विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ३ ] * तृतीय अंश * १७७
| यस्मिन्मन्वन्तरे व्यासा ये ये स्युस्तान्निबोध मे।<br>यथा च भेदश्शाखानां व्यासेन क्रियते मुने॥ ८<br>अष्टाविंशतिकृत्वो वै वेदो व्यस्तो महर्षिभिः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्द्रापरेषु पुनः पुनः॥ ९<br>वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम।<br>चतुर्धा यैः कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः॥ १०<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्तस्स्वयं वेदः स्वयम्भुवा।<br>द्वितीये द्वापरे चैव वेदव्यासः प्रजापतिः॥ ११<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे च बृहस्पतिः।<br>सविता पञ्चमे व्यासः षष्ठे मृत्युस्मृतः प्रभुः॥ १२<br>सप्तमे च तथैवेन्द्रो वसिष्ठश्चाष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतश्च नवमे त्रिधामा दशमे स्मृतः॥ १३<br>एकादशे तु त्रिशिखो भरद्वाजस्ततः परः।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो वर्णी चापि चतुर्दशे॥ १४<br>त्रय्यारुणः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>ऋतुञ्जयः सप्तदशे तदूर्ध्वं च जयस्मृतः॥ १५<br>ततो व्यासो भरद्वाजो भरद्वाजाच्च गौतमः।<br>गौतमादुत्तरो व्यासो हर्यात्मा योऽभिधीयते॥ १६<br>अथ हर्यात्मनोऽन्ते च स्मृतो वाजश्रवा मुनिः।<br>सोमशुष्मायणस्तस्मात्तृणबिन्दुरिति स्मृतः॥ १७<br>ऋक्षोऽभूद्भागर्वस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते।<br>तस्मादस्मत्पिता शक्तिर्व्यासस्तस्मादहं मुने॥ १८<br>जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः।<br>अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः॥ १९<br>एको वेदश्चतुर्धा तु तैः कृतो द्वापरादिषु॥ २०<br>भविष्ये द्वापरे चापि द्रौणिर्व्यासो भविष्यति।<br>व्यतीते मम पुत्रेऽस्मिन् कृष्णद्वैपायने मुने॥ २१<br>ध्रुवमेकाक्षरं ब्रह्म ओमित्येव व्यवस्थितम्।<br>बृहत्वाद्वृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्मेत्यभिधीयते॥ २२<br>प्रणवावस्थितं नित्यं भूर्भुवस्स्वरितीर्यते।<br>ऋग्यजुस्सामाथर्वाणो यत्तस्मै ब्रह्मणे नमः॥ २३ | हे मुने! जिस-जिस मन्वन्तरमें जो-जो व्यास होते हैं और वे जिस-जिस प्रकार शाखाओंका विभाग करते हैं—वह मुझसे सुनो॥ ८॥ इस वैवस्वत-मन्वन्तरके प्रत्येक द्वापरयुगमें व्यास महर्षियोंने अबतक पुनः-पुनः अट्ठाईस बार वेदोंके विभाग किये हैं॥ ९॥ हे साधुश्रेष्ठ! जिन्होंने पुनः-पुनः द्वापरयुगमें वेदोंके चार-चार विभाग किये हैं उन अट्ठाईस व्यासोंका विवरण सुनो—॥ १०॥ पहले द्वापरमें स्वयं भगवान् ब्रह्माजीने वेदोंका विभाग किया था। दूसरे द्वापरके वेदव्यास प्रजापति हुए॥ ११॥ तीसरे द्वापरमें शुक्राचार्यजी और चौथेमें बृहस्पतिजी व्यास हुए तथा पाँचवेंमें सूर्य और छठेमें भगवान् मृत्यु व्यास कहलाये॥ १२॥ सातवें द्वापरके वेदव्यास इन्द्र, आठवेंके वसिष्ठ, नवेंके सारस्वत और दसवेंके त्रिधामा कहे जाते हैं॥ १३॥ ग्यारहवेंमें त्रिशिख, बारहवेंमें भरद्वाज, तेरहवेंमें अन्तरिक्ष और चौदहवेंमें वर्णी नामक व्यास हुए॥ १४॥ पन्द्रहवेंमें त्रय्यारुण, सोलहवेंमें धनंजय, सत्रहवेंमें ऋतुंजय और तदनन्तर अठारहवेंमें जय नामक व्यास हुए॥ १५॥ फिर उन्नीसवें व्यास भरद्वाज हुए, भरद्वाजके पीछे गौतम हुए और गौतमके पीछे जो व्यास हुए वे हर्यात्मा कहे जाते हैं॥ १६॥ हर्यात्माके अनन्तर वाजश्रवामुनि व्यास हुए तथा उनके पश्चात् सोमशुष्मवंशी तृणबिन्दु (तेईसवें) वेदव्यास कहलाये॥ १७॥ उनके पीछे भृगुवंशी ऋक्ष व्यास हुए जो वाल्मीकि कहलाये, तदनन्तर हमारे पिता शक्ति हुए और फिर मैं हुआ॥ १८॥ मेरे अनन्तर जातुकर्ण व्यास हुए और फिर कृष्णद्वैपायन—इस प्रकार ये अट्ठाईस व्यास प्राचीन हैं। इन्होंने द्वापरादि युगोंमें एक ही वेदके चार-चार विभाग किये हैं॥ १९-२०॥ हे मुने! मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनके अनन्तर आगामी द्वापरयुगमें द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा वेदव्यास होंगे॥ २१॥<br><br>ॐ यह अविनाशी एकाक्षर ही ब्रह्म है। यह बृहत् और व्यापक है; इसलिये 'ब्रह्म' कहलाता है॥ २२॥ भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—ये तीनों प्रणवरूप ब्रह्ममें ही स्थित हैं तथा प्रणव ही ऋक्, यजुः, साम और अथर्वरूप है; अतः उस ओंकाररूप ब्रह्मको नमस्कार है॥ २३॥ |
| १७८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ४ |
|---|
जगतः प्रलयोत्पत्त्योर्यत्तत्कारणसंज्ञितम्।
महतः परमं गुह्यं तस्मै सुब्रह्मणे नमः ॥ २४
अगाधापारमक्षय्यं जगत्सम्मोहनालयम्।
स्वप्रकाशप्रवृत्तिभ्यां पुरुषार्थप्रयोजनम् ॥ २५
सांख्यज्ञानवतां निष्ठा गतिश्शमदमात्मनाम्।
यत्तद्व्यक्तममृतं प्रवृत्तिब्रह्म शाश्वतम् ॥ २६
प्रधानमात्मयोनिश्च गुहासंस्थं च शब्द्यते।
अविभागं तथा शुक्रमक्षयं बहुधात्मकम् ॥ २७
परमब्रह्मणे तस्मै नित्यमेव नमो नमः।
यद्रूपं वासुदेवस्य परमात्मस्वरूपिणः ॥ २८
एतद्ब्रह्म त्रिधा भेदमभेदमपि स प्रभुः।
सर्वभेदेष्वभेदोऽसौ भिद्यते भिन्नबुद्धिभिः ॥ २९
स ऋङ्मयस्साममयः सर्वात्मा स यजुर्मयः।
ऋग्यजुस्सामसारात्मा स एवात्मा शरीरिणाम् ॥ ३०
स भिद्यते वेदमयस्स्ववेदं करोति भेदैर्बहुभिस्स्वशाखम्।
शाखाप्रणेता स समस्तशाखा- ज्ञानस्वरूपो भगवानसङ्गः ॥ ३१
जो संसारके उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहलाता है तथा महत्तत्त्वसे भी परम गुह्य (सूक्ष्म) है उस ओंकाररूप ब्रह्मको नमस्कार है॥ २४॥ जो अगाध, अपार और अक्षय है, संसारको मोहित करनेवाले तमोगुणका आश्रय है, तथा प्रकाशमय सत्त्वगुण और वृत्तिरूप रजोगुणके द्वारा पुरुषोंके भोग और मोक्षरूप परमपुरुषार्थका हेतु है॥ २५॥ जो सांख्यज्ञानियोंकी परम्निष्ठा है, शम-दमशालियोंका गन्तव्य स्थान है, जो अव्यक्त और अविनाशी है तथा जो सक्रिय ब्रह्म होकर भी सदा रहनेवाला है॥ २६॥ जो स्वयम्भू, प्रधान और अन्तर्यामी कहलाता है तथा जो अविभाग, दीप्तिमान्, अक्षय और अनेक रूप है॥ २७॥ और जो परमात्मस्वरूप भगवान् वासुदेवका ही रूप (प्रतीक) है, उस ओंकाररूप परब्रह्मको सर्वदा बारम्बार नमस्कार है॥ २८॥ यह ओंकाररूप ब्रह्म अभिन्न होकर भी [अकार, उकार और मकाररूपसे] तीन भेदोंवाला है। यह समस्त भेदोंमें अभिन्नरूपसे स्थित है तथापि भेदबुद्धिसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है॥ २९॥ वह सर्वात्मा ऋङ्मय, साममय और यजुर्मय है तथा ऋग्यजुः-सामका साररूप वह ओंकार ही सब शरीरधारियोंका आत्मा है॥ ३०॥ वह वेदमय है, वही ऋग्वेदादिरूपसे भिन्न हो जाता है और वही अपने वेदरूपको नाना शाखाओंमें विभक्त करता है तथा वह असंग भगवान् ही समस्त शाखाओंका रचयिता और उनका ज्ञानस्वरूप है॥ ३१॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय
ऋग्वेदकी शाखाओंका विस्तार
श्रीपराशर उवाच
आद्यो वेदश्चतुष्पादः शतसाहस्रसम्मितः।
ततो दशगुणः कृत्स्नो यज्ञोऽयं सर्वकामधुक् ॥ १
ततोऽत्र मत्सुतो व्यासो अष्टाविंशतिमेऽन्तरे।
वेदमेकं चतुष्पादं चतुर्धा व्यभजत्प्रभुः ॥ २
यथा च तेन वै व्यस्ता वेदव्यासेन धीमता।
वेदास्तथा समस्तैस्तैर्व्यस्ता व्यस्तैस्तथा मया ॥ ३
तदनेनैव वेदानां शाखाभेदान्द्विजोत्तम।
चतुर्युगेषु पठितान्सम्स्तेष्ववधारय ॥ ४
श्रीपराशरजी बोले— सृष्टिके आदिमें ईश्वरसे आविर्भूत वेद ऋक्-यजुः आदि चार पादोंसे युक्त और एक लक्ष मन्त्रवाला था। उसीसे समस्त कामनाओंको देनेवाले अग्निहोत्रादि दस प्रकारके यज्ञोंका प्रचार हुआ॥ १॥ तदनन्तर अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें मेरे पुत्र कृष्णद्वैपायनने इस चतुष्पादयुक्त एक ही वेदके चार भाग किये॥ २॥ परम बुद्धिमान् वेदव्यासने उनका जिस प्रकार विभाग किया है, ठीक उसी प्रकार अन्यान्य वेदव्यासोंने तथा मैंने भी पहले किया था॥ ३॥ अतः हे द्विज! समस्त चतुर्युगोंमें इन्हीं शाखाभेदोंसे वेदका पाठ होता है—ऐसा जानो॥ ४॥
अ० ४ ] * तृतीय अंश * १७९
कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम्।
को ह्यन्यो भुवि मैत्रेय महाभारतकृद्भवेत्॥ ५
तेन व्यस्ता यथा वेदा मत्पुत्रेण महात्मना।
द्वापरे ह्यत्र मैत्रेय तस्मिञ्छृणु यथातथम्॥ ६
ब्रह्मणा चोदितो व्यासो वेदान्व्यस्तुं प्रचक्रमे।
अथ शिष्यान्प्रजग्राह चतुरो वेदपारगान्॥ ७
ऋग्वेदपाठकं पैलं जग्राह स महामुनिः।
वैशम्पायननामानं यजुर्वेदस्य चाग्रहीत्॥ ८
जैमिनिं सामवेदस्य तथैवाथर्ववेदवित्।
सुमन्तुस्तस्य शिष्योऽभूद्वेदव्यासस्य धीमतः॥ ९
रोमहर्षणनामानं महाबुद्धिं महामुनिः।
सूतं जग्राह शिष्यं स इतिहासपुराणयोः॥ १०
एक आसीद्यजुर्वेदस्तं चतुर्धा व्यकल्पयत्।
चातुर्होत्रमभूत्तस्मिंस्तेन यज्ञमथाकरोत्॥ ११
आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु ऋग्भिर्होत्रं तथा मुनिः।
औद्गात्रं सामभिश्चक्रे ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः॥ १२
ततस्स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदं कृतवान्मुनिः।
यजूंषि च यजुर्वेदं सामवेदं च सामभिः॥ १३
राज्ञां चाथर्ववेदेन सर्वकर्माणि च प्रभुः।
कारयामास मैत्रेय ब्रह्मत्वं च यथास्थिति॥ १४
सोऽयमेको यथा वेदस्तरुस्तेन पृथक्कृतः।
चतुर्थाथ ततो जातं वेदपादपकाननम्॥ १५
बिभेदं प्रथमं विप्र पैलो ऋग्वेदपादपम्।
इन्द्रप्रमितये प्रादाद्भाष्कलाय च संहिते॥ १६
चतुर्धा स बिभेदाथ बाष्कलोऽपि च संहिताम्।
बोध्यादिभ्यो ददौ ताश्च शिष्येभ्यस्स महामुनिः॥ १७
बोध्याग्निमाढकौ तद्वद्याज्ञवल्क्यपराशरौ।
प्रतिशाखास्तु शाखायास्तस्यास्ते जगृहुर्मुने॥ १८
इन्द्रप्रमितिरेकां तु संहितां स्वसुतं ततः।
माण्डुकेयं महात्मानं मैत्रेयाध्यापयत्तदा॥ १९
तस्य शिष्यप्रशिष्येभ्यः पुत्रशिष्यक्रमाद्ययौ॥ २०
