भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 200

अ० ८ ] * तृतीय अंश * १८९

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—हे मुने! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार जो कुछ यमने कहा था, वह सब मैंने तुम्हें भली प्रकार सुना दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३९ ॥
एतन्मुने समाख्यातं गीतं वैवस्वतेन यत्।<br>त्वत्प्रश्नानुगतं सम्यक्किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ३९ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

विष्णुभगवान्‌की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन

श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—हे भगवन्! जो लोग संसारको जीतना चाहते हैं, वे जिस प्रकार जगत्पति भगवान् विष्णुकी उपासना करते हैं, वह वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ और हे महामुने! उन गोविन्दकी आराधना करनेपर आराधनपरायण पुरुषोंको जो फल मिलता है, वह भी मैं सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
भगवन्भगवान्देवः संसारविजिगीषुभिः।<br>समाख्याहि जगन्नाथो विष्णुराराध्यते यथा ॥ १ ॥
आराधिताच्च गोविन्दादाराधनपरैर्नरैः।<br>यत्प्राप्यते फलं श्रोतुं तच्चेच्छाामि महामुने ॥ २ ॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! तुम जो कुछ पूछते हो यही बात महात्मा सगरने और्वसे पूछी थी। उसके उत्तरमें उन्होंने जो कुछ कहा वह मैं तुमको सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ ३ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! सगरने भृगुवंशी महात्मा और्वको प्रणाम करके उनसे भगवान् विष्णुकी आराधनाके उपाय और विष्णुकी उपासना करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है उसके विषयमें पूछा था। उनके पूछनेपर और्वने यत्नपूर्वक जो कुछ कहा था वह सब सुनो ॥ ४-५ ॥
यत्पृच्छति भवानेतत्त्सगरेण महात्मना।<br>और्वः प्राह यथा पृष्टस्तन्मे निगदतःशृणु ॥ ३ ॥
सगरः प्रणिपत्यैनमौर्वं पप्रच्छ भार्गवम्।<br>विष्णोराराधनोपायसम्बन्धं मुनिसत्तम ॥ ४ ॥
फलं चाराधिते विष्णौ यत्पुंसामभिजायते।<br>स चाह पृष्टो यत्नेन तस्मै तन्मेऽखिलं शृणु ॥ ५ ॥
और्व उवाचऔर्व बोले—भगवान् विष्णुकी आराधना करनेसे मनुष्य भूमण्डल-सम्बन्धी समस्त मनोरथ, स्वर्ग, स्वर्गसे भी श्रेष्ठ ब्रह्मपद और परम निर्वाण-पद भी प्राप्त कर लेता है ॥ ६ ॥ हे राजेन्द्र! वह जिस-जिस फलकी जितनी-जितनी इच्छा करता है, अल्प हो या अधिक, श्रीअच्युतकी आराधनासे निश्चय ही वह सब प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥ और हे भूपाल! तुमने जो पूछा कि हरिकी आराधना किस प्रकार की जाय, सो सब मैं तुमसे कहता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ८ ॥ जो पुरुष वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवाला है वही परमपुरुष विष्णुकी आराधना कर सकता है; उनको सन्तुष्ट करनेका और कोई मार्ग नहीं है ॥ ९ ॥ हे नृप! यज्ञोंका यजन करनेवाला पुरुष उन (विष्णु) ही का यजन करता है, जप करनेवाला उन्हींका जप करता है और दूसरोंकी हिंसा करनेवाला उन्हींकी हिंसा करता है; क्योंकि भगवान् हरि सर्वभूतमय हैं ॥ १० ॥
भौमं मनोरथं स्वर्गं स्वर्गे रम्यं च यत्पदम्।<br>प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ निर्वाणमपि चोत्तमम् ॥ ६ ॥
यद्यदिच्छति यावच्च फलमाराधितेऽच्युते।<br>तत्तदाप्नोति राजेन्द्र भूरि स्वल्पमथापि वा ॥ ७ ॥
यत्तु पृच्छसि भूपाल कथमाराध्यते हरिः।<br>तदहं सकलं तुभ्यं कथयामि निबोध मे ॥ ८ ॥
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।<br>विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः ॥ ९ ॥
यजन्यज्ञान्यजत्येनं जपत्येनं जपन्नृप।<br>निघ्नन्नन्यान्हिनस्त्येनं सर्वभूतो यतो हरिः ॥ १० ॥