्वन्तरोंके अधिपति समस्त मनुओंका वर्णन सुनना चाहता हूँ [आप वर्णन कीजिये]॥ ३-४॥
मन्वन्तराधिपांश्चैव शक्रदेवपुरोगमान्।<br>भवता कथितानेताञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो॥ ४
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
अतीतानागतानीह यानि मन्वन्तराणि वै।<br>तान्यहं भवतः सम्यक्कथयामि यथाक्रमम्॥ ५भूतकालमें जितने मन्वन्तर हुए हैं तथा आगे भी जो-जो होंगे, उन सबका मैं तुमसे क्रमशः वर्णन करता हूँ॥ ५॥
स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं परः स्वारोचिषस्तथा।<br>उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ ६प्रथम मनु स्वायम्भुव थे। उनके अनन्तर क्रमशः स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष हुए॥ ६॥
षडेते मनवोऽतीतास्साम्प्रतं तु रवेस्सुतः।<br>वैवस्वतोऽयं यस्यैतत्स्सप्तमं वर्ततेऽन्तरम्॥ ७ये छः मनु पूर्वकालमें हो चुके हैं। इस समय सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु हैं, जिनका यह सातवाँ मन्वन्तर वर्तमान है॥ ७॥
स्वायम्भुवं तु कथितं कल्पादावन्तरं मया।<br>देवास्सप्तर्षयश्चैव यथावत्कथिता मया॥ ८कल्पके आदिमें जिस स्वायम्भुव-मन्वन्तरके विषयमें मैंने कहा है, उसके देवता और सप्तर्षियोंका तो मैं पहले ही यथावत् वर्णन कर चुका हूँ॥ ८॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मनोस्स्वारोचिषस्य तु।<br>मन्वन्तराधिपान्सम्यग्देवर्षींस्तत्सुतांस्तथा॥ ९अब आगे मैं स्वारोचिष मनुके मन्वन्तराधिकारी देवता, ऋषि और मनुपुत्रोंका स्पष्टतया वर्णन करूँगा॥ ९॥
पारावतास्तुषिता देवास्स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>विपश्चित्तत्र देवेन्द्रो मैत्रेयासीन्महाबलः॥ १०हे मैत्रेय! स्वारोचिषमन्वन्तरमें पारावत और तुषितगण देवता थे, महाबली विपश्चित् देवराज इन्द्र थे॥ १०॥
ऊर्जः स्तम्भस्तथा प्राणो वातोऽथ पृषभस्तथा।<br>निरयश्च परीवांश्च तत्र सप्तर्षयोऽभवन्॥ ११ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, वात, पृषभ, निरय और परीवान्—ये उस समय सप्तर्षि थे॥ ११॥
चैत्रकिम्पुरुषाद्याश्च सुतास्स्वारोचिषस्य तु।<br>द्वितीयमेतद्व्याख्यातमन्तरं शृणु चोत्तमम्॥ १२तथा चैत्र और किम्पुरुष आदि स्वारोचिषमनुके पुत्र थे। इस प्रकार तुमसे द्वितीय मन्वन्तरका वर्णन कर दिया। अब उत्तम-मन्वन्तरका विवरण सुनो॥ १२॥

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१७०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १

तृतीयेऽप्यन्तरे ब्रह्मन्नुत्तमो नाम यो मनुः।
सुशान्तिर्नाम देवेन्द्रो मैत्रेयासीत्सुरेश्वरः ॥ १३
सुधामानस्तथा सत्या जपाश्चाथ प्रतर्दनाः।
वशवर्तिनश्च पञ्चैते गणा द्वादशकास्मृताः ॥ १४
वसिष्ठतनया ह्येते सप्त सप्तर्षयोऽभवन्।
अजः परशुदीप्ताद्यास्तथोत्तममनोस्सुताः ॥ १५

हे ब्रह्मन्! तीसरे मन्वन्तरमें उत्तम नामक मनु और सुशान्ति नामक देवाधिपति इन्द्र थे॥ १३॥ उस समय सुधाम, सत्य, जप, प्रतर्दन और वशवर्ती—ये पाँच बारह-बारह देवताओंके गण थे॥ १४॥ तथा वसिष्ठजीके सात पुत्र सप्तर्षिगण और अज, परशु एवं दीप्त आदि उत्तममनुके पुत्र थे॥ १५॥


तामसस्यान्तरे देवास्सुपारा हरयस्तथा।
सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गणाः ॥ १६
शिबिरिन्द्रस्तथा चासीच्छतयज्ञोपलक्षणः।
सप्तर्षयश्च ये तेषां तेषां नामानि मे शृणु ॥ १७
ज्योतिर्धामा पृथुः काव्यश्चैत्रोऽग्निर्वैनकस्तथा।
पीवरश्चर्षयो ह्येते सप्त तत्रापि चान्तरे ॥ १८
नरः ख्यातिः केतुरूपो जानुजङ्घादयस्तथा।
पुत्रास्तु तामसस्यासन् राजानस्सुमहाबलाः ॥ १९

तामस-मन्वन्तरमें सुपार, हरि, सत्य और सुधि—ये चार देवताओंके वर्ग थे और इनमेंसे प्रत्येक वर्गमें सत्ताईस-सत्ताईस देवगण थे॥ १६॥ सौ अश्वमेधयज्ञवाला राजा शिबि इन्द्र था, तथा उस समय जो सप्तर्षिगण थे उनके नाम मुझसे सुनो— ॥ १७॥ ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर—ये उस मन्वन्तरके सप्तर्षि थे॥ १८॥ तथा नर, ख्याति, केतुरूप और जानुजंघ आदि तामसमनुके महाबली पुत्र ही उस समय राज्याधिकारी थे॥ १९॥


पञ्चमे वापि मैत्रेय रैवतो नाम नामतः।
मनुर्विभुश्च तत्रेन्द्रो देवांश्चात्रान्तरे शृणु ॥ २०
अमिताभा भूतरया वैकुण्ठास्ससुमेधसः।
एते देवगणास्तत्र चतुर्दश चतुर्दश ॥ २१
हिरण्योमा वेदश्रीरूर्ध्वबाहुस्तथापरः।
वेदबाहुस्सुधामा च पर्जन्यश्च महामुनिः।
एते सप्तर्षयो विप्र तत्रासन् रैवतेऽन्तरे ॥ २२
बलबन्धुश्च सम्भाव्यस्सत्यकाद्याश्च तत्सुताः।
नरेन्द्राश्च महावीर्या बभूवुर्मुुनिसत्तम ॥ २३

हे मैत्रेय! पाँचवें मन्वन्तरमें रैवत नामक मनु और विभु नामक इन्द्र हुए तथा उस समय जो देवगण हुए उनके नाम सुनो— ॥ २०॥ इस मन्वन्तरमें चौदह-चौदह देवताओंके अमिताभ, भूतरय, वैकुण्ठ और सुमेधा नामक गण थे॥ २१॥ हे विप्र! इस रैवत-मन्वन्तरमें हिरण्योमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि—ये सात सप्तर्षिगण थे॥ २२॥ हे मुनिसत्तम! उस समय रैवतमनुके महावीर्यशाली पुत्र बलबन्धु, सम्भाव्य और सत्यक आदि राजा थे॥ २३॥


स्वारोचिषश्चोत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा।
प्रियव्रतान्वया ह्येते चत्वारो मनवस्स्मृताः ॥ २४
विष्णुमाराध्य तपसा स राजर्षिः प्रियव्रतः।
मन्वन्तराधिपाने ताँल्ललब्धवानात्मवंशजान् ॥ २५

हे मैत्रेय! स्वारोचिष, उत्तम, तामस और रैवत—ये चार मनु, राजा प्रियव्रतके वंशधर कहे जाते हैं॥ २४॥ राजर्षि प्रियव्रतने तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना करके अपने वंशमें उत्पन्न हुए इन चार मन्वन्तराधिपोंको प्राप्त किया था॥ २५॥


षष्ठे मन्वन्तरे चासीच्चाक्षुषाख्यस्तथा मनुः।
मनोजवस्तथैवेन्द्रो देवानपि निबोध मे ॥ २६
आप्याः प्रसूता भव्याश्च पृथुकाश्च दिवौकसः।
महानुभावा लेखाश्च पञ्चैते ह्राष्टका गणाः ॥ २७

छठे मन्वन्तरमें चाक्षुष नामक मनु और मनोजव नामक इन्द्र थे। उस समय जो देवगण थे उनके नाम सुनो— ॥ २६॥ उस समय आप्य, प्रसूत, भव्य, पृथुक और लेख—ये पाँच प्रकारके महानुभाव देवगण वर्तमान थे और इनमेंसे प्रत्येक गणमें आठ-आठ देवता थे॥ २७॥

अ० १ ] * तृतीय अंश * १७१


सुमेधा विरजाश्चैव हविष्मानुत्तमो मधुः।
अतिनामा सहिष्णुश्च सप्तासन्निति चर्षयः ॥ २८

ऊरुः पूरुश्शतद्युम्नप्रमुखास्सुमहाबलाः।
चाक्षुषस्य मनोः पुत्राः पृथिवीपतयोऽभवन्॥ २९

विवस्वतस्सुतो विप्र श्राद्धदेवो महाद्युतिः।
मनुस्संवर्तते धीमान् साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे॥ ३०

आदित्यवसुरुरुद्राद्या देवाश्चात्र महामुने।
पुरन्दरस्तथैवात्र मैत्रेय त्रिदशेश्वरः ॥ ३१

वसिष्ठः काश्यपोऽथात्रिर्जमदग्निस्र्सगौतमः।
विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥ ३२

इक्ष्वाकुश्च नृगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च।
नरिष्यन्तश्च विख्यातो नाभागोऽरिष्ट एव च॥ ३३

करूषश्च पृषध्रश्च सुमहाँल्लोकविश्रुतः।
मनोर्वैवस्वतस्यैते नव पुत्राः सुधार्र्मिकाः ॥ ३४

विष्णुशक्तिरनौपम्या सत्त्वोद्रिक्ता स्थितौ स्थिता।
मन्वन्तरेष्वशेषेषु देवत्वेनाधितिष्ठति ॥ ३५

अंशेन तस्या जज्ञेऽसौ यज्ञस्स्वायम्भुवेऽन्तरे।
आकूत्यां मानसो देव उत्पन्नः प्रथमेऽन्तरे ॥ ३६

ततः पुनः स वै देवः प्राप्ते स्वारोचिषेऽन्तरे।
तुषितायां समुत्पन्नो ह्यजितस्तुषितैः सह॥ ३७

औत्तमेऽप्यन्तरे देवस्तुषितस्तु पुनस्स वै।
सत्यायामभवत्सत्यः सत्यैस्सह सुरोत्तमैः ॥ ३८

तामसस्यान्तरे चैव सम्प्राप्ते पुनरेव हि।
हर्यायां हरिभिस्सार्धं हरिरेव बभूव ह॥ ३९

रैवतेऽप्यन्तरे देवस्सम्भूत्यां मानसो हरिः।
सम्भूतो रैवतैस्सार्धं देवैर्देववरो हरिः ॥ ४०

चाक्षुषे चान्तरे देवो वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः।
विकुण्ठायामसौ जज्ञे वैकुण्ठैर्देवतैः सह॥ ४१

मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वते द्विज।
वामनः कश्यपादद्विष्णुरदित्यां सम्बभूव ह॥ ४२

त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।
पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम् ॥ ४३


उस मन्वन्तरमें सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उत्तम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु—ये सात सप्तर्षि थे॥ २८॥ तथा चाक्षुषके अति बलवान् पुत्र ऊरु, पूरु और शतद्युम्न आदि राज्याधिकारी थे॥ २९॥