भगवान् कृष्णद्वैपायनको तुम साक्षात् नारायण ही समझो, क्योंकि हे मैत्रेय! संसारमें नारायणके अतिरिक्त और कौन महाभारतका रचयिता हो सकता है?॥ ५॥
हे मैत्रेय! द्वापरयुगमें मेरे पुत्र महात्मा कृष्णद्वैपायनने जिस प्रकार वेदोंका विभाग किया था वह यथावत् सुनो॥ ६॥ जब ब्रह्माजीकी प्रेरणासे व्यासजीने वेदोंका विभाग करनेका उपक्रम किया, तो उन्होंने वेदका अन्ततक अध्ययन करनेमें समर्थ चार ऋषियोंको शिष्य बनाया॥ ७॥ उनमेंसे उन महामुनिने पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद और जैमिनिको सामवेद पढ़ाया तथा उन मतिमान् व्यासजीका सुमन्तु नामक शिष्य अथर्ववेदका ज्ञाता हुआ॥ ८-९॥ इनके सिवा सूतजातीय महाबुद्धिमान् रोमहर्षणको महामुनि व्यासजीने अपने इतिहास और पुराणके विद्यार्थीरूपसे ग्रहण किया॥ १०॥
पूर्वकालमें यजुर्वेद एक ही था। उसके उन्होंने चार विभाग किये, अतः उसमें चातुर्होत्रकी प्रवृत्ति हुई और इस चातुर्होत्र-विधिसे ही उन्होंने यज्ञानुष्ठानकी व्यवस्था की॥ ११॥ व्यासजीने यजुःसे अध्वर्युके, ऋक्से होताके, सामसे उद्गाताके तथा अथर्ववेदसे ब्रह्माके कर्मकी स्थापना की॥ १२॥ तदनन्तर उन्होंने ऋक् तथा यजुःश्रुतियोंका उद्धार करके ऋग्वेद एवं यजुर्वेदकी और सामश्रुतियोंसे सामवेदकी रचना की॥ १३॥ हे मैत्रेय! अथर्ववेदके द्वारा भगवान् व्यासजीने सम्पूर्ण राज-कर्म और ब्रह्मत्वकी यथावत् व्यवस्था की॥ १४॥ इस प्रकार व्यासजीने वेदरूप एक वृक्षके चार विभाग कर दिये फिर विभक्त हुए उन चारोंसे वेदरूपी वृक्षोंका वन उत्पन्न हुआ॥ १५॥
हे विप्र! पहले पैलने ऋग्वेदरूप वृक्षके दो विभाग किये और उन दोनों शाखाओंको अपने शिष्य इन्द्रप्रमिति और बाष्कलको पढ़ाया॥ १६॥ फिर बाष्कलने भी अपनी शाखाके चार भाग किये और उन्हें बोध्य आदि अपने शिष्योंको दिया॥ १७॥ हे मुने! बाष्कलकी शाखाकी उन चारों प्रतिशाखाओंको उनके शिष्य बोध्य, अग्निमाढक, याज्ञवल्क्य और पराशरने ग्रहण किया॥ १८॥ हे मैत्रेयजी! इन्द्रप्रमितिने अपनी प्रतिशाखाको अपने पुत्र महात्मा माण्डुकेयको पढ़ाया॥ १९॥ इस प्रकार शिष्य-प्रशिष्य-क्रमसे उस शाखाका उनके पुत्र और शिष्योंमें प्रचार हुआ। इस
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| वेदमित्रस्तु शाकल्यः संहितां तामधीतवान्।<br>चकार संहिताः पञ्च शिष्येभ्यः प्रददौ च ताः॥ २१<br>तस्य शिष्यास्तु ये पञ्च तेषां नामानि मे शृणु।<br>मुद्गलो गोमुखश्चैव वात्स्यश्शालीय एव च।<br>शरीरः पञ्चमश्चासीन्मैत्रेय सुमहामतिः॥ २२<br>संहितात्रितयं चक्रे शाकपूर्णस्तथेतरः।<br>निरुक्तमकरोत्तद्वच्चतुर्थं मुनिसत्तम॥ २३<br>क्रौञ्चो वैतालिकस्तद्वद्बलाकश्च महामुनिः।<br>निरुक्तकृच्चतुर्थोऽभूद्वेदवेदाङ्गपारगः॥ २४<br>इत्येताः प्रतिशाखाभ्यो ह्यनुशाखा द्विजोत्तम।<br>बाष्कलश्चापरास्तिस्रस्संहिताः कृतवान्द्विज।<br>शिष्यः कालायनिर्गार्य्यस्तृतीयश्च कथाजवः॥ २५<br>इत्येते बह्वृचाः प्रोक्ताः संहिता यैः प्रवर्तिताः॥ २६ | शिष्य-परम्परासे ही शाकल्य वेदमित्रने उस संहिताको पढ़ा और उसको पाँच अनुशाखाओंमें विभक्त कर अपने पाँच शिष्योंको पढ़ाया॥ २०-२१॥ उसके जो पाँच शिष्य थे उनके नाम सुनो। हे मैत्रेय! वे मुद्गल, गोमुख, वात्स्य और शालीय तथा पाँचवें महामति शरीर थे॥ २२॥ हे मुनिसत्तम! उनके एक दूसरे शिष्य शाकपूर्णने तीन वेदसंहिताओंकी तथा चौथे एक निरुक्त-ग्रन्थकी रचना की॥ २३॥ [उन संहिताओंका अध्ययन करनेवाले उनके शिष्य] महामुनि क्रौंच, वैतालिक और बलाक थे तथा [निरुक्तका अध्ययन करनेवाले] एक चौथे शिष्य वेद-वेदांगके पारगामी निरुक्तकार हुए॥ २४॥ इस प्रकार वेदरूप वृक्षकी प्रतिशाखाओंसे अनुशाखाओंकी उत्पत्ति हुई। हे द्विजोत्तम! बाष्कलने और भी तीन संहिताओंकी रचना की। उनके [उन संहिताओंको पढ़नेवाले] शिष्य कालायनि, गार्ग्य तथा कथाजव थे। इस प्रकार जिन्होंने संहिताओंकी रचना की वे बह्वृच कहलाये॥ २५-२६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजुःशाखाओंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| यजुर्वेदतरोश्शाखास्सप्तविंशनमहामुनिः।<br>वैशम्पायननामासौ व्यासशिष्यश्चकार वै॥ १<br>शिष्येभ्यः प्रददौ ताश्च जगृहुस्तेऽप्यनुक्रमात्॥ २<br>याज्ञवल्क्यस्तु तत्राभूद्ब्रह्मरातसुतो द्विज।<br>शिष्यः परमधर्मज्ञो गुरुवृत्तिपरस्सदा॥ ३<br>ऋषिर्योऽद्य महामेरोः समाजे नागमिष्यति।<br>तस्य वै सप्तरात्रात्तु ब्रह्महत्या भविष्यति॥ ४<br>पूर्वमेवं मुनिगणैस्समयो यः कृतो द्विज।<br>वैशम्पायन एकस्तु तं व्यतिक्रान्तवांस्तदा॥ ५<br>स्वस्त्रीयं बालकं सोऽथ पदा स्पृष्टमघातयत्॥ ६<br>शिष्यानाह स भो शिष्या ब्रह्महत्यापहं व्रतम्।<br>चरध्वं मत्कृते सर्वे न विचार्यमिदं तथा॥ ७ | हे महामुने! व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनने यजुर्वेदरूपी वृक्षकी सत्ताईस शाखाओंकी रचना की; और उन्हें अपने शिष्योंको पढ़ाया तथा शिष्योंने भी क्रमशः ग्रहण किया॥ १-२॥ हे द्विज! उनका एक परम धार्मिक और सदैव गुरुसेवामें तत्पर रहनेवाला शिष्य ब्रह्मरातका पुत्र याज्ञवल्क्य था॥ ३॥ [एक समय समस्त ऋषिगणने मिलकर यह नियम किया कि] जो कोई महामेरुपर स्थित हमारे इस समाजमें सम्मिलित न होगा उसको सात रात्रियोंके भीतर ही ब्रह्महत्या लगेगी॥ ४॥ हे द्विज! इस प्रकार मुनियोंने पहले जिस समयको नियत किया था उसका केवल एक वैशम्पायनने ही अतिक्रमण कर दिया॥ ५॥ इसके पश्चात् उन्होंने [प्रमादवश] पैरसे छूए हुए अपने भानजेकी हत्या कर डाली; तब उन्होंने अपने शिष्योंसे कहा—'हे शिष्यगण! तुम सब लोग किसी प्रकारका विचार न करके मेरे लिये ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला व्रत करो'॥ ६-७॥ |
अ० ५] * तृतीय अंश * १८१
| अथाह याज्ञवल्क्यस्तु किमेभिर्भगवन्द्विजैः।<br>क्लेशितैरल्पतेजोभिश्चरिष्येऽहमिदं व्रतम्॥ ८ | तब याज्ञवल्क्य बोले—"भगवन्! ये सब ब्राह्मण अत्यन्त निस्तेज हैं, इन्हें कष्ट देनेकी क्या आवश्यकता है? मैं अकेला ही इस व्रतका अनुष्ठान करूँगा"॥ ८॥ |
| ततः क्रुद्धो गुरुः प्राह याज्ञवल्क्यं महामुनिम्।<br>मुच्यतां यत्त्वयाधीतं मत्तो विप्रावमानक॥ ९<br>निस्तेजसो वदस्येनान्यत्त्वं ब्राह्मणपुङ्गवान्।<br>तेन शिष्येण नार्थोऽस्ति ममाज्ञाभङ्गकारिणा॥ १० | इससे गुरु वैशम्पायनजीने क्रोधित होकर महामुनि याज्ञवल्क्यसे कहा—"अरे ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले ! तूने मुझसे जो कुछ पढ़ा है, वह सब त्याग दे॥ ९॥ तू इन समस्त द्विजश्रेष्ठोंको निस्तेज बताता है, मुझे तुझ-जैसे आज्ञा-भंगकारी शिष्यसे कोई प्रयोजन नहीं है"॥ १०॥ |
| याज्ञवल्क्यस्ततः प्राह भक्त्यैतत्ते मयोदितम्।<br>ममाप्यलं त्वयाधीतं यन्मया तदिदं द्विज॥ ११ | याज्ञवल्क्यने कहा—"हे द्विज! मैंने तो भक्तिवश आपसे ऐसा कहा था, मुझे भी आपसे कोई प्रयोजन नहीं है; लीजिये, मैंने आपसे जो कुछ पढ़ा है वह यह मौजूद है"॥ ११॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तो रुधिराक्तानि सरूपाणि यजूंषि सः।<br>छर्दयित्वा ददौ तस्मै ययौ स स्वेच्छया मुनिः॥ १२ | श्रीपराशरजी बोले—ऐसा कह महामुनि याज्ञवल्क्यजीने रुधिरसे भरा हुआ मूर्तिमान् यजुर्वेद वमन करके उन्हें दे दिया; और स्वेच्छानुसार चले गये॥ १२॥ |
| यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज।<br>जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः॥ १३ | हे द्विज! याज्ञवल्क्यद्वारा वमन की हुई उन यजुःश्रुतियोंको अन्य शिष्योंने तित्तिर (तीतर) होकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तिरीय कहलाये॥ १३॥ |
| ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं गुरुणा चोदितैस्तु यैः।<br>चरकाध्वर्यवस्ते तु चरणान्मुनिसत्तम॥ १४ | हे मुनिसत्तम! जिन विप्रगणने गुरुकी प्रेरणासे ब्रह्महत्या विनाशकव्रतका अनुष्ठान किया था, वे सब व्रताचरणके कारण यजुःशाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए॥ १४॥ |
| याज्ञवल्क्योऽपि मैत्रेय प्राणायामपरायणः।<br>तुष्टाव प्रयतस्सूर्यं यजूंष्यभिलषंस्ततः॥ १५ | तदनन्तर याज्ञवल्क्यने भी यजुर्वेदकी प्राप्तिकी इच्छासे प्राणोंका संयम कर संयतचित्तसे सूर्यभगवान्की स्तुति की॥ १५॥ |
| याज्ञवल्क्य उवाच<br>नमस्सवित्रे द्वाराय मुक्तेरमिततेजसे।<br>ऋग्यजुस्सामभूताय त्रयीधाम्ने च ते नमः॥ १६ | याज्ञवल्क्यजी बोले—अतुलित तेजस्वी, मुक्तिके द्वारस्वरूप तथा वेदत्रयरूप तेजसे सम्पन्न एवं ऋक्, यजुः तथा सामस्वरूप सवितादेवको नमस्कार है॥ १६॥ |
| नमोऽग्नीषोमभूताय जगतः कारणात्मने।<br>भास्कराय परं तेजस्सौषुम्नरूचिबिभ्रते॥ १७ | जो अग्निऔर चन्द्रमारूप, जगत्के कारण और सुषुम्न नामक परमतेजको धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् भास्करको नमस्कार है॥ १७॥ |
| कलाकाष्ठानिमेषादिकालज्ञानात्मरूपिणे।<br>ध्येयाय विष्णुरूपाय परमाक्षररूपिणे॥ १८ | कला, काष्ठा, निमेष आदि कालज्ञानके कारण तथा ध्यान करनेयोग्य परब्रह्मस्वरूप विष्णुमय श्रीसूर्यदेवको नमस्कार है॥ १८॥ |
| बिभर्त्ति यस्सूरगणानाप्यायेन्दुं स्वरश्मिभिः।<br>स्वधामृतेन च पितॄंस्तस्मै तृप्यात्मने नमः॥ १९ | जो अपनी किरणोंसे चन्द्रमाको पोषित करते हुए देवताओंको तथा स्वधारूप अमृतसे पितृगणको तृप्त करते हैं, उन तृप्तिरूप सूर्यदेवको नमस्कार है॥ १९॥ |
| हिमाम्बुघर्मवृष्टीनां कर्ता भर्ता च यः प्रभुः।<br>तस्मै त्रिकालरूपाय नमस्सूर्याय वेधसे॥ २० | जो हिम, जल और उष्णताके कर्ता [अर्थात् शीत, वर्षा और ग्रीष्म आदि ऋतुओंके कारण] हैं और [जगत्का] पोषण करनेवाले हैं, उन त्रिकालमूर्ति विधाता भगवान् सूर्यको नमस्कार है॥ २०॥ |
| अपहन्ति तमो यश्च जगतोऽस्य जगत्पतिः।<br>सत्त्वधामधरो देवो नमस्तस्मै विवस्वते॥ २१ | जो जगत्पति इस सम्पूर्ण जगत्के अन्धकारको दूर करते हैं, उन सत्त्वमूर्तिधारी-विवस्वान्को नमस्कार है॥ २१॥ |
