विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८ ]
| तस्मात्सदाचारवता पुरुषेण जनार्दनः।<br>आराध्यते स्ववर्णोक्तधर्मानुष्ठानकारिणा ॥ ११ | अतः सदाचारयुक्त पुरुष अपने वर्णके लिये विहित धर्मका आचरण करते हुए श्रीजनार्दनहीकी उपासना करता है ॥ ११ ॥ हे पृथिवीपते ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए ही विष्णुकी आराधना करते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ १२ ॥ |
|---|---|
| ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च पृथिवीपते।<br>स्वधर्मतत्परो विष्णुमाराधयति नान्यथा ॥ १२ | |
| परापवादं पैशुन्यमनृतं च न भाषते।<br>अन्योद्वेगकरं वापि तोष्यते तेन केशवः ॥ १३ | जो पुरुष दूसरोंकी निन्दा, चुगली अथवा मिथ्याभाषण नहीं करता तथा ऐसा वचन भी नहीं बोलता जिससे दूसरोंको खेद हो, उससे निश्चय ही भगवान् केशव प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥ हे राजन् ! जो पुरुष दूसरोंकी स्त्री, धन और हिंसामें रुचि नहीं करता उससे सर्वदा ही भगवान् केशव सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १४ ॥ हे नरेन्द्र ! जो मनुष्य किसी प्राणी अथवा [वृक्षादि ] अन्य देहधारियोंको पीड़ित अथवा नष्ट नहीं करता उससे श्रीकेशव सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १५ ॥ जो पुरुष देवता, ब्राह्मण और गुरुजनोंकी सेवामें सदा तत्पर रहता है, हे नरेश्वर ! उससे गोविन्द सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १६ ॥ जो व्यक्ति स्वयं अपने और अपने पुत्रोंके समान ही समस्त प्राणियोंका भी हित-चिन्तक होता है वह सुगमतासे ही श्रीहरिको प्रसन्न कर लेता है ॥ १७ ॥ हे नृप ! जिसका चित्त रागादि दोषोंसे दूषित नहीं है उस विशुद्ध-चित्त पुरुषसे भगवान् विष्णु सदा सन्तुष्ट रहते हैं ॥ १८ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! शास्त्रोंमें जो-जो वर्णाश्रम-धर्म कहे हैं उन-उनका ही आचरण करके पुरुष विष्णुकी आराधना कर सकता है; और किसी प्रकार नहीं ॥ १९ ॥ |
| परदारपरद्रव्यपरहिंसासु यो रतिम्।<br>न करोति पुमान्भूप तोष्यते तेन केशवः ॥ १४ | |
| न ताडयति नो हन्ति प्राणिनोऽन्यांश्च देहिनः।<br>यो मनुष्यो मनुष्येन्द्र तोष्यते तेन केशवः ॥ १५ | |
| देवद्विजगुरूणां च शुश्रूषासु सदोद्यतः।<br>तोष्यते तेन गोविन्दः पुरुषेण नरेश्वर ॥ १६ | |
| यथात्मनि च पुत्रे च सर्वभूतेषु यस्तथा।<br>हितकामो हरिस्तेन सर्वदा तोष्यते सुखम् ॥ १७ | |
| यस्य रागादिदोषेण न दुष्टं नृप मानसम्।<br>विशुद्धचेतसा विष्णुस्तोष्यते तेन सर्वदा ॥ १८ | |
| वर्णाश्रमेषु ये धर्माश्शास्त्रोक्ता नृपसत्तम।<br>तेषु तिष्ठन्नरो विष्णुमाराधयति नान्यथा ॥ १९ | |
| सगर उवाच<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि वर्णधर्मानशेषतः।<br>तथैवाश्रमधर्मांश्च द्विजवर्य ब्रवीहि तान् ॥ २० | सगर बोले— हे द्विजश्रेष्ठ ! अब मैं सम्पूर्ण वर्णधर्म और आश्रमधर्मोंको सुनना चाहता हूँ, कृपा करके वर्णन कीजिये ॥ २० ॥ |
| और्व उवाच<br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च यथाक्रमम्।<br>त्वमेकाग्रमतिर्भूत्वा शृणु धर्मान्मयोदितान् ॥ २१ | और्व बोले— जिनका मैं वर्णन करता हूँ, उन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके धर्मोंका तुम एकाग्रचित्त होकर क्रमशः श्रवण करो ॥ २१ ॥ ब्राह्मणका कर्तव्य है कि दान दे, यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करे, स्वाध्यायशील हो, नित्य स्नान-तर्पण करे और अग्न्याधान आदि कर्म करता रहे ॥ २२ ॥ ब्राह्मणको उचित है कि वृत्तिके लिये दूसरोंसे यज्ञ करावे, औरोंको पढ़ावे और न्यायोपार्जित शुद्ध धनमेंसे न्यायानुतूल द्रव्य संग्रह करे ॥ २३ ॥ ब्राह्मणको कभी किसीका अहित नहीं करना चाहिये और सर्वदा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहना चाहिये। सम्पूर्ण प्राणियोंमें मैत्री रखना ही ब्राह्मणका परम धन है ॥ २४ ॥ पत्थरमें और पराये रत्नमें ब्राह्मणको समान-बुद्धि रखनी चाहिये। हे राजन् ! पत्नीके विषयमें ऋतुगामी होना ही ब्राह्मणके लिये प्रशंसनीय कर्म है ॥ २५ ॥ |
| दानं दद्याद्यजेद्देवान्यज्ञैस्स्वाध्यायतत्परः।<br>नित्योदकी भवेद्विप्रः कुर्याच्चाग्निपरिग्रहम् ॥ २२ | |
| वृत्त्यर्थं याजयेच्चान्यानन्यानध्यापयेत्तथा।<br>कुर्यात्प्रतिग्रहादानं शुक्लार्थान्न्यायतो द्विजः ॥ २३ | |
| सर्वभूतहितं कुर्यान्नाहितं कस्यचिद् द्विजः।<br>मैत्री समस्तभूतेषु ब्राह्मणस्योत्तमं धनम् ॥ २४ | |
| ग्राव्णि रत्ने च पारक्ये समबुद्धिर्भवेद् द्विजः।<br>ऋतावभिगमः पत्न्यां शस्यते चास्य पार्थिव ॥ २५ |
अ० ८ ] * तृतीय अंश * १९१
| दानानि दद्यादिच्छातो द्विजेभ्यः क्षत्रियोऽपि वा।<br>यजेच्च विविधैर्यज्ञैरधीयीत च पार्थिवः ॥ २६ | क्षत्रियको उचित है कि ब्राह्मणोंको यथेच्छ दान दे, विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करे और अध्ययन करे ॥ २६ ॥ |
| शस्त्राजीवो महीरक्षा प्रवरा तस्य जीविका।<br>तत्रापि प्रथमः कल्पः पृथिवीपरिपालनम् ॥ २७ | शस्त्र धारण करना और पृथिवीकी रक्षा करना ही क्षत्रियकी उत्तम आजीविका है; इनमें भी पृथिवी-पालन ही उत्कृष्टतर है ॥ २७ ॥ |
| धरित्रीपालनेनैव कृतकृत्या नराधिपाः।<br>भवन्ति नृपतेरंशा यतो यज्ञादिकर्मणाम् ॥ २८ | पृथिवी-पालनसे ही राजालोग कृतकृत्य हो जाते हैं, क्योंकि पृथिवीमें होनेवाले यज्ञादि कर्मोंका अंश राजाको मिलता है ॥ २८ ॥ |
| दुष्टानां शासनाद्राजा शिष्टानां परिपालनात् ।<br>प्राप्नोत्यभिमताँल्लोकान्वर्णसंस्थां करोति यः ॥ २९ | जो राजा अपने वर्णधर्मको स्थिर रखता है वह दुष्टोंको दण्ड देने और साधुजनोंका पालन करनेसे अपने अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २९ ॥ |
| पाशुपाल्यं च वाणिज्यं कृषिं च मनुजेश्वर।<br>वैश्याय जीविकां ब्रह्मा ददौ लोकपितामहः ॥ ३० | हे नरनाथ! लोकपितामह ब्रह्माजीने वैश्योंको पशु-पालन, वाणिज्य और कृषि—ये जीविकारूपसे दिये हैं ॥ ३० ॥ |
| तस्याप्यध्ययनं यज्ञो दानं धर्मश्च शस्यते।<br>नित्यनैमित्तिकादीनामनुष्ठानं च कर्मणाम् ॥ ३१ | अध्ययन, यज्ञ, दान और नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंका अनुष्ठान—ये कर्म उसके लिये भी विहित हैं ॥ ३१ ॥ |
| द्विजातिसंश्रितं कर्म तादर्थ्यं तेन पोषणम्।<br>क्रयविक्रयजैर्र्वापि धनैः कारूद्भवैन वा ॥ ३२ | शूद्रका कर्तव्य यही है कि द्विजातियोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये कर्म करे और उसीसे अपना पालन-पोषण करे, अथवा [आपत्कालमें, जब उक्त उपायसे जीविका-निर्वाह न हो सके तो] वस्तुओंके लेने-बेचने अथवा कारीगरीके कामोंसे निर्वाह करे ॥ ३२ ॥ |
| शूद्रस्य सन्नतिश्शौचं सेवा स्वामिन्यमायया ।<br>अमन्त्रयज्ञो ह्यास्तेयं सत्सङ्गो विप्ररक्षणम् ॥ ३३ | अति नम्रता, शौच, निष्कपट स्वामि-सेवा, मन्त्रहीन यज्ञ, अस्तेय, सत्संग और ब्राह्मणकी रक्षा करना—ये शूद्रके प्रधान कर्म हैं ॥ ३३ ॥ |
| दानं च दद्याच्छूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेत च।<br>पित्र्यादिकं च तत्सर्वं शूद्रः कुर्वीत तेन वै ॥ ३४ | हे राजन्! शूद्रको भी उचित है कि दान दे, बलिवैश्वदेव अथवा नमस्कार आदि अल्प यज्ञोंका अनुष्ठान करे, पितृश्राद्ध आदि कर्म करे, |
| भृत्यादिभरणार्थाय सर्वेषां च परिग्रहः।<br>ऋतुकालेऽभिगमनं स्वदारेषु महीपते ॥ ३५ | अपने आश्रित कुटुम्बियोंके भरण-पोषणके लिये सकल वर्णोंसे द्रव्य संग्रह करे और ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे प्रसंग करे ॥ ३४-३५ ॥ |
| दया समस्तभूतेषु तितिक्षा नातिमानिता।<br>सत्यं शौचमनायासो मंगलं प्रियवादिता ॥ ३६ | हे नरेश्वर! इनके अतिरिक्त समस्त प्राणियोंपर दया, सहनशीलता, अमानिता, सत्य, शौच, अधिक परिश्रम न करना, मंगलाचरण, प्रियवादिता, |
| मैत्र्यस्पृहा तथा तद्वदकार्पण्यं नरेश्वर।<br>अनसूया च सामान्यवर्णानां कथिता गुणाः ॥ ३७ | मैत्री, निष्कामता, अकृपणता और किसीके दोष न देखना—ये समस्त वर्णोंके सामान्य गुण हैं ॥ ३६-३७ ॥ |
| आश्रमाणां च सर्वेषामेते सामान्यलक्षणाः।<br>गुणांस्तथापद्धर्मांश्च विप्रादीनामिमाञ्छृणु ॥ ३८ | सब वर्णोंके सामान्य लक्षण इसी प्रकार हैं। अब इन ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके आपद्धर्म और गुणोंका श्रवण करो ॥ ३८ ॥ |
| क्षात्रं कर्म द्विजस्योक्तं वैश्यं कर्म तथाऽपदि।<br>राजन्यस्य च वैश्योक्तं शूद्रकर्म न चैतयोः ॥ ३९ | आपत्तिके समय ब्राह्मणको क्षत्रिय और वैश्य-वर्णोंकी वृत्तिका अवलम्बन करना चाहिये तथा क्षत्रियको केवल वैश्यवृत्तिका ही आश्रय लेना चाहिये। ये दोनों शूद्रका कर्म (सेवा आदि) कभी न करें ॥ ३९ ॥ |
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
| १९२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
|---|
सामर्थ्ये सति तत्त्याज्यमुभाभ्यामपि पार्थिव ।<br>तदेवापदि कर्तव्यं न कुर्यात्कर्मसङ्करम् ॥ ४०<br>इत्येते कथिता राजन्वर्णधर्मा मया तव ।<br>धर्मानाश्रमिणां सम्यग्ब्रुवतो मे निशामय ॥ ४१ | हे राजन् ! इन उपरोक्त वृत्तियोंको भी सामर्थ्य होनेपर त्याग दे; केवल आपत्कालमें ही इनका आश्रय ले, कर्म संकरता (कर्मोंका मेल) न करे ॥ ४० ॥ हे राजन् ! इस प्रकार वर्णधर्मोंका वर्णन तो मैंने तुमसे कर दिया; अब आश्रम-धर्मोंका निरूपण और करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४१ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय
ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका वर्णन
और्व उवाच
बालः कृतोपनयनो वेदाहरणतत्परः ।<br>गुरुगेहे वसेद्द्रूप ब्रह्मचारी समाहितः ॥ १
शौचाचारव्रतं तत्र कार्यं शुश्रूषणं गुरोः ।<br>व्रतानि चरता ग्राह्यो वेदश्च कृतबुद्धिना ॥ २
उभे सन्ध्ये रविं भूप तथैवाग्निं समाहितः ।<br>उपतिष्ठेत्तदा कुर्याद्गुरोरप्यभिवादनम् ॥ ३
स्थिते तिष्ठेद्ब्रजेद्याते नीचैरासीत चासति ।<br>शिष्यो गुरोर्नृपश्रेष्ठ प्रतिकूलं न सञ्चरेत् ॥ ४