हे विप्र! इस समय इस सातवें मन्वन्तरमें सूर्यके पुत्र महातेजस्वी और बुद्धिमान् श्राद्धदेवजी मनु हैं॥ ३०॥ हे महामुने! इस मन्वन्तरमें आदित्य, वसु और रुद्र आदि देवगण हैं तथा पुरन्दर नामक इन्द्र है॥ ३१॥ इस समय वसिष्ठ, काश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज—ये सात सप्तर्षि हैं॥ ३२॥ तथा वैवस्वत मनुके इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करूष और पृषध्र—ये अत्यन्त लोकप्रसिद्ध और धर्मात्मा नौ पुत्र हैं॥ ३३-३४॥

समस्त मन्वन्तरोंमें देवरूपसे स्थित भगवान् विष्णुकी अनुपम और सत्त्वप्रधाना शक्ति ही संसारकी स्थितिमें उसकी अधिष्ठात्री होती है॥ ३५॥ सबसे पहले स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें मानसदेव यज्ञपुरुष उस विष्णुशक्तिके अंशसे ही आकूतिके गर्भसे उत्पन्न हुए थे॥ ३६॥ फिर स्वारोचिष-मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर वे मानसदेव श्रीअजित ही तुषित नामक देवगणोंके साथ तुषितासे उत्पन्न हुए॥ ३७॥ फिर उत्तम-मन्वन्तरमें वे तुषितदेव ही देवश्रेष्ठ सत्यगणके सहित सत्यरूपसे सत्याके उदरसे प्रकट हुए॥ ३८॥ तामस-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर वे हरि-नाम देवगणके सहित हरिरूपसे हर्याके गर्भसे उत्पन्न हुए॥ ३९॥ तत्पश्चात् वे देवश्रेष्ठ हरि, रैवत-मन्वन्तरमें तत्कालीन देवगणके सहित सम्भूतिका उदरसे प्रकट होकर मानस नामसे विख्यात हुए॥ ४०॥ तथा चाक्षुष-मन्वन्तरमें वे पुरुषोत्तम भगवान् वैकुण्ठ नामक देवगणोंके सहित विकुण्ठासे उत्पन्न होकर वैकुण्ठ कहलाये॥ ४१॥ और हे द्विज! इस वैवस्वत-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर भगवान् विष्णु कश्यपजीद्वारा अदितिके गर्भसे वामनरूप होकर प्रकट हुए॥ ४२॥ उन महात्मा वामनजीने अपनी तीन डगोंसे सम्पूर्ण लोकोंको जीतकर यह निष्कण्टक त्रिलोकी इन्द्रको दे दी थी॥ ४३॥

१७२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० २

इत्येतास्तनवस्तस्य सप्तमन्वन्तरेषु वै।
सप्तस्वेवाभवन्विप्र याभिः संवर्द्धिताः प्रजाः॥ ४४
यस्माद्विष्टमिदं विश्वं तस्य शक्त्या महात्मनः।
तस्मात्स प्रोच्यते विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात्॥ ४५
सर्वे च देवा मनवस्समस्ता-
स्सप्तर्षयो ये मनुसूनवश्च।
इन्द्रश्च योऽयं त्रिदशेशभूतो
विष्णोरशेषास्तु विभूतयस्ताः॥ ४६
| हे विप्र! इस प्रकार सातों मन्वन्तरोंमें भगवान्‌की ये सात मूर्तियाँ प्रकट हुईं, जिनसे (भविष्यमें) सम्पूर्ण प्रजाकी वृद्धि हुई॥ ४४॥ यह सम्पूर्ण विश्व उन परमात्माकी ही शक्तिसे व्याप्त है; अतः वे 'विष्णु' कहलाते हैं, क्योंकि 'विश्' धातुका अर्थ प्रवेश करना है॥ ४५॥ समस्त देवता, मनु, सप्तर्षि तथा मनुपुत्र और देवताओंके अधिपति इन्द्रगण—ये सब भगवान् विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं॥ ४६॥ इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥


दूसरा अध्याय

सावर्णिमनुकी उत्पत्ति तथा आगामी सात मन्वन्तरोंके मनु, मनुपुत्र, देवता, इन्द्र और सप्तर्षियोंका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाच
प्रोक्तान्येतानि भवता सप्तमन्वन्तराणि वै।
भविष्याण्यपि विप्रर्षे ममाख्यातुं त्वमर्हसि॥ १
| **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे विप्रर्षे! आपने यह सात अतीत मन्वन्तरोंकी कथा कही, अब आप मुझसे आगामी मन्वन्तरोंका भी वर्णन कीजिये॥ १॥

श्रीपराशर उवाच
सूर्यस्य पत्नी संज्ञाभूत्तनया विश्वकर्मणः।
मनुर्यमो यमी चैव तदपत्यानि वै मुने॥ २
असहन्ती तु सा भर्तुस्तेजश्छायां युयोज वै।
भर्तृशुश्रूषणेऽरण्यं स्वयं च तपसे ययौ॥ ३
संज्ञेयमित्यर्थार्कश्च छायायामात्मजत्रयम्।
शनैश्चरं मनुं चान्यं तपतीं चाप्यजीजनत्॥ ४
| **श्रीपराशरजी बोले—**हे मुने! विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा सूर्यकी भार्या थी। उससे उनके मनु, यम और यमी—तीन सन्तानें हुईं॥ २॥ कालान्तरमें पतिका तेज सहन न कर सकनेके कारण संज्ञा छायाको पतिकी सेवामें नियुक्त कर स्वयं तपस्याके लिये वनको चली गयी॥ ३॥ सूर्यदेवने यह समझकर कि यह संज्ञा ही है, छायासे शनैश्चर, एक और मनु तथा तपती—ये तीन सन्तानें उत्पन्न कीं॥ ४॥

छायासंज्ञा ददौ शापं यमाय कुपिता यदा।
तदान्येयमसौ बुद्धिरित्यासीद्यमसूर्ययोः॥ ५
ततो विवस्वानाख्याते तयैवारण्यसंस्थिताम्।
समाधिदृष्ट्या ददृशे तामश्वां तपसि स्थिताम्॥ ६
वाजिरूपधरः सोऽथ तस्यां देवावथाश्विनौ।
जनयामास रेवन्तं रेतसोऽन्ते च भास्करः॥ ७
आनिन्ये च पुनः संज्ञां स्वस्थानं भगवान् रविः।
तेजसश्शमनं चास्य विश्वकर्मा चकार ह॥ ८
| एक दिन जब छायारूपिणी संज्ञानें क्रोधित होकर [अपने पुत्रके पक्षपातसे] यमको शाप दिया, तब सूर्य और यमको विदित हुआ कि यह तो कोई और है॥ ५॥ तब छायाके द्वारा ही सारा रहस्य खुल जानेपर सूर्यदेवने समाधिमें स्थित होकर देखा कि संज्ञा घोड़ीका रूप धारण कर वनमें तपस्या कर रही है॥ ६॥ अतः उन्होंने भी अश्वरूप होकर उससे दो अश्विनीकुमार और रेतःस्रावके अनन्तर ही रेवन्तको उत्पन्न किया॥ ७॥
फिर भगवान् सूर्य संज्ञाको अपने स्थानपर ले आये तथा विश्वकर्माने उनके तेजको शान्त कर दिया॥ ८॥

अ० २ ] * तृतीय अंश * १७३


भ्रममारोप्य सूर्य तु तस्य तेजोनिशातनम्।
कृतवानष्टमं भागं स व्यशातयदव्ययम्॥ ९
यत्तस्माद्वैष्णवं तेजश्शातितं विश्वकर्मणा।
जाज्वल्यमानमपतत्तद्भूमौ मुनिसत्तम॥ १०
त्वष्टैव तेजसा तेन विष्णोश्चक्रमकल्पयत्।
त्रिशूलं चैव शर्वस्य शिबिकां धनदस्य च॥ ११
शक्तिं गुहस्य देवानामन्येषां च यदायुधम्।
तत्सर्वं तेजसा तेन विश्वकर्मा व्यवर्धयत्॥ १२
छायासंज्ञासुतो योऽसौ द्वितीयः कथितो मनुः।
पूर्वजस्य सवर्णोऽसौ सावर्णिस्तेन कथ्यते॥ १३
तस्य मन्वन्तरं ह्येतत्सावर्णिकमथाष्टमम्।
तच्छृणुष्व महाभाग भविष्यत्कथयामि ते॥ १४
सावर्णिस्तु मनुर्योऽसौ मैत्रेय भविता ततः।
सुतपाश्चामिताभाश्च मुख्याश्चापि तथा सुराः॥ १५
तेषां गणश्च देवानामेकैको विंशकः स्मृतः।
सप्तर्षीनपि वक्ष्यामि भविष्यान्मुनिसत्तम॥ १६
दीप्तिमान् गालवो रामः कृपो द्रौणिस्तथा परः।
मत्पुत्रश्च तथा व्यास ऋष्यशृङ्गश्च सप्तमः॥ १७
विष्णुप्रसादादनघः पातालान्तरगोचरः।
विरोचनसुतस्तेषां बलिरिन्द्रो भविष्यति॥ १८
विरजाश्चोर्वरीवांश्च निर्मोकाद्यास्तथापरे।
सावर्णेस्तु मनोः पुत्रा भविष्यन्ति नरेश्वराः॥ १९
नवमो दक्षसावर्णिर्भविष्यति मुने मनुः॥ २०
पारा मरीचिगर्भाश्च सुधर्माणस्तथा त्रिधा।
भविष्यन्ति तथा देवा ह्येकैको द्वादशो गणः॥ २१
तेषामिन्द्रो महावीर्यो भविष्यत्यद्भुतो द्विज॥ २२
सवनो द्युतिमान् भव्यो वसुर्मेधातिथिस्तथा।
ज्योतिष्मान् सप्तमः सत्यस्तत्रैते च महर्षयः॥ २३
धृतकेतुर्दीप्तिकेतुः पञ्चहस्तनिरामयौ।
पृथुश्रवाद्याश्च तथा दक्षसावर्णिकात्मजाः॥ २४
दशमो ब्रह्मसावर्णिर्भविष्यति मुने मनुः।
सुधामानो विशुद्धाश्च शतसंख्यास्तथा सुराः॥ २५


उन्होंने सूर्यको भ्रमियन्त्र (सान)-पर चढ़ाकर उनका तेज छाँटा, किन्तु वे उस अक्षुण्ण तेजका केवल अष्टमांश ही क्षीण कर सके॥ ९॥ हे मुनिसत्तम! सूर्यके जिस जाज्वल्यमान वैष्णव-तेजको विश्वकर्माने छाँटा था वह पृथिवीपर गिरा॥ १०॥ उस पृथिवीपर गिरे हुए सूर्य-तेजसे ही विश्वकर्माने विष्णुभगवान्‌का चक्र, शंकरका त्रिशूल, कुबेरका विमान, कार्तिकेयकी शक्ति बनायी तथा अन्य देवताओंके भी जो-जो शस्त्र थे उन्हें उससे पुष्ट किया॥११-१२॥ जिस छायासंज्ञाके पुत्र दूसरे मनुका ऊपर वर्णन कर चुके हैं वह अपने अग्रज मनुका सवर्ण होनेसे सावणि कहलाया॥ १३॥

हे महाभाग! सुनो, अब मैं उनके इस सावर्णिकनाम आठवें मन्वन्तरका, जो आगे होनेवाला है, वर्णन करता हूँ॥ १४॥ हे मैत्रेय! यह सावणि ही उस समय मनु होंगे तथा सुतप, अमिताभ और मुख्यगण देवता होंगे॥ १५॥ उन देवताओंका प्रत्येक गण बीस-बीसका समूह कहा जाता है। हे मुनिसत्तम! अब मैं आगे होनेवाले सप्तर्षि भी बतलाता हूँ॥ १६॥ उस समय दीप्तिमान्, गालव, राम, कृप, द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा, मेरे पुत्र व्यास और सातवें ऋष्यशृंग—ये सप्तर्षि होंगे॥ १७॥ तथा पाताल-लोकवासी विरोचनके पुत्र बलि श्रीविष्णुभगवान्‌की कृपासे तत्कालीन इन्द्र और सावणिमनुके पुत्र विरजा, उर्वरीवान् एवं निर्मोक आदि तत्कालीन राजा होंगे॥ १८-१९॥