| सत्कर्मयोग्यो न जनो नैवापः शुद्धिकारणम्।<br>यस्मिन्ननुदिते तस्मै नमो देवाय भास्वते॥ २२ | जिनके उदित हुए बिना मनुष्य सत्कर्ममें प्रवृत्त नहीं हो सकते और जल शुद्धिका कारण नहीं हो सकता, उन भास्वान्देवको नमस्कार है॥ २२॥ |
| १८२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ६ |
|---|
स्पृष्टो यदंशुभिर्लोकः क्रियायोग्यो हि जायते।
पवित्रताकारणाय तस्मै शुद्धात्मने नमः ॥ २३
जिनके किरण-समूहका स्पर्श होनेपर लोक कर्मानुष्ठानके योग्य होता है, उन पवित्रताके कारण, शुद्धस्वरूप सूर्यदेवको नमस्कार है॥ २३॥
नमः सवित्रे सूर्याय भास्कराय विवस्वते।
आदित्यायादिभूताय देवादीनां नमो नमः ॥ २४
भगवान् सविता, सूर्य, भास्कर और विवस्वान्को नमस्कार है; देवता आदि समस्त भूतोंके आदिभूत आदित्यदेवको बारम्बार नमस्कार है॥ २४॥
हिरण्मयं रथं यस्य केतवोऽमृतवाजिनः।
वहन्ति भुवनालोकिचक्षुषं तं नमाम्यहम् ॥ २५
जिनका तेजोमय रथ है, [प्रज्ञारूप] ध्वजाएँ हैं, जिन्हें [छन्दोमय] अमर अश्वगण वहन करते हैं तथा जो त्रिभुवनको प्रकाशित करनेवाले नेत्ररूप हैं, उन सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २५॥
श्रीपराशर उवाच
श्रीपराशरजी बोले— उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर
इत्येवमादिभिस्तेन स्तूयमानस्स वै रविः।
वाजिरूपधरः प्राह व्रियतामिति वाञ्छितम् ॥ २६
भगवान् सूर्य अश्वरूपसे प्रकट होकर बोले—'तुम अपना अभीष्ट वर माँगो'॥ २६॥
याज्ञवल्क्यस्तदा प्राह प्रणिपत्य दिवाकरम्।
यजूंषि तानि मे देहि यानि सन्ति न मे गुरौ ॥ २७
तब याज्ञवल्क्यजीने उन्हें प्रणाम करके कहा—'आप मुझे उन यजुः श्रुतियोंका उपदेश कीजिये जिन्हें मेरे गुरुजी भी न जानते हों'॥ २७॥
एवमुक्तो ददौ तस्मै यजूंषि भगवान् रविः।
अयातयामसंज्ञानि यानि वेत्ति न तद्गुरुः ॥ २८
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् सूर्यने उन्हें अयातयाम नामक यजुःश्रुतियोंका उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायनजी भी नहीं जानते थे ॥ २८ ॥
यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम।
वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽप्यश्वोऽभवद्यतः ॥ २९
हे द्विजोत्तम! उन श्रुतियोंको जिन ब्राह्मणोंने पढ़ा था वे वाजी नामसे विख्यात हुए क्योंकि उनका उपदेश करते समय सूर्य भी अश्वरूप हो गये थे ॥ २९॥
शाखाभेदास्तु तेषां वै दश पञ्च च वाजिनाम्।
काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्याः प्रकीर्तिताः ॥ ३०
हे महाभाग! उन वाजिश्रुतियोंकी काण्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं; वे सब शाखाएँ महर्षि याज्ञवल्क्यकी प्रवृत्त की हुई कही जाती हैं॥ ३०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥
छठा अध्याय
सामवेदकी शाखा, अठारह पुराण और चौदह विद्याओंके विभागका वर्णन
श्रीपराशर उवाच
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! जिस क्रमसे
सामवेदतरोश्शाखा व्यासशिष्यस्स जैमिनिः।
क्रमेण येन मैत्रेय बिभेद शृणु तन्मम ॥ १
व्यासजीके शिष्य जैमिनिने सामवेदकी शाखाओंका विभाग किया था, वह मुझसे सुनो ॥ १ ॥
सुमन्तुस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुकर्मास्याप्यभूत्सुतः।
अधीतवन्तौ चैकैकां संहितां तौ महामती ॥ २
जैमिनिका पुत्र सुमन्तु था और उसका पुत्र सुकर्मा हुआ। उन दोनों महामति पुत्र-पौत्रोंने सामवेदकी एक-एक शाखाका अध्ययन किया ॥ २॥
सहस्रसंहिताभेदं सुकर्मा तत्सुतस्ततः।
चकार तं च तच्छिष्यौ जगृहाते महाव्रतौ ॥ ३
हिरण्यनाभः कौशल्यः पौष्पिञ्जिश्च द्विजोत्तम।
उदीच्यास्सामगाः शिष्यास्तस्य पञ्चशतं स्मृताः ॥ ४
तदनन्तर सुमन्तुके पुत्र सुकर्माने अपनी सामवेदसंहिताके एक सहस्र शाखाभेद किये और हे द्विजोत्तम! उन्हें उसके कौसल्य हिरण्यनाभ तथा पौष्पिंजि नामक दो महाव्रती शिष्योंने ग्रहण किया। हिरण्यनाभके पाँच सौ शिष्य थे जो उदीच्य सामग कहलाये ॥ ३-४॥
अ० ६ ] * तृतीय अंश * १८३
हिरण्यनाभात्तावत्यस्संहिता यैर्द्विजोत्तमैः।
गृहीतास्तेऽपि चोच्यन्ते पण्डितैः प्राच्यसामगाः॥ ५
लोकाक्षिनौधमिश्चैव कक्षीवाँल्लाङ्गलिस्तथा।
पौष्पिञ्जिशिष्यास्तद्भेदैस्संहिता बहुलीकृताः॥ ६
हिरण्यनाभशिष्यस्तु चतुर्विंशतिसंहिताः।
प्रोवाच कृतिनामासौ शिष्येभ्यश्च महामुनिः॥ ७
तैश्चापि सामवेदोऽसौ शाखाभिर्बहुलीकृतः।
अथर्वणामथो वक्ष्ये संहितानां समुच्चयम्॥ ८
अथर्ववेदं स मुनिस्सुमन्तुर्मितद्युतिः।
शिष्यमध्यापयामास कबन्धं सोऽपि तं द्विधा।
कृत्वा तु देवदर्शाय तथा पथ्याय दत्तवान्॥ ९
देवदर्शस्य शिष्यास्तु मेधोब्रह्मबलिस्तथा।
शौल्कायनिः पिप्पलादस्तथान्यौ द्विजसत्तम॥ १०
पथ्यस्यापि त्रयश्शिष्याः कृता यैर्द्विज संहिताः।
जाबालिः कुमुदादिश्च तृतीयश्शौनको द्विज॥ ११
शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावेकां तु बभ्रवे।
द्वितीयां संहितां प्रादात्सैन्धवाय च संज्ञिने॥ १२
सैन्धवान्मुञ्जिकेशश्च द्वेधाभिन्नास्त्रिधा पुनः।
नक्षत्रकल्पो वेदानां संहितानां तथैव च॥ १३
चतुर्थस्स्यादांगिरसश्शान्तिकल्पश्च पञ्चमः।
श्रेष्ठास्त्वथर्वणामेते संहितानां विकल्पकाः॥ १४
आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः।
पुराणसंहितां चक्रे पुराणार्थविशारदः॥ १५
प्रख्यातो व्यासशिष्योऽभूत्सूतो वै रोमहर्षणः।
पुराणसंहितां तस्मै ददौ व्यासो महामतिः॥ १६
सुमतिश्चाग्निवर्चाश्च मित्रायुश्शांसपायनः।
अकृतव्रणसावर्णी षट् शिष्यास्तस्य चाभवन्॥ १७
काश्यपः संहिताकर्ता सावर्णिश्चांशपायनः।
रोमहर्ष णिका चान्या तिसॄणां मूलसंहिता॥ १८
चतुष्टयेन भेदेन संहितानामिदं मुने॥ १९
आद्यं सर्वपुराणानां पुराणं ब्राह्ममुच्यते।
अष्टादशपुराणानि पुराणज्ञाः प्रचक्षते॥ २०
इसी प्रकार जिन अन्य द्विजोत्तमोंने इतनी ही संहिताएँ हिरण्यनाभसे और ग्रहण कीं उन्हें पण्डितजन प्राच्य सामग कहते हैं॥ ५॥ पौष्पिंजिके शिष्य लोकाक्षि, नौधमि, कक्षीवान् और लांगलि थे। उनके शिष्य-प्रशिष्योंने अपनी-अपनी संहिताओंके विभाग करके उन्हें बहुत बढ़ा दिया॥ ६॥ महामुनि कृति नामक हिरण्यनाभके एक और शिष्यने अपने शिष्योंको सामवेदकी चौबीस संहिताएँ पढ़ायीं॥ ७॥ फिर उन्होंने भी इस सामवेदका शाखाओंद्वारा खूब विस्तार किया। अब मैं अथर्ववेदकी संहिताओंके समुच्चयका वर्णन करता हूँ॥ ८॥
अथर्ववेदको सर्वप्रथम अमिततेजोमय सुमन्तु मुनिने अपने शिष्य कबन्धको पढ़ाया था, फिर कबन्धने उसके दो भाग कर उन्हें देवदर्श और पथ्य नामक अपने शिष्योंको दिया॥ ९॥ हे द्विजसत्तम! देवदर्शके शिष्य मेध, ब्रह्मबलि, शौल्कायनि और पिप्पलाद थे॥ १०॥ हे द्विज! पथ्यके भी जाबालि, कुमुदादि और शौनक नामक तीन शिष्य थे, जिन्होंने संहिताओंका विभाग किया॥ ११॥ शौनकने भी अपनी संहिताके दो विभाग करके उनमेंसे एक बभ्रुको तथा दूसरी सैन्धव नामक अपने शिष्यको दी॥ १२॥ सैन्धवसे पढ़कर मुंजिकेशने अपनी संहिताके पहले दो और फिर तीन [इस प्रकार पाँच] विभाग किये। नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहितानकल्प, आंगिरसकल्प और शान्तिकल्प—उनके रचे हुए ये पाँच विकल्प अथर्ववेद-संहिताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥ १३-१४॥
तदनन्तर पुराणार्थविशारद व्यासजीने आख्यान, उपाख्यान, गाथा और कल्पशुद्धिके सहित पुराणसंहिताकी रचना की॥ १५॥ रोमहर्षण सूत व्यासजीके प्रसिद्ध शिष्य थे। महामति व्यासजीने उन्हें पुराणसंहिताका अध्ययन कराया॥ १६॥ उन सूतजीके सुमति, अग्निवर्चा, मित्रायु, शांसपायन, अकृतव्रण और सावर्णि—ये छः शिष्य थे॥ १७॥ काश्यपगोत्रीय अकृतव्रण, सावर्णि और शांसपायन—ये तीनों संहिताकर्ता हैं। उन तीनों संहिताओंकी आधार एक रोमहर्षणजीकी संहिता है। हे मुने! इन चारों संहिताओंकी सारभूत मैंने यह विष्णुपुराणसंहिता बनायी है॥ १८-१९॥ पुराणज्ञ पुरुष कुल अठारह पुराण बतलाते हैं; उन सबमें प्राचीनतम ब्रह्मपुराण है॥ २०॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
१८४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा।<br>तथान्यं नारदीयं च मार्कण्डेयं च सप्तमम्॥ २१<br>आग्नेयमष्टमं चैव भविष्यन्नवमं स्मृतम्।<br>दशमं ब्रह्मवैवर्त्तं लैङ्गमेकादशं स्मृतम्॥ २२<br>वाराहं द्वादशं चैव स्कान्दं चात्र त्रयोदशम्।<br>चतुर्दशं वामनं च कौर्मं पञ्चदशं तथा॥ २३<br>मात्स्यं च गारुडं चैव ब्रह्माण्डं च ततः परम्।<br>महापुराणान्येतानि ह्यष्टादश महामुने॥ २४ | प्रथम पुराण ब्राह्म है, दूसरा पाद्म, तीसरा वैष्णव, चौथा शैव, पाँचवाँ भागवत, छठा नारदीय और सातवाँ मार्कण्डेय है॥ २१॥ इसी प्रकार आठवाँ आग्नेय, नवाँ भविष्यत्, दसवाँ ब्रह्मवैवर्त्त और ग्यारहवाँ पुराण लैङ्ग कहा जाता है॥ २२॥ तथा बारहवाँ वाराह, तेरहवाँ स्कान्द, चौदहवाँ वामन, पन्द्रहवाँ कौर्म, तथा इनके पश्चात् मात्स्य, गारुड और ब्रह्माण्डपुराण हैं। हे महामुने! ये ही अठारह महापुराण हैं॥ २३-२४॥ |
| तथा चोपपुराणानि मुनिभिः कथितानि च।<br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च।<br>सर्वेष्वेतेषु कथ्यन्ते वंशानुचरितं च यत्॥ २५ | इनके अतिरिक्त मुनिजनोंने और भी अनेक उपपुराण बतलाये हैं। इन सभीमें सृष्टि, प्रलय, देवता आदिकोंके वंश, मन्वन्तर और भिन्न-भिन्न राजवंशोंके चरित्रोंका वर्णन किया गया है॥ २५॥ |
| यदेतत्तव मैत्रेय पुराणं कथ्यते मया।<br>एतद्वैष्णवसंज्ञं वै पाद्मस्य समनन्तरम्॥ २६ | हे मैत्रेय! जिस पुराणको मैं तुम्हें सुना रहा हूँ वह पाद्मपुराणके अनन्तर कहा हुआ वैष्णव नामक महापुराण है॥ २६॥ |
| सर्गे च प्रतिसर्गे च वंशमन्वन्तरादिषु।<br>कथ्यते भगवान्विष्णुरशेषेष्वेव सत्तम॥ २७ | हे साधुश्रेष्ठ! इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश और मन्वन्तरादिका वर्णन करते हुए सर्वत्र केवल विष्णुभगवान्का ही वर्णन किया गया है॥ २७॥ |
| अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।<br>पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥ २८ | छः वेदांग, चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र—ये ही चौदह विद्याएँ हैं॥ २८॥ |
| आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।<br>अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः॥ २९<br>ज्ञेया ब्रह्मर्षयः पूर्वं तेभ्यो देवर्षयः पुनः।<br>राजर्षयः पुनस्तेभ्य ऋषिप्रकृतयस्त्रयः॥ ३० | इन्हींमें आयुर्वेद, धनुर्वेद और गान्धर्व इन तीनोंको तथा चौथे अर्थशास्त्रको मिला लेनेसे कुल अठारह विद्याएँ हो जाती हैं। ऋषियोंके तीन भेद हैं—प्रथम ब्रह्मर्षि, द्वितीय देवर्षि और फिर राजर्षि॥ २९-३०॥ |
| इति शाखास्समाख्याताश्शाखाभेदास्तथैव च।<br>कर्तारश्चैव शाखानां भेदहेतुस्तथोदितः॥ ३१ | इस प्रकार मैंने तुमसे वेदोंकी शाखा, शाखाओंके भेद, उनके रचयिता तथा शाखाभेदके कारणोंका भी वर्णन कर दिया॥ ३१॥ |
| सर्वमन्वन्तरेष्वेवं शाखाभेदास्समाः स्मृताः।<br>प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या तद्विकल्पास्त्विमे द्विज॥ ३२ | इसी प्रकार समस्त मन्वन्तरोंमें एक-से शाखाभेद रहते हैं; हे द्विज! प्रजापति ब्रह्माजीसे प्रकट होनेवाली श्रुति तो नित्य है, ये तो उसके विकल्पमात्र हैं॥ ३२॥ |
| एतत्ते कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>मैत्रेय वेदसम्बन्धः किमन्यत्कथयामि ते॥ ३३ | हे मैत्रेय! वेदके सम्बन्धमें तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था वह मैंने सुना दिया; अब और क्या कहूँ?॥ ३३॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
अ० ७ ] * तृतीय अंश * १८५
सातवाँ अध्याय
यमगीता
| श्रीमैत्रेय उवाच | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे गुरो ! मैंने जो कुछ पूछा |
| यथावत्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया गुरो । | था वह सब आपने यथावत् वर्णन किया। अब मैं |
| श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वेकं तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥ १ | एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥ हे महामुने ! सातों द्वीप, सातों पाताल |
| सप्त द्वीपानि पातालविधयश्च महामुने । | और सातों लोक—ये सभी स्थान जो इस ब्रह्माण्डके |
| सप्तलोकाश्च येऽन्तःस्था ब्रह्माण्डस्यास्य सर्वतः ॥ २ | अन्तर्गत हैं, स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा |
| स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मसूक्ष्मात्सूक्ष्मतैरैस्तथा । | स्थूल और स्थूलतर जीवोंसे भरे हुए हैं ॥ २-३ ॥ हे |
| स्थूलात्स्थूलतरैश्चैव सर्वं प्राणिभिरावृतम् ॥ ३ | मुनिसत्तम ! एक अंगुलका आठवाँ भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ कर्म-बन्धनसे बँधे हुए जीव न |
| अंगुलस्याष्टभागोऽपि न सोऽस्ति मुनिसत्तम । | रहते हों ॥ ४ ॥ किंतु हे भगवन् ! आयुके समाप्त होनेपर |
| न सन्ति प्राणिनो यत्र कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥ ४ | ये सभी यमराजके वशीभूत हो जाते हैं और उन्हींके |
| सर्वे चैते वशं यान्ति यमस्य भगवन् किल । | आदेशानुसार नरक आदि नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगते हैं ॥ ५ ॥ तदनन्तर पाप-भोगके समाप्त होनेपर |
| आयुषोऽन्ते तथा यान्ति यातनास्तत्प्रचोदिताः ॥ ५ | वे देवादि योनियोंमें घूमते रहते हैं—सकल शास्त्रोंका |
| यातनाभ्यः परिभ्रष्टा देवाद्यास्वथ योनिषु । | ऐसा ही मत है ॥ ६ ॥ अतः आप मुझे वह कर्म |
| जन्तवः परिवर्तन्ते शास्त्राणामेष निर्णयः ॥ ६ | बताइये जिसे करनेसे मनुष्य यमराजके वशीभूत नहीं |
| सोऽहमिच्छामि तच्छ्रोतुं यमस्य वशवर्तिनः । | होता; मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥ |
| न भवन्ति नरा येन तत्कर्म कथयस्व मे ॥ ७ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मुने ! यही प्रश्न महात्मा |
| श्रीपराशर उवाच | नकुलने पितामह भीष्मसे पूछा था। उसके उत्तरमें |
| अयमेव मुने प्रश्नो नकुलेन महात्मना । | उन्होंने जो कुछ कहा था वह सुनो ॥ ८ ॥ |
| पृष्टः पितामहः प्राह भीष्मो यत्तच्छृणुष्व मे ॥ ८ | **भीष्मजीने कहा—**हे वत्स ! पूर्वकालमें मेरे पास एक कलिंगदेशीय ब्राह्मण-मित्र आया और मुझसे |
| भीष्म उवाच | बोला—'मेरे पूछनेपर एक जातिस्मर मुनिने बतलाया |
| पुरा ममागतो वत्स सखा कालिङ्गको द्विजः । | था कि ये सब बातें अमुक-अमुक प्रकार ही होंगी।' |
| स मामुवाच पृष्टो वै मया जातिस्मरो मुनिः ॥ ९ | हे वत्स ! उस बुद्धिमान्ने जो-जो बातें जिस-जिस प्रकार होनेको कही थीं वे सब ज्यों-की-त्यों हुईं ॥ ९-१० ॥ |
| तेनाख्यातमिदं सर्वमित्थं चैतद्भविष्यति । | इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जानेसे मैंने उससे |
| तथा च तदभूद्वत्स यथोक्तं तेन धीमता ॥ १० | फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तरमें उस द्विजश्रेष्ठने जो-जो बातें बतलायीं उनके |
| स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्दधानेन वै द्विजः । | विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा ॥ ११ ॥ एक दिन, |
| यद्यदाह न तद्द्द्ष्टमन्यथा हि मया क्वचित् ॥ ११ | जो बात तुम मुझसे पूछते हो वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मणसे पूछी। उस समय उसने उस मुनिके वचनोंको |
| एकदा तु मया पृष्टमेतद्यद्भवतोदितम् । | याद करके कहा कि उस जातिस्मर ब्राह्मणने, |
| प्राह कालिङ्गको विप्रस्स्मृत्वा तस्य मुनेर्वचः ॥ १२ | यम और उनके दूतोंके बीचमें जो संवाद हुआ था, |
| जातिस्मरेण कथितो रहस्यः परमो मम । | वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था। वही मैं तुमसे |
| यमकिङ्करयोर्योऽभूत्संवादस्तं ब्रवीमि ते ॥ १३ | कहता हूँ ॥ १२-१३ ॥ |
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
| १८६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [अ० ७ |
|---|
कालिङ्ग उवाच
स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं
वदति यमः किल तस्य कर्णमूले।
परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्-
प्रभुरहमन्यनृणामवैष्णवानाम्॥ १४
अहममरवरार्चितेन धात्रा
यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः।
हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः
प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः॥ १५
कटकमुकुटकर्णिकादिभेदैः
कनकमभेदमपीष्यते यथैकम्।
सुरपशुमनुजादिकल्पनाभि-
र्हरिरखिलाभिरुदीर्यते तथैकः॥ १६
क्षितितलपरमाणवोऽनिलान्ते
पुनरुपयान्ति यथैकतां धरित्र्याः।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन॥ १७
हरिममरवरार्चिताङ्घ्रिपद्मं
प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः।
तमपगतसमस्तपापबन्धं
व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम्॥ १८
इति यमवचनं निशम्य पाशी
यमपुरुषस्तमुवाच धर्मराजम्।
कथय मम विभो समस्तधातु-
र्भवति हरेः खलु यादृशोऽस्य भक्तः॥ १९
यम उवाच
न चलति निजवर्णधर्मतो यः
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।
न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम्॥ २०
कलिकलुषमलेन यस्य नात्मा
विमलमतेर्मलिनीकृतस्तमेनम्।
मनसि कृतजनार्दनं मनुष्यं
सततमवेहि हरेरतीवभक्तम्॥ २१
कालिङ्ग बोला—अपने अनुचरको हाथमें पाश लिये देखकर यमराजने उसके कानमें कहा—'भगवान् मधुसूदनके शरणागत व्यक्तियोंको छोड़ देना, क्योंकि मैं वैष्णवोंसे अतिरिक्त और सब मनुष्योंका ही स्वामी हूँ॥ १४॥ देव-पूज्य विधाताने मुझे 'यम' नामसे लोकोंके पाप-पुण्यका विचार करनेके लिये नियुक्त किया है। मैं अपने गुरु श्रीहरिके वशीभूत हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान् विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करनेमें समर्थ हैं॥ १५॥ जिस प्रकार सुवर्ण भेदरहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदिके भेदसे नानारूप प्रतीत होता है उसी प्रकार एक ही हरिका देवता, मनुष्य और पशु आदि नाना-विध कल्पनाओंसे निर्देश किया जाता है॥ १६॥
जिस प्रकार वायुके शान्त होनेपर उसमें उड़ते हुए परमाणु पृथिवीसे मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार गुण-क्षोभसे उत्पन्न हुए समस्त देवता, मनुष्य और पशु आदि [उसका अन्त हो जानेपर] उस सनातन परमात्मामें लीन हो जाते हैं॥ १७॥ जो भगवान्के सुरवरवन्दित चरण-कमलोंकी परमार्थ-बुद्धिसे वन्दना करता है, घृताहुतिसे प्रज्वलित अग्निके समान समस्त पाप-बन्धनसे मुक्त हुए उस पुरुषको तुम दूरहीसे छोड़कर निकल जाना'॥ १८॥
यमराजके ऐसे वचन सुनकर पाशहस्त यमदूतने उनसे पूछा—'प्रभो! सबके विधाता भगवान् हरिका भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिये'॥ १९॥
यमराज बोले—जो पुरुष अपने वर्ण-धर्मसे विचलित नहीं होता, अपने सुहृद् और विपक्षियोंके प्रति समान भाव रखता है, किसीका द्रव्य हरण नहीं करता तथा किसी जीवकी हिंसा नहीं करता उस अत्यन्त रागादि-शून्य और निर्मलचित्त व्यक्तिको भगवान् विष्णुका भक्त जानो॥ २०॥ जिस निर्मलमतिका चित्त कलि-कल्मषरूप मलसे मलिन नहीं हुआ और जिसने अपने हृदयमें श्रीजनार्दनको बसाया हुआ है उस मनुष्यको भगवान्का अतीव भक्त समझो॥ २१॥
अ० ७] * तृतीय अंश * १८७
कनकमपि रहस्यवेक्ष्य बुद्ध्या
तृणमिव यस्समवैति वै परस्वम्।
भवति च भगवत्यनन्यचेताः
पुरुषवरं तमवेहि विष्णुभक्तम्॥ २२
