विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ५] * तृतीय अंश * १८१
| अथाह याज्ञवल्क्यस्तु किमेभिर्भगवन्द्विजैः।<br>क्लेशितैरल्पतेजोभिश्चरिष्येऽहमिदं व्रतम्॥ ८ | तब याज्ञवल्क्य बोले—"भगवन्! ये सब ब्राह्मण अत्यन्त निस्तेज हैं, इन्हें कष्ट देनेकी क्या आवश्यकता है? मैं अकेला ही इस व्रतका अनुष्ठान करूँगा"॥ ८॥ |
| ततः क्रुद्धो गुरुः प्राह याज्ञवल्क्यं महामुनिम्।<br>मुच्यतां यत्त्वयाधीतं मत्तो विप्रावमानक॥ ९<br>निस्तेजसो वदस्येनान्यत्त्वं ब्राह्मणपुङ्गवान्।<br>तेन शिष्येण नार्थोऽस्ति ममाज्ञाभङ्गकारिणा॥ १० | इससे गुरु वैशम्पायनजीने क्रोधित होकर महामुनि याज्ञवल्क्यसे कहा—"अरे ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले ! तूने मुझसे जो कुछ पढ़ा है, वह सब त्याग दे॥ ९॥ तू इन समस्त द्विजश्रेष्ठोंको निस्तेज बताता है, मुझे तुझ-जैसे आज्ञा-भंगकारी शिष्यसे कोई प्रयोजन नहीं है"॥ १०॥ |
| याज्ञवल्क्यस्ततः प्राह भक्त्यैतत्ते मयोदितम्।<br>ममाप्यलं त्वयाधीतं यन्मया तदिदं द्विज॥ ११ | याज्ञवल्क्यने कहा—"हे द्विज! मैंने तो भक्तिवश आपसे ऐसा कहा था, मुझे भी आपसे कोई प्रयोजन नहीं है; लीजिये, मैंने आपसे जो कुछ पढ़ा है वह यह मौजूद है"॥ ११॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तो रुधिराक्तानि सरूपाणि यजूंषि सः।<br>छर्दयित्वा ददौ तस्मै ययौ स स्वेच्छया मुनिः॥ १२ | श्रीपराशरजी बोले—ऐसा कह महामुनि याज्ञवल्क्यजीने रुधिरसे भरा हुआ मूर्तिमान् यजुर्वेद वमन करके उन्हें दे दिया; और स्वेच्छानुसार चले गये॥ १२॥ |
| यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज।<br>जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः॥ १३ | हे द्विज! याज्ञवल्क्यद्वारा वमन की हुई उन यजुःश्रुतियोंको अन्य शिष्योंने तित्तिर (तीतर) होकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तिरीय कहलाये॥ १३॥ |
| ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं गुरुणा चोदितैस्तु यैः।<br>चरकाध्वर्यवस्ते तु चरणान्मुनिसत्तम॥ १४ | हे मुनिसत्तम! जिन विप्रगणने गुरुकी प्रेरणासे ब्रह्महत्या विनाशकव्रतका अनुष्ठान किया था, वे सब व्रताचरणके कारण यजुःशाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए॥ १४॥ |
| याज्ञवल्क्योऽपि मैत्रेय प्राणायामपरायणः।<br>तुष्टाव प्रयतस्सूर्यं यजूंष्यभिलषंस्ततः॥ १५ | तदनन्तर याज्ञवल्क्यने भी यजुर्वेदकी प्राप्तिकी इच्छासे प्राणोंका संयम कर संयतचित्तसे सूर्यभगवान्की स्तुति की॥ १५॥ |
| याज्ञवल्क्य उवाच<br>नमस्सवित्रे द्वाराय मुक्तेरमिततेजसे।<br>ऋग्यजुस्सामभूताय त्रयीधाम्ने च ते नमः॥ १६ | याज्ञवल्क्यजी बोले—अतुलित तेजस्वी, मुक्तिके द्वारस्वरूप तथा वेदत्रयरूप तेजसे सम्पन्न एवं ऋक्, यजुः तथा सामस्वरूप सवितादेवको नमस्कार है॥ १६॥ |
| नमोऽग्नीषोमभूताय जगतः कारणात्मने।<br>भास्कराय परं तेजस्सौषुम्नरूचिबिभ्रते॥ १७ | जो अग्निऔर चन्द्रमारूप, जगत्के कारण और सुषुम्न नामक परमतेजको धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् भास्करको नमस्कार है॥ १७॥ |
| कलाकाष्ठानिमेषादिकालज्ञानात्मरूपिणे।<br>ध्येयाय विष्णुरूपाय परमाक्षररूपिणे॥ १८ | कला, काष्ठा, निमेष आदि कालज्ञानके कारण तथा ध्यान करनेयोग्य परब्रह्मस्वरूप विष्णुमय श्रीसूर्यदेवको नमस्कार है॥ १८॥ |
| बिभर्त्ति यस्सूरगणानाप्यायेन्दुं स्वरश्मिभिः।<br>स्वधामृतेन च पितॄंस्तस्मै तृप्यात्मने नमः॥ १९ | जो अपनी किरणोंसे चन्द्रमाको पोषित करते हुए देवताओंको तथा स्वधारूप अमृतसे पितृगणको तृप्त करते हैं, उन तृप्तिरूप सूर्यदेवको नमस्कार है॥ १९॥ |
| हिमाम्बुघर्मवृष्टीनां कर्ता भर्ता च यः प्रभुः।<br>तस्मै त्रिकालरूपाय नमस्सूर्याय वेधसे॥ २० | जो हिम, जल और उष्णताके कर्ता [अर्थात् शीत, वर्षा और ग्रीष्म आदि ऋतुओंके कारण] हैं और [जगत्का] पोषण करनेवाले हैं, उन त्रिकालमूर्ति विधाता भगवान् सूर्यको नमस्कार है॥ २०॥ |
| अपहन्ति तमो यश्च जगतोऽस्य जगत्पतिः।<br>सत्त्वधामधरो देवो नमस्तस्मै विवस्वते॥ २१ | जो जगत्पति इस सम्पूर्ण जगत्के अन्धकारको दूर करते हैं, उन सत्त्वमूर्तिधारी-विवस्वान्को नमस्कार है॥ २१॥ |
| सत्कर्मयोग्यो न जनो नैवापः शुद्धिकारणम्।<br>यस्मिन्ननुदिते तस्मै नमो देवाय भास्वते॥ २२ | जिनके उदित हुए बिना मनुष्य सत्कर्ममें प्रवृत्त नहीं हो सकते और जल शुद्धिका कारण नहीं हो सकता, उन भास्वान्देवको नमस्कार है॥ २२॥ |