हे मुने! नवें मनु दक्षसावर्णि होंगे। उनके समय पार, मरीचिगर्भ और सुधर्मा नामक तीन देववर्ग होंगे, जिनमेंसे प्रत्येक वर्गमें बारह-बारह देवता होंगे; तथा हे द्विज! उनका नायक महापराक्रमी अद्भुत नामक इन्द्र होगा॥ २०-२२॥ सवन, द्युतिमान्, भव्य, वसु, मेधातिथि, ज्योतिष्मान् और सातवें सत्य—ये उस समयके सप्तर्षि होंगे तथा धृतकेतु, दीप्तिकेतु, पंचहस्त, निरामय और पृथुश्रवा आदि दक्षसावर्णिमनुके पुत्र होंगे॥ २३-२४॥

हे मुने! दसवें मनु ब्रह्मसावर्णि होंगे। उनके समय सुधामा और विशुद्ध नामक सौ-सौ देवताओंके दो गण होंगे॥ २५॥

१७४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० २

तेषामिन्द्रश्च भविता शान्तिर्नाम महाबलः।<br/>सप्तर्षयो भविष्यन्ति ये तथा ताञ्छृणुष्व ह॥ २६<br/>हविष्मान्सुकृतस्सत्यस्तपोमूर्तिस्तथापरः।<br/>नाभागोऽप्रतिमौजाश्च सत्यकेतुस्तथैव च॥ २७<br/>सुक्षेत्रश्चोत्तमौजाश्च भूरिषेणादयो दश।<br/>ब्रह्मसावर्णिपुत्रास्तु रक्षिष्यन्ति वसुन्धराम्॥ २८<br/>एकादशश्च भविता धर्मसावर्णिको मनुः॥ २९<br/>विहङ्गमाः कामगमा निर्वाणरतयस्तथा।<br/>गणास्त्वेते तदा मुख्या देवानां च भविष्यताम्।<br/>एकैकस्त्रिंशकस्तेषां गणश्चेन्द्रश्च वै वृषः॥ ३०<br/>निःस्वरश्चाग्नितेजाश्च वपुष्मान्घृणिरारुणिः।<br/>हविष्माननघश्चैव भाव्याः सप्तर्षयस्तथा॥ ३१<br/>सर्वत्रगस्सुधर्मा च देवानीकादयस्तथा।<br/>भविष्यन्ति मनोस्तस्य तनयाः पृथिवीश्वराः॥ ३२<br/>रुद्रपुत्रस्तु सावर्णिर्भविता द्वादशो मनुः।<br/>ऋतुधामा च तत्रेन्द्रो भविता शृणु मे सुरान्॥ ३३<br/>हरिता रोहिता देवास्तथा सुमनसो द्विज।<br/>सुकर्माणः सुरापाश्च दशकाः पञ्च वै गणाः॥ ३४<br/>तपस्वी सुतपाश्चैव तपोमूर्तिस्तपोरतिः।<br/>तपोधृतिर्ध्रुतिश्चान्यः सप्तमस्तु तपोधनः।<br/>सप्तर्षयस्त्विमे तस्य पुत्रानपि निबोध मे॥ ३५<br/>देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठादयस्तथा।<br/>मनोस्तस्य महावीर्या भविष्यन्ति महानृपाः॥ ३६<br/>त्रयोदशो रुचिर्नामा भविष्यति मुने मनुः॥ ३७<br/>सुत्रामाणः सुकर्माणः सुधर्माणस्तथामराः।<br/>त्रयस्त्रिंशद्द्विभेदास्ते देवानां यत्र वै गणाः॥ ३८<br/>दिवस्पतिर्महावीर्यस्तेषामिन्द्रो भविष्यति॥ ३९<br/>निर्मोहस्तत्त्वदर्शी च निष्प्रकम्प्यो निरुत्सुकः।<br/>धृतिमानव्ययश्चान्यस्सप्तमस्सुतपा मुनिः।<br/>सप्तर्षयस्त्वमी तस्य पुत्रानपि निबोध मे॥ ४०<br/>चित्रसेनविचित्राद्या भविष्यन्ति महीक्षितः॥ ४१ | | महाबलवान् शान्ति उनका इन्द्र होगा तथा उस समय जो सप्तर्षिगण होंगे उनके नाम सुनो—॥ २६॥ उनके नाम हविष्मान्, सुकृत, सत्य, तपोमूर्ति, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु हैं॥ २७॥ उस समय ब्रह्मसावर्णिमनुके सुक्षेत्र, उत्तमौजा और भूरिषेण आदि दस पुत्र पृथिवीकी रक्षा करेंगे॥ २८॥<br/><br/>ग्यारहवाँ मनु धर्मसावर्णि होगा। उस समय होनेवाले देवताओंके विहंगम, कामगम और निर्वाणरति नामक मुख्य गण होंगे—इनमेंसे प्रत्येकमें तीस-तीस देवता रहेंगे और वृष नामक इन्द्र होगा॥ २९-३०॥ उस समय होनेवाले सप्तर्षियोंके नाम निःस्वर, अग्नितेजा, वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, हविष्मान् और अनघ हैं। तथा धर्मसावर्णि मनुके सर्वत्रग, सुधर्मा और देवानीक आदि पुत्र उस समयके राज्याधिकारी पृथिवीपति होंगे॥ ३१-३२॥<br/><br/>रुद्रपुत्र सावर्णि बारहवाँ मनु होगा। उसके समय ऋतुधामा नामक इन्द्र होगा तथा तत्कालीन देवताओंके नाम ये हैं सुनो—॥ ३३॥ हे द्विज! उस समय दस-दस देवताओंके हरित, रोहित, सुमना, सुकर्मा और सुराप नामक पाँच गण होंगे॥ ३४॥ तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोरति, तपोधृति, तपोद्युति तथा तपोधन—ये सात सप्तर्षि होंगे। अब मनुपुत्रोंके नाम सुनो—॥ ३५॥ उस समय उस मनुके देववान्, उपदेव और देवश्रेष्ठ आदि महावीर्यशाली पुत्र तत्कालीन सम्राट् होंगे॥ ३६॥<br/><br/>हे मुने! तेरहवाँ रुचि नामक मनु होगा। इस मन्वन्तरमें सुत्रामा, सुकर्मा और सुधर्मा नामक देवगण होंगे इनमेंसे प्रत्येकमें तैंतीस-तैंतीस देवता रहेंगे; तथा महाबलवान् दिवस्पति उनका इन्द्र होगा॥ ३७-३९॥ निर्मोह, तत्त्वदर्शी, निष्प्रकम्प, निरुत्सुक, धृतिमान्, अव्यय और सुतपा—ये तत्कालीन सप्तर्षि होंगे। अब मनुपुत्रोंके नाम भी सुनो॥ ४०॥ उस मन्वन्तरमें चित्रसेन और विचित्र आदि मनुपुत्र राजा होंगे॥ ४१॥

अ० २ ] * तृतीय अंश * १७५

भौमश्चतुर्दशश्चात्र मैत्रेय भविता मनुः। शुचिरिन्द्रः सुरगणास्तत्र पञ्च शृणुष्व तान्॥ ४२ चाक्षुषाश्च पवित्राश्च कनिष्ठा भ्राजिकास्तथा। वाचावृद्धाश्च वै देवास्सप्तर्षीनपि मे शृणु॥ ४३ अग्निबाहुः शुचिः शुक्नो मागधोऽग्नीध्र एव च। युक्तस्तथा जितश्चान्यो मनुपुत्रानतः शृणु॥ ४४ ऊरुगम्भीरबुद्ध्याद्या मनोस्तस्य सुता नृपाः। कथिता मुनिशार्दूल पालयिष्यन्ति ये महीम्॥ ४५ चतुर्युगान्ते वेदानां जायते किल विप्लवः। प्रवर्तयन्ति तानेत्य भुवं सप्तर्षयो दिवः॥ ४६ कृते कृते स्मृतेर्विप्र प्रणेता जायते मनुः। देवा यज्ञभुजस्ते तु यावन्मन्वन्तरं तु तत्॥ ४७ भवन्ति ये मनोः पुत्रा यावन्मन्वन्तरं तु तैः। तदन्वयोद्भवैश्चैव तावद्भूः परिपाल्यते॥ ४८ मनुस्सप्तर्षयो देवा भूपालाश्च मनोः सुताः। मन्वन्तरे भवन्त्येते शक्रश्चैवाधिकारिणः॥ ४९ चतुर्दशभिरेतैस्तु गतैर्मन्वन्तरैर्द्विज। सहस्त्रयुगपर्यन्तः कल्पो निश्शेष उच्यते॥ ५० तावत्प्रमाणा च निशा ततो भवति सत्तम। ब्रह्मरूपधरश्शेते शेषाहावम्बुसम्मप्लवे॥ ५१ त्रैलोक्यमखिलं ग्रस्त्वा भगवानादिकृद्विभुः। स्वमायासंस्थितो विप्र सर्वभूतो जनार्दनः॥ ५२ ततः प्रबुद्धो भगवान् यथा पूर्वं तथा पुनः। सृष्टिं करोत्यव्ययात्मा कल्पे कल्पे रजोगुणः॥ ५३ मनवो भूभुजस्सेन्द्रा देवास्सप्तर्षयस्तथा। सात्त्विकोंऽशः स्थितिकरो जगतो द्विजसत्तम॥ ५४ चतुर्युगेऽप्यसौ विष्णुः स्थितिव्यापारलक्षणः। युगव्यवस्थां कुरुते यथा मैत्रेय तच्छृणु॥ ५५ कृते युगे परं ज्ञानं कपिलादिस्वरूपधृक्। ददाति सर्वभूतात्मा सर्वभूतहिते रतः॥ ५६ चक्रवर्त्तिस्वरूपेण त्रेतायामपि स प्रभुः। दुष्टानां निग्रहं कुर्वन्परिपाति जगत्त्रयम्॥ ५७

हे मैत्रेय! चौदहवाँ मनु भौम होगा। उस समय शुचि नामक इन्द्र और पाँच देवगण होंगे; उनके नाम सुनो—वे चाक्षुष, पवित्र, कनिष्ठ, भ्राजिक और वाचावृद्ध नामक देवता हैं। अब तत्कालीन सप्तर्षियोंके नाम भी सुनो॥ ४२-४३॥ उस समय अग्निबाहु, शुचि, शुक्र, मागध, अग्नीध्र, युक्त और जित—ये सप्तर्षि होंगे। अब मनुपुत्रोंके विषयमें सुनो॥ ४४॥ हे मुनिशार्दूल! कहते हैं, उस मनुके ऊरु और गम्भीरबुद्धि आदि पुत्र होंगे जो राज्याधिकारी होकर पृथिवीका पालन करेंगे॥ ४५॥

प्रत्येक चतुर्युगके अन्तमें वेदोंका लोप हो जाता है, उस समय सप्तर्षिगण ही स्वर्गलोकसे पृथिवीमें अवतीर्ण होकर उनका प्रचार करते हैं॥ ४६॥ प्रत्येक सत्ययुगके आदिमें [मनुष्योंकी धर्म-मर्यादा स्थापित करनेके लिये] स्मृति-शास्त्रके रचयिता मनुका प्रादुर्भाव होता है; और उस मन्वन्तरके अन्त-पर्यन्त तत्कालीन देवगण यज्ञ-भागोंको भोगते हैं तथा मनुके पुत्र और उनके वंशधर मन्वन्तरके अन्ततक पृथिवीका पालन करते रहते हैं॥ ४७-४८॥ इस प्रकार मनु सप्तर्षि, देवता, इन्द्र तथा मनु-पुत्र राजागण—ये प्रत्येक मन्वन्तरके अधिकारी होते हैं॥ ४९॥