अर्थ : जो एकान्तमें पड़े हुए दूसरेके सोनेको देखकर भी उसे अपनी बुद्धिद्वारा तृणके समान समझता है और निरन्तर भगवान्का अनन्यभावसे चिन्तन करता है उस नरश्रेष्ठको विष्णुका भक्त जानो॥ २२॥
स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णु-
र्मनसि नृणां क्व च मत्सरादिदोषः।
न हि तुहिनमयूखरश्मिपुञ्जे
भवति हुताशनदीप्तिजः प्रतापः॥ २३
अर्थ : कहाँ तो स्फटिकगिरि-शिलाके समान अति निर्मल भगवान् विष्णु और कहाँ मनुष्योंके चित्तमें रहनेवाले राग-द्वेषादि दोष? [इन दोनोंका संयोग किसी प्रकार नहीं हो सकता] हिमकर (चन्द्रमा)-के किरण जालमें अग्नि-तेजकी उष्णता कभी नहीं रह सकती है॥ २३॥
विमलमतिरमत्सरः प्रशान्त-
श्शुचिचरितोऽखिलसत्त्वमित्रभूतः।
प्रियहितवचनोऽस्तमानमायो
वसति सदा हृदि तस्य वासुदेवः॥ २४
अर्थ : जो व्यक्ति निर्मल-चित्त, मात्सर्यरहित, प्रशान्त, शुद्ध-चरित्र, समस्त जीवोंका सुहृद्, प्रिय और हितवादी तथा अभिमान एवं मायासे रहित होता है उसके हृदयमें भगवान् वासुदेव सर्वदा विराजमान रहते हैं॥ २४॥
वसति हृदि सनातने च तस्मिन्
भवति पुमाञ्जगतोऽस्य सौम्यरूपः।
क्षितिरसमतिरम्यमात्मनोऽन्तः
कथयति चारुतयैव शालपोतः॥ २५
अर्थ : उन सनातन भगवान्के हृदयमें विराजमान होनेपर पुरुष इस जगत्में सौम्यमूर्ति हो जाता है, जिस प्रकार नवीन शालवृक्ष अपने सौन्दर्यसे ही भीतर भरे हुए अति सुन्दर पार्थिव रसको बतला देता है॥ २५॥
यमनियमविधूतकल्मषाणा-
मनुदिनमच्युतसक्तमानसानाम्।
अपगतमदमानमत्सराणां
त्यज भट दूरतरेण मानवानाम्॥ २६
अर्थ : हे दूत! यम और नियमके द्वारा जिनकी पापराशि दूर हो गयी है, जिनका हृदय निरन्तर श्रीअच्युतमें ही आसक्त रहता है, तथा जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्यका लेश भी नहीं रहा है; उन मनुष्योंको तुम दूरहीसे त्याग देना॥ २६॥
हृदि यदि भगवाननादिरास्ते
हरिरसिशङ्खगदाधरोऽव्ययात्मा।
तदघमघविघातकर्तृभिन्नं
भवति कथं सति चान्धकारमर्के॥ २७
अर्थ : यदि खड्ग, शंख और गदाधारी अव्ययात्मा भगवान् हरि हृदयमें विराजमान हैं तो उन पापनाशक भगवान्के द्वारा उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्यके रहते हुए भला अन्धकार कैसे ठहर सकता है?॥ २७॥
हरति परधनं निहन्ति जन्तून्
वदति तथाऽनृतनिष्ठुराणि यश्च।
अशुभजनितदुर्मदस्य पुंसः
कलुषमतेर्हृदि तस्य नास्त्यनन्तः॥ २८
अर्थ : जो पुरुष दूसरोंका धन हरण करता है, जीवोंकी हिंसा करता है, तथा मिथ्या और कटुभाषण करता है उस अशुभ कर्मोन्मत्त दुष्टबुद्धिके हृदयमें भगवान् अनन्त नहीं टिक सकते॥ २८॥
न सहति परसम्पदं विनिन्दां
कलुषमतिः कुरुते सतामसाधुः।
न यजति न ददाति यश्च सन्तं
मनसि न तस्य जनार्दनोऽधमस्य॥ २९
अर्थ : जो कुमति दूसरोंके वैभवको नहीं देख सकता, जो दूसरोंकी निन्दा करता है, साधुजनोंका अपकार करता है तथा [सम्पन्न होकर भी] न तो श्रीविष्णुभगवान्की पूजा ही करता है और न [उनके भक्तोंको] दान ही देता है; उस अधमके हृदयमें श्रीजनार्दनका निवास कभी नहीं हो सकता॥ २९॥
१८८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ७
परमसुहृदि बान्धवे कलत्रे सुततनयापितृमातृभृत्यवर्गे। शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवेहि नास्य भक्तम्॥ ३०
जो दुष्टबुद्धि अपने परम सुहृद्, बन्धु-बान्धव, स्त्री, पुत्र, कन्या, पिता तथा भृत्यवर्गके प्रति अर्थतृष्णा प्रकट करता है उस पापाचारीको भगवान्का भक्त मत समझो॥ ३०॥
अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्त- स्सततमनार्यकुशीलसंगमत्तः। अनुदिनकृतपापबन्धयुक्तः पुरुषपशुर्न हि वासुदेवभक्तः॥ ३१
जो दुर्बुद्धि पुरुष असत्कर्मोंमें लगा रहता है, नीच पुरुषोंके आचार और उन्हींके संगमें उन्मत्त रहता है तथा नित्यप्रति पापमय कर्मबन्धनसे ही बँधता जाता है वह मनुष्यरूप पशु ही है; वह भगवान् वासुदेवका भक्त नहीं हो सकता॥ ३१॥
सकलमिदमहं च वासुदेवः परमपुमान्यरमेश्वरस्स एकः। इति मतिरचला भवत्यनन्ते हृदयगते व्रज तान्विहाय दूरात्॥ ३२
यह सकल प्रपंच और मैं एक परमपुरुष परमेश्वर वासुदेव ही हैं, हृदयमें भगवान् अनन्तके स्थित होनेसे जिनकी ऐसी स्थिर बुद्धि हो गयी हो, उन्हें तुम दूरहीसे छोड़कर चले जाना॥ ३२॥
कमलनयन वासुदेव विष्णो धरणिधराच्युत शङ्खचक्रपाणे। भव शरणमितीरयन्ति ये वै त्यज भट दूरतरेण तानपापान्॥ ३३
'हे कमलनयन! हे वासुदेव! हे विष्णो! हे धरणिधर! हे अच्युत! हे शंख-चक्र-पाणे! आप हमें शरण दीजिये'-जो लोग इस प्रकार पुकारते हों उन निष्पाप व्यक्तियोंको तुम दूरसे ही त्याग देना॥ ३३॥
वसति मनसि यस्य सोऽव्ययात्मा पुरुषवरस्य न तस्य दृष्टिपाते। तव गतिरथ वा ममास्ति चक्र- प्रतिहतवीर्यबलस्य सोऽन्यलोक्यः॥ ३४
जिस पुरुषश्रेष्ठके अन्तःकरणमें वे अव्ययात्मा भगवान् विराजते हैं, उसका जहाँतक दृष्टिपात होता है वहाँतक भगवान्के चक्रके प्रभावसे अपने बल-वीर्य नष्ट हो जानेके कारण तुम्हारी अथवा मेरी गति नहीं हो सकती। वह (महापुरुष) तो अन्य (वैकुण्ठादि) लोकोंका पात्र है॥ ३४॥
कालिङ्ग उवाच
इति निजभटशासनाय देवो रवितनयस्स किलाह धर्मराजः। मम कथितमिदं च तेन तुभ्यं कुरुवर सम्यगिदं मयापि चोक्तम्॥ ३५
कालिंग बोला—हे कुरुवर! अपने दूतको शिक्षा देनेके लिये सूर्यपुत्र धर्मराजने उससे इस प्रकार कहा। मुझसे यह प्रसंग उस जातिस्मर मुनिने कहा था और मैंने यह सम्पूर्ण कथा तुमको सुना दी है॥ ३५॥
श्रीभीष्म उवाच
नकुलैतन्ममाख्यातं पूर्वं तेन द्विजन्मना। कलिङ्गदेशादभ्येत्य प्रीतेन सुमहात्मना॥ ३६
श्रीभीष्मजी बोले—हे नकुल! पूर्वकालमें कलिंगदेशसे आये हुए उस महात्मा ब्राह्मणने प्रसन्न होकर मुझे यह सब विषय सुनाया था॥ ३६॥
मयाप्येतद्यथान्यायं सम्यग्वत्स तवोदितम्। यथा विष्णुमृते नान्यत्राणं संसारसागरे॥ ३७
हे वत्स! वही सम्पूर्ण वृत्तान्त, जिस प्रकार कि इस संसार-सागरमें एक विष्णुभगवान्को छोड़कर जीवका और कोई भी रक्षक नहीं है, मैंने ज्यों-का-त्यों तुम्हें सुना दिया॥ ३७॥
किंकराः पाशदण्डाश्च न यमो न च यातनाः। समर्थास्तस्य यस्यात्मा केशवालम्बनस्सदा॥ ३८
जिसका हृदय निरन्तर भगवत्परायण रहता है उसका यम, यमदूत, यमपाश, यमदण्ड अथवा यम-यातना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते॥ ३८॥
अ० ८ ] * तृतीय अंश * १८९
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार जो कुछ यमने कहा था, वह सब मैंने तुम्हें भली प्रकार सुना दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३९ ॥ |
|---|---|
| एतन्मुने समाख्यातं गीतं वैवस्वतेन यत्।<br>त्वत्प्रश्नानुगतं सम्यक्किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ३९ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय
विष्णुभगवान्की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले—हे भगवन्! जो लोग संसारको जीतना चाहते हैं, वे जिस प्रकार जगत्पति भगवान् विष्णुकी उपासना करते हैं, वह वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ और हे महामुने! उन गोविन्दकी आराधना करनेपर आराधनपरायण पुरुषोंको जो फल मिलता है, वह भी मैं सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ |
|---|---|
| भगवन्भगवान्देवः संसारविजिगीषुभिः।<br>समाख्याहि जगन्नाथो विष्णुराराध्यते यथा ॥ १ ॥ | |
| आराधिताच्च गोविन्दादाराधनपरैर्नरैः।<br>यत्प्राप्यते फलं श्रोतुं तच्चेच्छाामि महामुने ॥ २ ॥ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! तुम जो कुछ पूछते हो यही बात महात्मा सगरने और्वसे पूछी थी। उसके उत्तरमें उन्होंने जो कुछ कहा वह मैं तुमको सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ ३ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! सगरने भृगुवंशी महात्मा और्वको प्रणाम करके उनसे भगवान् विष्णुकी आराधनाके उपाय और विष्णुकी उपासना करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है उसके विषयमें पूछा था। उनके पूछनेपर और्वने यत्नपूर्वक जो कुछ कहा था वह सब सुनो ॥ ४-५ ॥ |
| यत्पृच्छति भवानेतत्त्सगरेण महात्मना।<br>और्वः प्राह यथा पृष्टस्तन्मे निगदतःशृणु ॥ ३ ॥ | |
| सगरः प्रणिपत्यैनमौर्वं पप्रच्छ भार्गवम्।<br>विष्णोराराधनोपायसम्बन्धं मुनिसत्तम ॥ ४ ॥ | |
| फलं चाराधिते विष्णौ यत्पुंसामभिजायते।<br>स चाह पृष्टो यत्नेन तस्मै तन्मेऽखिलं शृणु ॥ ५ ॥ | |
| और्व उवाच | और्व बोले—भगवान् विष्णुकी आराधना करनेसे मनुष्य भूमण्डल-सम्बन्धी समस्त मनोरथ, स्वर्ग, स्वर्गसे भी श्रेष्ठ ब्रह्मपद और परम निर्वाण-पद भी प्राप्त कर लेता है ॥ ६ ॥ हे राजेन्द्र! वह जिस-जिस फलकी जितनी-जितनी इच्छा करता है, अल्प हो या अधिक, श्रीअच्युतकी आराधनासे निश्चय ही वह सब प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥ और हे भूपाल! तुमने जो पूछा कि हरिकी आराधना किस प्रकार की जाय, सो सब मैं तुमसे कहता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ८ ॥ जो पुरुष वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाला है वही परमपुरुष विष्णुकी आराधना कर सकता है; उनको सन्तुष्ट करनेका और कोई मार्ग नहीं है ॥ ९ ॥ हे नृप! यज्ञोंका यजन करनेवाला पुरुष उन (विष्णु) ही का यजन करता है, जप करनेवाला उन्हींका जप करता है और दूसरोंकी हिंसा करनेवाला उन्हींकी हिंसा करता है; क्योंकि भगवान् हरि सर्वभूतमय हैं ॥ १० ॥ |
| भौमं मनोरथं स्वर्गं स्वर्गे रम्यं च यत्पदम्।<br>प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ निर्वाणमपि चोत्तमम् ॥ ६ ॥ | |
| यद्यदिच्छति यावच्च फलमाराधितेऽच्युते।<br>तत्तदाप्नोति राजेन्द्र भूरि स्वल्पमथापि वा ॥ ७ ॥ | |
| यत्तु पृच्छसि भूपाल कथमाराध्यते हरिः।<br>तदहं सकलं तुभ्यं कथयामि निबोध मे ॥ ८ ॥ | |
| वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।<br>विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः ॥ ९ ॥ | |
