विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| वेदमित्रस्तु शाकल्यः संहितां तामधीतवान्।<br>चकार संहिताः पञ्च शिष्येभ्यः प्रददौ च ताः॥ २१<br>तस्य शिष्यास्तु ये पञ्च तेषां नामानि मे शृणु।<br>मुद्गलो गोमुखश्चैव वात्स्यश्शालीय एव च।<br>शरीरः पञ्चमश्चासीन्मैत्रेय सुमहामतिः॥ २२<br>संहितात्रितयं चक्रे शाकपूर्णस्तथेतरः।<br>निरुक्तमकरोत्तद्वच्चतुर्थं मुनिसत्तम॥ २३<br>क्रौञ्चो वैतालिकस्तद्वद्बलाकश्च महामुनिः।<br>निरुक्तकृच्चतुर्थोऽभूद्वेदवेदाङ्गपारगः॥ २४<br>इत्येताः प्रतिशाखाभ्यो ह्यनुशाखा द्विजोत्तम।<br>बाष्कलश्चापरास्तिस्रस्संहिताः कृतवान्द्विज।<br>शिष्यः कालायनिर्गार्य्यस्तृतीयश्च कथाजवः॥ २५<br>इत्येते बह्वृचाः प्रोक्ताः संहिता यैः प्रवर्तिताः॥ २६ | शिष्य-परम्परासे ही शाकल्य वेदमित्रने उस संहिताको पढ़ा और उसको पाँच अनुशाखाओंमें विभक्त कर अपने पाँच शिष्योंको पढ़ाया॥ २०-२१॥ उसके जो पाँच शिष्य थे उनके नाम सुनो। हे मैत्रेय! वे मुद्गल, गोमुख, वात्स्य और शालीय तथा पाँचवें महामति शरीर थे॥ २२॥ हे मुनिसत्तम! उनके एक दूसरे शिष्य शाकपूर्णने तीन वेदसंहिताओंकी तथा चौथे एक निरुक्त-ग्रन्थकी रचना की॥ २३॥ [उन संहिताओंका अध्ययन करनेवाले उनके शिष्य] महामुनि क्रौंच, वैतालिक और बलाक थे तथा [निरुक्तका अध्ययन करनेवाले] एक चौथे शिष्य वेद-वेदांगके पारगामी निरुक्तकार हुए॥ २४॥ इस प्रकार वेदरूप वृक्षकी प्रतिशाखाओंसे अनुशाखाओंकी उत्पत्ति हुई। हे द्विजोत्तम! बाष्कलने और भी तीन संहिताओंकी रचना की। उनके [उन संहिताओंको पढ़नेवाले] शिष्य कालायनि, गार्ग्य तथा कथाजव थे। इस प्रकार जिन्होंने संहिताओंकी रचना की वे बह्वृच कहलाये॥ २५-२६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजुःशाखाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| यजुर्वेदतरोश्शाखास्सप्तविंशनमहामुनिः।<br>वैशम्पायननामासौ व्यासशिष्यश्चकार वै॥ १<br>शिष्येभ्यः प्रददौ ताश्च जगृहुस्तेऽप्यनुक्रमात्॥ २<br>याज्ञवल्क्यस्तु तत्राभूद्ब्रह्मरातसुतो द्विज।<br>शिष्यः परमधर्मज्ञो गुरुवृत्तिपरस्सदा॥ ३<br>ऋषिर्योऽद्य महामेरोः समाजे नागमिष्यति।<br>तस्य वै सप्तरात्रात्तु ब्रह्महत्या भविष्यति॥ ४<br>पूर्वमेवं मुनिगणैस्समयो यः कृतो द्विज।<br>वैशम्पायन एकस्तु तं व्यतिक्रान्तवांस्तदा॥ ५<br>स्वस्त्रीयं बालकं सोऽथ पदा स्पृष्टमघातयत्॥ ६<br>शिष्यानाह स भो शिष्या ब्रह्महत्यापहं व्रतम्।<br>चरध्वं मत्कृते सर्वे न विचार्यमिदं तथा॥ ७ | हे महामुने! व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनने यजुर्वेदरूपी वृक्षकी सत्ताईस शाखाओंकी रचना की; और उन्हें अपने शिष्योंको पढ़ाया तथा शिष्योंने भी क्रमशः ग्रहण किया॥ १-२॥ हे द्विज! उनका एक परम धार्मिक और सदैव गुरुसेवामें तत्पर रहनेवाला शिष्य ब्रह्मरातका पुत्र याज्ञवल्क्य था॥ ३॥ [एक समय समस्त ऋषिगणने मिलकर यह नियम किया कि] जो कोई महामेरुपर स्थित हमारे इस समाजमें सम्मिलित न होगा उसको सात रात्रियोंके भीतर ही ब्रह्महत्या लगेगी॥ ४॥ हे द्विज! इस प्रकार मुनियोंने पहले जिस समयको नियत किया था उसका केवल एक वैशम्पायनने ही अतिक्रमण कर दिया॥ ५॥ इसके पश्चात् उन्होंने [प्रमादवश] पैरसे छूए हुए अपने भानजेकी हत्या कर डाली; तब उन्होंने अपने शिष्योंसे कहा—'हे शिष्यगण! तुम सब लोग किसी प्रकारका विचार न करके मेरे लिये ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला व्रत करो'॥ ६-७॥ |