हे द्विज! इन चौदह मन्वन्तरोंके बीत जानेपर एक सहस्र युग रहनेवाला कल्प समाप्त हुआ कहा जाता है॥ ५०॥ हे साधुश्रेष्ठ! फिर इतने ही समयकी रात्रि होती है। उस समय ब्रह्मरूपधारी श्रीविष्णुभगवान् प्रलयकालीन जलके ऊपर शेष-शय्यापर शयन करते हैं॥ ५१॥ हे विप्र! तब आदिकर्ता सर्वव्यापक सर्वभूत भगवान् जनार्दन सम्पूर्ण त्रिलोकीका ग्रास कर अपनी मायामें स्थित रहते हैं॥ ५२॥ फिर [प्रलय-रात्रिका अन्त होनेपर] प्रत्येक कल्पके आदिमें अव्ययात्मा भगवान् जाग्रत् होकर रजोगुणका आश्रय कर सृष्टिकी रचना करते हैं॥ ५३॥ हे द्विजश्रेष्ठ! मनु, मनु-पुत्र राजागण, इन्द्र देवता तथा सप्तर्षि—ये सब जगत्का पालन करनेवाले भगवान्के सात्त्विक अंश हैं॥ ५४॥

हे मैत्रेय! स्थितिकारक भगवान् विष्णु चारों युगोंमें जिस प्रकार व्यवस्था करते हैं, सो सुनो—॥ ५५॥ समस्त प्राणियोंके कल्याणमें तत्पर वे सर्वभूतात्मा सत्ययुगमें कपिल आदिरूप धारणकर परम ज्ञानका उपदेश करते हैं॥ ५६॥ त्रेतायुगमें वे सर्वसमर्थ प्रभु चक्रवर्ती भूपाल होकर दुष्टोंका दमन करके त्रिलोकीकी रक्षा करते हैं॥ ५७॥

१७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३


वेदमेकं चतुर्भेदं कृत्वा शाखाशतैर्विभुः।
करोति बहुलं भूयो वेदव्यासस्वरूपधृक्॥ ५८

वेदांस्तु द्वापरे व्यस्य कलेरन्ते पुनर्हरिः।
कल्किस्वरूपी दुर्वृत्तान्मार्गे स्थापयति प्रभुः॥ ५९

एवमेतज्जगत्सर्वं शश्वत्याति करोति च।
हन्ति चान्तेष्वनन्तात्मा नास्त्यस्माद्व्यतिरेकि यत्॥ ६०

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वभूतान्महात्मनः।
तदत्रान्यत्र वा विप्र सद्भावः कथितस्तव॥ ६१

मन्वन्तराण्यशेषाणि कथितानि मया तव।
मन्वन्तराधिपांश्चैव किमन्यत्कथयामि ते॥ ६२

तदनन्तर द्वापरयुगमें वे वेदव्यासरूप धारणकर एक वेदके चार विभाग करते हैं और सैकड़ों शाखाओंमें बाँटकर उसका बहुत विस्तार कर देते हैं॥ ५८॥ इस प्रकार द्वापरमें वेदोंका विस्तार कर कलियुगके अन्तमें भगवान् कल्किरूप धारणकर दुराचारी लोगोंको सन्मार्गमें प्रवृत्त करते हैं॥ ५९॥ इसी प्रकार अनन्तात्मा प्रभु निरन्तर इस सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्ति, पालन और नाश करते रहते हैं। इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो उनसे भिन्न हो॥ ६०॥ हे विप्र! इहलोक और परलोकमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान जितने भी पदार्थ हैं वे सब महात्मा भगवान् विष्णुसे ही उत्पन्न हुए हैं—यह सब मैं तुमसे कह चुका हूँ॥ ६१॥ मैंने तुमसे सम्पूर्ण मन्वन्तरों और मन्वन्तराधिकारियोंका वर्णन कर दिया। कहो, अब और क्या सुनाऊँ?॥ ६२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


तीसरा अध्याय

चतुर्युगानुसार भिन्न-भिन्न व्यासोंके नाम तथा ब्रह्मज्ञानके माहात्म्यका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाच

ज्ञातमेतन्मया त्वत्तो यथा सर्वमिदं जगत्।
विष्णुर्विष्णौ विष्णुतःश्च न परं विद्यते ततः॥ १

एतत्तु श्रोतुमिच्छामि व्यस्ता वेदा महात्मना।
वेदव्यासस्वरूपेण तथा तेन युगे युगे॥ २

यस्मिन्यस्मिन्युगे व्यासो यो य आसीन्महामुने।
तं तमाचक्ष्व भगवञ्छाखाभेदांश्च मे वद॥ ३

श्रीमैत्रेयजी बोले—हे भगवन्! आपके कथनसे मैं यह जान गया कि किस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है, विष्णुमें ही स्थित है, विष्णुसे ही उत्पन्न हुआ है तथा विष्णुसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है?॥ १॥ अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भगवान्ने वेदव्यासरूपसे युग-युगमें किस प्रकार वेदोंका विभाग किया॥ २॥ हे महामुने! हे भगवन्! जिस-जिस युगमें जो-जो वेदव्यास हुए उनका तथा वेदोंके सम्पूर्ण शाखा-भेदोंका आप मुझसे वर्णन कीजिये॥ ३॥

श्रीपराशर उवाच

वेदद्रुमस्य मैत्रेय शाखाभेदास्सहस्रशः।
न शक्तो विस्तराद्वक्तुं सङ्क्षेपेण शृणुष्व तम्॥ ४

द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपी महामुने।
वेदमेकं सुबहुधा कुरुते जगतो हितः॥ ५

वीर्यं तेजो बलं चाल्पं मनुष्याणामवेक्ष्य च।
हिताय सर्वभूतानां वेदभेदान्करोति सः॥ ६

ययासौ कुरुते तन्वा वेदमेकं पृथक् प्रभुः।
वेदव्यासाभिधाना तु सा च मूर्तिमधुद्विषः॥ ७

श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! वेदरूप वृक्षके सहस्रों शाखा-भेद हैं, उनका विस्तारसे वर्णन करनेमें तो कोई भी समर्थ नहीं है, अतः संक्षेपसे सुनो॥ ४॥ हे महामुने ! प्रत्येक द्वापरयुगमें भगवान् विष्णु व्यासरूपसे अवतीर्ण होते हैं और संसारके कल्याणके लिये एक वेदके अनेक भेद कर देते हैं॥ ५॥ मनुष्योंके बल, वीर्य और तेजको अल्प जानकर वे समस्त प्राणियोंके हितके लिये वेदोंका विभाग करते हैं॥ ६॥ जिस शरीरके द्वारा वे प्रभु एक वेदके अनेक विभाग करते हैं भगवान् मधुसूदनकी उस मूर्तिका नाम वेदव्यास है॥ ७॥

अ० ३ ] * तृतीय अंश * १७७


यस्मिन्मन्वन्तरे व्यासा ये ये स्युस्तान्निबोध मे।<br>यथा च भेदश्शाखानां व्यासेन क्रियते मुने॥ ८<br>अष्टाविंशतिकृत्वो वै वेदो व्यस्तो महर्षिभिः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्द्रापरेषु पुनः पुनः॥ ९<br>वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम।<br>चतुर्धा यैः कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः॥ १०<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्तस्स्वयं वेदः स्वयम्भुवा।<br>द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥ ११<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे च बृहस्पतिः।<br>सविता पञ्चमे व्यासः षष्ठे मृत्युस्मृतः प्रभुः॥ १२<br>सप्तमे च तथैवेन्द्रो वसिष्ठश्चाष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतश्च नवमे त्रिधामा दशमे स्मृतः॥ १३<br>एकादशे तु त्रिशिखो भरद्वाजस्ततः परः।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो वर्णी चापि चतुर्दशे॥ १४<br>त्रय्यारुणः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>ऋतुञ्जयः सप्तदशे तदूर्ध्वं च जयस्मृतः॥ १५<br>ततो व्यासो भरद्वाजो भरद्वाजाच्च गौतमः।<br>गौतमादुत्तरो व्यासो हर्यात्मा योऽभिधीयते॥ १६<br>अथ हर्यात्मनोऽन्ते च स्मृतो वाजश्रवा मुनिः।<br>सोमशुष्मायणस्तस्मात्तृणबिन्दुरिति स्मृतः॥ १७<br>ऋक्षोऽभूद्भागर्वस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते।<br>तस्मादस्मत्पिता शक्तिर्व्यासस्तस्मादहं मुने॥ १८<br>जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः।<br>अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः॥ १९<br>एको वेदश्चतुर्धा तु तैः कृतो द्वापरादिषु॥ २०<br>भविष्ये द्वापरे चापि द्रौणिर्व्यासो भविष्यति।<br>व्यतीते मम पुत्रेऽस्मिन् कृष्णद्वैपायने मुने॥ २१<br>ध्रुवमेकाक्षरं ब्रह्म ओमित्येव व्यवस्थितम्।<br>बृहत्वाद्वृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्मेत्यभिधीयते॥ २२<br>प्रणवावस्थितं नित्यं भूर्भुवस्स्वरितीर्यते।<br>ऋग्यजुस्सामाथर्वाणो यत्तस्मै ब्रह्मणे नमः॥ २३हे मुने! जिस-जिस मन्वन्तरमें जो-जो व्यास होते हैं और वे जिस-जिस प्रकार शाखाओंका विभाग करते हैं—वह मुझसे सुनो॥ ८॥ इस वैवस्वत-मन्वन्तरके प्रत्येक द्वापरयुगमें व्यास महर्षियोंने अबतक पुनः-पुनः अट्ठाईस बार वेदोंके विभाग किये हैं॥ ९॥ हे साधुश्रेष्ठ! जिन्होंने पुनः-पुनः द्वापरयुगमें वेदोंके चार-चार विभाग किये हैं उन अट्ठाईस व्यासोंका विवरण सुनो—॥ १०॥ पहले द्वापरमें स्वयं भगवान् ब्रह्माजीने वेदोंका विभाग किया था। दूसरे द्वापरके वेदव्यास प्रजापति हुए॥ ११॥ तीसरे द्वापरमें शुक्राचार्यजी और चौथेमें बृहस्पतिजी व्यास हुए तथा पाँचवेंमें सूर्य और छठेमें भगवान् मृत्यु व्यास कहलाये॥ १२॥ सातवें द्वापरके वेदव्यास इन्द्र, आठवेंके वसिष्ठ, नवेंके सारस्वत और दसवेंके त्रिधामा कहे जाते हैं॥ १३॥ ग्यारहवेंमें त्रिशिख, बारहवेंमें भरद्वाज, तेरहवेंमें अन्तरिक्ष और चौदहवेंमें वर्णी नामक व्यास हुए॥ १४॥ पन्द्रहवेंमें त्रय्यारुण, सोलहवेंमें धनंजय, सत्रहवेंमें ऋतुंजय और तदनन्तर अठारहवेंमें जय नामक व्यास हुए॥ १५॥ फिर उन्नीसवें व्यास भरद्वाज हुए, भरद्वाजके पीछे गौतम हुए और गौतमके पीछे जो व्यास हुए वे हर्यात्मा कहे जाते हैं॥ १६॥ हर्यात्माके अनन्तर वाजश्रवामुनि व्यास हुए तथा उनके पश्चात् सोमशुष्मवंशी तृणबिन्दु (तेईसवें) वेदव्यास कहलाये॥ १७॥ उनके पीछे भृगुवंशी ऋक्ष व्यास हुए जो वाल्मीकि कहलाये, तदनन्तर हमारे पिता शक्ति हुए और फिर मैं हुआ॥ १८॥ मेरे अनन्तर जातुकर्ण व्यास हुए और फिर कृष्णद्वैपायन—इस प्रकार ये अट्ठाईस व्यास प्राचीन हैं। इन्होंने द्वापरादि युगोंमें एक ही वेदके चार-चार विभाग किये हैं॥ १९-२०॥ हे मुने! मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनके अनन्तर आगामी द्वापरयुगमें द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा वेदव्यास होंगे॥ २१॥<br><br>ॐ यह अविनाशी एकाक्षर ही ब्रह्म है। यह बृहत् और व्यापक है; इसलिये 'ब्रह्म' कहलाता है॥ २२॥ भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—ये तीनों प्रणवरूप ब्रह्ममें ही स्थित हैं तथा प्रणव ही ऋक्, यजुः, साम और अथर्वरूप है; अतः उस ओंकाररूप ब्रह्मको नमस्कार है॥ २३॥
१७८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ४