| यजन्यज्ञान्यजत्येनं जपत्येनं जपन्नृप।<br>निघ्नन्नन्यान्हिनस्त्येनं सर्वभूतो यतो हरिः ॥ १० ॥ |
१९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८ ]
| तस्मात्सदाचारवता पुरुषेण जनार्दनः।<br>आराध्यते स्ववर्णोक्तधर्मानुष्ठानकारिणा ॥ ११ | अतः सदाचारयुक्त पुरुष अपने वर्णके लिये विहित धर्मका आचरण करते हुए श्रीजनार्दनहीकी उपासना करता है ॥ ११ ॥ हे पृथिवीपते ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए ही विष्णुकी आराधना करते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ १२ ॥ |
|---|---|
| ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च पृथिवीपते।<br>स्वधर्मतत्परो विष्णुमाराधयति नान्यथा ॥ १२ | |
| परापवादं पैशुन्यमनृतं च न भाषते।<br>अन्योद्वेगकरं वापि तोष्यते तेन केशवः ॥ १३ | जो पुरुष दूसरोंकी निन्दा, चुगली अथवा मिथ्याभाषण नहीं करता तथा ऐसा वचन भी नहीं बोलता जिससे दूसरोंको खेद हो, उससे निश्चय ही भगवान् केशव प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥ हे राजन् ! जो पुरुष दूसरोंकी स्त्री, धन और हिंसामें रुचि नहीं करता उससे सर्वदा ही भगवान् केशव सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १४ ॥ हे नरेन्द्र ! जो मनुष्य किसी प्राणी अथवा [वृक्षादि ] अन्य देहधारियोंको पीड़ित अथवा नष्ट नहीं करता उससे श्रीकेशव सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १५ ॥ जो पुरुष देवता, ब्राह्मण और गुरुजनोंकी सेवामें सदा तत्पर रहता है, हे नरेश्वर ! उससे गोविन्द सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १६ ॥ जो व्यक्ति स्वयं अपने और अपने पुत्रोंके समान ही समस्त प्राणियोंका भी हित-चिन्तक होता है वह सुगमतासे ही श्रीहरिको प्रसन्न कर लेता है ॥ १७ ॥ हे नृप ! जिसका चित्त रागादि दोषोंसे दूषित नहीं है उस विशुद्ध-चित्त पुरुषसे भगवान् विष्णु सदा सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १८ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! शास्त्रोंमें जो-जो वर्णाश्रम-धर्म कहे हैं उन-उनका ही आचरण करके पुरुष विष्णुकी आराधना कर सकता है; और किसी प्रकार नहीं ॥ १९ ॥ |
| परदारपरद्रव्यपरहिंसासु यो रतिम्।<br>न करोति पुमान्भूप तोष्यते तेन केशवः ॥ १४ | |
| न ताडयति नो हन्ति प्राणिनोऽन्यांश्च देहिनः।<br>यो मनुष्यो मनुष्येन्द्र तोष्यते तेन केशवः ॥ १५ | |
| देवद्विजगुरूणां च शुश्रूषासु सदोद्यतः।<br>तोष्यते तेन गोविन्दः पुरुषेण नरेश्वर ॥ १६ | |
| यथात्मनि च पुत्रे च सर्वभूतेषु यस्तथा।<br>हितकामो हरिस्तेन सर्वदा तोष्यते सुखम् ॥ १७ | |
| यस्य रागादिदोषेण न दुष्टं नृप मानसम्।<br>विशुद्धचेतसा विष्णुस्तोष्यते तेन सर्वदा ॥ १८ | |
| वर्णाश्रमेषु ये धर्माश्शास्त्रोक्ता नृपसत्तम।<br>तेषु तिष्ठन्नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ॥ १९ | |
| सगर उवाच<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि वर्णधर्मानशेषतः।<br>तथैवाश्रमधर्मांश्च द्विजवर्य ब्रवीहि तान् ॥ २० | सगर बोले— हे द्विजश्रेष्ठ ! अब मैं सम्पूर्ण वर्णधर्म और आश्रमधर्मोंको सुनना चाहता हूँ, कृपा करके वर्णन कीजिये ॥ २० ॥ |
| और्व उवाच<br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च यथाक्रमम्।<br>त्वमेकाग्रमतिर्भूत्वा शृणु धर्मान्मयोदितान् ॥ २१ | और्व बोले— जिनका मैं वर्णन करता हूँ, उन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके धर्मोंका तुम एकाग्रचित्त होकर क्रमशः श्रवण करो ॥ २१ ॥ ब्राह्मणका कर्तव्य है कि दान दे, यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करे, स्वाध्यायशील हो, नित्य स्नान-तर्पण करे और अग्न्याधान आदि कर्म करता रहे ॥ २२ ॥ ब्राह्मणको उचित है कि वृत्तिके लिये दूसरोंसे यज्ञ करावे, औरोंको पढ़ावे और न्यायोपार्जित शुद्ध धनमेंसे न्यायानुतूल द्रव्य संग्रह करे ॥ २३ ॥ ब्राह्मणको कभी किसीका अहित नहीं करना चाहिये और सर्वदा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहना चाहिये। सम्पूर्ण प्राणियोंमें मैत्री रखना ही ब्राह्मणका परम धन है ॥ २४ ॥ पत्थरमें और पराये रत्नमें ब्राह्मणको समान-बुद्धि रखनी चाहिये। हे राजन् ! पत्नीके विषयमें ऋतुगामी होना ही ब्राह्मणके लिये प्रशंसनीय कर्म है ॥ २५ ॥ |
| दानं दद्याद्यजेद्देवान्यज्ञैस्स्वाध्यायतत्परः।<br>नित्योदकी भवेद्विप्रः कुर्याच्चाग्निपरिग्रहम् ॥ २२ | |
| वृत्त्यर्थं याजयेच्चान्यानन्यानध्यापयेत्तथा।<br>कुर्यात्प्रतिग्रहादानं शुक्लार्थान्न्यायतो द्विजः ॥ २३ | |
| सर्वभूतहितं कुर्यान्नाहितं कस्यचिद् द्विजः।<br>मैत्री समस्तभूतेषु ब्राह्मणस्योत्तमं धनम् ॥ २४ | |
| ग्राव्णि रत्ने च पारक्ये समबुद्धिर्भवेद् द्विजः।<br>ऋतावभिगमः पत्न्यां शस्यते चास्य पार्थिव ॥ २५ |
अ० ८ ] * तृतीय अंश * १९१
| दानानि दद्यादिच्छातो द्विजेभ्यः क्षत्रियोऽपि वा।<br>यजेच्च विविधैर्यज्ञैरधीयीत च पार्थिवः ॥ २६ | क्षत्रियको उचित है कि ब्राह्मणोंको यथेच्छ दान दे, विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करे और अध्ययन करे ॥ २६ ॥ |
| शस्त्राजीवो महीरक्षा प्रवरा तस्य जीविका।<br>तत्रापि प्रथमः कल्पः पृथिवीपरिपालनम् ॥ २७ | शस्त्र धारण करना और पृथिवीकी रक्षा करना ही क्षत्रियकी उत्तम आजीविका है; इनमें भी पृथिवी-पालन ही उत्कृष्टतर है ॥ २७ ॥ |
| धरित्रीपालनेनैव कृतकृत्या नराधिपाः।<br>भवन्ति नृपतेरंशा यतो यज्ञादिकर्मणाम् ॥ २८ | पृथिवी-पालनसे ही राजालोग कृतकृत्य हो जाते हैं, क्योंकि पृथिवीमें होनेवाले यज्ञादि कर्मोंका अंश राजाको मिलता है ॥ २८ ॥ |
| दुष्टानां शासनाद्राजा शिष्टानां परिपालनात् ।<br>प्राप्नोत्यभिमताँल्लोकान्वर्णसंस्थां करोति यः ॥ २९ | जो राजा अपने वर्णधर्मको स्थिर रखता है वह दुष्टोंको दण्ड देने और साधुजनोंका पालन करनेसे अपने अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २९ ॥ |
| पाशुपाल्यं च वाणिज्यं कृषिं च मनुजेश्वर।<br>वैश्याय जीविकां ब्रह्मा ददौ लोकपितामहः ॥ ३० | हे नरनाथ! लोकपितामह ब्रह्माजीने वैश्योंको पशु-पालन, वाणिज्य और कृषि—ये जीविकारूपसे दिये हैं ॥ ३० ॥ |
| तस्याप्यध्ययनं यज्ञो दानं धर्मश्च शस्यते।<br>नित्यनैमित्तिकादीनामनुष्ठानं च कर्मणाम् ॥ ३१ | अध्ययन, यज्ञ, दान और नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंका अनुष्ठान—ये कर्म उसके लिये भी विहित हैं ॥ ३१ ॥ |
| द्विजातिसंश्रितं कर्म तादर्थ्यं तेन पोषणम्।<br>क्रयविक्रयजैर्र्वापि धनैः कारूद्भवैन वा ॥ ३२ | शूद्रका कर्तव्य यही है कि द्विजातियोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये कर्म करे और उसीसे अपना पालन-पोषण करे, अथवा [आपत्कालमें, जब उक्त उपायसे जीविका-निर्वाह न हो सके तो] वस्तुओंके लेने-बेचने अथवा कारीगरीके कामोंसे निर्वाह करे ॥ ३२ ॥ |
| शूद्रस्य सन्नतिश्शौचं सेवा स्वामिन्यमायया ।<br>अमन्त्रयज्ञो ह्यास्तेयं सत्सङ्गो विप्ररक्षणम् ॥ ३३ | अति नम्रता, शौच, निष्कपट स्वामि-सेवा, मन्त्रहीन यज्ञ, अस्तेय, सत्संग और ब्राह्मणकी रक्षा करना—ये शूद्रके प्रधान कर्म हैं ॥ ३३ ॥ |
| दानं च दद्याच्छूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेत च।<br>पित्र्यादिकं च तत्सर्वं शूद्रः कुर्वीत तेन वै ॥ ३४ | हे राजन्! शूद्रको भी उचित है कि दान दे, बलिवैश्वदेव अथवा नमस्कार आदि अल्प यज्ञोंका अनुष्ठान करे, पितृश्राद्ध आदि कर्म करे, |
| भृत्यादिभरणार्थाय सर्वेषां च परिग्रहः।<br>ऋतुकालेऽभिगमनं स्वदारेषु महीपते ॥ ३५ | अपने आश्रित कुटुम्बियोंके भरण-पोषणके लिये सकल वर्णोंसे द्रव्य संग्रह करे और ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे प्रसंग करे ॥ ३४-३५ ॥ |
| दया समस्तभूतेषु तितिक्षा नातिमानिता।<br>सत्यं शौचमनायासो मंगलं प्रियवादिता ॥ ३६ | हे नरेश्वर! इनके अतिरिक्त समस्त प्राणियोंपर दया, सहनशीलता, अमानिता, सत्य, शौच, अधिक परिश्रम न करना, मंगलाचरण, प्रियवादिता, |
| मैत्र्यस्पृहा तथा तद्वदकार्पण्यं नरेश्वर।<br>अनसूया च सामान्यवर्णानां कथिता गुणाः ॥ ३७ | मैत्री, निष्कामता, अकृपणता और किसीके दोष न देखना—ये समस्त वर्णोंके सामान्य गुण हैं ॥ ३६-३७ ॥ |
| आश्रमाणां च सर्वेषामेते सामान्यलक्षणाः।<br>गुणांस्तथापद्धर्मांश्च विप्रादीनामिमाञ्छृणु ॥ ३८ | सब वर्णोंके सामान्य लक्षण इसी प्रकार हैं। अब इन ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके आपद्धर्म और गुणोंका श्रवण करो ॥ ३८ ॥ |
| क्षात्रं कर्म द्विजस्योक्तं वैश्यं कर्म तथाऽपदि।<br>राजन्यस्य च वैश्योक्तं शूद्रकर्म न चैतयोः ॥ ३९ | आपत्तिके समय ब्राह्मणको क्षत्रिय और वैश्य-वर्णोंकी वृत्तिका अवलम्बन करना चाहिये तथा क्षत्रियको केवल वैश्यवृत्तिका ही आश्रय लेना चाहिये। ये दोनों शूद्रका कर्म (सेवा आदि) कभी न करें ॥ ३९ ॥ |
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
| १९२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
|---|
सामर्थ्ये सति तत्त्याज्यमुभाभ्यामपि पार्थिव ।<br>तदेवापदि कर्तव्यं न कुर्यात्कर्मसङ्करम् ॥ ४०<br>इत्येते कथिता राजन्वर्णधर्मा मया तव ।<br>धर्मानाश्रमिणां सम्यग्ब्रुवतो मे निशामय ॥ ४१ | हे राजन् ! इन उपरोक्त वृत्तियोंको भी सामर्थ्य होनेपर त्याग दे; केवल आपत्कालमें ही इनका आश्रय ले, कर्म संकरता (कर्मोंका मेल) न करे ॥ ४० ॥ हे राजन् ! इस प्रकार वर्णधर्मोंका वर्णन तो मैंने तुमसे कर दिया; अब आश्रम-धर्मोंका निरूपण और करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४१ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय
ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका वर्णन
और्व उवाच
बालः कृतोपनयनो वेदाहरणतत्परः ।<br>गुरुगेहे वसेद्द्रूप ब्रह्मचारी समाहितः ॥ १
शौचाचारव्रतं तत्र कार्यं शुश्रूषणं गुरोः ।<br>व्रतानि चरता ग्राह्यो वेदश्च कृतबुद्धिना ॥ २
उभे सन्ध्ये रविं भूप तथैवाग्निं समाहितः ।<br>उपतिष्ठेत्तदा कुर्याद्गुरोरप्यभिवादनम् ॥ ३
स्थिते तिष्ठेद्ब्रजेद्याते नीचैरासीत चासति ।<br>शिष्यो गुरोर्नृपश्रेष्ठ प्रतिकूलं न सञ्चरेत् ॥ ४
तेनैवोक्तं पठेद्देवं नान्यचित्तः पुरःस्थितः ।<br>अनुज्ञातश्च भिक्षानमश्नीयाद्गुरुणा ततः ॥ ५
अवगाहेदपः पूर्वमाचार्येणावगाहिताः ।<br>समिज्जलादिकं चास्य कल्यं कल्यमुपानयेत् ॥ ६
गृहीतग्राह्यवेदश्च ततोऽनुज्ञामवाप्य च ।<br>गार्हस्थ्यमाविशेत्प्राज्ञो निष्पन्नगुरुनिष्कृतिः ॥ ७
विधिनावाप्तदारस्तु धनं प्राप्य स्वकर्मणा ।<br>गृहस्थकार्यमखिलं कुर्याद्द्रूपाल शक्तितः ॥ ८
निवापेन पितॄनर्चन्यज्ञैर्देवांस्तथातिथीन् ।<br>अन्नैर्मुनींश्च स्वाध्यायैरपत्येन प्रजापतिम् ॥ ९
भूतानि बलिभिश्चैव वात्सल्येनाखिलं जगत् ।<br>प्राप्नोति लोकान्पुरुषो निजकर्मसमार्जितान् ॥ १०
और्व बोले—हे भूपते ! बालकको चाहिये कि उपनयन-संस्कारके अनन्तर वेदाध्ययनमें तत्पर होकर ब्रह्मचर्यका अवलम्बन कर, सावधानतापूर्वक गुरुगृहमें निवास करे ॥ १ ॥ वहाँ रहकर उसे शौच और आचार-व्रतका पालन करते हुए गुरुकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये तथा व्रतादिका आचरण करते हुए स्थिर-बुद्धिसे वेदाध्ययन करना चाहिये ॥ २ ॥ हे राजन् ! [ प्रातःकाल और सायंकाल] दोनों सन्ध्याओंमें एकाग्र होकर सूर्य और अग्निकी उपासना करे तथा गुरुका अभिवादन करे ॥ ३ ॥ गुरुके खड़े होनेपर खड़ा हो जाय, चलनेपर पीछे-पीछे चलने लगे तथा बैठ जानेपर नीचे बैठ जाय। हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार कभी गुरुके विरुद्ध कोई आचरण न करे ॥ ४ ॥ गुरुजीके कहनेपर ही उनके सामने बैठकर एकाग्रचित्तसे वेदाध्ययन करे और उनकी आज्ञा होनेपर ही भिक्षान्न भोजन करे ॥ ५ ॥ जलमें प्रथम आचार्यके स्नान कर चुकनेपर फिर स्वयं स्नान करे तथा प्रतिदिन प्रातःकाल गुरुजीके लिये समिधा, जल, कुश और पुष्पादि लाकर जुटा दे ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपना अभिमत वेदपाठ समाप्त कर चुकनेपर बुद्धिमान् शिष्य गुरुजीकी आज्ञासे उन्हें गुरु-दक्षिणा देकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे ॥ ७ ॥ हे राजन् ! फिर विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर अपनी वर्णानुकूल वृत्तिसे द्रव्योपार्जन करता हुआ सामर्थ्यानुसार समस्त गृहकार्य करता रहे ॥ ८ ॥ पिण्ड-दानादिसे पितृगणकी, यज्ञादिसे देवताओंकी, अन्नदानसे अतिथियोंकी, स्वाध्यायसे ऋषियोंकी, पुत्रोत्पत्तिसे प्रजापतिकी, बलियों (अन्नभाग)-से भूतगणकी तथा वात्सल्यभावसे सम्पूर्ण जगत्की पूजा करते हुए पुरुष अपने कर्मोंद्वारा मिले हुए उत्तमोत्तम लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ९-१० ॥
अ० ९ ] * तृतीय अंश * १९३
| भिक्षाभुजश्च ये केचित्परिव्राड्ब्रह्मचारिणः ।<br>तेऽप्यत्रैव प्रतिष्ठन्ते गार्हस्थ्यं तेन वै परम् ॥ ११ | जो केवल भिक्षावृत्तिसे ही रहनेवाले परिव्राजक और ब्रह्मचारी आदि हैं उनका आश्रय भी गृहस्थाश्रम ही है, अतः यह सर्वश्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ हे राजन्! विप्रगण वेदाध्ययन, तीर्थस्नान और देश-दर्शनके लिये पृथिवी-पर्यटन किया करते हैं ॥ १२ ॥ उनमेंसे जिनका कोई निश्चित गृह अथवा भोजन प्रबन्ध नहीं होता और जो जहाँ सायंकाल हो जाता है वहीं ठहर जाते हैं, उन सबका आधार और मूल गृहस्थाश्रम ही है ॥ १३ ॥ हे राजन्! ऐसे लोग जब घर आवें तो उनका कुशल-प्रश्न और मधुर वचनोंसे स्वागत करे तथा शय्या, आसन और भोजनके द्वारा उनका यथाशक्ति सत्कार करे ॥ १४ ॥ जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है उसे अपने समस्त दुष्कर्म देकर वह (अतिथि) उसके पुण्यकर्मोंको स्वयं ले जाता है ॥ १५ ॥ गृहस्थके लिये अतिथिके प्रति अपमान, अहंकार और दम्भका आचरण करना, उसे देकर पछताना, उसपर प्रहार करना अथवा उससे कटुभाषण करना उचित नहीं है ॥ १६ ॥ इस प्रकार जो गृहस्थ अपने परम धर्मका पूर्णतया पालन करता है वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर अत्युत्तम लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |
| वेदाहरणकार्याय तीर्थस्नानाय च प्रभो ।<br>अटन्ति वसुधां विप्राः पृथिवीदर्शनाय च ॥ १२ | |
| अनिकेता ह्यनाहारा यत्र सायंगृहाश्च ये ।<br>तेषां गृहस्थः सर्वेषां प्रतिष्ठा योनिरैव च ॥ १३ | |
| तेषां स्वागतदानादि वक्तव्यं मधुरं नृप ।<br>गृहागतानां दद्याच्च शयनासनभोजनम् ॥ १४ | |
| अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते ।<br>स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ १५ | |
| अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव गृहे सतः ।<br>परितापोपघातौ च पारुष्यं च न शस्यते ॥ १६ | |
| यस्तु सम्यक्करोत्येवं गृहस्थः परमं विधिम् ।<br>सर्वबन्धविनिर्मुक्तो लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ १७ | |
| वयःपरिणतो राजन्कृतकृत्यो गृहाश्रमी ।<br>पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ १८ | हे राजन्! इस प्रकार गृहस्थोचित कार्य करते-करते जिसकी अवस्था ढल गयी हो उस गृहस्थको उचित है कि स्त्रीको पुत्रोंके प्रति सौंपकर अथवा अपने साथ लेकर वनको चला जाय ॥ १८ ॥ वहाँ पत्र, मूल, फल आदिका आहार करता हुआ, लोम, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) और जटाओंको धारण कर पृथिवीपर शयन करे और मुनिवृत्तिका अवलम्बन कर सब प्रकार अतिथिकी सेवा करे ॥ १९ ॥ उसे चर्म, काश और कुशाओंसे अपना बिछौना तथा ओढ़नेका वस्त्र बनाना चाहिये । हे नरेश्वर! उस मुनिके लिये त्रिकाल-स्नानका विधान है ॥ २० ॥ इसी प्रकार देवपूजन, होम, सब अतिथियोंका सत्कार, भिक्षा और बलिवैश्वदेव भी उसके विहित कर्म हैं ॥ २१ ॥ हे राजेन्द्र! वन्य तैलादिको शरीरमें मलना और शीतोष्णका सहन करते हुए तपस्यामें लगे रहना उसके प्रशस्त कर्म हैं ॥ २२ ॥ जो वानप्रस्थ मुनि इन नियत कर्मोंका आचरण करता है वह अपने समस्त दोषोंको अग्निके समान भस्म कर देता है और नित्य-लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥ |
| पर्णमूलफलाहारः केशश्मश्रुजटाधरः ।<br>भूमिशायी भवेत्तत्र मुनिस्स्र्वातिथिनृप ॥ १९ | |
| चर्मकाशकुशैः कुर्यात्परिधानोत्तरीयके ।<br>तद्वत्त्रिश्रवणं स्नानं शस्तमस्य नरेश्वर ॥ २० | |
| देव build: देवताभ्यर्चनं होमस्सर्वाभ्यागतपूजनम् ।<br>भिक्षा बलिप्रदानं च शस्तमस्य नरेश्वर ॥ २१ | |
| वन्यस्नेहेन गात्राणामभ्यंगश्चास्य शस्यते ।<br>तपश्च तस्य राजेन्द्र शीतोष्णादिसहिष्णुता ॥ २२ | |
| यस्त्वेतां नियतश्चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः ।<br>स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च शाश्वतान् ॥ २३ | |
| चतुर्थश्चाश्रमो भिक्षोः प्रोच्यते यो मनीषिभिः ।<br>तस्य स्वरूपं गदतो मम श्रोतुं नृपार्हसि ॥ २४ | हे नृप! पण्डितगण जिस चतुर्थ आश्रमको भिक्षु-आश्रम कहते हैं अब मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २४ ॥ हे नरेन्द्र! तृतीय आश्रमके अनन्तर पुत्र, द्रव्य और स्त्री आदिके स्नेहको सर्वथा त्यागकर तथा मात्सर्यको छोड़कर चतुर्थ आश्रममें प्रवेश करे ॥ २५ ॥ |
| पुत्रद्रव्यकलत्रेषु त्यक्तस्नेहो नराधिप ।<br>चतुर्थमाश्रमस्थानं गच्छेद्विधूत मत्सरः ॥ २५ |
48 Visnupuran_Section_8_1_Front
१९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०
त्रैवर्गिकांस्त्यजेत्सर्वानारम्भानवनीपते ।
मित्रादिषु समो मैत्रस्समस्तेष्वेव जन्तुषु ॥ २६
जरायुजाण्डजादीनां वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
युक्तः कुर्वीत न द्रोहं सर्वसङ्गांश्च वर्जयेत् ॥ २७
एकरात्रस्थितिर्ग्रामे पञ्चरात्रस्थितिः पुरे ।
तथा तिष्ठेद्यथाप्रीतिर्द्वेषो वा नास्य जायते ॥ २८
प्राणयात्रानिमित्तं च व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
काले प्रशस्तवर्णानां भिक्षार्थं पर्यटेद् गृहान् ॥ २९
कामः क्रोधस्तथा दर्पमोहेलोभादयश्च ये ।
तांस्तु सर्वान्परित्यज्य परिव्राङ् निर्ममो भवेत् ॥ ३०
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।
तस्यापि सर्वभूतेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ३१
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं
शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।
विप्रस्तु भैक्ष्योपहितैर्हविर्भि-
श्चिताग्निकानां व्रजति स्म लोकान् ॥ ३२
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं
शुचिस्सुखं कल्पितबुद्धियुक्तः ।
अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तः
स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः ॥ ३३
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
भावार्थ :—