तेनैवोक्तं पठेद्देवं नान्यचित्तः पुरःस्थितः ।<br>अनुज्ञातश्च भिक्षानमश्नीयाद्गुरुणा ततः ॥ ५
अवगाहेदपः पूर्वमाचार्येणावगाहिताः ।<br>समिज्जलादिकं चास्य कल्यं कल्यमुपानयेत् ॥ ६
गृहीतग्राह्यवेदश्च ततोऽनुज्ञामवाप्य च ।<br>गार्हस्थ्यमाविशेत्प्राज्ञो निष्पन्नगुरुनिष्कृतिः ॥ ७
विधिनावाप्तदारस्तु धनं प्राप्य स्वकर्मणा ।<br>गृहस्थकार्यमखिलं कुर्याद्द्रूपाल शक्तितः ॥ ८
निवापेन पितॄनर्चन्यज्ञैर्देवांस्तथातिथीन् ।<br>अन्नैर्मुनींश्च स्वाध्यायैरपत्येन प्रजापतिम् ॥ ९
भूतानि बलिभिश्चैव वात्सल्येनाखिलं जगत् ।<br>प्राप्नोति लोकान्पुरुषो निजकर्मसमार्जितान् ॥ १०
और्व बोले—हे भूपते ! बालकको चाहिये कि उपनयन-संस्कारके अनन्तर वेदाध्ययनमें तत्पर होकर ब्रह्मचर्यका अवलम्बन कर, सावधानतापूर्वक गुरुगृहमें निवास करे ॥ १ ॥ वहाँ रहकर उसे शौच और आचार-व्रतका पालन करते हुए गुरुकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये तथा व्रतादिका आचरण करते हुए स्थिर-बुद्धिसे वेदाध्ययन करना चाहिये ॥ २ ॥ हे राजन् ! [ प्रातःकाल और सायंकाल] दोनों सन्ध्याओंमें एकाग्र होकर सूर्य और अग्निकी उपासना करे तथा गुरुका अभिवादन करे ॥ ३ ॥ गुरुके खड़े होनेपर खड़ा हो जाय, चलनेपर पीछे-पीछे चलने लगे तथा बैठ जानेपर नीचे बैठ जाय। हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार कभी गुरुके विरुद्ध कोई आचरण न करे ॥ ४ ॥ गुरुजीके कहनेपर ही उनके सामने बैठकर एकाग्रचित्तसे वेदाध्ययन करे और उनकी आज्ञा होनेपर ही भिक्षान्न भोजन करे ॥ ५ ॥ जलमें प्रथम आचार्यके स्नान कर चुकनेपर फिर स्वयं स्नान करे तथा प्रतिदिन प्रातःकाल गुरुजीके लिये समिधा, जल, कुश और पुष्पादि लाकर जुटा दे ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपना अभिमत वेदपाठ समाप्त कर चुकनेपर बुद्धिमान् शिष्य गुरुजीकी आज्ञासे उन्हें गुरु-दक्षिणा देकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे ॥ ७ ॥ हे राजन् ! फिर विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर अपनी वर्णानुकूल वृत्तिसे द्रव्योपार्जन करता हुआ सामर्थ्यानुसार समस्त गृहकार्य करता रहे ॥ ८ ॥ पिण्ड-दानादिसे पितृगणकी, यज्ञादिसे देवताओंकी, अन्नदानसे अतिथियोंकी, स्वाध्यायसे ऋषियोंकी, पुत्रोत्पत्तिसे प्रजापतिकी, बलियों (अन्नभाग)-से भूतगणकी तथा वात्सल्यभावसे सम्पूर्ण जगत्की पूजा करते हुए पुरुष अपने कर्मोंद्वारा मिले हुए उत्तमोत्तम लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ९-१० ॥
अ० ९ ] * तृतीय अंश * १९३
| भिक्षाभुजश्च ये केचित्परिव्राड्ब्रह्मचारिणः ।<br>तेऽप्यत्रैव प्रतिष्ठन्ते गार्हस्थ्यं तेन वै परम् ॥ ११ | जो केवल भिक्षावृत्तिसे ही रहनेवाले परिव्राजक और ब्रह्मचारी आदि हैं उनका आश्रय भी गृहस्थाश्रम ही है, अतः यह सर्वश्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ हे राजन्! विप्रगण वेदाध्ययन, तीर्थस्नान और देश-दर्शनके लिये पृथिवी-पर्यटन किया करते हैं ॥ १२ ॥ उनमेंसे जिनका कोई निश्चित गृह अथवा भोजन प्रबन्ध नहीं होता और जो जहाँ सायंकाल हो जाता है वहीं ठहर जाते हैं, उन सबका आधार और मूल गृहस्थाश्रम ही है ॥ १३ ॥ हे राजन्! ऐसे लोग जब घर आवें तो उनका कुशल-प्रश्न और मधुर वचनोंसे स्वागत करे तथा शय्या, आसन और भोजनके द्वारा उनका यथाशक्ति सत्कार करे ॥ १४ ॥ जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है उसे अपने समस्त दुष्कर्म देकर वह (अतिथि) उसके पुण्यकर्मोंको स्वयं ले जाता है ॥ १५ ॥ गृहस्थके लिये अतिथिके प्रति अपमान, अहंकार और दम्भका आचरण करना, उसे देकर पछताना, उसपर प्रहार करना अथवा उससे कटुभाषण करना उचित नहीं है ॥ १६ ॥ इस प्रकार जो गृहस्थ अपने परम धर्मका पूर्णतया पालन करता है वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर अत्युत्तम लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |
| वेदाहरणकार्याय तीर्थस्नानाय च प्रभो ।<br>अटन्ति वसुधां विप्राः पृथिवीदर्शनाय च ॥ १२ | |
| अनिकेता ह्यनाहारा यत्र सायंगृहाश्च ये ।<br>तेषां गृहस्थः सर्वेषां प्रतिष्ठा योनिरैव च ॥ १३ | |
| तेषां स्वागतदानादि वक्तव्यं मधुरं नृप ।<br>गृहागतानां दद्याच्च शयनासनभोजनम् ॥ १४ | |
| अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते ।<br>स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ १५ | |
| अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव गृहे सतः ।<br>परितापोपघातौ च पारुष्यं च न शस्यते ॥ १६ | |
| यस्तु सम्यक्करोत्येवं गृहस्थः परमं विधिम् ।<br>सर्वबन्धविनिर्मुक्तो लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ १७ | |
| वयःपरिणतो राजन्कृतकृत्यो गृहाश्रमी ।<br>पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ १८ | हे राजन्! इस प्रकार गृहस्थोचित कार्य करते-करते जिसकी अवस्था ढल गयी हो उस गृहस्थको उचित है कि स्त्रीको पुत्रोंके प्रति सौंपकर अथवा अपने साथ लेकर वनको चला जाय ॥ १८ ॥ वहाँ पत्र, मूल, फल आदिका आहार करता हुआ, लोम, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) और जटाओंको धारण कर पृथिवीपर शयन करे और मुनिवृत्तिका अवलम्बन कर सब प्रकार अतिथिकी सेवा करे ॥ १९ ॥ उसे चर्म, काश और कुशाओंसे अपना बिछौना तथा ओढ़नेका वस्त्र बनाना चाहिये । हे नरेश्वर! उस मुनिके लिये त्रिकाल-स्नानका विधान है ॥ २० ॥ इसी प्रकार देवपूजन, होम, सब अतिथियोंका सत्कार, भिक्षा और बलिवैश्वदेव भी उसके विहित कर्म हैं ॥ २१ ॥ हे राजेन्द्र! वन्य तैलादिको शरीरमें मलना और शीतोष्णका सहन करते हुए तपस्यामें लगे रहना उसके प्रशस्त कर्म हैं ॥ २२ ॥ जो वानप्रस्थ मुनि इन नियत कर्मोंका आचरण करता है वह अपने समस्त दोषोंको अग्निके समान भस्म कर देता है और नित्य-लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥ |
| पर्णमूलफलाहारः केशश्मश्रुजटाधरः ।<br>भूमिशायी भवेत्तत्र मुनिस्स्र्वातिथिनृप ॥ १९ | |
| चर्मकाशकुशैः कुर्यात्परिधानोत्तरीयके ।<br>तद्वत्त्रिश्रवणं स्नानं शस्तमस्य नरेश्वर ॥ २० | |
| देव build: देवताभ्यर्चनं होमस्सर्वाभ्यागतपूजनम् ।<br>भिक्षा बलिप्रदानं च शस्तमस्य नरेश्वर ॥ २१ | |
| वन्यस्नेहेन गात्राणामभ्यंगश्चास्य शस्यते ।<br>तपश्च तस्य राजेन्द्र शीतोष्णादिसहिष्णुता ॥ २२ | |
| यस्त्वेतां नियतश्चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः ।<br>स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च शाश्वतान् ॥ २३ | |
| चतुर्थश्चाश्रमो भिक्षोः प्रोच्यते यो मनीषिभिः ।<br>तस्य स्वरूपं गदतो मम श्रोतुं नृपार्हसि ॥ २४ | हे नृप! पण्डितगण जिस चतुर्थ आश्रमको भिक्षु-आश्रम कहते हैं अब मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २४ ॥ हे नरेन्द्र! तृतीय आश्रमके अनन्तर पुत्र, द्रव्य और स्त्री आदिके स्नेहको सर्वथा त्यागकर तथा मात्सर्यको छोड़कर चतुर्थ आश्रममें प्रवेश करे ॥ २५ ॥ |
| पुत्रद्रव्यकलत्रेषु त्यक्तस्नेहो नराधिप ।<br>चतुर्थमाश्रमस्थानं गच्छेद्विधूत मत्सरः ॥ २५ |
48 Visnupuran_Section_8_1_Front
१९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १०
त्रैवर्गिकांस्त्यजेत्सर्वानारम्भानवनीपते ।
मित्रादिषु समो मैत्रस्समस्तेष्वेव जन्तुषु ॥ २६
जरायुजाण्डजादीनां वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
युक्तः कुर्वीत न द्रोहं सर्वसङ्गांश्च वर्जयेत् ॥ २७
एकरात्रस्थितिर्ग्रामे पञ्चरात्रस्थितिः पुरे ।
तथा तिष्ठेद्यथाप्रीतिर्द्वेषो वा नास्य जायते ॥ २८
प्राणयात्रानिमित्तं च व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
काले प्रशस्तवर्णानां भिक्षार्थं पर्यटेद् गृहान् ॥ २९
कामः क्रोधस्तथा दर्पमोहेलोभादयश्च ये ।
तांस्तु सर्वान्परित्यज्य परिव्राङ् निर्ममो भवेत् ॥ ३०
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।
तस्यापि सर्वभूतेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ३१
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं
शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।
विप्रस्तु भैक्ष्योपहितैर्हविर्भि-
श्चिताग्निकानां व्रजति स्म लोकान् ॥ ३२
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं
शुचिस्सुखं कल्पितबुद्धियुक्तः ।
अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तः
स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः ॥ ३३
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
भावार्थ :—
हे पृथिवीपते ! भिक्षुको उचित है कि अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्गसम्बन्धी समस्त कर्मोंको छोड़ दे, शत्रु-मित्रादिमें समान भाव रखे और सभी जीवोंका सुहृद् हो ॥ २६ ॥ निरन्तर समाहित रहकर जरायुज, अण्डज और स्वेदज आदि समस्त जीवोंसे मन, वाणी अथवा कर्मद्वारा कभी द्रोह न करे तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे ॥ २७ ॥ ग्राममें एक रात और पुरमें पाँच रात्रितक रहे तथा इतने दिन भी तो इस प्रकार रहे जिससे किसीसे प्रेम अथवा द्वेष न हो ॥ २८ ॥ जिस समय घरोंमें अग्नि शान्त हो जाय और लोग भोजन कर चुके उस समय प्राणरक्षाके लिये उत्तम वर्णोंमें भिक्षाके लिये जाय ॥ २९ ॥ परिव्राजकको चाहिये कि काम, क्रोध तथा दर्प, लोभ और मोह आदि समस्त दुर्गुणोंको छोड़कर ममताशून्य होकर रहे ॥ ३० ॥ जो मुनि समस्त प्राणियोंको अभयदान देकर विचरता है; उसको भी किसीसे कभी कोई भय नहीं होता ॥ ३१ ॥ जो ब्राह्मण चतुर्थ आश्रममें अपने शरीरमें स्थित प्राणादिसहित जठराग्निके उद्देश्यसे अपने मुखमें भिक्षान्निरूप हविसे हवन करता है, वह ऐसा अग्निहोत्र करके अग्निहोत्रियोंके लोकोंको प्राप्त हो जाता है ॥ ३२ ॥ जो ब्राह्मण [ब्रह्मसे भिन्न सभी मिथ्या है, सम्पूर्ण जगत् भगवान्का ही संकल्प है—ऐसे] बुद्धियोगसे युक्त होकर, यथाविधि आचरण करता हुआ इस मोक्षाश्रमका पवित्रता और सुखपूर्वक आचरण करता है, वह निरिन्धन अग्निके समान शान्त होता है और अन्तमें ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ॥ ३३ ॥