जगतः प्रलयोत्पत्त्योर्यत्तत्कारणसंज्ञितम्।
महतः परमं गुह्यं तस्मै सुब्रह्मणे नमः ॥ २४
अगाधापारमक्षय्यं जगत्सम्मोहनालयम्।
स्वप्रकाशप्रवृत्तिभ्यां पुरुषार्थप्रयोजनम् ॥ २५
सांख्यज्ञानवतां निष्ठा गतिश्शमदमात्मनाम्।
यत्तद्व्यक्तममृतं प्रवृत्तिब्रह्म शाश्वतम् ॥ २६
प्रधानमात्मयोनिश्च गुहासंस्थं च शब्द्यते।
अविभागं तथा शुक्रमक्षयं बहुधात्मकम् ॥ २७
परमब्रह्मणे तस्मै नित्यमेव नमो नमः।
यद्रूपं वासुदेवस्य परमात्मस्वरूपिणः ॥ २८
एतद्ब्रह्म त्रिधा भेदमभेदमपि स प्रभुः।
सर्वभेदेष्वभेदोऽसौ भिद्यते भिन्नबुद्धिभिः ॥ २९
स ऋङ्मयस्साममयः सर्वात्मा स यजुर्मयः।
ऋग्यजुस्सामसारात्मा स एवात्मा शरीरिणाम् ॥ ३०
स भिद्यते वेदमयस्स्ववेदं करोति भेदैर्बहुभिस्स्वशाखम्।
शाखाप्रणेता स समस्तशाखा- ज्ञानस्वरूपो भगवानसङ्गः ॥ ३१

जो संसारके उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहलाता है तथा महत्तत्त्वसे भी परम गुह्य (सूक्ष्म) है उस ओंकाररूप ब्रह्मको नमस्कार है॥ २४॥ जो अगाध, अपार और अक्षय है, संसारको मोहित करनेवाले तमोगुणका आश्रय है, तथा प्रकाशमय सत्त्वगुण और वृत्तिरूप रजोगुणके द्वारा पुरुषोंके भोग और मोक्षरूप परमपुरुषार्थका हेतु है॥ २५॥ जो सांख्यज्ञानियोंकी परम्निष्ठा है, शम-दमशालियोंका गन्तव्य स्थान है, जो अव्यक्त और अविनाशी है तथा जो सक्रिय ब्रह्म होकर भी सदा रहनेवाला है॥ २६॥ जो स्वयम्भू, प्रधान और अन्तर्यामी कहलाता है तथा जो अविभाग, दीप्तिमान्, अक्षय और अनेक रूप है॥ २७॥ और जो परमात्मस्वरूप भगवान् वासुदेवका ही रूप (प्रतीक) है, उस ओंकाररूप परब्रह्मको सर्वदा बारम्बार नमस्कार है॥ २८॥ यह ओंकाररूप ब्रह्म अभिन्न होकर भी [अकार, उकार और मकाररूपसे] तीन भेदोंवाला है। यह समस्त भेदोंमें अभिन्नरूपसे स्थित है तथापि भेदबुद्धिसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है॥ २९॥ वह सर्वात्मा ऋङ्मय, साममय और यजुर्मय है तथा ऋग्यजुः-सामका साररूप वह ओंकार ही सब शरीरधारियोंका आत्मा है॥ ३०॥ वह वेदमय है, वही ऋग्वेदादिरूपसे भिन्न हो जाता है और वही अपने वेदरूपको नाना शाखाओंमें विभक्त करता है तथा वह असंग भगवान् ही समस्त शाखाओंका रचयिता और उनका ज्ञानस्वरूप है॥ ३१॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


चौथा अध्याय

ऋग्वेदकी शाखाओंका विस्तार

श्रीपराशर उवाच

आद्यो वेदश्चतुष्पादः शतसाहस्रसम्मितः।
ततो दशगुणः कृत्स्नो यज्ञोऽयं सर्वकामधुक् ॥ १
ततोऽत्र मत्सुतो व्यासो अष्टाविंशतिमेऽन्तरे।
वेदमेकं चतुष्पादं चतुर्धा व्यभजत्प्रभुः ॥ २
यथा च तेन वै व्यस्ता वेदव्यासेन धीमता।
वेदास्तथा समस्तैस्तैर्व्यस्ता व्यस्तैस्तथा मया ॥ ३
तदनेनैव वेदानां शाखाभेदान्द्विजोत्तम।
चतुर्युगेषु पठितान्सम्स्तेष्ववधारय ॥ ४

श्रीपराशरजी बोले— सृष्टिके आदिमें ईश्वरसे आविर्भूत वेद ऋक्-यजुः आदि चार पादोंसे युक्त और एक लक्ष मन्त्रवाला था। उसीसे समस्त कामनाओंको देनेवाले अग्निहोत्रादि दस प्रकारके यज्ञोंका प्रचार हुआ॥ १॥ तदनन्तर अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनने इस चतुष्पादयुक्त एक ही वेदके चार भाग किये॥ २॥ परम बुद्धिमान् वेदव्यासने उनका जिस प्रकार विभाग किया है, ठीक उसी प्रकार अन्यान्य वेदव्यासोंने तथा मैंने भी पहले किया था॥ ३॥ अतः हे द्विज! समस्त चतुर्युगोंमें इन्हीं शाखाभेदोंसे वेदका पाठ होता है—ऐसा जानो॥ ४॥

अ० ४ ] * तृतीय अंश * १७९


कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम्।
को ह्यन्यो भुवि मैत्रेय महाभारतकृद्भवेत्॥ ५
तेन व्यस्ता यथा वेदा मत्पुत्रेण महात्मना।
द्वापरे ह्यत्र मैत्रेय तस्मिञ्छृणु यथातथम्॥ ६
ब्रह्मणा चोदितो व्यासो वेदान्व्यस्तुं प्रचक्रमे।
अथ शिष्यान्प्रजग्राह चतुरो वेदपारगान्॥ ७
ऋग्वेदपाठकं पैलं जग्राह स महामुनिः।
वैशम्पायननामानं यजुर्वेदस्य चाग्रहीत्॥ ८
जैमिनिं सामवेदस्य तथैवाथर्ववेदवित्।
सुमन्तुस्तस्य शिष्योऽभूद्वेदव्यासस्य धीमतः॥ ९
रोमहर्षणनामानं महाबुद्धिं महामुनिः।
सूतं जग्राह शिष्यं स इतिहासपुराणयोः॥ १०
एक आसीद्यजुर्वेदस्तं चतुर्धा व्यकल्पयत्।
चातुर्होत्रमभूत्तस्मिंस्तेन यज्ञमथाकरोत्॥ ११
आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु ऋग्भिर्होत्रं तथा मुनिः।
औद्गात्रं सामभिश्चक्रे ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः॥ १२
ततस्स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदं कृतवान्मुनिः।
यजूंषि च यजुर्वेदं सामवेदं च सामभिः॥ १३
राज्ञां चाथर्ववेदेन सर्वकर्माणि च प्रभुः।
कारयामास मैत्रेय ब्रह्मत्वं च यथास्थिति॥ १४
सोऽयमेको यथा वेदस्तरुस्तेन पृथक्कृतः।
चतुर्थाथ ततो जातं वेदपादपकाननम्॥ १५
बिभेदं प्रथमं विप्र पैलो ऋग्वेदपादपम्।
इन्द्रप्रमितये प्रादाद्भाष्कलाय च संहिते॥ १६
चतुर्धा स बिभेदाथ बाष्कलोऽपि च संहिताम्।
बोध्यादिभ्यो ददौ ताश्च शिष्येभ्यस्स महामुनिः॥ १७
बोध्याग्निमाढकौ तद्वद्याज्ञवल्क्यपराशरौ।
प्रतिशाखास्तु शाखायास्तस्यास्ते जगृहुर्मुने॥ १८
इन्द्रप्रमितिरेकां तु संहितां स्वसुतं ततः।
माण्डुकेयं महात्मानं मैत्रेयाध्यापयत्तदा॥ १९
तस्य शिष्यप्रशिष्येभ्यः पुत्रशिष्यक्रमाद्ययौ॥ २०


भगवान् कृष्णद्वैपायनको तुम साक्षात् नारायण ही समझो, क्योंकि हे मैत्रेय! संसारमें नारायणके अतिरिक्त और कौन महाभारतका रचयिता हो सकता है?॥ ५॥

हे मैत्रेय! द्वापरयुगमें मेरे पुत्र महात्मा कृष्णद्वैपायनने जिस प्रकार वेदोंका विभाग किया था वह यथावत् सुनो॥ ६॥ जब ब्रह्माजीकी प्रेरणासे व्यासजीने वेदोंका विभाग करनेका उपक्रम किया, तो उन्होंने वेदका अन्ततक अध्ययन करनेमें समर्थ चार ऋषियोंको शिष्य बनाया॥ ७॥ उनमेंसे उन महामुनिने पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद और जैमिनिको सामवेद पढ़ाया तथा उन मतिमान् व्यासजीका सुमन्तु नामक शिष्य अथर्ववेदका ज्ञाता हुआ॥ ८-९॥ इनके सिवा सूतजातीय महाबुद्धिमान् रोमहर्षणको महामुनि व्यासजीने अपने इतिहास और पुराणके विद्यार्थीरूपसे ग्रहण किया॥ १०॥

पूर्वकालमें यजुर्वेद एक ही था। उसके उन्होंने चार विभाग किये, अतः उसमें चातुर्होत्रकी प्रवृत्ति हुई और इस चातुर्होत्र-विधिसे ही उन्होंने यज्ञानुष्ठानकी व्यवस्था की॥ ११॥ व्यासजीने यजुःसे अध्वर्युके, ऋक्‌से होताके, सामसे उद्गाताके तथा अथर्ववेदसे ब्रह्माके कर्मकी स्थापना की॥ १२॥ तदनन्तर उन्होंने ऋक् तथा यजुःश्रुतियोंका उद्धार करके ऋग्वेद एवं यजुर्वेदकी और सामश्रुतियोंसे सामवेदकी रचना की॥ १३॥ हे मैत्रेय! अथर्ववेदके द्वारा भगवान् व्यासजीने सम्पूर्ण राज-कर्म और ब्रह्मत्वकी यथावत् व्यवस्था की॥ १४॥ इस प्रकार व्यासजीने वेदरूप एक वृक्षके चार विभाग कर दिये फिर विभक्त हुए उन चारोंसे वेदरूपी वृक्षोंका वन उत्पन्न हुआ॥ १५॥

हे विप्र! पहले पैलने ऋग्वेदरूप वृक्षके दो विभाग किये और उन दोनों शाखाओंको अपने शिष्य इन्द्रप्रमिति और बाष्कलको पढ़ाया॥ १६॥ फिर बाष्कलने भी अपनी शाखाके चार भाग किये और उन्हें बोध्य आदि अपने शिष्योंको दिया॥ १७॥ हे मुने! बाष्कलकी शाखाकी उन चारों प्रतिशाखाओंको उनके शिष्य बोध्य, अग्निमाढक, याज्ञवल्क्य और पराशरने ग्रहण किया॥ १८॥ हे मैत्रेयजी! इन्द्रप्रमितिने अपनी प्रतिशाखाको अपने पुत्र महात्मा माण्डुकेयको पढ़ाया॥ १९॥ इस प्रकार शिष्य-प्रशिष्य-क्रमसे उस शाखाका उनके पुत्र और शिष्योंमें प्रचार हुआ। इस


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१८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५


