विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ३ ] * तृतीय अंश * १७७
| यस्मिन्मन्वन्तरे व्यासा ये ये स्युस्तान्निबोध मे।<br>यथा च भेदश्शाखानां व्यासेन क्रियते मुने॥ ८<br>अष्टाविंशतिकृत्वो वै वेदो व्यस्तो महर्षिभिः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्द्रापरेषु पुनः पुनः॥ ९<br>वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम।<br>चतुर्धा यैः कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः॥ १०<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्तस्स्वयं वेदः स्वयम्भुवा।<br>द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥ ११<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे च बृहस्पतिः।<br>सविता पञ्चमे व्यासः षष्ठे मृत्युस्मृतः प्रभुः॥ १२<br>सप्तमे च तथैवेन्द्रो वसिष्ठश्चाष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतश्च नवमे त्रिधामा दशमे स्मृतः॥ १३<br>एकादशे तु त्रिशिखो भरद्वाजस्ततः परः।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो वर्णी चापि चतुर्दशे॥ १४<br>त्रय्यारुणः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>ऋतुञ्जयः सप्तदशे तदूर्ध्वं च जयस्मृतः॥ १५<br>ततो व्यासो भरद्वाजो भरद्वाजाच्च गौतमः।<br>गौतमादुत्तरो व्यासो हर्यात्मा योऽभिधीयते॥ १६<br>अथ हर्यात्मनोऽन्ते च स्मृतो वाजश्रवा मुनिः।<br>सोमशुष्मायणस्तस्मात्तृणबिन्दुरिति स्मृतः॥ १७<br>ऋक्षोऽभूद्भागर्वस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते।<br>तस्मादस्मत्पिता शक्तिर्व्यासस्तस्मादहं मुने॥ १८<br>जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः।<br>अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः॥ १९<br>एको वेदश्चतुर्धा तु तैः कृतो द्वापरादिषु॥ २०<br>भविष्ये द्वापरे चापि द्रौणिर्व्यासो भविष्यति।<br>व्यतीते मम पुत्रेऽस्मिन् कृष्णद्वैपायने मुने॥ २१<br>ध्रुवमेकाक्षरं ब्रह्म ओमित्येव व्यवस्थितम्।<br>बृहत्वाद्वृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्मेत्यभिधीयते॥ २२<br>प्रणवावस्थितं नित्यं भूर्भुवस्स्वरितीर्यते।<br>ऋग्यजुस्सामाथर्वाणो यत्तस्मै ब्रह्मणे नमः॥ २३ | हे मुने! जिस-जिस मन्वन्तरमें जो-जो व्यास होते हैं और वे जिस-जिस प्रकार शाखाओंका विभाग करते हैं—वह मुझसे सुनो॥ ८॥ इस वैवस्वत-मन्वन्तरके प्रत्येक द्वापरयुगमें व्यास महर्षियोंने अबतक पुनः-पुनः अट्ठाईस बार वेदोंके विभाग किये हैं॥ ९॥ हे साधुश्रेष्ठ! जिन्होंने पुनः-पुनः द्वापरयुगमें वेदोंके चार-चार विभाग किये हैं उन अट्ठाईस व्यासोंका विवरण सुनो—॥ १०॥ पहले द्वापरमें स्वयं भगवान् ब्रह्माजीने वेदोंका विभाग किया था। दूसरे द्वापरके वेदव्यास प्रजापति हुए॥ ११॥ तीसरे द्वापरमें शुक्राचार्यजी और चौथेमें बृहस्पतिजी व्यास हुए तथा पाँचवेंमें सूर्य और छठेमें भगवान् मृत्यु व्यास कहलाये॥ १२॥ सातवें द्वापरके वेदव्यास इन्द्र, आठवेंके वसिष्ठ, नवेंके सारस्वत और दसवेंके त्रिधामा कहे जाते हैं॥ १३॥ ग्यारहवेंमें त्रिशिख, बारहवेंमें भरद्वाज, तेरहवेंमें अन्तरिक्ष और चौदहवेंमें वर्णी नामक व्यास हुए॥ १४॥ पन्द्रहवेंमें त्रय्यारुण, सोलहवेंमें धनंजय, सत्रहवेंमें ऋतुंजय और तदनन्तर अठारहवेंमें जय नामक व्यास हुए॥ १५॥ फिर उन्नीसवें व्यास भरद्वाज हुए, भरद्वाजके पीछे गौतम हुए और गौतमके पीछे जो व्यास हुए वे हर्यात्मा कहे जाते हैं॥ १६॥ हर्यात्माके अनन्तर वाजश्रवामुनि व्यास हुए तथा उनके पश्चात् सोमशुष्मवंशी तृणबिन्दु (तेईसवें) वेदव्यास कहलाये॥ १७॥ उनके पीछे भृगुवंशी ऋक्ष व्यास हुए जो वाल्मीकि कहलाये, तदनन्तर हमारे पिता शक्ति हुए और फिर मैं हुआ॥ १८॥ मेरे अनन्तर जातुकर्ण व्यास हुए और फिर कृष्णद्वैपायन—इस प्रकार ये अट्ठाईस व्यास प्राचीन हैं। इन्होंने द्वापरादि युगोंमें एक ही वेदके चार-चार विभाग किये हैं॥ १९-२०॥ हे मुने! मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनके अनन्तर आगामी द्वापरयुगमें द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा वेदव्यास होंगे॥ २१॥<br><br>ॐ यह अविनाशी एकाक्षर ही ब्रह्म है। यह बृहत् और व्यापक है; इसलिये 'ब्रह्म' कहलाता है॥ २२॥ भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—ये तीनों प्रणवरूप ब्रह्ममें ही स्थित हैं तथा प्रणव ही ऋक्, यजुः, साम और अथर्वरूप है; अतः उस ओंकाररूप ब्रह्मको नमस्कार है॥ २३॥ |