दसवाँ अध्याय
जातकर्म, नामकरण और विवाह-संस्कारकी विधि
सगर उवाच
कथितं चातुराश्रम्यं चातुर्वर्ण्यक्रियास्तथा ।
पुंसः क्रियामहं श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम ॥ १
नित्यनैमित्तिकाः काम्याः क्रियाः पुंसामशेषतः ।
समाख्याहि भृगुश्रेष्ठ सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ २
**सगर बोले—**हे द्विजश्रेष्ठ ! आपने चारों आश्रम और चारों वर्णोंके कर्मोंका वर्णन किया । अब मैं आपके द्वारा मनुष्योंके (षोडश संस्काररूप) कर्मोंको सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥ हे भृगुश्रेष्ठ ! मेरा विचार है कि आप सर्वज्ञ हैं । अतएव आप मनुष्योंके नित्य-नैमित्तिक और काम्य आदि सब प्रकारके कर्मोंका निरूपण कीजिये ॥ २ ॥
और्व उवाच
यदेतदुक्तं भवता नित्यनैमित्तिकाश्रयम् ।
तदहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना मम ॥ ३
**और्व बोले—**हे राजन् ! आपने जो नित्य-नैमित्तिक आदि क्रियाकलापके विषयमें पूछा सो मैं सबका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ३ ॥
अ० १० ] * तृतीय अंश * १९५
जातस्य जातकर्मादिक्रियाकाण्डमशेषतः ।
पुत्रस्य कुर्वीत पिता श्राद्धं चाभ्युदयात्मकम् ॥ ४
युग्मांस्तु प्राङ्मुखान्विप्रान्भोजयेन्मनुजेश्वर ।
यथा वृत्तित्तथा कुर्याद्दैवं पित्र्यं द्विजन्मनाम् ॥ ५
दध्ना यवैः सबदरैर्मिश्रानपिण्डान्मुदा युतः ।
नान्दीमुखेभ्यस्तीर्थेन दद्याद्दैवेन पार्थिव ॥ ६
प्राजापत्येन वा सर्वमुपचारं प्रदक्षिणम् ।
कुर्वीत तत्तथाशेषवृद्धिकालेषु भूपते ॥ ७
ततश्च नाम कुर्वीत पितैव दशमेऽहनि ।
देवपूर्वं नराख्यं हि शर्मवर्मादिसंयुतम् ॥ ८
शर्मेति ब्राह्मणस्योक्तं वर्मेति क्षत्रसंश्रयम् ।
गुप्तदासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः ॥ ९
नार्थहीनं न चाशस्तं नापशब्दयुतं तथा ।
नामंगल्यं जुगुप्स्यं वा नाम कुर्यात्समाक्षरम् ॥ १०
नातिदीर्घं नातिह्रस्वं नातिगुर्वक्षरान्वितम् ।
सुखोच्चार्यं तु तन्नाम कुर्याद्यत्प्रवणाक्षरम् ॥ ११
ततोऽनन्तरसंस्कारसंस्कृतो गुरुवेश्मनि ।
यथोक्तविधिमाश्रित्य कुर्याद्विद्यापरिग्रहम् ॥ १२
गृहीतविद्यो गुरवे दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम् ।
गार्हस्थ्यमिच्छन्भूपाल कुर्याद्दारपरिग्रहम् ॥ १३
ब्रह्मचर्येण वा कालं कुर्यात्संकल्पपूर्वकम् ।
गुरोश्शुश्रूषणं कुर्यात्तत्पुत्रादेरथापि वा ॥ १४
वैखानसो वापि भवेत्परिव्राडथ वेच्छया ।
पूर्वसंकल्पितं याद्दक् तादृक्कुर्यान्नराधिप ॥ १५
वर्षैरेकगुणां भार्यामुद्वहेत्त्रिगुणस्स्वयम् ।
नातिकेशामकेशां वा नातिकृष्णां न पिंगलाम् ॥ १६
निसर्गतोऽधिकांगीं वा न्यूनांगीमपि नोद्वहेत् ।
नाविशुद्धां सरोमां वाकुलजां वापि रोगिणीम् ॥ १७
न दुष्टां दुष्टवाक्यां वा व्यंगिनीं पितृमातृत्तः ।
न श्मश्रुव्यञ्जनवतीं न चैव पुरुषाकृतिम् ॥ १८
पुत्रके उत्पन्न होनेपर पिताको चाहिये कि उसके जातकर्म आदि सकल क्रियाकाण्ड और आभ्युदयिक श्राद्ध करे ॥ ४ ॥ हे नरेश्वर! पूर्वाभिमुख बिठाकर युग्म ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा द्विजातियोंके व्यवहारके अनुसार देव और पितृपक्षकी तृप्तिके लिये श्राद्ध करे ॥ ५ ॥ और हे राजन्! प्रसन्नतापूर्वक दैवतीर्थ (अँगलियोंके अग्रभाग)-द्वारा नान्दीमुख पितृगणको दही, जौ और बदरीफल मिलाकर बनाये हुए पिण्ड दे ॥ ६ ॥ अथवा प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिकाके मूल)-द्वारा सम्पूर्ण उपचारद्रव्योंका दान करे। इसी प्रकार [कन्या अथवा पुत्रोंके विवाह आदि] समस्त वृद्धिकालोंमें भी करे ॥ ७ ॥
तदनन्तर पुत्रोत्पत्तिके दसवें दिन पिता नामकरण-संस्कार करे। पुरुषका नाम पुरुषवाचक होना चाहिये। उसके पूर्वमें देववाचक शब्द हो तथा पीछे शर्मा, वर्मा आदि होने चाहिये ॥ ८ ॥ ब्राह्मणके नामके अन्तमें शर्मा, क्षत्रियके अन्तमें वर्मा तथा वैश्य और शूद्रोंके नामान्तमें क्रमशः गुप्त और दास शब्दोंका प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ नाम अर्थहीन, अविहित, अपशब्दयुक्त, अमांगलिक और निन्दनीय न होना चाहिये तथा उसके अक्षर समान होने चाहिये ॥ १० ॥ अति दीर्घ, अति लघु अथवा कठिन अक्षरोंसे युक्त नाम न रखे। जो सुखपूर्वक उच्चारण किया जा सके और जिसके पीछेके वर्ण लघु हों ऐसे नामका व्यवहार करे ॥ ११ ॥
तदनन्तर उपनयन-संस्कार हो जानेपर गुरुगृहमें रहकर विधिपूर्वक विद्याध्ययन करे ॥ १२ ॥ हे भूपाल! फिर विद्याध्ययन कर चुकनेपर गुरुको दक्षिणा देकर यदि गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छा हो तो विवाह कर ले ॥ १३ ॥ या दृढ़ संकल्पपूर्वक नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ग्रहणकर गुरु अथवा गुरुपुत्रोंकी सेवा-शुश्रूषा करता रहे ॥ १४ ॥ अथवा अपनी इच्छानुसार वानप्रस्थ या संन्यास ग्रहण कर ले। हे राजन् ! पहले जैसा संकल्प किया हो वैसा ही करे ॥ १५ ॥
[यदि विवाह करना हो तो] अपनेसे तृतीयांश अवस्थावाली कन्यासे विवाह करे तथा अधिक या अल्प केशवाली अथवा अति साँवली या पाण्डुवर्णा (भूरे रंगकी) स्त्रीसे सम्बन्ध न करे ॥ १६ ॥ जिसके जन्मसे ही अधिक या न्यून अंग हों, जो अपवित्र, रोमयुक्त, अकुलीना अथवा रोगिणी हो उस स्त्रीसे पाणिग्रहण न करे ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि जो दुष्ट स्वभाववाली हो, कटुभाषिणी हो, माता अथवा पिताके
१९६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
न घर्घरस्वरां क्षामां तथा काकस्वरां न च।
नानिबन्धेक्षणां तद्वद्वृत्ताक्षीं नोद्वहेद्बुधः ॥ १९
यस्याश्च रोमशे जङ्घे गुल्फौ यस्यास्तथोनतौ।
गण्डयोः कूपरौ यस्या हसन्त्यास्तां न चोद्वहेत् ॥ २०
नातिरूक्षच्छविं पाण्डुकरजामरुणेक्षणाम्।
आपीनहस्तपादां च न कन्यामुद्वहेद् बुधः ॥ २१
न वामनां नातिदीर्घां नोद्वहेत्संहतभ्रुवम्।
न चातिच्छिद्रदशनां न करालमुखीं नरः ॥ २२
पञ्चमीं मातृपक्षाच्च पितृपक्षाच्च सप्तमीम्।
गृहस्थश्चोद्वहेत्कन्यां न्यायेन विधिना नृप ॥ २३
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः।
गान्धर्वराक्षसौ चान्यौ पैशाचश्चाष्टमो मतः ॥ २४
एतेषां यस्य यो धर्म्यो वर्णस्योक्तो महर्षिभिः।
कुर्वीत दारग्रहणं तेनान्यं परिवर्जयेत् ॥ २५
सधर्मचारिणीं प्राप्य गार्हस्थ्यं सहितस्तया।
समुद्वहेद्बदात्येतत्सम्यगूढं महाफलम् ॥ २६
अनुसार अंगहीना हो, जिसके श्मश्रु (मूँछोंके) चिह्न हों, जो पुरुषके-से आकारवाली हो अथवा घर्घर शब्द करनेवाले अति मन्द या कौएके समान (कर्णकटु) स्वरवाली हो तथा पक्ष्मशून्या या गोल नेत्रोंवाली हो उस स्त्रीसे विवाह न करे ॥ १८-१९ ॥ जिसकी जंघाओंपर रोम हों, जिसके गुल्फ (टखने) ऊँचे हों तथा हँसते समय जिसके कपोलोंमें गड्ढे पड़ते हों उस कन्यासे विवाह न करे ॥ २० ॥ जिसकी कान्ति अत्यन्त उदासीन न हो, नख पाण्डुवर्ण हों, नेत्र लाल हों तथा हाथ-पैर कुछ भारी हों, बुद्धिमान् पुरुष उस कन्यासे सम्बन्ध न करे ॥ २१ ॥ जो अति वामन (नाटी) अथवा अति दीर्घ (लम्बी) हो, जिसकी भुकुटियाँ जुड़ी हुई हों, जिसके दाँतोंमें अधिक अन्तर हो तथा जो दन्तुर (आगेको दाँत निकले हुए) मुखवाली हो उस स्त्रीसे कभी विवाह न करे ॥ २२ ॥ हे राजन्! मातृपक्षसे पाँचवीं पीढ़ी तक और पितृपक्षसे सातवीं पीढ़ी तक जिस कन्याका सम्बन्ध न हो, गृहस्थ पुरुषको नियमानुसार उसीसे विवाह करना चाहिये ॥ २३ ॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच—ये आठ प्रकारके विवाह हैं ॥ २४ ॥ इनमेंसे जिस विवाहको जिस वर्णके लिये महर्षियोंने धर्मानुकूल कहा है उसीके द्वारा दार–परिग्रह करे, अन्य विधियोंको छोड़ दे ॥ २५ ॥ इस प्रकार सहधर्मिणीको प्राप्तकर उसके साथ गार्हस्थ्यधर्मका पालन करे, क्योंकि उसका पालन करनेपर वह महान् फल देनेवाला होता है ॥ २६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
ग्यारहवाँ अध्याय
गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन
सगर उवाच
गृहस्थस्य सदाचारं श्रोतुमिच्छाम्यहं मुने।
लोकादस्मात्परस्माच्च यमातिष्ठन्न हीयते ॥ १
और्व उवाच
श्रूयतां पृथिवीपाल सदाचारस्य लक्षणम्।
सदाचारवता पुंसा जितौ लोकावुभावपि ॥ २
साधवः क्षीणदोषास्तु सच्छब्दः साधुवाचकः।
तेषामाचरणं यत्तु सदाचारस्स उच्यते ॥ ३
सप्तर्षयोऽथ मनवः प्रजानां पतयस्तथा।
सदाचारस्य वक्तारः कर्तारश्च महीपते ॥ ४
सगर बोले— हे मुने! मैं गृहस्थके सदाचारोंको सुनना चाहता हूँ, जिनका आचरण करनेसे वह इहलोक और परलोक दोनों जगह पतित नहीं होता ॥ १ ॥
और्व बोले— हे पृथिवीपाल! तुम सदाचारके लक्षण सुनो। सदाचारी पुरुष इहलोक और परलोक दोनोंहीको जीत लेता है ॥ २ ॥ 'सत्' शब्दका अर्थ साधु है, और साधु वही है जो दोषरहित हो। उस साधु पुरुषका जो आचरण होता है उसीको सदाचार कहते हैं ॥ ३ ॥ हे राजन्! इस सदाचारके वक्ता और कर्ता सप्तर्षिगण, मनु एवं प्रजापति हैं ॥ ४ ॥
अ० ११] * तृतीय अंश * १९७
ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय मनसा मतिमान्नृप।
प्रबुद्धश्चिन्तयेद्धर्ममर्थं चाप्यविरोधिनम्॥ ५
अपीडया तयोः काममुभयोरपि चिन्तयेत्।
दृष्टादृष्टविनाशाय त्रिवर्गे समदर्शिता॥ ६
परित्यजेदर्थकामौ धर्मपीडाकरौ नृप।
धर्ममप्यसुखोदर्कं लोकविद्विष्टमेव च॥ ७
ततः कल्यं समुत्थाय कुर्यान्मूत्रं नरेश्वर॥ ८
नैर्ऋत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकं भुवः।
दूरादावसथान्मूत्रं पुरीषं च विसर्जयेत्॥ ९
पादावनेजनोच्छिष्टे प्रक्षिपेन्न गृहांगणे॥ १०
आत्मच्छायां तरुच्छायां गोसूर्याग्न्यनिलांस्तथा।
गुरुद्विजादींस्तु बुधो नाधिमेहेत्कदाचन॥ ११
न कृष्टे सस्यमध्ये वा गोव्रजे जनसंसदि।
न वर्त्मनि न नद्यादितीर्थेषु पुरुषर्षभ॥ १२
नाप्सु नैवाम्भसस्तीरे श्मशाने न समाचरेत्।
उत्सर्गं वै पुरीषस्य मूत्रस्य च विसर्जनम्॥ १३
उदङ्मुखो दिवा मूत्रं विपरीतमुखो निशि।
कुर्वीतानापदि प्राज्ञो मूत्रोत्सर्गं च पार्थिव॥ १४
तृणैरास्तीर्य वसुधां वस्त्रप्रावृतमस्तकः।
तिष्ठेन्नातिचिरं तत्र नैव किञ्चिदुदीरयेत्॥ १५
वल्मीकमूषिकोद्भूतां मृदं नान्तर्जलां तथा।