वेदमित्रस्तु शाकल्यः संहितां तामधीतवान्।<br>चकार संहिताः पञ्च शिष्येभ्यः प्रददौ च ताः॥ २१<br>तस्य शिष्यास्तु ये पञ्च तेषां नामानि मे शृणु।<br>मुद्गलो गोमुखश्चैव वात्स्यश्शालीय एव च।<br>शरीरः पञ्चमश्चासीन्मैत्रेय सुमहामतिः॥ २२<br>संहितात्रितयं चक्रे शाकपूर्णस्तथेतरः।<br>निरुक्तमकरोत्तद्वच्चतुर्थं मुनिसत्तम॥ २३<br>क्रौञ्चो वैतालिकस्तद्वद्बलाकश्च महामुनिः।<br>निरुक्तकृच्चतुर्थोऽभूद्वेदवेदाङ्गपारगः॥ २४<br>इत्येताः प्रतिशाखाभ्यो ह्यनुशाखा द्विजोत्तम।<br>बाष्कलश्चापरास्तिस्रस्संहिताः कृतवान्द्विज।<br>शिष्यः कालायनिर्गार्य्यस्तृतीयश्च कथाजवः॥ २५<br>इत्येते बह्वृचाः प्रोक्ताः संहिता यैः प्रवर्तिताः॥ २६शिष्य-परम्परासे ही शाकल्य वेदमित्रने उस संहिताको पढ़ा और उसको पाँच अनुशाखाओंमें विभक्त कर अपने पाँच शिष्योंको पढ़ाया॥ २०-२१॥ उसके जो पाँच शिष्य थे उनके नाम सुनो। हे मैत्रेय! वे मुद्गल, गोमुख, वात्स्य और शालीय तथा पाँचवें महामति शरीर थे॥ २२॥ हे मुनिसत्तम! उनके एक दूसरे शिष्य शाकपूर्णने तीन वेदसंहिताओंकी तथा चौथे एक निरुक्त-ग्रन्थकी रचना की॥ २३॥ [उन संहिताओंका अध्ययन करनेवाले उनके शिष्य] महामुनि क्रौंच, वैतालिक और बलाक थे तथा [निरुक्तका अध्ययन करनेवाले] एक चौथे शिष्य वेद-वेदांगके पारगामी निरुक्तकार हुए॥ २४॥ इस प्रकार वेदरूप वृक्षकी प्रतिशाखाओंसे अनुशाखाओंकी उत्पत्ति हुई। हे द्विजोत्तम! बाष्कलने और भी तीन संहिताओंकी रचना की। उनके [उन संहिताओंको पढ़नेवाले] शिष्य कालायनि, गार्ग्य तथा कथाजव थे। इस प्रकार जिन्होंने संहिताओंकी रचना की वे बह्वृच कहलाये॥ २५-२६॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥


पाँचवाँ अध्याय

शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजुःशाखाओंका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
यजुर्वेदतरोश्शाखास्सप्तविंशनमहामुनिः।<br>वैशम्पायननामासौ व्यासशिष्यश्चकार वै॥ १<br>शिष्येभ्यः प्रददौ ताश्च जगृहुस्तेऽप्यनुक्रमात्॥ २<br>याज्ञवल्क्यस्तु तत्राभूद्ब्रह्मरातसुतो द्विज।<br>शिष्यः परमधर्मज्ञो गुरुवृत्तिपरस्सदा॥ ३<br>ऋषिर्योऽद्य महामेरोः समाजे नागमिष्यति।<br>तस्य वै सप्तरात्रात्तु ब्रह्महत्या भविष्यति॥ ४<br>पूर्वमेवं मुनिगणैस्समयो यः कृतो द्विज।<br>वैशम्पायन एकस्तु तं व्यतिक्रान्तवांस्तदा॥ ५<br>स्वस्त्रीयं बालकं सोऽथ पदा स्पृष्टमघातयत्॥ ६<br>शिष्यानाह स भो शिष्या ब्रह्महत्यापहं व्रतम्।<br>चरध्वं मत्कृते सर्वे न विचार्यमिदं तथा॥ ७हे महामुने! व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनने यजुर्वेदरूपी वृक्षकी सत्ताईस शाखाओंकी रचना की; और उन्हें अपने शिष्योंको पढ़ाया तथा शिष्योंने भी क्रमशः ग्रहण किया॥ १-२॥ हे द्विज! उनका एक परम धार्मिक और सदैव गुरुसेवामें तत्पर रहनेवाला शिष्य ब्रह्मरातका पुत्र याज्ञवल्क्य था॥ ३॥ [एक समय समस्त ऋषिगणने मिलकर यह नियम किया कि] जो कोई महामेरुपर स्थित हमारे इस समाजमें सम्मिलित न होगा उसको सात रात्रियोंके भीतर ही ब्रह्महत्या लगेगी॥ ४॥ हे द्विज! इस प्रकार मुनियोंने पहले जिस समयको नियत किया था उसका केवल एक वैशम्पायनने ही अतिक्रमण कर दिया॥ ५॥ इसके पश्चात् उन्होंने [प्रमादवश] पैरसे छूए हुए अपने भानजेकी हत्या कर डाली; तब उन्होंने अपने शिष्योंसे कहा—'हे शिष्यगण! तुम सब लोग किसी प्रकारका विचार न करके मेरे लिये ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला व्रत करो'॥ ६-७॥

अ० ५] * तृतीय अंश * १८१


अथाह याज्ञवल्क्यस्तु किमेभिर्भगवन्द्विजैः।<br>क्लेशितैरल्पतेजोभिश्चरिष्येऽहमिदं व्रतम्॥ ८तब याज्ञवल्क्य बोले—"भगवन्! ये सब ब्राह्मण अत्यन्त निस्तेज हैं, इन्हें कष्ट देनेकी क्या आवश्यकता है? मैं अकेला ही इस व्रतका अनुष्ठान करूँगा"॥ ८॥
ततः क्रुद्धो गुरुः प्राह याज्ञवल्क्यं महामुनिम्।<br>मुच्यतां यत्त्वयाधीतं मत्तो विप्रावमानक॥ ९<br>निस्तेजसो वदस्येनान्यत्त्वं ब्राह्मणपुङ्गवान्।<br>तेन शिष्येण नार्थोऽस्ति ममाज्ञाभङ्गकारिणा॥ १०इससे गुरु वैशम्पायनजीने क्रोधित होकर महामुनि याज्ञवल्क्यसे कहा—"अरे ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले ! तूने मुझसे जो कुछ पढ़ा है, वह सब त्याग दे॥ ९॥ तू इन समस्त द्विजश्रेष्ठोंको निस्तेज बताता है, मुझे तुझ-जैसे आज्ञा-भंगकारी शिष्यसे कोई प्रयोजन नहीं है"॥ १०॥
याज्ञवल्क्यस्ततः प्राह भक्त्यैतत्ते मयोदितम्।<br>ममाप्यलं त्वयाधीतं यन्मया तदिदं द्विज॥ ११याज्ञवल्क्यने कहा—"हे द्विज! मैंने तो भक्तिवश आपसे ऐसा कहा था, मुझे भी आपसे कोई प्रयोजन नहीं है; लीजिये, मैंने आपसे जो कुछ पढ़ा है वह यह मौजूद है"॥ ११॥
श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तो रुधिराक्तानि सरूपाणि यजूंषि सः।<br>छर्दयित्वा ददौ तस्मै ययौ स स्वेच्छया मुनिः॥ १२श्रीपराशरजी बोले—ऐसा कह महामुनि याज्ञवल्क्यजीने रुधिरसे भरा हुआ मूर्तिमान् यजुर्वेद वमन करके उन्हें दे दिया; और स्वेच्छानुसार चले गये॥ १२॥
यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज।<br>जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः॥ १३हे द्विज! याज्ञवल्क्यद्वारा वमन की हुई उन यजुःश्रुतियोंको अन्य शिष्योंने तित्तिर (तीतर) होकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तिरीय कहलाये॥ १३॥
ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं गुरुणा चोदितैस्तु यैः।<br>चरकाध्वर्यवस्ते तु चरणान्मुनिसत्तम॥ १४हे मुनिसत्तम! जिन विप्रगणने गुरुकी प्रेरणासे ब्रह्महत्या विनाशकव्रतका अनुष्ठान किया था, वे सब व्रताचरणके कारण यजुःशाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए॥ १४॥
याज्ञवल्क्योऽपि मैत्रेय प्राणायामपरायणः।<br>तुष्टाव प्रयतस्सूर्यं यजूंष्यभिलषंस्ततः॥ १५तदनन्तर याज्ञवल्क्यने भी यजुर्वेदकी प्राप्तिकी इच्छासे प्राणोंका संयम कर संयतचित्तसे सूर्यभगवान्की स्तुति की॥ १५॥
याज्ञवल्क्य उवाच<br>नमस्सवित्रे द्वाराय मुक्तेरमिततेजसे।<br>ऋग्यजुस्सामभूताय त्रयीधाम्ने च ते नमः॥ १६याज्ञवल्क्यजी बोले—अतुलित तेजस्वी, मुक्तिके द्वारस्वरूप तथा वेदत्रयरूप तेजसे सम्पन्न एवं ऋक्, यजुः तथा सामस्वरूप सवितादेवको नमस्कार है॥ १६॥
नमोऽग्नीषोमभूताय जगतः कारणात्मने।<br>भास्कराय परं तेजस्सौषुम्नरूचिबिभ्रते॥ १७जो अग्निऔर चन्द्रमारूप, जगत्के कारण और सुषुम्न नामक परमतेजको धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् भास्करको नमस्कार है॥ १७॥
कलाकाष्ठानिमेषादिकालज्ञानात्मरूपिणे।<br>ध्येयाय विष्णुरूपाय परमाक्षररूपिणे॥ १८कला, काष्ठा, निमेष आदि कालज्ञानके कारण तथा ध्यान करनेयोग्य परब्रह्मस्वरूप विष्णुमय श्रीसूर्यदेवको नमस्कार है॥ १८॥
बिभर्त्ति यस्सूरगणानाप्यायेन्दुं स्वरश्मिभिः।<br>स्वधामृतेन च पितॄंस्तस्मै तृप्यात्मने नमः॥ १९जो अपनी किरणोंसे चन्द्रमाको पोषित करते हुए देवताओंको तथा स्वधारूप अमृतसे पितृगणको तृप्त करते हैं, उन तृप्तिरूप सूर्यदेवको नमस्कार है॥ १९॥
हिमाम्बुघर्मवृष्टीनां कर्ता भर्ता च यः प्रभुः।<br>तस्मै त्रिकालरूपाय नमस्सूर्याय वेधसे॥ २०जो हिम, जल और उष्णताके कर्ता [अर्थात् शीत, वर्षा और ग्रीष्म आदि ऋतुओंके कारण] हैं और [जगत्का] पोषण करनेवाले हैं, उन त्रिकालमूर्ति विधाता भगवान् सूर्यको नमस्कार है॥ २०॥
अपहन्ति तमो यश्च जगतोऽस्य जगत्पतिः।<br>सत्त्वधामधरो देवो नमस्तस्मै विवस्वते॥ २१जो जगत्पति इस सम्पूर्ण जगत्के अन्धकारको दूर करते हैं, उन सत्त्वमूर्तिधारी-विवस्वान्‌को नमस्कार है॥ २१॥
सत्कर्मयोग्यो न जनो नैवापः शुद्धिकारणम्।<br>यस्मिन्ननुदिते तस्मै नमो देवाय भास्वते॥ २२जिनके उदित हुए बिना मनुष्य सत्कर्ममें प्रवृत्त नहीं हो सकते और जल शुद्धिका कारण नहीं हो सकता, उन भास्वान्देवको नमस्कार है॥ २२॥
१८२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ६

स्पृष्टो यदंशुभिर्लोकः क्रियायोग्यो हि जायते।
पवित्रताकारणाय तस्मै शुद्धात्मने नमः ॥ २३

जिनके किरण-समूहका स्पर्श होनेपर लोक कर्मानुष्ठानके योग्य होता है, उन पवित्रताके कारण, शुद्धस्वरूप सूर्यदेवको नमस्कार है॥ २३॥