हे पृथिवीपते ! भिक्षुको उचित है कि अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्गसम्बन्धी समस्त कर्मोंको छोड़ दे, शत्रु-मित्रादिमें समान भाव रखे और सभी जीवोंका सुहृद् हो ॥ २६ ॥ निरन्तर समाहित रहकर जरायुज, अण्डज और स्वेदज आदि समस्त जीवोंसे मन, वाणी अथवा कर्मद्वारा कभी द्रोह न करे तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे ॥ २७ ॥ ग्राममें एक रात और पुरमें पाँच रात्रितक रहे तथा इतने दिन भी तो इस प्रकार रहे जिससे किसीसे प्रेम अथवा द्वेष न हो ॥ २८ ॥ जिस समय घरोंमें अग्नि शान्त हो जाय और लोग भोजन कर चुके उस समय प्राणरक्षाके लिये उत्तम वर्णोंमें भिक्षाके लिये जाय ॥ २९ ॥ परिव्राजकको चाहिये कि काम, क्रोध तथा दर्प, लोभ और मोह आदि समस्त दुर्गुणोंको छोड़कर ममताशून्य होकर रहे ॥ ३० ॥ जो मुनि समस्त प्राणियोंको अभयदान देकर विचरता है; उसको भी किसीसे कभी कोई भय नहीं होता ॥ ३१ ॥ जो ब्राह्मण चतुर्थ आश्रममें अपने शरीरमें स्थित प्राणादिसहित जठराग्निके उद्देश्यसे अपने मुखमें भिक्षान्निरूप हविसे हवन करता है, वह ऐसा अग्निहोत्र करके अग्निहोत्रियोंके लोकोंको प्राप्त हो जाता है ॥ ३२ ॥ जो ब्राह्मण [ब्रह्मसे भिन्न सभी मिथ्या है, सम्पूर्ण जगत् भगवान्का ही संकल्प है—ऐसे] बुद्धियोगसे युक्त होकर, यथाविधि आचरण करता हुआ इस मोक्षाश्रमका पवित्रता और सुखपूर्वक आचरण करता है, वह निरिन्धन अग्निके समान शान्त होता है और अन्तमें ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ॥ ३३ ॥
दसवाँ अध्याय
जातकर्म, नामकरण और विवाह-संस्कारकी विधि
सगर उवाच
कथितं चातुराश्रम्यं चातुर्वर्ण्यक्रियास्तथा ।
पुंसः क्रियामहं श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम ॥ १
नित्यनैमित्तिकाः काम्याः क्रियाः पुंसामशेषतः ।
समाख्याहि भृगुश्रेष्ठ सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ २
**सगर बोले—**हे द्विजश्रेष्ठ ! आपने चारों आश्रम और चारों वर्णोंके कर्मोंका वर्णन किया । अब मैं आपके द्वारा मनुष्योंके (षोडश संस्काररूप) कर्मोंको सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥ हे भृगुश्रेष्ठ ! मेरा विचार है कि आप सर्वज्ञ हैं । अतएव आप मनुष्योंके नित्य-नैमित्तिक और काम्य आदि सब प्रकारके कर्मोंका निरूपण कीजिये ॥ २ ॥
और्व उवाच
यदेतदुक्तं भवता नित्यनैमित्तिकाश्रयम् ।
तदहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना मम ॥ ३
**और्व बोले—**हे राजन् ! आपने जो नित्य-नैमित्तिक आदि क्रियाकलापके विषयमें पूछा सो मैं सबका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ३ ॥
अ० १० ] * तृतीय अंश * १९५
जातस्य जातकर्मादिक्रियाकाण्डमशेषतः ।
पुत्रस्य कुर्वीत पिता श्राद्धं चाभ्युदयात्मकम् ॥ ४
युग्मांस्तु प्राङ्मुखान्विप्रान्भोजयेन्मनुजेश्वर ।
यथा वृत्तित्तथा कुर्याद्दैवं पित्र्यं द्विजन्मनाम् ॥ ५
दध्ना यवैः सबदरैर्मिश्रानपिण्डान्मुदा युतः ।
नान्दीमुखेभ्यस्तीर्थेन दद्याद्दैवेन पार्थिव ॥ ६
प्राजापत्येन वा सर्वमुपचारं प्रदक्षिणम् ।
कुर्वीत तत्तथाशेषवृद्धिकालेषु भूपते ॥ ७
ततश्च नाम कुर्वीत पितैव दशमेऽहनि ।
देवपूर्वं नराख्यं हि शर्मवर्मादिसंयुतम् ॥ ८
शर्मेति ब्राह्मणस्योक्तं वर्मेति क्षत्रसंश्रयम् ।
गुप्तदासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः ॥ ९
नार्थहीनं न चाशस्तं नापशब्दयुतं तथा ।
नामंगल्यं जुगुप्स्यं वा नाम कुर्यात्समाक्षरम् ॥ १०
नातिदीर्घं नातिह्रस्वं नातिगुर्वक्षरान्वितम् ।
सुखोच्चार्यं तु तन्नाम कुर्याद्यत्प्रवणाक्षरम् ॥ ११
ततोऽनन्तरसंस्कारसंस्कृतो गुरुवेश्मनि ।
यथोक्तविधिमाश्रित्य कुर्याद्विद्यापरिग्रहम् ॥ १२
गृहीतविद्यो गुरवे दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम् ।
गार्हस्थ्यमिच्छन्भूपाल कुर्याद्दारपरिग्रहम् ॥ १३
ब्रह्मचर्येण वा कालं कुर्यात्संकल्पपूर्वकम् ।
गुरोश्शुश्रूषणं कुर्यात्तत्पुत्रादेरथापि वा ॥ १४
वैखानसो वापि भवेत्परिव्राडथ वेच्छया ।
पूर्वसंकल्पितं याद्दक् तादृक्कुर्यान्नराधिप ॥ १५
वर्षैरेकगुणां भार्यामुद्वहेत्त्रिगुणस्स्वयम् ।
नातिकेशामकेशां वा नातिकृष्णां न पिंगलाम् ॥ १६
निसर्गतोऽधिकांगीं वा न्यूनांगीमपि नोद्वहेत् ।
नाविशुद्धां सरोमां वाकुलजां वापि रोगिणीम् ॥ १७
न दुष्टां दुष्टवाक्यां वा व्यंगिनीं पितृमातृत्तः ।
न श्मश्रुव्यञ्जनवतीं न चैव पुरुषाकृतिम् ॥ १८
पुत्रके उत्पन्न होनेपर पिताको चाहिये कि उसके जातकर्म आदि सकल क्रियाकाण्ड और आभ्युदयिक श्राद्ध करे ॥ ४ ॥ हे नरेश्वर! पूर्वाभिमुख बिठाकर युग्म ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा द्विजातियोंके व्यवहारके अनुसार देव और पितृपक्षकी तृप्तिके लिये श्राद्ध करे ॥ ५ ॥ और हे राजन्! प्रसन्नतापूर्वक दैवतीर्थ (अँगलियोंके अग्रभाग)-द्वारा नान्दीमुख पितृगणको दही, जौ और बदरीफल मिलाकर बनाये हुए पिण्ड दे ॥ ६ ॥ अथवा प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिकाके मूल)-द्वारा सम्पूर्ण उपचारद्रव्योंका दान करे। इसी प्रकार [कन्या अथवा पुत्रोंके विवाह आदि] समस्त वृद्धिकालोंमें भी करे ॥ ७ ॥
तदनन्तर पुत्रोत्पत्तिके दसवें दिन पिता नामकरण-संस्कार करे। पुरुषका नाम पुरुषवाचक होना चाहिये। उसके पूर्वमें देववाचक शब्द हो तथा पीछे शर्मा, वर्मा आदि होने चाहिये ॥ ८ ॥ ब्राह्मणके नामके अन्तमें शर्मा, क्षत्रियके अन्तमें वर्मा तथा वैश्य और शूद्रोंके नामान्तमें क्रमशः गुप्त और दास शब्दोंका प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ नाम अर्थहीन, अविहित, अपशब्दयुक्त, अमांगलिक और निन्दनीय न होना चाहिये तथा उसके अक्षर समान होने चाहिये ॥ १० ॥ अति दीर्घ, अति लघु अथवा कठिन अक्षरोंसे युक्त नाम न रखे। जो सुखपूर्वक उच्चारण किया जा सके और जिसके पीछेके वर्ण लघु हों ऐसे नामका व्यवहार करे ॥ ११ ॥
तदनन्तर उपनयन-संस्कार हो जानेपर गुरुगृहमें रहकर विधिपूर्वक विद्याध्ययन करे ॥ १२ ॥ हे भूपाल! फिर विद्याध्ययन कर चुकनेपर गुरुको दक्षिणा देकर यदि गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छा हो तो विवाह कर ले ॥ १३ ॥ या दृढ़ संकल्पपूर्वक नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ग्रहणकर गुरु अथवा गुरुपुत्रोंकी सेवा-शुश्रूषा करता रहे ॥ १४ ॥ अथवा अपनी इच्छानुसार वानप्रस्थ या संन्यास ग्रहण कर ले। हे राजन् ! पहले जैसा संकल्प किया हो वैसा ही करे ॥ १५ ॥
[यदि विवाह करना हो तो] अपनेसे तृतीयांश अवस्थावाली कन्यासे विवाह करे तथा अधिक या अल्प केशवाली अथवा अति साँवली या पाण्डुवर्णा (भूरे रंगकी) स्त्रीसे सम्बन्ध न करे ॥ १६ ॥ जिसके जन्मसे ही अधिक या न्यून अंग हों, जो अपवित्र, रोमयुक्त, अकुलीना अथवा रोगिणी हो उस स्त्रीसे पाणिग्रहण न करे ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि जो दुष्ट स्वभाववाली हो, कटुभाषिणी हो, माता अथवा पिताके
१९६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
न घर्घरस्वरां क्षामां तथा काकस्वरां न च।
नानिबन्धेक्षणां तद्वद्वृत्ताक्षीं नोद्वहेद्बुधः ॥ १९
यस्याश्च रोमशे जङ्घे गुल्फौ यस्यास्तथोनतौ।
गण्डयोः कूपरौ यस्या हसन्त्यास्तां न चोद्वहेत् ॥ २०
नातिरूक्षच्छविं पाण्डुकरजामरुणेक्षणाम्।
आपीनहस्तपादां च न कन्यामुद्वहेद् बुधः ॥ २१
न वामनां नातिदीर्घां नोद्वहेत्संहतभ्रुवम्।
न चातिच्छिद्रदशनां न करालमुखीं नरः ॥ २२
पञ्चमीं मातृपक्षाच्च पितृपक्षाच्च सप्तमीम्।
गृहस्थश्चोद्वहेत्कन्यां न्यायेन विधिना नृप ॥ २३
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः।
गान्धर्वराक्षसौ चान्यौ पैशाचश्चाष्टमो मतः ॥ २४
एतेषां यस्य यो धर्म्यो वर्णस्योक्तो महर्षिभिः।
कुर्वीत दारग्रहणं तेनान्यं परिवर्जयेत् ॥ २५
सधर्मचारिणीं प्राप्य गार्हस्थ्यं सहितस्तया।
समुद्वहेद्बदात्येतत्सम्यगूढं महाफलम् ॥ २६
अनुसार अंगहीना हो, जिसके श्मश्रु (मूँछोंके) चिह्न हों, जो पुरुषके-से आकारवाली हो अथवा घर्घर शब्द करनेवाले अति मन्द या कौएके समान (कर्णकटु) स्वरवाली हो तथा पक्ष्मशून्या या गोल नेत्रोंवाली हो उस स्त्रीसे विवाह न करे ॥ १८-१९ ॥ जिसकी जंघाओंपर रोम हों, जिसके गुल्फ (टखने) ऊँचे हों तथा हँसते समय जिसके कपोलोंमें गड्ढे पड़ते हों उस कन्यासे विवाह न करे ॥ २० ॥ जिसकी कान्ति अत्यन्त उदासीन न हो, नख पाण्डुवर्ण हों, नेत्र लाल हों तथा हाथ-पैर कुछ भारी हों, बुद्धिमान् पुरुष उस कन्यासे सम्बन्ध न करे ॥ २१ ॥ जो अति वामन (नाटी) अथवा अति दीर्घ (लम्बी) हो, जिसकी भुकुटियाँ जुड़ी हुई हों, जिसके दाँतोंमें अधिक अन्तर हो तथा जो दन्तुर (आगेको दाँत निकले हुए) मुखवाली हो उस स्त्रीसे कभी विवाह न करे ॥ २२ ॥ हे राजन्! मातृपक्षसे पाँचवीं पीढ़ी तक और पितृपक्षसे सातवीं पीढ़ी तक जिस कन्याका सम्बन्ध न हो, गृहस्थ पुरुषको नियमानुसार उसीसे विवाह करना चाहिये ॥ २३ ॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच—ये आठ प्रकारके विवाह हैं ॥ २४ ॥ इनमेंसे जिस विवाहको जिस वर्णके लिये महर्षियोंने धर्मानुकूल कहा है उसीके द्वारा दार–परिग्रह करे, अन्य विधियोंको छोड़ दे ॥ २५ ॥ इस प्रकार सहधर्मिणीको प्राप्तकर उसके साथ गार्हस्थ्यधर्मका पालन करे, क्योंकि उसका पालन करनेपर वह महान् फल देनेवाला होता है ॥ २६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
ग्यारहवाँ अध्याय
गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन
सगर उवाच
गृहस्थस्य सदाचारं श्रोतुमिच्छाम्यहं मुने।
लोकादस्मात्परस्माच्च यमातिष्ठन्न हीयते ॥ १
और्व उवाच
श्रूयतां पृथिवीपाल सदाचारस्य लक्षणम्।
सदाचारवता पुंसा जितौ लोकावुभावपि ॥ २
साधवः क्षीणदोषास्तु सच्छब्दः साधुवाचकः।
तेषामाचरणं यत्तु सदाचारस्स उच्यते ॥ ३
सप्तर्षयोऽथ मनवः प्रजानां पतयस्तथा।
सदाचारस्य वक्तारः कर्तारश्च महीपते ॥ ४
सगर बोले— हे मुने! मैं गृहस्थके सदाचारोंको सुनना चाहता हूँ, जिनका आचरण करनेसे वह इहलोक और परलोक दोनों जगह पतित नहीं होता ॥ १ ॥
और्व बोले— हे पृथिवीपाल! तुम सदाचारके लक्षण सुनो। सदाचारी पुरुष इहलोक और परलोक दोनोंहीको जीत लेता है ॥ २ ॥ 'सत्' शब्दका अर्थ साधु है, और साधु वही है जो दोषरहित हो। उस साधु पुरुषका जो आचरण होता है उसीको सदाचार कहते हैं ॥ ३ ॥ हे राजन्! इस सदाचारके वक्ता और कर्ता सप्तर्षिगण, मनु एवं प्रजापति हैं ॥ ४ ॥