शौचावशिष्टां गेहाच्च नादद्याल्लेपसम्भवाम्॥ १६
अणुप्राण्युपपन्नां च हलोत्खातां च पार्थिव।
परित्यजेन्मृदो ह्येतास्सकलाश्शौचकर्मणि॥ १७
एका लिंगे गुदे तिस्रो दश वामकरे नृप।
हस्तद्वये च सप्त स्युर्मृदश्शौचोपपादिकाः॥ १८
अच्छेनागन्धलेपेन जलेनाबुद्बुदेन च।
आचामेच्च मृदं भूयस्तथादद्यात्समाहितः॥ १९
निष्पादिताङ्घ्रिशौचस्तु पादावभ्युक्ष्य तैः पुनः।
त्रिःपिबेत्सलिलं तेन तथा द्विः परिमार्जयेत्॥ २०
शीर्षण्यानि ततः खानि मूर्द्धानं च समालभेत।
बाहू नाभिं च तोयेन हृदयं चापि संस्पृशेत्॥ २१
हे नृप! बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ चित्तसे ब्राह्ममुहूर्तमें जगकर अपने धर्म और धर्माविरोधी अर्थका चिन्तन करे॥ ५॥ तथा जिसमें धर्म और अर्थकी क्षति न हो ऐसे कामका भी चिन्तन करे। इस प्रकार दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टकी निवृत्तिके लिये धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्गके प्रति समान भाव रखना चाहिये॥ ६॥ हे नृप! धर्मविरुद्ध अर्थ और काम दोनोंका त्याग कर दे तथा ऐसे धर्मका भी आचरण न करे जो उत्तरकालमें दुःखमय अथवा समाज-विरुद्ध हो॥ ७॥
हे नरेश्वर! तदनन्तर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रथम मूत्रत्याग करे। ग्रामसे नैर्ऋत्यकोणमें जितनी दूर बाण जा सकता है उससे आगे बढ़कर अथवा अपने निवास स्थानसे दूर जाकर मल-मूत्र त्याग करे। पैर धोया हुआ और जूठा जल अपने घरके आँगनमें न डाले॥ ८-१०॥ अपनी या वृक्षकी छायाके ऊपर तथा गौ, सूर्य, अग्नि, वायु, गुरु और द्विजातीय पुरुषके सामने बुद्धिमान् पुरुष कभी मल-मूत्र त्याग न करे॥ ११॥ इसी प्रकार हे पुरुषर्षभ! जुते हुए खेतमें, सस्यसम्पन्न भूमिमें, गौओंके गोष्ठमें, जन-समाजमें, मार्गके बीचमें, नदी आदि तीर्थस्थानोंमें, जल अथवा जलाशयके तटपर और श्मशानमें भी कभी मल-मूत्रका त्याग न करे॥ १२-१३॥ हे राजन्! कोई विशेष आपत्ति न हो तो प्राज्ञ पुरुषको चाहिये कि दिनके समय उत्तर-मुख और रात्रिके समय दक्षिण-मुख होकर मूत्रत्याग करे॥ १४॥ मल-त्यागके समय पृथिवीको तिनकोंसे और सिरको वस्त्रसे ढाँप ले तथा उस स्थानपर अधिक समयतक न रहे और न कुछ बोले ही॥ १५॥
हे राजन्! बाँबीकी, चूहोंद्वारा बिलसे निकाली हुई, जलके भीतरकी, शौचकर्मसे बची हुई, घरके लीपनकी, चींटी आदि छोटे-छोटे जीवोंद्वारा निकाली हुई और हलसे उखाड़ी हुई—इन सब प्रकारकी मृत्तिकाओंका शौच कर्ममें उपयोग न करे॥ १६-१७॥ हे नृप! लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार और दोनों हाथोंमें सात बार मृत्तिका लगानेसे शौच सम्पन्न होता है॥ १८॥ तदनन्तर गन्ध और फेनरहित स्वच्छ जलसे आचमन करे। तथा फिर सावधानीपूर्वक बहुत-सी मृत्तिका ले॥ १९॥ उससे चरण-शुद्धि करनेके अनन्तर फिर पैर धोकर तीन बार कुल्ला करे और दो बार मुख धोवे॥ २०॥ तत्पश्चात् जल लेकर शिरोदेशमें स्थित इन्द्रियरन्ध्र, मूर्द्धा, बाहु, नाभि और हृदयको स्पर्श करे॥ २१॥
| १९८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ११ |
|---|
[मूल संस्कृत श्लोक]
स्वाचान्तस्तु ततः कुर्यात्पुमान्केशप्रसाधनम्।
आदर्शाञ्जनमांगल्यं दूर्व्वाद्यालम्भनानि च॥ २२
ततस्स्ववर्णधर्मेण वृत्त्यर्थं च धनार्जनम्।
कुर्वीत श्रद्धासम्पन्नो यजेच्च पृथिवीपते॥ २३
सोमसंस्था हविस्संस्थाः पाकसंस्थास्तु संस्थिताः।
धने यतो मनुष्याणां यतेतातो धनार्जने॥ २४
नदीनदतटाकेषु देवखातजलेषु च।
नित्यक्रियार्थं स्नायीत गिरिप्रस्रवणेषु च॥ २५
कूपेषूद्धृततोयेन स्नानं कुर्वीत वा भुवि।
गृहेषूद्धृततोयेन ह्यथवा भुव्यसम्भवे॥ २६
शुचिवस्त्रधरः स्नातो देवर्षिपितृतर्पणम्।
तेषामेव हि तीर्थेन कुर्वीत सुसमाहितः॥ २७
त्रिरपः प्रीणनार्थाय देवानामुपवर्जयेत्।
ऋषीणां च यथान्यायं सकृच्चापि प्रजापतेः॥ २८
पितॄणां प्रीणनार्थाय त्रिरपः पृथिवीपते।
पितामहेभ्यश्च तथा प्रीणयेत्प्रपितामहान्॥ २९
मातामहाय तत्पित्रे तत्पित्रे च समाहितः।
दद्यात्तैत्रेण तीर्थेन काम्यं चान्यच्छृणुष्व मे॥ ३०
मात्रे प्रमात्रे तन्मात्रे गुरुपत्न्यै तथा नृप।
गुरूणां मातुलानां च स्निग्धमित्राय भूपुजे॥ ३१
इदं चापि जपेदम्बु दद्यादात्मेच्छया नृप।
उपकाराय भूतानां कृतदेवादितर्पणम्॥ ३२
देवासुरास्तथा यक्षा नागगन्धर्वराक्षसाः।
पिशाचा गुह्यकास्सिद्धाः कूष्माण्डाः पशवः खगाः॥ ३३
जलेचरा भूनिलया वाय्वाहाराश्च जन्तवः।
तृप्तिमेतेन यान्त्वाशु मद्द्त्तेनाम्बुनाखिलाः॥ ३४
[हिन्दी अनुवाद]
फिर भली प्रकार स्नान करनेके अनन्तर केश सँवारे और दर्पण, अंजन तथा दूर्वा आदि मांगलिक द्रव्योंका यथाविधि व्यवहार करे॥ २२॥ तदनन्तर हे पृथिवीपते! अपने वर्णधर्मके अनुसार आजीविकाके लिये धनोपार्जन करे और श्रद्धापूर्वक यज्ञानुष्ठान करे॥ २३॥ सोमसंस्था, हविस्संस्था और पाकसंस्था—इन सब धर्म-कर्मोंका आधार धन ही है।* अतः मनुष्योंको धनोपार्जनका यत्न करना चाहिये॥ २४॥ नित्यकर्मोंके सम्पादनके लिये नदी, नद, तड़ाग, देवालयोंकी बावड़ी और पर्वतीय झरनोंमें स्नान करना चाहिये॥ २५॥ अथवा कुएँसे जल खींचकर उसके पासकी भूमिपर स्नान करे और यदि वहाँ भूमिपर स्नान करना सम्भव न हो तो कुएँसे खींचकर लाये हुए जलसे घरहीमें नहा ले॥ २६॥
स्नान करनेके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण कर देवता, ऋषिगण और पितृगणका उन्हींके तीर्थोंसे तर्पण करे॥ २७॥ देवता और ऋषियोंके तर्पणके लिये तीन-तीन बार तथा प्रजापतिके लिये एक बार जल छोड़े॥ २८॥ हे पृथिवीपते! पितृगण और पितामहोंकी प्रसन्नताके लिये तीन बार जल छोड़े तथा इसी प्रकार प्रपितामहोंको भी सन्तुष्ट करे एवं मातामह (नाना) और उनके पिता तथा उनके पिताको भी सावधानतापूर्वक पितृ-तीर्थसे जलदान करे। अब काम्य तर्पणका वर्णन करता हूँ, श्रवण करो॥ २९-३०॥
'यह जल माताके लिये हो, यह प्रमाताके लिये हो, यह वृद्धाप्रमाताके लिये हो, यह गुरुपत्नीको, यह गुरुको, यह मामाको, यह प्रिय मित्रको तथा यह राजाको प्राप्त हो—हे राजन्! यह जपता हुआ समस्त भूतोंके हितके लिये देवादि तर्पण करके अपनी इच्छानुसार अभिलषित सम्बन्धीके लिये जलदान करे'॥ ३१-३२॥ [देवादि तर्पणके समय इस प्रकार कहे—] 'देव, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, पशु, पक्षी, जलचर, स्थलचर और वायु-भक्षक आदि सभी प्रकारके जीव मेरे दिये हुए इस जलसे तृप्त हों॥ ३३-३४॥
* गौतमस्मृतिके अष्टम अध्यायमें कहा है—
‘औपासनमष्टका पार्वणश्राद्धः श्रावण्याग्रहायणी चैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकयज्ञसंस्थाः। अग्न्याधेयमग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासा-वाग्रयणं चातुर्मास्यानि निरूढपशुबन्धस्सौत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थाः। अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थः षोडशी वाजपेयोऽतिरात्राप्तोर्यामा इति सप्त सोमसंस्थाः।’
औपासन, अष्टका श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध तथा श्रावण, अग्रहायण, चैत्र और आश्विन मासकी पूर्णिमाएँ—ये सात ‘पाकयज्ञ-संस्था’ हैं। अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास, आग्रयण, चातुर्मास्य, यज्ञपशुबन्ध और सौत्रामणी—ये सात ‘हविर्यज्ञसंस्था’ हैं, यथा अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये सात ‘सोमयज्ञसंस्था’ हैं।
अ० ११ ] * तृतीय अंश * १९९
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया॥ ३५
जो प्राणी सम्पूर्ण नरकोंमें नाना प्रकारकी यातनाएँ भोग रहे हैं उनकी तृप्तिके लिये मैं यह जलदान करता हूँ॥ ३५॥
ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु ये चास्मत्तोयकांक्षिणः॥ ३६
जो मेरे बन्धु अथवा अबन्धु हैं, तथा जो अन्य जन्मोंमें मेरे बन्धु थे एवं और भी जो-जो मुझसे जलकी इच्छा रखनेवाले हैं वे सब मेरे दिये हुए जलसे परितृप्त हों॥ ३६॥
यत्र क्वचनसंस्थानां क्षुत्तृष्णोपहतात्मनाम्।
इदमाप्यायनायास्तु मया दत्तं तिलोदकम्॥ ३७
क्षुधा और तृष्णासे व्याकुल जीव कहीं भी क्यों न हों मेरा दिया हुआ यह तिलोदक उनको तृप्ति प्रदान करे'॥ ३७॥
काम्योदकप्रदानं ते मयैतत्कथितं नृप।
यद्दत्त्वा प्रीणयत्येतन्मनुष्यस्सकलं जगत्।
जगदाप्यायनोद्भूतं पुण्यमाप्नोति चानघ॥ ३८
हे नृप! इस प्रकार मैंने तुमसे यह काम्य-तर्पणका निरूपण किया, जिसके करनेसे मनुष्य सकल संसारको तृप्त कर देता है और हे अनघ! इससे उसे जगत्की तृप्तिसे होनेवाला पुण्य प्राप्त होता है॥ ३८॥
दत्त्वा काम्योदकं सम्यगेतेभ्यः श्रद्धयान्वितः।
आचम्य च ततो दद्यात्सूर्याय सलिलाञ्जलिम्॥ ३९
इस प्रकार उपरोक्त जीवोंको श्रद्धापूर्वक काम्यजल-दान करनेके अनन्तर आचमन करे और फिर सूर्यदेवको जलांजलि दे॥ ३९॥ [उस समय इस प्रकार कहे—]
नमो विवस्वते ब्रह्मभास्वते विष्णुतेजसे।
जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मसाक्षिणे॥ ४०
'भगवान् विवस्वान्को नमस्कार है जो वेद-वेद्य और विष्णुके तेजस्स्वरूप हैं तथा जगत्को उत्पन्न करनेवाले, अति पवित्र एवं कर्मोंके साक्षी हैं'॥ ४०॥
ततो गृहार्चनं कुर्यादभीष्टसुरपूजनम्।
जलाभिषेकैः पुष्पैश्च धूपाद्यैश्च निवेदनम्॥ ४१
तदनन्तर जलाभिषेक और पुष्प तथा धूपादि निवेदन करता हुआ गृहदेव और इष्टदेवका पूजन करे॥ ४१॥
अपूर्वमग्निहोत्रं च कुर्यात्प्राग्ब्रह्मणे नृप॥ ४२
प्रजापतिं समुद्दिश्य दद्यादाहुतिमादरात्।
गुह्येभ्यः काश्यपायाथ ततोऽनुमतये क्रमात्॥ ४३
हे नृप! फिर अपूर्व अग्निहोत्र करे, उसमें पहले ब्रह्माको और तदनन्तर क्रमशः प्रजापति, गुह्य, काश्यप और अनुमतिको आदरपूर्वक आहुतियाँ दे॥ ४२-४३॥
तच्छेषं मणिके पृथ्वीपर्जन्येभ्यः क्षिपेत्ततः।
द्वारे धातुर्विधातुश्च मध्ये च ब्रह्मणे क्षिपेत्॥ ४४
गृहस्य पुरुषव्याघ्र दिग्देवानपि मे शृणु॥ ४५
उससे बचे हुए हव्यको पृथिवी और मेघके उद्देश्यसे उदकपात्रमें,* धाता और विधाताके उद्देश्यसे द्वारके दोनों ओर तथा ब्रह्माके उद्देश्यसे घरके मध्यमें छोड़ दे। हे पुरुषव्याघ्र! अब मैं दिक्पालगणकी पूजाका वर्णन करता हूँ, श्रवण करो॥ ४४-४५॥
इन्द्राय धर्मराजाय वरुणाय तथेन्दवे।