नमः सवित्रे सूर्याय भास्कराय विवस्वते।
आदित्यायादिभूताय देवादीनां नमो नमः ॥ २४

भगवान् सविता, सूर्य, भास्कर और विवस्वान्‌को नमस्कार है; देवता आदि समस्त भूतोंके आदिभूत आदित्यदेवको बारम्बार नमस्कार है॥ २४॥

हिरण्मयं रथं यस्य केतवोऽमृतवाजिनः।
वहन्ति भुवनालोकिचक्षुषं तं नमाम्यहम् ॥ २५

जिनका तेजोमय रथ है, [प्रज्ञारूप] ध्वजाएँ हैं, जिन्हें [छन्दोमय] अमर अश्वगण वहन करते हैं तथा जो त्रिभुवनको प्रकाशित करनेवाले नेत्ररूप हैं, उन सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २५॥

श्रीपराशर उवाच

श्रीपराशरजी बोले— उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर

इत्येवमादिभिस्तेन स्तूयमानस्स वै रविः।
वाजिरूपधरः प्राह व्रियतामिति वाञ्छितम् ॥ २६

भगवान् सूर्य अश्वरूपसे प्रकट होकर बोले—'तुम अपना अभीष्ट वर माँगो'॥ २६॥

याज्ञवल्क्यस्तदा प्राह प्रणिपत्य दिवाकरम्।
यजूंषि तानि मे देहि यानि सन्ति न मे गुरौ ॥ २७

तब याज्ञवल्क्यजीने उन्हें प्रणाम करके कहा—'आप मुझे उन यजुः श्रुतियोंका उपदेश कीजिये जिन्हें मेरे गुरुजी भी न जानते हों'॥ २७॥

एवमुक्तो ददौ तस्मै यजूंषि भगवान् रविः।
अयातयामसंज्ञानि यानि वेत्ति न तद्गुरुः ॥ २८

उनके ऐसा कहनेपर भगवान् सूर्यने उन्हें अयातयाम नामक यजुःश्रुतियोंका उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायनजी भी नहीं जानते थे ॥ २८ ॥

यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम।
वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽप्यश्वोऽभवद्यतः ॥ २९

हे द्विजोत्तम! उन श्रुतियोंको जिन ब्राह्मणोंने पढ़ा था वे वाजी नामसे विख्यात हुए क्योंकि उनका उपदेश करते समय सूर्य भी अश्वरूप हो गये थे ॥ २९॥

शाखाभेदास्तु तेषां वै दश पञ्च च वाजिनाम्।
काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्याः प्रकीर्तिताः ॥ ३०

हे महाभाग! उन वाजिश्रुतियोंकी काण्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं; वे सब शाखाएँ महर्षि याज्ञवल्क्यकी प्रवृत्त की हुई कही जाती हैं॥ ३०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥


छठा अध्याय

सामवेदकी शाखा, अठारह पुराण और चौदह विद्याओंके विभागका वर्णन

श्रीपराशर उवाच

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! जिस क्रमसे

सामवेदतरोश्शाखा व्यासशिष्यस्स जैमिनिः।
क्रमेण येन मैत्रेय बिभेद शृणु तन्मम ॥ १

व्यासजीके शिष्य जैमिनिने सामवेदकी शाखाओंका विभाग किया था, वह मुझसे सुनो ॥ १ ॥

सुमन्तुस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुकर्मास्याप्यभूत्सुतः।
अधीतवन्तौ चैकैकां संहितां तौ महामती ॥ २

जैमिनिका पुत्र सुमन्तु था और उसका पुत्र सुकर्मा हुआ। उन दोनों महामति पुत्र-पौत्रोंने सामवेदकी एक-एक शाखाका अध्ययन किया ॥ २॥

सहस्रसंहिताभेदं सुकर्मा तत्सुतस्ततः।
चकार तं च तच्छिष्यौ जगृहाते महाव्रतौ ॥ ३

हिरण्यनाभः कौशल्यः पौष्पिञ्जिश्च द्विजोत्तम।
उदीच्यास्सामगाः शिष्यास्तस्य पञ्चशतं स्मृताः ॥ ४

तदनन्तर सुमन्तुके पुत्र सुकर्माने अपनी सामवेदसंहिताके एक सहस्र शाखाभेद किये और हे द्विजोत्तम! उन्हें उसके कौसल्य हिरण्यनाभ तथा पौष्पिंजि नामक दो महाव्रती शिष्योंने ग्रहण किया। हिरण्यनाभके पाँच सौ शिष्य थे जो उदीच्य सामग कहलाये ॥ ३-४॥

अ० ६ ] * तृतीय अंश * १८३


हिरण्यनाभात्तावत्यस्संहिता यैर्द्विजोत्तमैः।
गृहीतास्तेऽपि चोच्यन्ते पण्डितैः प्राच्यसामगाः॥ ५
लोकाक्षिनौधमिश्चैव कक्षीवाँल्लाङ्गलिस्तथा।
पौष्पिञ्जिशिष्यास्तद्भेदैस्संहिता बहुलीकृताः॥ ६
हिरण्यनाभशिष्यस्तु चतुर्विंशतिसंहिताः।
प्रोवाच कृतिनामासौ शिष्येभ्यश्च महामुनिः॥ ७
तैश्चापि सामवेदोऽसौ शाखाभिर्बहुलीकृतः।
अथर्वणामथो वक्ष्ये संहितानां समुच्चयम्॥ ८
अथर्ववेदं स मुनिस्सुमन्तुर्मितद्युतिः।
शिष्यमध्यापयामास कबन्धं सोऽपि तं द्विधा।
कृत्वा तु देवदर्शाय तथा पथ्याय दत्तवान्॥ ९
देवदर्शस्य शिष्यास्तु मेधोब्रह्मबलिस्तथा।
शौल्कायनिः पिप्पलादस्तथान्यौ द्विजसत्तम॥ १०
पथ्यस्यापि त्रयश्शिष्याः कृता यैर्द्विज संहिताः।
जाबालिः कुमुदादिश्च तृतीयश्शौनको द्विज॥ ११
शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावेकां तु बभ्रवे।
द्वितीयां संहितां प्रादात्सैन्धवाय च संज्ञिने॥ १२
सैन्धवान्मुञ्जिकेशश्च द्वेधाभिन्नास्त्रिधा पुनः।
नक्षत्रकल्पो वेदानां संहितानां तथैव च॥ १३
चतुर्थस्स्यादांगिरसश्शान्तिकल्पश्च पञ्चमः।
श्रेष्ठास्त्वथर्वणामेते संहितानां विकल्पकाः॥ १४
आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः।
पुराणसंहितां चक्रे पुराणार्थविशारदः॥ १५
प्रख्यातो व्यासशिष्योऽभूत्सूतो वै रोमहर्षणः।
पुराणसंहितां तस्मै ददौ व्यासो महामतिः॥ १६
सुमतिश्चाग्निवर्चाश्च मित्रायुश्शांसपायनः।
अकृतव्रणसावर्णी षट् शिष्यास्तस्य चाभवन्॥ १७
काश्यपः संहिताकर्ता सावर्णिश्चांशपायनः।
रोमहर्ष णिका चान्या तिसॄणां मूलसंहिता॥ १८
चतुष्टयेन भेदेन संहितानामिदं मुने॥ १९
आद्यं सर्वपुराणानां पुराणं ब्राह्ममुच्यते।
अष्टादशपुराणानि पुराणज्ञाः प्रचक्षते॥ २०


इसी प्रकार जिन अन्य द्विजोत्तमोंने इतनी ही संहिताएँ हिरण्यनाभसे और ग्रहण कीं उन्हें पण्डितजन प्राच्य सामग कहते हैं॥ ५॥ पौष्पिंजिके शिष्य लोकाक्षि, नौधमि, कक्षीवान् और लांगलि थे। उनके शिष्य-प्रशिष्योंने अपनी-अपनी संहिताओंके विभाग करके उन्हें बहुत बढ़ा दिया॥ ६॥ महामुनि कृति नामक हिरण्यनाभके एक और शिष्यने अपने शिष्योंको सामवेदकी चौबीस संहिताएँ पढ़ायीं॥ ७॥ फिर उन्होंने भी इस सामवेदका शाखाओं‌द्वारा खूब विस्तार किया। अब मैं अथर्ववेदकी संहिताओंके समुच्चयका वर्णन करता हूँ॥ ८॥

अथर्ववेदको सर्वप्रथम अमिततेजोमय सुमन्तु मुनिने अपने शिष्य कबन्धको पढ़ाया था, फिर कबन्धने उसके दो भाग कर उन्हें देवदर्श और पथ्य नामक अपने शिष्योंको दिया॥ ९॥ हे द्विजसत्तम! देवदर्शके शिष्य मेध, ब्रह्मबलि, शौल्कायनि और पिप्पलाद थे॥ १०॥ हे द्विज! पथ्यके भी जाबालि, कुमुदादि और शौनक नामक तीन शिष्य थे, जिन्होंने संहिताओंका विभाग किया॥ ११॥ शौनकने भी अपनी संहिताके दो विभाग करके उनमेंसे एक बभ्रुको तथा दूसरी सैन्धव नामक अपने शिष्यको दी॥ १२॥ सैन्धवसे पढ़कर मुंजिकेशने अपनी संहिताके पहले दो और फिर तीन [इस प्रकार पाँच] विभाग किये। नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहितानकल्प, आंगिरसकल्प और शान्तिकल्प—उनके रचे हुए ये पाँच विकल्प अथर्ववेद-संहिताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥ १३-१४॥

तदनन्तर पुराणार्थविशारद व्यासजीने आख्यान, उपाख्यान, गाथा और कल्पशुद्धिके सहित पुराणसंहिताकी रचना की॥ १५॥ रोमहर्षण सूत व्यासजीके प्रसिद्ध शिष्य थे। महामति व्यासजीने उन्हें पुराणसंहिताका अध्ययन कराया॥ १६॥ उन सूतजीके सुमति, अग्निवर्चा, मित्रायु, शांसपायन, अकृतव्रण और सावर्णि—ये छः शिष्य थे॥ १७॥ काश्यपगोत्रीय अकृतव्रण, सावर्णि और शांसपायन—ये तीनों संहिताकर्ता हैं। उन तीनों संहिताओंकी आधार एक रोमहर्षणजीकी संहिता है। हे मुने! इन चारों संहिताओंकी सारभूत मैंने यह विष्णुपुराणसंहिता बनायी है॥ १८-१९॥ पुराणज्ञ पुरुष कुल अठारह पुराण बतलाते हैं; उन सबमें प्राचीनतम ब्रह्मपुराण है॥ २०॥


