विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८ ]
| तस्मात्सदाचारवता पुरुषेण जनार्दनः।<br>आराध्यते स्ववर्णोक्तधर्मानुष्ठानकारिणा ॥ ११ | अतः सदाचारयुक्त पुरुष अपने वर्णके लिये विहित धर्मका आचरण करते हुए श्रीजनार्दनहीकी उपासना करता है ॥ ११ ॥ हे पृथिवीपते ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए ही विष्णुकी आराधना करते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ १२ ॥ |
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| ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च पृथिवीपते।<br>स्वधर्मतत्परो विष्णुमाराधयति नान्यथा ॥ १२ | |
| परापवादं पैशुन्यमनृतं च न भाषते।<br>अन्योद्वेगकरं वापि तोष्यते तेन केशवः ॥ १३ | जो पुरुष दूसरोंकी निन्दा, चुगली अथवा मिथ्याभाषण नहीं करता तथा ऐसा वचन भी नहीं बोलता जिससे दूसरोंको खेद हो, उससे निश्चय ही भगवान् केशव प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥ हे राजन् ! जो पुरुष दूसरोंकी स्त्री, धन और हिंसामें रुचि नहीं करता उससे सर्वदा ही भगवान् केशव सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १४ ॥ हे नरेन्द्र ! जो मनुष्य किसी प्राणी अथवा [वृक्षादि ] अन्य देहधारियोंको पीड़ित अथवा नष्ट नहीं करता उससे श्रीकेशव सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १५ ॥ जो पुरुष देवता, ब्राह्मण और गुरुजनोंकी सेवामें सदा तत्पर रहता है, हे नरेश्वर ! उससे गोविन्द सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १६ ॥ जो व्यक्ति स्वयं अपने और अपने पुत्रोंके समान ही समस्त प्राणियोंका भी हित-चिन्तक होता है वह सुगमतासे ही श्रीहरिको प्रसन्न कर लेता है ॥ १७ ॥ हे नृप ! जिसका चित्त रागादि दोषोंसे दूषित नहीं है उस विशुद्ध-चित्त पुरुषसे भगवान् विष्णु सदा सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १८ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! शास्त्रोंमें जो-जो वर्णाश्रम-धर्म कहे हैं उन-उनका ही आचरण करके पुरुष विष्णुकी आराधना कर सकता है; और किसी प्रकार नहीं ॥ १९ ॥ |
| परदारपरद्रव्यपरहिंसासु यो रतिम्।<br>न करोति पुमान्भूप तोष्यते तेन केशवः ॥ १४ | |
| न ताडयति नो हन्ति प्राणिनोऽन्यांश्च देहिनः।<br>यो मनुष्यो मनुष्येन्द्र तोष्यते तेन केशवः ॥ १५ | |
| देवद्विजगुरूणां च शुश्रूषासु सदोद्यतः।<br>तोष्यते तेन गोविन्दः पुरुषेण नरेश्वर ॥ १६ | |
| यथात्मनि च पुत्रे च सर्वभूतेषु यस्तथा।<br>हितकामो हरिस्तेन सर्वदा तोष्यते सुखम् ॥ १७ | |
| यस्य रागादिदोषेण न दुष्टं नृप मानसम्।<br>विशुद्धचेतसा विष्णुस्तोष्यते तेन सर्वदा ॥ १८ | |
| वर्णाश्रमेषु ये धर्माश्शास्त्रोक्ता नृपसत्तम।<br>तेषु तिष्ठन्नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ॥ १९ | |
| सगर उवाच<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि वर्णधर्मानशेषतः।<br>तथैवाश्रमधर्मांश्च द्विजवर्य ब्रवीहि तान् ॥ २० | सगर बोले— हे द्विजश्रेष्ठ ! अब मैं सम्पूर्ण वर्णधर्म और आश्रमधर्मोंको सुनना चाहता हूँ, कृपा करके वर्णन कीजिये ॥ २० ॥ |
| और्व उवाच<br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च यथाक्रमम्।<br>त्वमेकाग्रमतिर्भूत्वा शृणु धर्मान्मयोदितान् ॥ २१ | और्व बोले— जिनका मैं वर्णन करता हूँ, उन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके धर्मोंका तुम एकाग्रचित्त होकर क्रमशः श्रवण करो ॥ २१ ॥ ब्राह्मणका कर्तव्य है कि दान दे, यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करे, स्वाध्यायशील हो, नित्य स्नान-तर्पण करे और अग्न्याधान आदि कर्म करता रहे ॥ २२ ॥ ब्राह्मणको उचित है कि वृत्तिके लिये दूसरोंसे यज्ञ करावे, औरोंको पढ़ावे और न्यायोपार्जित शुद्ध धनमेंसे न्यायानुतूल द्रव्य संग्रह करे ॥ २३ ॥ ब्राह्मणको कभी किसीका अहित नहीं करना चाहिये और सर्वदा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहना चाहिये। सम्पूर्ण प्राणियोंमें मैत्री रखना ही ब्राह्मणका परम धन है ॥ २४ ॥ पत्थरमें और पराये रत्नमें ब्राह्मणको समान-बुद्धि रखनी चाहिये। हे राजन् ! पत्नीके विषयमें ऋतुगामी होना ही ब्राह्मणके लिये प्रशंसनीय कर्म है ॥ २५ ॥ |
| दानं दद्याद्यजेद्देवान्यज्ञैस्स्वाध्यायतत्परः।<br>नित्योदकी भवेद्विप्रः कुर्याच्चाग्निपरिग्रहम् ॥ २२ | |
| वृत्त्यर्थं याजयेच्चान्यानन्यानध्यापयेत्तथा।<br>कुर्यात्प्रतिग्रहादानं शुक्लार्थान्न्यायतो द्विजः ॥ २३ | |
| सर्वभूतहितं कुर्यान्नाहितं कस्यचिद् द्विजः।<br>मैत्री समस्तभूतेषु ब्राह्मणस्योत्तमं धनम् ॥ २४ | |
| ग्राव्णि रत्ने च पारक्ये समबुद्धिर्भवेद् द्विजः।<br>ऋतावभिगमः पत्न्यां शस्यते चास्य पार्थिव ॥ २५ |