प्राच्यादिषु बुधो दद्याद्धुतशेषात्मकं बलिम्॥ ४६
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, यम, वरुण और चन्द्रमाके लिये हुतशिष्ट सामग्रीसे बलि प्रदान करे॥ ४६॥
प्रागुत्तरे च दिग्भागे धन्वन्तरिबलिं बुधः।
निर्वपेद्वैश्वदेवं च कर्म कुर्यादतः परम्॥ ४७
पूर्व और उत्तर-दिशाओंमें धन्वन्तरिके लिये बलि दे तथा इसके अनन्तर बलिवैश्वदेव-कर्म करे॥ ४७॥
वायव्यां वायवे दिक्षु समस्तासु यथादिशम्।
ब्रह्मणे चान्तरिक्षाय भानवे च क्षिपेद्बलिम्॥ ४८
बलिवैश्वदेवके समय वायव्यकोणमें वायुको तथा अन्य समस्त दिशाओंमें वायु एवं उन दिशाओंको बलि दे, इसी प्रकार ब्रह्मा, अन्तरिक्ष और सूर्यको भी उनकी दिशाओंके अनुसार [अर्थात् मध्यमें] बलि प्रदान करे॥ ४८॥
* वह जल भरा पात्र जो अग्निहोत्र करते समय समीपमें रख लिया जाता है और जिसमें 'इदं न मम' कहकर आहुतिका शेष भाग छोड़ा जाता है।
२०० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
विश्वेदेवान्विश्वभूतानथ विश्वपतीन्पितॄन्।
यक्षाणां च समुद्दिश्य बलिं दद्यान्नरेश्वर॥ ४९
ततोऽन्यदन्नमादाय भूमिभागे शुचौ बुधः।
दद्यादशेषभूतेभ्यस्स्वेच्छया सुसमाहितः॥ ५०
देवा मनुष्याः पशवो वयांसि
सिद्धास्सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः।
प्रेताः पिशाचास्तरवस्समस्ता
ये चान्नमिच्छन्ति मयात्र दत्तम्॥ ५१
पिपीलिकाः कीटपतङ्गकाद्या
बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः।
प्रयान्तु ते तृप्तिमिदं मयान्नं
तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु॥ ५२
येषां न माता न पिता न बन्धु-
नैवान्नसिद्धिर्न तथान्नम्ति।
तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्
ते यान्तु तृप्तिं मुदिता भवन्तु॥ ५३
भूतानि सर्वाणि तथान्नमेत-
दहं च विष्णुर्न ततोऽन्यदस्ति।
तस्मादहं भूतनिकायभूत-
मन्नं प्रयच्छामि भवाय तेषाम्॥ ५४
चतुर्दशो भूतगणो य एष
तत्र स्थिता येऽखिलभूतसङ्घाः।
तृप्त्यर्थमन्नं हि मया विसृष्टं
तेषामिदं ते मुदिता भवन्तु॥ ५५
इत्युच्चार्य नरो दद्यादन्नं श्रद्धासमन्वितः।
भुवि सर्वोपकाराय गृही सर्वाश्रयो यतः॥ ५६
श्वचाण्डालविहङ्गानां भुवि दद्यान्नरेश्वर।
ये चान्ये पतिताःकेचिदपुत्राः सन्ति मानवाः॥ ५७
ततो गोदोहमात्रं वै कालं तिष्ठेद् गृहाङ्गणे।
अतिथिग्रहणार्थाय तदूर्ध्वं तु यथेच्छया॥ ५८
फिर हे नरेश्वर! विश्वेदेवों, विश्वभूतों, विश्वपतियों, पितरों और यक्षोंके उद्देश्यसे [यथास्थान] बलि प्रदान करे॥४९॥
तदनन्तर बुद्धिमान् व्यक्ति और अन्न लेकर पवित्र पृथिवीपर समाहित चित्तसे बैठकर स्वेच्छानुसार समस्त प्राणियोंको बलि प्रदान करे॥५०॥ [उस समय इस प्रकार कहे—] ‘देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष, सर्प, दैत्य, प्रेत, पिशाच, वृक्ष तथा और भी चींटी आदि कीट-पतंग जो अपने कर्मबन्धनसे बँधे हुए क्षुधातुर होकर मेरे दिये हुए अन्नकी इच्छा करते हैं, उन सबके लिये मैं यह अन्न दान करता हूँ। वे इससे परितृप्त और आनन्दित हों॥५१-५२॥ जिनके माता, पिता अथवा कोई और बन्धु नहीं हैं तथा अन्न प्रस्तुत करनेका साधन और अन्न भी नहीं है उनकी तृप्तिके लिये पृथिवीपर मैंने यह अन्न रखा है; वे इससे तृप्त होकर आनन्दित हों॥५३॥ सम्पूर्ण प्राणी, यह अन्न और मैं—सभी विष्णु हैं; क्योंकि उनसे भिन्न और कुछ है ही नहीं। अतः मैं समस्त भूतोंका शरीररूप यह अन्न उनके पोषणके लिये दान करता हूँ॥५४॥ यह जो चौदह प्रकारका* भूतसमुदाय है उसमें जितने भी प्राणिगण अवस्थित हैं उन सबकी तृप्तिके लिये मैंने यह अन्न प्रस्तुत किया है; वे इससे प्रसन्न हों’॥५५॥ इस प्रकार उच्चारण करके गृहस्थ पुरुष श्रद्धापूर्वक समस्त जीवोंके उपकारके लिये पृथिवीमें अन्नदान करे, क्योंकि गृहस्थ ही सबका आश्रय है॥५६॥ हे नरेश्वर! तदनन्तर कुत्ता, चाण्डाल, पक्षिगण तथा और भी जो कोई पतित एवं पुत्रहीन पुरुष हों उनकी तृप्तिके लिये पृथिवीमें बलिभाग रखे॥५७॥
फिर गो-दोहनकालपर्यन्त अथवा इच्छानुसार इससे भी कुछ अधिक देर अतिथि ग्रहण करनेके लिये घरके आँगनमें रहे॥५८॥
* चौदह भूतसमुदायोंका वर्णन इस प्रकार किया गया है—
अष्टविधं दैवत्वं तैर्यग्योन्यश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यं चैकविधं समासतो भौतिकः सर्गः॥
अर्थात् आठ प्रकारका देवसम्बन्धी, पाँच प्रकारका तिर्यग्योनिसम्बन्धी और एक प्रकारका मनुष्ययोनिसम्बन्धी—यह संक्षेपसे भौतिक सर्ग कहलाता है। इनका पृथक्-पृथक् विवरण इस प्रकार है—
सिद्धगुह्यकगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः। विद्याधराः पिशाचाश्च निर्दिष्टा देवयोनयः॥
अ० ११] * तृतीय अंश * २०९
अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं पूजयेत्स्वागतादिना । तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च ॥ ५९
श्रद्धया चान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद् गृही ॥ ६०
अज्ञातकुलनामानमन्यदेशादुपागतम् । पूजयेदतिथिं सम्यङ् नैकग्रामनिवासिनम् ॥ ६१
अकिञ्चनम walkसम्बन्धमज्ञातकुलशीलिनम् । असम्पूज्यातिथिं भुक्त्वा भोक्तुकामं व्रजत्यधः ॥ ६२
स्वाध्यायगोत्राचरणमपृष्ट्वा च तथा कुलम् । हिरण्यगर्भबुद्ध्या तं मन्येताभ्यागतं गृही ॥ ६३
पित्रर्थं चापरं विप्रमेकमप्याशयेन्नृप । तद्देश्यं विदिताचारसम्भूतिं पाञ्चयज्ञिकम् ॥ ६४
अन्नाग्रञ्च समुद्धृत्य हन्तकारोपकल्पितम् । निर्वापभूतं भूपाल श्रोत्रियायोपपादयेत् ॥ ६५
दत्त्वा च भिक्षात्रितयं परिव्राड्ब्रह्मचारिणाम् । इच्छया च बुधो दद्याद्विभवे सत्यवारितम् ॥ ६६
इत्येतेऽतिथयः प्रोक्ताः प्रागुक्ता भिक्षवश्च ये । चतुरः पूजयित्वैतान्नृप पापात्प्रमुच्यते ॥ ६७
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥ ६८
धाता प्रजापतिः शक्रो वह्निर्वसुगणोऽर्यमा । प्रविश्यातिथिमेते वै भुञ्जन्तेऽन्नं नरेश्वर ॥ ६९
तस्मादतिथिपूजायां यतेत सततं नरः । स केवलमघं भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यतिथिं विना ॥ ७०
ततः स्ववासिनीदुःखिगर्भिणीवृद्धबालकान् । भोजयेत्संस्कृतान्नेन प्रथमं चर मं गृही ॥ ७१
यदि अतिथि आ जाय तो उसका स्वागतादिसे तथा आसन देकर और चरण धोकर सत्कार करे ॥ ५९ ॥ फिर श्रद्धापूर्वक भोजन कराकर मधुर वाणीसे प्रश्नोत्तर करके तथा उसके जानेके समय पीछे-पीछे जाकर उसको प्रसन्न करे ॥ ६० ॥ जिसके कुल और नामका कोई पता न हो तथा अन्य देशसे आया हो उसी अतिथिका सत्कार करे, अपने ही गाँवमें रहनेवाले पुरुषकी अतिथिरूपसे पूजा करनी उचित नहीं है ॥ ६१ ॥ जिसके पास कोई सामग्री न हो, जिससे कोई सम्बन्ध न हो, जिसके कुल-शीलका कोई पता न हो और जो भोजन करना चाहता हो उस अतिथिका सत्कार किये बिना भोजन करनेसे मनुष्य अधोगतिको प्राप्त होता है ॥ ६२ ॥ गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि आये हुए अतिथिके अध्ययन, गोत्र, आचरण और कुल आदिके विषयमें कुछ भी न पूछकर हिरण्यगर्भ-बुद्धिसे उसकी पूजा करे ॥ ६३ ॥ हे नृप ! अतिथि-सत्कारके अनन्तर अपने ही देशके एक और पांचयज्ञिक ब्राह्मणको जिसके आचार और कुल आदिका ज्ञान हो पितृगणके लिये भोजन करावे ॥ ६४ ॥ हे भूपाल ! [मनुष्ययज्ञकी विधिसे 'मनुष्येभ्यो हन्त' इत्यादि मन्त्रोच्चारणपूर्वक] पहले ही निकालकर अलग रखे हुए हन्तकार नामक अन्नसे उस श्रोत्रिय ब्राह्मणको भोजन करावे ॥ ६५ ॥
इस प्रकार [देवता, अतिथि और ब्राह्मणको] ये तीन भिक्षाएँ देकर, यदि सामर्थ्य हो तो परिव्राजक और ब्रह्मचारियोंको भी बिना लौटाये हुए इच्छानुसार भिक्षा दे ॥ ६६ ॥ तीन पहले तथा भिक्षुगण—ये चारों अतिथि कहलाते हैं। हे राजन् ! इन चारोंका पूजन करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ६७ ॥ जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है उसे वह अपने पाप देकर उसके शुभकर्मोंको ले जाता है ॥ ६८ ॥ हे नरेश्वर ! धाता, प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, वसुगण और अर्यमा—ये समस्त देवगण अतिथिमें प्रविष्ट होकर अन्न भोजन करते हैं ॥ ६९ ॥ अतः मनुष्यको अतिथि-पूजाके लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। जो पुरुष अतिथिके बिना भोजन करता है वह तो केवल पाप ही भोग करता है ॥ ७० ॥ तदनन्तर गृहस्थ पुरुष पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता कन्या, दुखिया और गर्भिणी स्त्री तथा वृद्ध और बालकोंको संस्कृत अन्नसे भोजन कराकर अन्तमें स्वयं भोजन करे ॥ ७१ ॥
सरीसृपा वानराश्च पशवो मृगपक्षिणः। तिर्यञ्च इति कथ्यन्ते पञ्चैताः प्राणिजातयः ॥ सिद्ध, गुह्यक, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर और पिशाच—ये आठ देवयोनियाँ मानी गयी हैं तथा सरीसृप, वानर, पशु, मृग, (जंगली प्राणी) और पक्षी—ये पाँच तिर्यग् योनियाँ कही गयी हैं।
२०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| अभुक्तवत्सु चैतेषु भुञ्जन्भुङ्क्ते स दुष्कृतम्।<br>मृतश्च गत्वा नरकं श्लेष्मभुग्जायते नरः॥ ७२ | इन सबको भोजन कराये बिना जो स्वयं भोजन कर लेता है वह पापमय भोजन करता है और अन्तमें मरकर नरकमें श्लेष्मभोजी कीट होता है॥ ७२॥ |
| अस्नाताशी मलं भुङ्क्ते ह्यजपी पूयशोणितम्।<br>असंस्कृतान्रभुङ्ग्मूत्रं बालादिप्रथमं शकृत्॥ ७३ | जो व्यक्ति स्नान किये बिना भोजन करता है वह मल भक्षण करता है, जप किये बिना भोजन करनेवाला रक्त और पूय पान करता है, संस्कारहीन अन्न खानेवाला मूत्र पान करता है तथा जो बालक-वृद्ध आदिसे पहले आहार करता है वह विष्ठाहारी है। |
| अहोमी च कृमीन्भुङ्क्ते अदत्त्वा विषमश्नुते॥ ७४ | इसी प्रकार बिना होम किये भोजन करनेवाला मानो कीड़ोंको खाता है और बिना दान किये खानेवाला विष-भोजी है॥ ७३-७४॥ |
| तस्माच्छृणुष्व राजेन्द्र यथा भुञ्जीत वै गृही।<br>भुञ्जतश्च यथा पुंसः पापबन्धो न जायते॥ ७५ | अतः हे राजेन्द्र! गृहस्थको जिस प्रकार भोजन करना चाहिये—जिस प्रकार भोजन करनेसे पुरुषको पाप-बन्धन नहीं होता तथा इहलोकमें अत्यन्त आरोग्य, बल, बुद्धिकी प्राप्ति और अरिष्टोंकी शान्ति होती है और जो शत्रुपक्षका ह्रास करनेवाली है—वह भोजनविधि सुनो॥ ७५-७६॥ |