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१८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा।<br>तथान्यं नारदीयं च मार्कण्डेयं च सप्तमम्॥ २१<br>आग्नेयमष्टमं चैव भविष्यन्नवमं स्मृतम्।<br>दशमं ब्रह्मवैवर्त्तं लैङ्गमेकादशं स्मृतम्॥ २२<br>वाराहं द्वादशं चैव स्कान्दं चात्र त्रयोदशम्।<br>चतुर्दशं वामनं च कौर्मं पञ्चदशं तथा॥ २३<br>मात्स्यं च गारुडं चैव ब्रह्माण्डं च ततः परम्।<br>महापुराणान्येतानि ह्यष्टादश महामुने॥ २४प्रथम पुराण ब्राह्म है, दूसरा पाद्म, तीसरा वैष्णव, चौथा शैव, पाँचवाँ भागवत, छठा नारदीय और सातवाँ मार्कण्डेय है॥ २१॥ इसी प्रकार आठवाँ आग्नेय, नवाँ भविष्यत्, दसवाँ ब्रह्मवैवर्त्त और ग्यारहवाँ पुराण लैङ्ग कहा जाता है॥ २२॥ तथा बारहवाँ वाराह, तेरहवाँ स्कान्द, चौदहवाँ वामन, पन्द्रहवाँ कौर्म, तथा इनके पश्चात् मात्स्य, गारुड और ब्रह्माण्डपुराण हैं। हे महामुने! ये ही अठारह महापुराण हैं॥ २३-२४॥
तथा चोपपुराणानि मुनिभिः कथितानि च।<br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च।<br>सर्वेष्वेतेषु कथ्यन्ते वंशानुचरितं च यत्॥ २५इनके अतिरिक्त मुनिजनोंने और भी अनेक उपपुराण बतलाये हैं। इन सभीमें सृष्टि, प्रलय, देवता आदिकोंके वंश, मन्वन्तर और भिन्न-भिन्न राजवंशोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है॥ २५॥
यदेतत्तव मैत्रेय पुराणं कथ्यते मया।<br>एतद्वैष्णवसंज्ञं वै पाद्मस्य समनन्तरम्॥ २६हे मैत्रेय! जिस पुराणको मैं तुम्हें सुना रहा हूँ वह पाद्मपुराणके अनन्तर कहा हुआ वैष्णव नामक महापुराण है॥ २६॥
सर्गे च प्रतिसर्गे च वंशमन्वन्तरादिषु।<br>कथ्यते भगवान्विष्णुरशेषेष्वेव सत्तम॥ २७हे साधुश्रेष्ठ! इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश और मन्वन्तरादिका वर्णन करते हुए सर्वत्र केवल विष्णुभगवान्‌का ही वर्णन किया गया है॥ २७॥
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।<br>पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥ २८छः वेदांग, चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र—ये ही चौदह विद्याएँ हैं॥ २८॥
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।<br>अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः॥ २९<br>ज्ञेया ब्रह्मर्षयः पूर्वं तेभ्यो देवर्षयः पुनः।<br>राजर्षयः पुनस्तेभ्य ऋषिप्रकृतयस्त्रयः॥ ३०इन्हींमें आयुर्वेद, धनुर्वेद और गान्धर्व इन तीनोंको तथा चौथे अर्थशास्त्रको मिला लेनेसे कुल अठारह विद्याएँ हो जाती हैं। ऋषियोंके तीन भेद हैं—प्रथम ब्रह्मर्षि, द्वितीय देवर्षि और फिर राजर्षि॥ २९-३०॥
इति शाखास्समाख्याताश्शाखाभेदास्तथैव च।<br>कर्तारश्चैव शाखानां भेदहेतुस्तथोदितः॥ ३१इस प्रकार मैंने तुमसे वेदोंकी शाखा, शाखाओंके भेद, उनके रचयिता तथा शाखाभेदके कारणोंका भी वर्णन कर दिया॥ ३१॥
सर्वमन्वन्तरेष्वेवं शाखाभेदास्समाः स्मृताः।<br>प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या तद्विकल्पास्त्विमे द्विज॥ ३२इसी प्रकार समस्त मन्वन्तरोंमें एक-से शाखाभेद रहते हैं; हे द्विज! प्रजापति ब्रह्माजीसे प्रकट होनेवाली श्रुति तो नित्य है, ये तो उसके विकल्पमात्र हैं॥ ३२॥
एतत्ते कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>मैत्रेय वेदसम्बन्धः किमन्यत्कथयामि ते॥ ३३हे मैत्रेय! वेदके सम्बन्धमें तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था वह मैंने सुना दिया; अब और क्या कहूँ?॥ ३३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

अ० ७ ] * तृतीय अंश * १८५


सातवाँ अध्याय

यमगीता

श्रीमैत्रेय उवाच**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे गुरो ! मैंने जो कुछ पूछा
यथावत्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया गुरो ।था वह सब आपने यथावत् वर्णन किया। अब मैं
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वेकं तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥ १एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥ हे महामुने ! सातों द्वीप, सातों पाताल
सप्त द्वीपानि पातालविधयश्च महामुने ।और सातों लोक—ये सभी स्थान जो इस ब्रह्माण्डके
सप्तलोकाश्च येऽन्तःस्था ब्रह्माण्डस्यास्य सर्वतः ॥ २अन्तर्गत हैं, स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा
स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मसूक्ष्मात्सूक्ष्मतैरैस्तथा ।स्थूल और स्थूलतर जीवोंसे भरे हुए हैं ॥ २-३ ॥ हे
स्थूलात्स्थूलतरैश्चैव सर्वं प्राणिभिरावृतम् ॥ ३मुनिसत्तम ! एक अंगुलका आठवाँ भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ कर्म-बन्धनसे बँधे हुए जीव न
अंगुलस्याष्टभागोऽपि न सोऽस्ति मुनिसत्तम ।रहते हों ॥ ४ ॥ किंतु हे भगवन् ! आयुके समाप्त होनेपर
न सन्ति प्राणिनो यत्र कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥ ४ये सभी यमराजके वशीभूत हो जाते हैं और उन्हींके
सर्वे चैते वशं यान्ति यमस्य भगवन् किल ।आदेशानुसार नरक आदि नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगते हैं ॥ ५ ॥ तदनन्तर पाप-भोगके समाप्त होनेपर
आयुषोऽन्ते तथा यान्ति यातनास्तत्प्रचोदिताः ॥ ५वे देवादि योनियोंमें घूमते रहते हैं—सकल शास्त्रोंका
यातनाभ्यः परिभ्रष्टा देवाद्यास्वथ योनिषु ।ऐसा ही मत है ॥ ६ ॥ अतः आप मुझे वह कर्म
जन्तवः परिवर्तन्ते शास्त्राणामेष निर्णयः ॥ ६बताइये जिसे करनेसे मनुष्य यमराजके वशीभूत नहीं
सोऽहमिच्छामि तच्छ्रोतुं यमस्य वशवर्तिनः ।होता; मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥
न भवन्ति नरा येन तत्कर्म कथयस्व मे ॥ ७**श्रीपराशरजी बोले—**हे मुने ! यही प्रश्न महात्मा
श्रीपराशर उवाचनकुलने पितामह भीष्मसे पूछा था। उसके उत्तरमें
अयमेव मुने प्रश्नो नकुलेन महात्मना ।उन्होंने जो कुछ कहा था वह सुनो ॥ ८ ॥
पृष्टः पितामहः प्राह भीष्मो यत्तच्छृणुष्व मे ॥ ८**भीष्मजीने कहा—**हे वत्स ! पूर्वकालमें मेरे पास एक कलिंगदेशीय ब्राह्मण-मित्र आया और मुझसे
भीष्म उवाचबोला—'मेरे पूछनेपर एक जातिस्मर मुनिने बतलाया
पुरा ममागतो वत्स सखा कालिङ्गको द्विजः ।था कि ये सब बातें अमुक-अमुक प्रकार ही होंगी।'
स मामुवाच पृष्टो वै मया जातिस्मरो मुनिः ॥ ९हे वत्स ! उस बुद्धिमान्ने जो-जो बातें जिस-जिस प्रकार होनेको कही थीं वे सब ज्यों-की-त्यों हुईं ॥ ९-१० ॥
तेनाख्यातमिदं सर्वमित्थं चैतद्भविष्यति ।इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जानेसे मैंने उससे
तथा च तदभूद्वत्स यथोक्तं तेन धीमता ॥ १०फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तरमें उस द्विजश्रेष्ठने जो-जो बातें बतलायीं उनके
स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्दधानेन वै द्विजः ।विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा ॥ ११ ॥ एक दिन,
यद्यदाह न तद्द्द्ष्टमन्यथा हि मया क्वचित् ॥ ११जो बात तुम मुझसे पूछते हो वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मणसे पूछी। उस समय उसने उस मुनिके वचनोंको
एकदा तु मया पृष्टमेतद्यद्भवतोदितम् ।याद करके कहा कि उस जातिस्मर ब्राह्मणने,
प्राह कालिङ्गको विप्रस्स्मृत्वा तस्य मुनेर्वचः ॥ १२यम और उनके दूतोंके बीचमें जो संवाद हुआ था,
जातिस्मरेण कथितो रहस्यः परमो मम ।वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था। वही मैं तुमसे
यमकिङ्करयोर्योऽभूत्संवादस्तं ब्रवीमि ते ॥ १३कहता हूँ ॥ १२-१३ ॥

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१८६* श्रीविष्णुपुराण *[अ० ७

कालिङ्ग उवाच

स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं
वदति यमः किल तस्य कर्णमूले।
परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्-
प्रभुरहमन्यनृणामवैष्णवानाम्॥ १४

अहममरवरार्चितेन धात्रा
यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः।
हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः
प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः॥ १५

कटकमुकुटकर्णिकादिभेदैः
कनकमभेदमपीष्यते यथैकम्।
सुरपशुमनुजादिकल्पनाभि-
र्हरिरखिलाभिरुदीर्यते तथैकः॥ १६

क्षितितलपरमाणवोऽनिलान्ते
पुनरुपयान्ति यथैकतां धरित्र्याः।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन॥ १७

हरिममरवरार्चिताङ्घ्रिपद्मं
प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः।
तमपगतसमस्तपापबन्धं
व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम्॥ १८

इति यमवचनं निशम्य पाशी
यमपुरुषस्तमुवाच धर्मराजम्।
कथय मम विभो समस्तधातु-
र्भवति हरेः खलु यादृशोऽस्य भक्तः॥ १९

यम उवाच

न चलति निजवर्णधर्मतो यः
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।
न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम्॥ २०

कलिकलुषमलेन यस्य नात्मा
विमलमतेर्मलिनीकृतस्तमेनम्।
मनसि कृतजनार्दनं मनुष्यं
सततमवेहि हरेरतीवभक्तम्॥ २१


कालिङ्ग बोला—अपने अनुचरको हाथमें पाश लिये देखकर यमराजने उसके कानमें कहा—'भगवान् मधुसूदनके शरणागत व्यक्तियोंको छोड़ देना, क्योंकि मैं वैष्णवोंसे अतिरिक्त और सब मनुष्योंका ही स्वामी हूँ॥ १४॥ देव-पूज्य विधाताने मुझे 'यम' नामसे लोकोंके पाप-पुण्यका विचार करनेके लिये नियुक्त किया है। मैं अपने गुरु श्रीहरिके वशीभूत हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान् विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करनेमें समर्थ हैं॥ १५॥ जिस प्रकार सुवर्ण भेदरहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदिके भेदसे नानारूप प्रतीत होता है उसी प्रकार एक ही हरिका देवता, मनुष्य और पशु आदि नाना-विध कल्पनाओंसे निर्देश किया जाता है॥ १६॥

जिस प्रकार वायुके शान्त होनेपर उसमें उड़ते हुए परमाणु पृथिवीसे मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार गुण-क्षोभसे उत्पन्न हुए समस्त देवता, मनुष्य और पशु आदि [उसका अन्त हो जानेपर] उस सनातन परमात्मामें लीन हो जाते हैं॥ १७॥ जो भगवान्‌के सुरवरवन्दित चरण-कमलोंकी परमार्थ-बुद्धिसे वन्दना करता है, घृताहुतिसे प्रज्वलित अग्निके समान समस्त पाप-बन्धनसे मुक्त हुए उस पुरुषको तुम दूरहीसे छोड़कर निकल जाना'॥ १८॥

यमराजके ऐसे वचन सुनकर पाशहस्त यमदूतने उनसे पूछा—'प्रभो! सबके विधाता भगवान् हरिका भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिये'॥ १९॥

यमराज बोले—जो पुरुष अपने वर्ण-धर्मसे विचलित नहीं होता, अपने सुहृद् और विपक्षियोंके प्रति समान भाव रखता है, किसीका द्रव्य हरण नहीं करता तथा किसी जीवकी हिंसा नहीं करता उस अत्यन्त रागादि-शून्य और निर्मलचित्त व्यक्तिको भगवान् विष्णुका भक्त जानो॥ २०॥ जिस निर्मलमतिका चित्त कलि-कल्मषरूप मलसे मलिन नहीं हुआ और जिसने अपने हृदयमें श्रीजनार्दनको बसाया हुआ है उस मनुष्यको भगवान्‌का अतीव भक्त समझो॥ २१॥