भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 558 में से

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पृष्ठ 202

अ० ८ ] * तृतीय अंश * १९१


दानानि दद्यादिच्छातो द्विजेभ्यः क्षत्रियोऽपि वा।<br>यजेच्च विविधैर्यज्ञैरधीयीत च पार्थिवः ॥ २६क्षत्रियको उचित है कि ब्राह्मणोंको यथेच्छ दान दे, विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करे और अध्ययन करे ॥ २६ ॥
शस्त्राजीवो महीरक्षा प्रवरा तस्य जीविका।<br>तत्रापि प्रथमः कल्पः पृथिवीपरिपालनम् ॥ २७शस्त्र धारण करना और पृथिवीकी रक्षा करना ही क्षत्रियकी उत्तम आजीविका है; इनमें भी पृथिवी-पालन ही उत्कृष्टतर है ॥ २७ ॥
धरित्रीपालनेनैव कृतकृत्या नराधिपाः।<br>भवन्ति नृपतेरंशा यतो यज्ञादिकर्मणाम् ॥ २८पृथिवी-पालनसे ही राजालोग कृतकृत्य हो जाते हैं, क्योंकि पृथिवीमें होनेवाले यज्ञादि कर्मोंका अंश राजाको मिलता है ॥ २८ ॥
दुष्टानां शासनाद्राजा शिष्टानां परिपालनात् ।<br>प्राप्नोत्यभिमताँल्लोकान्वर्णसंस्थां करोति यः ॥ २९जो राजा अपने वर्णधर्मको स्थिर रखता है वह दुष्टोंको दण्ड देने और साधुजनोंका पालन करनेसे अपने अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २९ ॥
पाशुपाल्यं च वाणिज्यं कृषिं च मनुजेश्वर।<br>वैश्याय जीविकां ब्रह्मा ददौ लोकपितामहः ॥ ३०हे नरनाथ! लोकपितामह ब्रह्माजीने वैश्योंको पशु-पालन, वाणिज्य और कृषि—ये जीविकारूपसे दिये हैं ॥ ३० ॥
तस्याप्यध्ययनं यज्ञो दानं धर्मश्च शस्यते।<br>नित्यनैमित्तिकादीनामनुष्ठानं च कर्मणाम् ॥ ३१अध्ययन, यज्ञ, दान और नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंका अनुष्ठान—ये कर्म उसके लिये भी विहित हैं ॥ ३१ ॥
द्विजातिसंश्रितं कर्म तादर्थ्यं तेन पोषणम्।<br>क्रयविक्रयजैर्र्वापि धनैः कारूद्भवैन वा ॥ ३२शूद्रका कर्तव्य यही है कि द्विजातियोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये कर्म करे और उसीसे अपना पालन-पोषण करे, अथवा [आपत्कालमें, जब उक्त उपायसे जीविका-निर्वाह न हो सके तो] वस्तुओंके लेने-बेचने अथवा कारीगरीके कामोंसे निर्वाह करे ॥ ३२ ॥
शूद्रस्य सन्नतिश्शौचं सेवा स्वामिन्यमायया ।<br>अमन्त्रयज्ञो ह्यास्तेयं सत्सङ्गो विप्ररक्षणम् ॥ ३३अति नम्रता, शौच, निष्कपट स्वामि-सेवा, मन्त्रहीन यज्ञ, अस्तेय, सत्संग और ब्राह्मणकी रक्षा करना—ये शूद्रके प्रधान कर्म हैं ॥ ३३ ॥
दानं च दद्याच्छूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेत च।<br>पित्र्यादिकं च तत्सर्वं शूद्रः कुर्वीत तेन वै ॥ ३४हे राजन्! शूद्रको भी उचित है कि दान दे, बलिवैश्वदेव अथवा नमस्कार आदि अल्प यज्ञोंका अनुष्ठान करे, पितृश्राद्ध आदि कर्म करे,
भृत्यादिभरणार्थाय सर्वेषां च परिग्रहः।<br>ऋतुकालेऽभिगमनं स्वदारेषु महीपते ॥ ३५अपने आश्रित कुटुम्बियोंके भरण-पोषणके लिये सकल वर्णोंसे द्रव्य संग्रह करे और ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे प्रसंग करे ॥ ३४-३५ ॥
दया समस्तभूतेषु तितिक्षा नातिमानिता।<br>सत्यं शौचमनायासो मंगलं प्रियवादिता ॥ ३६हे नरेश्वर! इनके अतिरिक्त समस्त प्राणियोंपर दया, सहनशीलता, अमानिता, सत्य, शौच, अधिक परिश्रम न करना, मंगलाचरण, प्रियवादिता,
मैत्र्यस्पृहा तथा तद्वदकार्पण्यं नरेश्वर।<br>अनसूया च सामान्यवर्णानां कथिता गुणाः ॥ ३७मैत्री, निष्कामता, अकृपणता और किसीके दोष न देखना—ये समस्त वर्णोंके सामान्य गुण हैं ॥ ३६-३७ ॥
आश्रमाणां च सर्वेषामेते सामान्यलक्षणाः।<br>गुणांस्तथापद्धर्मांश्च विप्रादीनामिमाञ्छृणु ॥ ३८सब वर्णोंके सामान्य लक्षण इसी प्रकार हैं। अब इन ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके आपद्धर्म और गुणोंका श्रवण करो ॥ ३८ ॥
क्षात्रं कर्म द्विजस्योक्तं वैश्यं कर्म तथाऽपदि।<br>राजन्यस्य च वैश्योक्तं शूद्रकर्म न चैतयोः ॥ ३९आपत्तिके समय ब्राह्मणको क्षत्रिय और वैश्य-वर्णोंकी वृत्तिका अवलम्बन करना चाहिये तथा क्षत्रियको केवल वैश्यवृत्तिका ही आश्रय लेना चाहिये। ये दोनों शूद्रका कर्म (सेवा आदि) कभी न करें ॥ ३९ ॥

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