| इह चारोग्यविपुलं बलबुद्धिस्तथा नृप।<br>भवत्यरिष्टशान्तिश्च वैरिपक्षाभिचारिका॥ ७६ | |
| स्नातो यथावत्कृत्वा च देवर्षिपितृतर्पणम्।<br>प्रशस्तरत्नपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही॥ ७७ | गृहस्थको चाहिये कि स्नान करनेके अनन्तर यथाविधि देव, ऋषि और पितृगणका तर्पण करके हाथमें उत्तम रत्न धारण किये पवित्रतापूर्वक भोजन करे॥ ७७॥ |
| कृते जपे हुते वह्नौ शुद्धवस्त्रधरो नृप।<br>दत्त्वातिथिभ्यो विप्रेभ्यो गुरुभ्यस्संश्रिताय च।<br>पुण्यगन्धश्शस्तमाल्यधारी चैव नरेश्वर॥ ७८ | हे नृप! जप तथा अग्निहोत्रके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण कर अतिथि, ब्राह्मण, गुरुजन और अपने आश्रित (बालक एवं वृद्धों)-को भोजन करा सुन्दर सुगन्धयुक्त उत्तम पुष्पमाला तथा एक ही वस्त्र धारण किये हाथ-पाँव और मुँह धोकर प्रीतिपूर्वक भोजन करे। हे राजन्! भोजनके समय इधर-उधर न देखे॥ ७८-७९॥ |
| एकवस्त्रधरोऽथार्द्रपाणिपादो महीपते।<br>विशुद्धवदनः प्रीतो भुञ्जीत न विदिङ्मुखः॥ ७९ | |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न चैवान्यमना नरः।<br>अन्नं प्रशस्तं पथ्यं च प्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैः॥ ८० | मनुष्यको चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके, अन्यमना न होकर उत्तम और पथ्य अन्नको प्रोक्षणके लिये रखे हुए मन्त्रपूत जलसे छिड़क कर भोजन करे॥ ८०॥ |
| न कुत्सिताहृतं नैव जुगुप्सावदसंस्कृतम्।<br>दत्त्वा तु भक्तं शिष्येभ्यः क्षुधितेभ्यस्तथा गृही॥ ८१ | जो अन्न दुराचारी व्यक्तिका लाया हुआ हो, घृणाजनक हो अथवा बलिवैश्वदेव आदि संस्कारशून्य हो उसको ग्रहण न करे। हे द्विज! गृहस्थ पुरुष अपने खाद्यमेंसे कुछ अंश अपने शिष्य तथा अन्य भूखे-प्यासोंको देकर उत्तम और शुद्ध पात्रमें शान्तचित्तसे भोजन करे॥ ८१-८२॥ |
| प्रशस्तशुद्धपात्रे तु भुञ्जीताकुपितो द्विजः॥ ८२ | |
| नासन्दिसंस्थिते पात्रे नादेशे च नरेश्वर।<br>नाकाले नातिसंकीर्णे दत्त्वाग्रं च नरोऽग्नये॥ ८३ | हे नरेश्वर! किसी बेंत आदिके आसन (कुर्सी आदि)-पर रखे हुए पात्रमें, अयोग्य स्थानमें, असमय (सन्ध्या आदि काल)-में अथवा अत्यन्त संकुचित स्थानमें कभी भोजन न करे। मनुष्यको चाहिये कि [परोसे हुए भोजनका] अग्र-भाग अग्निको देकर भोजन करे॥ ८३॥ |
| मन्त्राभिमन्त्रितं शस्तं न च पर्युषितं नृप।<br>अन्यत्र फलमूलेभ्यश्शुष्कशाखादिकात्तथा॥ ८४ | हे नृप! जो अन्न मन्त्रपूत और प्रशस्त हो तथा जो बासी न हो उसीको भोजन करे। परंतु फल, मूल और सूखी शाखाओंको तथा बिना पकाये हुए लेह्य (चटनी) आदि और गुड़के पदार्थोंकि |
अ० ११] * तृतीय अंश * २०३
तद्वद्धारीतकेभ्यश्च गुडभक्ष्येभ्य एव च।
भुञ्जीतोद्धृतसाराणि न कदापि नरेश्वर॥ ८५
नाशेषं पुरुषोऽश्नीयादन्यत्र जगतीपते।
मध्वम्बुदधिसर्पिर्भ्यस्सक्तुभ्यश्च विवेकवान्॥ ८६
अश्नीयात्तन्मयो भूत्वा पूर्वं तु मधुरं रसम्।
लवणाम्लौ तथा मध्ये कटुतिक्तादिकांस्ततः॥ ८७
प्राग्द्रवं पुरुषोऽश्नीयान्मध्ये कठिनभोजनः।
अन्ते पुनर्द्रवाशी तु बलारोग्ये न मुञ्चति॥ ८८
अनिन्द्यं भक्षयेदित्थं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्।
पञ्चग्रासं महामौनं प्राणाद्याप्यायनं हि तत्॥ ८९
भुक्त्वा सम्यगथाचाम्य प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा।
यथावत्पुनराचामेत्पाणी प्रक्षाल्य मूलतः॥ ९०
स्वस्थः प्रशान्तचित्तस्तु कृतासनपरिग्रहः।
अभीष्टदेवतानां तु कुर्वीत स्मरणं नरः॥ ९१
अग्निराप्याययेद्धातुं पार्थिवं पवनेरितः।
दत्तावकाशं नभसा जरयत्वस्तु मे सुखम्॥ ९२
अन्नं बलाय मे भूमेरपामग्न्यनिलस्य च।
भवत्येतत्परिणतं ममास्त्वव्याहतं सुखम्॥ ९३
प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा।
अन्नं पुष्टिकरं चास्तु ममाप्यव्याहतं सुखम्॥ ९४
अगस्तिरग्निर्बडवानलश्च
भुक्तं मयान्नं जरयत्वशेषम्।
सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं
यच्छन्त्वरोगो मम चास्तु देहे॥ ९५
विष्णुस्समस्तेन्द्रियदेहदेही
प्रधानभूतो भगवान्यथैकः।
सत्येन तेनात्तमशेषमन्न-
मारोग्यदं मे परिणाममेतु॥ ९६
विष्णुरत्ता तथैवान्नं परिणामश्च वै तथा।
सत्येन तेन मद्भुक्तं जीर्यत्वन्नमिदं तथा॥ ९७
इत्युच्चार्य स्वहस्तेन परिमृज्य तथोदरम्।
अनायासप्रदायीनि कुर्यात्कर्माण्यतन्द्रितः॥ ९८
लिये ऐसा नियम नहीं है। हे नरेश्वर! सारहीन पदार्थोंको कभी न खाय॥ ८४-८५॥ हे पृथिवीपते! विवेकी पुरुष मधु, जल, दही, घी और सत्तूके सिवा और किसी पदार्थको पूरा न खाय॥ ८६॥
भोजन एकाग्रचित्त होकर करे तथा प्रथम मधुररस, फिर लवण और अम्ल (खट्टा)-रस तथा अन्तमें कटु और तीखे पदार्थोंको खाय॥ ८७॥ जो पुरुष पहले द्रव पदार्थोंको, बीचमें कठिन वस्तुओंको तथा अन्तमें फिर द्रव पदार्थोंको ही खाता है वह कभी बल तथा आरोग्यसे हीन नहीं होता॥ ८८॥ इस प्रकार वाणीका संयम करके अनिषिद्ध अन्न भोजन करे। अन्नकी निन्दा न करे। प्रथम पाँच ग्रास अत्यन्त मौन होकर ग्रहण करे, उनसे पंचप्राणोंकी तृप्ति होती है॥ ८९॥ भोजनके अनन्तर भली प्रकार आचमन करे और फिर पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके हाथोंको उनके मूलदेशतक धोकर विधिपूर्वक आचमन करे॥ ९०॥
तदनन्तर स्वस्थ और शान्त-चित्तसे आसनपर बैठकर अपने इष्टदेवोंका चिन्तन करे॥ ९१॥ [और इस प्रकार कहे-] "[प्राणरूप] पवनसे प्रज्वलित हुआ जठराग्नि आकाशके द्वारा अवकाशयुक्त अन्नका परिपाक करे और [फिर अन्नरससे] मेरे शरीरके पार्थिव धातुओंको पुष्ट करे जिससे मुझे सुख प्राप्त हो॥ ९२॥ यह अन्न मेरे शरीरस्थ पृथिवी, जल, अग्नि और वायुका बल बढ़ानेवाला हो और इन चारों तत्त्वोंके रूपमें परिणत हुआ यह अन्न ही मुझे निरन्तर सुख देनेवाला हो॥ ९३॥ यह अन्न मेरे प्राण, अपान, समान, उदान और व्यानकी पुष्टि करे तथा मुझे भी निर्बाध सुखकी प्राप्ति हो॥ ९४॥ मेरे खाये हुए सम्पूर्ण अन्नका अगस्ति नामक अग्नि और बडवानल परिपाक करें, मुझे उसके परिणामसे होनेवाला सुख प्रदान करें और उससे मेरे शरीरको आरोग्यता प्राप्त हो॥ ९५॥ 'देह और इन्द्रियादिके अधिष्ठाता एकमात्र भगवान् विष्णु ही प्रधान हैं'— इस सत्यके बलसे मेरा खाया हुआ समस्त अन्न परिपक्व होकर मुझे आरोग्यता प्रदान करे॥ ९६॥ 'भोजन करनेवाला, भोज्य अन्न और उसका परिपाक—ये सब विष्णु ही है'—इस सत्य भावनाके बलसे मेरा खाया हुआ यह अन्न पच जाय"॥ ९७॥ ऐसा कहकर अपने उदरपर हाथ फेरे और सावधान होकर अधिक श्रम उत्पन्न न करनेवाले कार्योंमें लग जाय॥ ९८॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
| २०४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ११ |
|---|
सच्छास्त्रादिविनोदेन सन्मार्गादविरोधिना।
दिनं नयेत्ततस्सन्ध्यामुपतिष्ठेत्समाहितः॥ ९९
दिनान्तसन्ध्यां सूर्येण पूर्वामृक्षैर्युतां बुधः।
उपतिष्ठेद्यथान्यायं सम्यगाचम्य पार्थिव॥ १००
सर्वकालमुपस्थानं सन्ध्ययोः पार्थिवेष्यते।
अन्यत्र सूतकाशौचविभ्रमातुरभीतितः॥ १०१
सूर्येणाभ्युदितो यश्च त्यक्तः सूर्येण वा स्वपन्।
अन्यत्रातुरभावात्तु प्रायश्चित्ती भवेन्नरः॥ १०२
तस्मादनुदिते सूर्ये समुत्थाय महीपते।
उपतिष्ठेन्नरस्सन्ध्यामस्वपंश्च दिनान्तजाम्॥ १०३
उपतिष्ठन्ति वै सन्ध्यां ये न पूर्वां न पश्चिमाम्।
व्रजन्ति ते दुरात्मानस्तामिस्रं नरकं नृप॥ १०४
पुनः पाकमुपादाय सायम्प्यवनीपते।
वैश्वदेवनिमित्तं वै पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्॥ १०५
तत्रापि श्वपचादिभ्यस्तथैवान्नविसर्जनम्॥ १०६
अतिथिं चागतं तत्र स्वशक्त्या पूजयेद् बुधः।
पादशौचासनप्रह्वस्वागतोक्त्या च पूजनम्।
ततश्चान्नप्रदानेन शयनेन च पार्थिव॥ १०७
दिवातिथौ तु विमुखे गते यत्पातकं नृप।
तदेवाष्टगुणं पुंसस्सूर्योढे विमुखे गते॥ १०८
तस्मात्स्वशक्त्या राजेन्द्र सूर्योढमतिथिं नरः।
पूजयेत्पूजिते तस्मिन्पूजितास्सर्वदेवताः॥ १०९
अन्नशाकाम्बुदानेन स्वशक्त्या पूजयेत्पुमान्।
शयनप्रस्तरमहीप्रदानैरथवापि तम्॥ ११०
कृतपादादिशौचस्तु भुक्त्वा सायं ततो गृही।
गच्छेच्छय्यामस्फुटितामपि दारुमयीं नृप॥ १११
नाविशालां न वै भग्नां नासमां मलिनां न च।
न च जन्तुमयीं शय्यामधितिष्ठेदनास्तृताम्॥ ११२
हिन्दी अनुवाद
सच्छास्त्रोंका अवलोकन आदि सन्मार्गके अविरोधी विनोदोंसे शेष दिनको व्यतीत करे और फिर सायंकालके समय सावधानतापूर्वक सन्ध्योपासन करे॥ ९९॥
हे राजन्! बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि सायंकालके समय सूर्यके रहते हुए और प्रातःकाल तारागणके चमकते हुए ही भली प्रकार आचमनादि करके विधिपूर्वक सन्ध्योपासन करे॥ १००॥ हे पार्थिव! सूतक (पुत्र-जन्मादिसे होनेवाली अशुचिता), अशौच (मृत्युसे होनेवाली अशुचिता), उन्माद, रोग और भय आदि कोई बाधा न हो तो प्रतिदिन ही सन्ध्योपासन करना चाहिये॥ १०१॥ जो पुरुष रुग्णावस्थाको छोड़कर और कभी सूर्यके उदय अथवा अस्तके समय सोता है वह प्रायश्चित्तका भागी होता है॥ १०२॥ अतः हे महीपते! गृहस्थ पुरुष सूर्योदयसे पूर्व ही उठकर प्रातःसन्ध्या करे और सायंकालमें भी तत्कालीन सन्ध्यावन्दन करे; सोवे नहीं॥ १०३॥ हे नृप! जो पुरुष प्रातः अथवा सायंकालीन सन्ध्योपासन नहीं करते वे दुरात्मा अन्धतामिस्र नरकमें पड़ते हैं॥ १०४॥
तदनन्तर हे पृथिवीपते! सायंकालके समय सिद्ध किये हुए अन्नसे गृहपत्नी मन्त्रहीन बलिवैश्वदेव करे; उस समय भी उसी प्रकार श्वपच आदिके लिये अन्नदान किया जाता है॥ १०५-१०६॥ बुद्धिमान् पुरुष उस समय आये हुए अतिथिका भी सामर्थ्यानुसार सत्कार करे। हे राजन्! प्रथम पाँव धुलाने, आसन देने और स्वागतसूचक विनम्र वचन कहनेसे तथा फिर भोजन कराने और शयन करानेसे अतिथिका सत्कार किया जाता है॥ १०७॥ हे नृप! दिनके समय अतिथिके लौट जानेसे जितना पाप लगता है उससे आठगुना पाप सूर्यास्तके समय लौटनेसे होता है॥ १०८॥ अतः हे राजेन्द्र! सूर्यास्तके समय आये हुए अतिथिका गृहस्थ पुरुष अपनी सामर्थ्यानुसार अवश्य सत्कार करे क्योंकि उसका पूजन करनेसे ही समस्त देवताओंका पूजन हो जाता है॥ १०९॥ मनुष्यको चाहिये कि अपनी शक्तिके अनुसार उसे भोजनके लिये अन्न, शाक या जल देकर तथा सोनेके लिये शय्या या घास-फूसका बिछौना अथवा पृथिवी ही देकर उसका सत्कार करे॥ ११०॥
हे नृप! तदनन्तर गृहस्थ पुरुष सायंकालका भोजन करके तथा हाथ-पाँव धोकर छिद्रादिहीन काष्ठमय शय्यापर लेट जाय॥ १११॥ जो काफी बड़ी न हो, टूटी हुई हो, ऊँची-नीची हो, मलिन हो अथवा जिसमें जीव हों या जिसपर कुछ बिछा हुआ न हो उस शय्यापर न सोवे॥ ११२॥
अ० ११ ] * तृतीय अंश * २०५
| प्राच्यां दिशि शिरश्शस्तं याम्यायामथ वा नृप।<br>सदैव स्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्॥ ११३ | हे नृप! सोनेके समय सदा पूर्व अथवा दक्षिणकी ओर सिर रखना चाहिये। इनके विपरीत दिशाओंकी ओर सिर रखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है॥ ११३॥ |
| ऋतावुपेगमश्शस्तस्स्वपत्यामवनीपते।<br>पुन्नामर्क्षे शुभे काले ज्येष्ठाद्युग्मासु रात्रिषु॥ ११४ | हे पृथिवीपते! ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे संग करना उचित है। पुल्लिङ्ग नक्षत्रमें युग्म और उनमें भी पीछेकी रात्रियोंमें शुभ समयमें स्त्रीप्रसंग करे॥ ११४॥ |
| नादूनां तु स्त्रियं गच्छेन्नातुरां न रजस्वलाम्।<br>नानिष्टां न प्रकुपितां न त्रस्तां न च गर्भिणीम्॥ ११५ | किन्तु यदि स्त्री अप्रसन्ना, रोगिणी, रजस्वला, निरभिलाषिणी, क्रोधिता, दुःखिनी अथवा गर्भिणी हो तो उसका संग न करे॥ ११५॥ |
| नादक्षिणां नान्यकामां नाकामां नान्ययोषितम्।<br>क्षुत्क्षामां नातिभुक्तां वा स्वयं चैभिर्गुणैर्युतः॥ ११६ | जो सीधे स्वभावकी न हो, पराभिलाषिणी अथवा निरभिलाषिणी हो, क्षुधार्ता हो, अधिक भोजन किये हुए हो अथवा परस्त्री हो उसके पास न जाय; और यदि अपनेमें ये दोष हों तो भी स्त्रीगमन न करे॥ ११६॥ |
| स्नातस्स्रग्गन्धधृक्प्रीतो नाध्मातः क्षुधितोऽपि वा।<br>सकामस्सानुरागश्च व्यवायं पुरुषो व्रजेत्॥ ११७ | पुरुषको उचित है कि स्नान करनेके अनन्तर माला और गन्ध धारण कर काम और अनुरागयुक्त होकर स्त्रीगमन करे। जिस समय अति भोजन किया हो अथवा क्षुधित हो उस समय उसमें प्रवृत्त न हो॥ ११७॥ |
| चतुर्दश्यष्टमी चैव तथामा चाथ पूर्णिमा।<br>पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसंक्रान्तिरेव च॥ ११८ | हे राजेन्द्र! चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, पूर्णिमा और सूर्यकी संक्रान्ति—ये सब पर्वदिन हैं॥ ११८॥ |
| तैलस्त्रीमांससम्भोगी सर्वेष्वेतेषु वै पुमान्।<br>विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः॥ ११९ | इन पर्वदिनोंमें तैल, स्त्री अथवा मांसका भोग करनेवाला पुरुष मरनेपर विष्ठा और मूत्रसे भरे नरकमें पड़ता है॥ ११९॥ |
| अशेषपर्वस्वेतेषु तस्मात्संयमिभिर्बुधैः।<br>भाव्यं सच्छास्त्रदेवेज्याध्यायनजप्यपरैर्नरैः॥ १२० | संयमी और बुद्धिमान् पुरुषोंको इन समस्त पर्वदिनोंमें सच्छास्त्रावलोकन, देवोपासना, यज्ञानुष्ठान, ध्यान और जप आदिमें लगे रहना चाहिये॥ १२०॥ |
| नान्योनावयोनौ वा नोपयुक्तौषधस्तथा।<br>द्विजदेवगुरूणां च व्यवायी नाश्रमे भवेत्॥ १२१ | गौ-छाग आदि अन्य योनियोंसे, अयोनियोंसे, औषध-प्रयोगसे अथवा ब्राह्मण, देवता और गुरुके आश्रमोंमें कभी मैथुन न करे॥ १२१॥ |
| चैत्यचत्वरतीर्थेषु नैव गोष्ठे चतुष्पथे।<br>नैव श्मशानोपवने सलिलेषु महीपते॥ १२२ | हे पृथिवीपते! चैत्यवृक्षके नीचे, आँगनमें, तीर्थमें, पशुशालामें, चौराहेपर, श्मशानमें, उपवनमें अथवा जलमें भी मैथुन करना उचित नहीं है॥ १२२॥ |
| प्रोक्तपर्वस्वशेषेषु नैव भूपाल सन्ध्ययोः।<br>गच्छेद्व्यवायं मतिमान्न मूत्रोच्चारपीडितः॥ १२३ | हे राजन्! पूर्वोक्त समस्त पर्वदिनोंमें प्रातःकाल और सायंकालमें तथा मल-मूत्रके वेगके समय बुद्धिमान् पुरुष मैथुनमें प्रवृत्त न हो॥ १२३॥ |
| पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप।<br>भुवि रोगावहो नृणामप्रशस्तो जलाशये॥ १२४ | हे नृप! पर्वदिनोंमें स्त्रीगमन करनेसे धनकी हानि होती है; दिनमें करनेसे पाप होता है, पृथिवीपर करनेसे रोग होते हैं और जलाशयमें स्त्रीप्रसंग करनेसे अमंगल होता है॥ १२४॥ |
| परदारान्न गच्छेच्च मनसापि कथञ्चन।<br>किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवायिनाम्॥ १२५ | परस्त्रीसे तो वाणीसे क्या, मनसे भी प्रसंग न करे, क्योंकि उनसे मैथुन करनेवालोंको अस्थि-बन्धन भी नहीं होता [अर्थात् उन्हें अस्थिशून्य कीटादि होना पड़ता है]॥ १२५॥ |
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
२०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
मृतो नरकमभ्येति हीयतेऽत्रापि चायुषः ।
परदाररतिः पुंसामिह चामुत्र भीतिदा ॥ १२६
इति मत्वा स्वदारेषु ऋतुपत्सु बुधो व्रजेत् ।
यथोक्तदोषहीनेषु सकामेष्वनृतावपि ॥ १२७
परस्त्रीकी आसक्ति पुरुषको इहलोक और परलोक दोनों जगह भय देनेवाली है; इहलोकमें उसकी आयु क्षीण हो जाती है और मरनेपर वह नरकमें जाता है ॥ १२६ ॥ ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष उपरोक्त दोषोंसे रहित अपनी स्त्रीसे ही ऋतुकालमें प्रसंग करे तथा उसकी विशेष अभिलाषा हो तो बिना ऋतुकालके भी गमन करे ॥ १२७ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
बारहवाँ अध्याय
गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन
और्व उवाच
देवगोब्राह्मणांन्सिद्धांन्वृद्धाचार्यांस्तथार्चयेत् ।
द्विकालं च नमेत्सन्ध्यामग्नीनुपचरेत्तथा ॥ १
सदाऽनुपहते वस्त्रे प्रशस्तांश्च महौषधीः ।
गारुडानि च रत्नानि बिभृयात्प्रयतो नरः ॥ २
प्रस्निग्धामलकेशश्च सुगन्धश्चारुवेषधृक् ।
सितास्सुमनसो हृद्या बिभृयाच्च नरस्सदा ॥ ३
किञ्चित्परस्वं न हरेन्नाल्पमप्यप्रियं वदेत् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयान्नान्यदोषानुदीरयेत् ॥ ४
नान्यस्त्रियं तथा वैरं रोचयेत्पुरुषर्षभ ।
न दुष्टं यानमारोहेत्कूलच्छायां न संश्रयेत् ॥ ५
विद्विष्टपतितोन्मत्तबहुवैरादिकण्टकैः ।
बन्धकी बन्धकीभर्तुः क्षुद्रानृतकथैस्सह ॥ ६
तथातिव्ययशीलैश्च परिवादरतैश्शठैः ।
बुधो मैत्रीं न कुर्वीत नैकः पन्थानमाश्रयेत् ॥ ७
नावगाहेज्जलोघस्य वेगमग्रे नरेश्वर ।
प्रदीप्तं वेश्म न विशेन्नारोहेच्छिखरं तरोः ॥ ८
न कुर्याद्दन्तसङ्घर्षं कुष्णीयाच्च न नासिकाम् ।
नासंवृतमुखो जृम्भेच्छ्वासकासौ विसर्जयेत् ॥ ९
नोच्चैर्हसेत्सशब्दं च न मुञ्चेत्पवनं बुधः ।
नखान् खादयेच्छिन्द्यान्न तृणं न महीं लिखेत् ॥ १०
और्व बोले— गृहस्थ पुरुषको नित्यप्रति देवता, गौ, ब्राह्मण, सिद्धगण, वयोवृद्ध तथा आचार्यकी पूजा करनी चाहिये और दोनों समय सन्ध्यावन्दन तथा अग्निहोत्रादि कर्म करने चाहिये ॥ १ ॥ गृहस्थ पुरुष सदा ही संयमपूर्वक रहकर बिना कहींसे कटे हुए दो वस्त्र, उत्तम ओषधियाँ और गारुड (मरकत आदि विष नष्ट करनेवाले) रत्न धारण करे ॥ २ ॥ वह केशोंको स्वच्छ और चिकना रखे तथा सर्वदा सुगन्धयुक्त सुन्दर वेष और मनोहर श्वेतपुष्प धारण करे ॥ ३ ॥ किसीका थोड़ा-सा भी धन हरण न करे और थोड़ा-सा भी अप्रिय भाषण न करे। जो मिथ्या हो ऐसा प्रिय वचन भी कभी न बोले और न कभी दूसरोंके दोषोंको ही कहे ॥ ४ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! दूसरोंकी स्त्री अथवा दूसरोंके साथ वैर करनेमें कभी रुचि न करे, निन्दित सवारीमें कभी न चढ़े और नदीतीरकी छायाका कभी आश्रय न ले ॥ ५ ॥ बुद्धिमान् पुरुष लोकविद्विष्ट, पतित, उन्मत्त और जिसके बहुत-से शत्रु हों ऐसे परपीडक पुरुषोंके साथ तथा कुलटा, कुलटाके स्वामी, क्षुद्र, मिथ्यावादी अति व्ययशील, निन्दापरायण और दुष्ट पुरुषोंके साथ कभी मित्रता न करे और न कभी मार्गमें अकेला चले ॥ ६-७ ॥ हे नरेश्वर ! जलप्रवाहके वेगमें सामने पड़कर स्नान न करे, जलते हुए घरमें प्रवेश न करे और वृक्षकी चोटीपर न चढ़े ॥ ८ ॥ दाँतोंको परस्पर न घिसे, नाकको न कुरेदे तथा मुखको बन्द किये हुए जमुहाई न ले और न बन्द मुखसे खाँसे या श्वास छोड़े ॥ ९ ॥ बुद्धिमान् पुरुष जोरसे न हँसे और शब्द करते हुए अधोवायु न छोड़े; तथा नखोंको न चबावे, तिनका न तोड़े और पृथिवीपर भी न लिखे ॥ १० ॥
अ० १२ ] * तृतीय अंश * २०७
| न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्टं न मृद्नीयाद्विचक्षणः।<br/>ज्योतींष्यमेध्यशस्तानि नाभिवीक्षेत च प्रभो॥ ११<br/>नग्नां परस्त्रियं चैव सूर्यं चास्तमयोदये।<br/>न हुंकुर्याच्छवं गन्धं शवगन्धो हि सोमजः॥ १२<br/>चतुष्पथं चैत्यतरुं श्मशानोपवनानि च।<br/>दुष्टस्त्रीसन्निकर्षं च वर्जयेन्निशि सर्वदा॥ १३<br/>पूज्यदेवद्विजज्योतिश्छायां नातिक्रमेद् बुधः।<br/>नैकश्शून्याटवीं गच्छेत्तथा शून्यगृहे वसेत्॥ १४<br/>केशास्थिकण्टकामेध्यबलिभस्मतुषांस्तथा।<br/>स्नानार्द्रधरणीं चैव दूरतः परिवर्जयेत्॥ १५<br/>नानार्यानाश्रयेत्कांश्चिन्न जिह्मां रोचयेद् बुधः।<br/>उपसर्पेन्न वै व्यालं चिरं तिष्ठेन्न वोत्थितः॥ १६<br/>अतीव जागरस्वप्ने तद्वत्स्नानासने बुधः।<br/>न सेवेत तथा शय्यां व्यायामं च नरेश्वर॥ १७<br/>दंष्ट्रिणः शृंगिणश्चैव प्राज्ञो दूरेण वर्जयेत्।<br/>अवश्यायं च राजेन्द्र पुरोवातातपौ तथा॥ १८<br/>न स्नायान्न स्वपेन्नग्नो न चैवोपस्पृशेद् बुधः।<br/>मुक्तकेशश्च नाचामेद्देवाद्यर्चां च वर्जयेत्॥ १९<br/>होमदेवार्चनाद्यासु क्रियास्वाचमने तथा।<br/>नैकवस्त्रः प्रवर्तेत द्विजवाचनिके जपे॥ २०<br/>नासमञ्जसशीलैस्तु सहासीत कथञ्चन।<br/>सदृवृत्तसन्निकर्षो हि क्षणादर्द्धमपि शस्यते॥ २१<br/>विरोधं नोत्तमैर्गच्छेन्नाधमैश्च सदा बुधः।<br/>विवाहश्च विवादश्च तुल्यशीलैर्नृपेष्यते॥ २२<br/>नारभेत कलिं प्राज्ञश्शुष्कवैरं च वर्जयेत्।<br/>अप्यल्पहानिस्सोढव्या वैरेणार्थागमं त्यजेत्॥ २३<br/>स्नातो नांगानि सम्मार्जैत्स्नानशाट्या न पाणिना।<br/>न च निर्धूनयेत्केशान्नाचामेच्चैव चोत्थितः॥ २४<br/>पादेन नाक्रमेत्पादं न पूज्याभिमुखं नयेत्।<br/>नोच्चासनं गुरोरग्रे भजेताविनयान्वितः॥ २५<br/>अपसव्यं न गच्छेच्च देवागारचतुष्पथान्।<br/>मांगल्यपूज्यांश्च तथा विपरीतान्न दक्षिणम्॥ २६ | हे प्रभो! विचक्षण पुरुष मूँछ-दाढ़ीके बालोंको न चबावे, दो ढेलोंको परस्पर न रगड़े और अपवित्र एवं निन्दित नक्षत्रोंको न देखे॥ ११॥ नग्न परस्त्रीको और उदय अथवा अस्त होते हुए सूर्यको न देखे तथा शव और शव-गन्धसे घृणा न करे, क्योंकि शव-गन्ध सोमका अंश है॥ १२॥ चौराहा, चैत्यवृक्ष, श्मशान, उपवन और दुष्टा स्त्रीकी समीपता—इन सबका रात्रिके समय सर्वदा त्याग करे॥ १३॥ बुद्धिमान् पुरुष अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और तेजोमय पदार्थोंकी छायाको कभी न लाँघे तथा शून्य वनखण्डी और शून्य घरमें कभी अकेला न रहे॥ १४॥ केश, अस्थि, कण्टक, अपवित्र वस्तु, बलि, भस्म, तुष तथा स्नानके कारण भीगी हुई पृथिवीका दूरहीसे त्याग करे॥ १५॥ प्राज्ञ पुरुषको चाहिये कि अनार्य व्यक्तिका संग न करे, कुटिल पुरुषमें आसक्त न हो, सर्पके पास न जाय और जग पड़नेपर अधिक देरतक लेटा न रहे॥ १६॥ हे नरेश्वर! बुद्धिमान् पुरुष जागने, सोने, स्नान करने, बैठने, शय्यासेवन करने और व्यायाम करनेमें अधिक समय न लगावे॥ १७॥ हे राजेन्द्र! प्राज्ञ पुरुष दाँत और सींगवाले पशुओंको, ओसको तथा सामनेकी वायु और धूपका सर्वदा परित्याग करे॥ १८॥ नग्न होकर स्नान, शयन और आचमन न करे तथा केश खोलकर आचमन और देव-पूजन न करे॥ १९॥ होम तथा देवार्चन आदि क्रियाओंमें, आचमनमें, पुण्याहवाचनमें और जपमें एक वस्त्र धारण करके प्रवृत्त न हो॥ २०॥ संशयशील व्यक्तियोंके साथ कभी न रहे। सदाचारी पुरुषोंका तो आधे क्षणका संग भी अति प्रशंसनीय होता है॥ २१॥ बुद्धिमान् पुरुष उत्तम अथवा अधम व्यक्तियोंसे विरोध न करे। हे राजन्! विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियोंसे ही होना चाहिये॥ २२॥ प्राज्ञ पुरुष कलह न बढ़ावे तथा व्यर्थ वैरका भी त्याग करे। थोड़ी-सी हानि सह ले, किन्तु वैरसे कुछ लाभ होता हो तो उसे भी छोड़ दे॥ २३॥ स्नान करनेके अनन्तर स्नानसे भीगी हुई धोती अथवा हाथोंसे शरीरको न पोंछे तथा खड़े-खड़े केशोंको न झाड़े और आचमन भी न करे॥ २४॥ पैरके ऊपर पैर न रखे, गुरुजनोंके सामने पैर न फैलावे और धृष्टतापूर्वक उनके सामने कभी उच्चासनपर न बैठे॥ २५॥<br/>देवालय, चौराहा, मांगलिक द्रव्य और पूज्य व्यक्ति—इन सबको बायीं ओर रखकर न निकले तथा इनके विपरीत वस्तुओंको दायीं ओर रखकर न जाय॥ २६॥ |
२०८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२
सोमार्कोग्न्यम्बुवायूनां पूज्यानां च न सम्मुखम्।
कुर्यान्निष्ठीवविण्मूत्रसमुत्सर्गं च पण्डितः ॥ २७
तिष्ठन्न मूत्रयेत्तद्वत्पथिष्वपि न मूत्रयेत्।
श्लेष्मविण्मूत्ररक्तानि सर्वदैव न लङ्घयेत् ॥ २८
श्लेष्मशिङ्घाणिकोत्सर्गो नान्नकाले प्रशस्यते।
बलिमङ्गलजप्यादौ न होमे न महाजने ॥ २९
योषितो नावमन्येत न चासां विश्वसेद् बुधः ।
न चैवेर्ष्या भवेत्तासु न धिक्कुर्यात्कदाचन ॥ ३०
मङ्गल्यपुष्परत्नाज्यपूज्याननभिवाद्य च।
न निष्क्रमेद् गृहात्प्राज्ञस्सदाचारपरो नरः॥ ३१
चतुष्पथान्नमस्कार्यात्काले होमपरो भवेत्।
दीनानभ्युद्धरेत्साधूनुपासीत बहुश्रुतान् ॥ ३२
देवर्षिपूजकस्सम्यक्पितृपिण्डोदकप्रदः ।
सत्कर्ता चातिथीनां यः स लोकानुत्तमान्व्रजेत्॥ ३३
हितं मितं प्रियं काले वश्यात्मा योऽभिभाषते।
स याति लोकानाह्लादहेतुभूतान्नपाक्षयान् ॥ ३४
धीमान्हीमाञ्क्षमायुक्तो ह्यास्तिको विनयान्वितः ।
विद्याभिजनवृद्धानां याति लोकाननुत्तमान् ॥ ३५
अकालगर्जितादौ च पर्वस्वाशौचकादिषु ।
अनध्यायं बुधः कुर्यादुपरागादिके तथा॥ ३६
शमं नयति यः क्रुद्धान्सर्वबन्धुरमत्सरी।
भीताश्वासनकृत्साधुस्स्वर्गस्तस्याल्पकं फलम् ॥ ३७
वर्षातपादिषु छत्री दण्डी रात्र्यटवीषु च।
शरीरत्राणकामो वै सोपानत्कस्सदा व्रजेत् ॥ ३८
नोर्ध्वं न तिर्यग्दूरं वा न पश्यन्नर्यटेद् बुधः ।
युगमात्रं महीपृष्ठं नरो गच्छेद्विलोकयन् ॥ ३९
दोषहेतूनशेषांश्च वश्यात्मा यो निरस्यति ।
तस्य धर्मार्थकामानां हानिर्नाल्पापि जायते ॥ ४०
सदाचाररतः प्राज्ञो विद्याविनयशिक्षितः ।
पापेऽप्यपापः परुषे ह्यभिधत्ते प्रियाणि यः ।
मैत्रीद्रवान्तःकरणस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ॥ ४१
चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, वायु और पूज्य व्यक्तियोंके सम्मुख पण्डित पुरुष मल-मूत्र-त्याग न करे और न थूके ही ॥ २७॥ खड़े-खड़े अथवा मार्गमें मूत्र-त्याग न करे तथा श्लेष्मा (थूक), विष्ठा, मूत्र और रक्तको कभी न लाँघे ॥ २८॥ भोजन, देव-पूजा, मांगलिक कार्य और जप-होमादिके समय तथा महापुरुषोंके सामने थूकना और छींकना उचित नहीं है ॥ २९॥ बुद्धिमान् पुरुष स्त्रियोंका अपमान न करे, उनका विश्वास भी न करे तथा उनसे ईर्ष्या और उनका तिरस्कार भी कभी न करे ॥ ३०॥ सदाचार-परायण प्राज्ञ पुरुष मांगलिक द्रव्य, पुष्प, रत्न, घृत और पूज्य व्यक्तियोंका अभिवादन किये बिना कभी अपने घरसे न निकले ॥ ३१॥ चौराहोंको नमस्कार करे, यथासमय अग्निहोत्र करे, दीन-दुःखियोंका उद्धार करे और बहुश्रुत साधु पुरुषोंका सत्संग करे ॥ ३२॥
जो पुरुष देवता और ऋषियोंकी पूजा करता है, पितृगणको पिण्डोदक देता है और अतिथिका सत्कार करता है वह पुण्यलोकोंको जाता है ॥ ३३॥ जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर समयानुसार हित, मित और प्रिय भाषण करता है, हे राजन्! वह आनन्दके हेतुभूत अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ ३४॥ बुद्धिमान्, लज्जावान्, क्षमाशील, आस्तिक और विनयी पुरुष विद्वान् और कुलीन पुरुषोंके योग्य उत्तम लोकोंमें जाता है ॥ ३५॥ अकाल मेघगर्जनके समय, पर्व-दिनोंपर, अशौच कालमें तथा चन्द्र और सूर्यग्रहणके समय बुद्धिमान् पुरुष अध्ययन न करे ॥ ३६॥ जो व्यक्ति क्रोधितको शान्त करता है, सबका बन्धु है, मत्सरशून्य है, भयभीतको सान्त्वना देनेवाला है और साधु-स्वभाव है उसके लिये स्वर्ग तो बहुत थोड़ा फल है ॥ ३७॥ जिसे शरीर-रक्षाकी इच्छा हो वह पुरुष वर्षा और धूपमें छाता लेकर निकले, रात्रिके समय और वनमें दण्ड लेकर जाय तथा जहाँ कहीं जाना हो सर्वदा जूते पहनकर जाय ॥ ३८॥ बुद्धिमान् पुरुषको ऊपरकी ओर, इधर-उधर अथवा दूरके पदार्थोंको देखते हुए नहीं चलना चाहिये, केवल युगमात्र (चार हाथ) पृथिवीको देखता हुआ चले ॥ ३९॥
जो जितेन्द्रिय दोषके समस्त हेतुओंको त्याग देता है उसके धर्म, अर्थ और कामकी थोड़ी-सी भी हानि नहीं होती ॥ ४०॥ जो विद्या-विनय-सम्पन्न, सदाचारी प्राज्ञ पुरुष पापीके प्रति पापमय व्यवहार नहीं करता, कुटिल पुरुषोंसे प्रिय भाषण करता है तथा जिसका अन्तःकरण मैत्रीसे द्रवीभूत रहता है, मुक्ति उसकी मुट्ठीमें रहती है ॥ ४१॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अ० १३ ] * तृतीय अंश * २०९
ये कामक्रोधलोभानां वीतरागा न गोचरे।
सदाचारस्थितास्तेषामनुभावैर्धृता मही॥ ४२
तस्मात्सत्यं वदेत्प्राज्ञो यत्परप्रीतिकारणम्।
सत्यं यत्परदुःखाय तदा मौनपरो भवेत्॥ ४३
प्रियम्युक्तं हितं नैतदिति मत्वा न तद्वदेत्।
श्रेयस्तत्र हितं वाच्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्॥ ४४
प्राणिनामुपकाराय यथैवेह परत्र च।
कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान्भजेत्॥ ४५
जो वीतरागमहापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचारमें स्थित रहते हैं उनके प्रभावसे ही पृथिवी टिकी हुई है॥ ४२॥ अतः प्राज्ञ पुरुषको वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरोंकी प्रसन्नताका कारण हो। यदि किसी सत्य वाक्यके कहनेसे दूसरोंको दुःख होता जाने तो मौन रहे॥ ४३॥ यदि प्रिय वाक्यको भी अहितकर समझे तो उसे न कहे; उस अवस्थामें तो हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यन्त अप्रिय क्यों न हो॥ ४४॥ जो कार्य इहलोक और परलोकमें प्राणियोंके हितका साधक हो मतिमान् पुरुष मन, वचन और कर्मसे उसीका आचरण करे॥ ४५॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
तेरहवाँ अध्याय
आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार
और्व उवाच
सचैलस्य पितुः स्नानं जाते पुत्रे विधीयते।
जातकर्म तदा कुर्याच्छ्राद्धमभ्युदये च यत्॥ १
युग्मान्देवांश्च पित्रांश्च सम्यक्सव्यक्रमाद् द्विजान्।
पूजयेद्भोजयेच्चैव तन्मना नान्यमानसः॥ २
दध्यक्षतैस्सबदरैः प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा।
देवतीर्थेन वै पिण्डान्दद्यात्कायेन वा नृप॥ ३
नान्दीमुखः पितृगणस्तेन श्राद्धेन पार्थिव।
प्रीयते तत्तु कर्त्तव्यं पुरुषैस्सर्ववृद्धिषु॥ ४
कन्यापुत्रविवाहेषु प्रवेशेषु च वेश्मनः।
नामकर्माणि बालानां चूडाकर्मादिके तथा॥ ५
सीमन्तोन्नयने चैव पुत्रादिमुखदर्शने।
नान्दीमुखं पितृगणं पूजयेत्प्रयतो गृही॥ ६
पितृपूजाक्रमः प्रोक्तो वृद्धावेष सनातनः।
श्रूयतामवनीपाल प्रेतकर्मक्रियाविधिः॥ ७
प्रेतदेहं शुभैः स्नानैस्स्नापितं स्रग्विभूषितम्।
दग्ध्वा ग्रामाद्वहिः स्नात्वा सचैलस्सलिलाशये॥ ८
और्व बोले— पुत्रके उत्पन्न होनेपर पिताको सचैल (वस्त्रोंसहित) स्नान करना चाहिये। उसके पश्चात् जातकर्म-संस्कार और आभ्युदयिक श्राद्ध करने चाहिये॥ १॥ फिर तन्मयभावसे अनन्यचित्त होकर देवता और पितृगणके लिये क्रमशः दायीं और बायीं ओर बिठाकर दो-दो ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हें भोजन करावे॥ २॥ हे राजन्! पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके दधि, अक्षत और बदरीफलसे बने हुए पिण्डोंको देवतीर्थ^१ या प्रजापतितीर्थसे^२ दान करे॥ ३॥ हे पृथिवीनाथ! इस आभ्युदयिक श्राद्धसे नान्दीमुख नामक पितृगण प्रसन्न होते हैं, अतः सब प्रकारकी अभिवृद्धिके समय पुरुषोंको इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४॥ कन्या और पुत्रके विवाहमें, गृहप्रवेशमें, बालकोंके नामकरण तथा चूडाकर्म आदि संस्कारोंमें, सीमन्तोन्नयन-संस्कारमें और पुत्र आदिके मुख देखनेके समय गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्तसे नान्दीमुख नामक पितृगणका पूजन करे॥ ५-६॥ हे पृथिवीपाल! आभ्युदयिक श्राद्धमें पितृपूजाका यह सनातन क्रम तुमको सुनाया, अब प्रेतक्रियाकी विधि सुनो॥ ७॥
बन्धु-बान्धवोंको चाहिये कि भली प्रकार स्नान करानेके अनन्तर पुष्प-मालाओंसे विभूषित शवका गाँवके
१- अँगुलियोंके अग्रभाग। २- कनिष्ठिकाका मूलभाग।