विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ११ |
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[मूल संस्कृत श्लोक]
स्वाचान्तस्तु ततः कुर्यात्पुमान्केशप्रसाधनम्।
आदर्शाञ्जनमांगल्यं दूर्व्वाद्यालम्भनानि च॥ २२
ततस्स्ववर्णधर्मेण वृत्त्यर्थं च धनार्जनम्।
कुर्वीत श्रद्धासम्पन्नो यजेच्च पृथिवीपते॥ २३
सोमसंस्था हविस्संस्थाः पाकसंस्थास्तु संस्थिताः।
धने यतो मनुष्याणां यतेतातो धनार्जने॥ २४
नदीनदतटाकेषु देवखातजलेषु च।
नित्यक्रियार्थं स्नायीत गिरिप्रस्रवणेषु च॥ २५
कूपेषूद्धृततोयेन स्नानं कुर्वीत वा भुवि।
गृहेषूद्धृततोयेन ह्यथवा भुव्यसम्भवे॥ २६
शुचिवस्त्रधरः स्नातो देवर्षिपितृतर्पणम्।
तेषामेव हि तीर्थेन कुर्वीत सुसमाहितः॥ २७
त्रिरपः प्रीणनार्थाय देवानामुपवर्जयेत्।
ऋषीणां च यथान्यायं सकृच्चापि प्रजापतेः॥ २८
पितॄणां प्रीणनार्थाय त्रिरपः पृथिवीपते।
पितामहेभ्यश्च तथा प्रीणयेत्प्रपितामहान्॥ २९
मातामहाय तत्पित्रे तत्पित्रे च समाहितः।
दद्यात्तैत्रेण तीर्थेन काम्यं चान्यच्छृणुष्व मे॥ ३०
मात्रे प्रमात्रे तन्मात्रे गुरुपत्न्यै तथा नृप।
गुरूणां मातुलानां च स्निग्धमित्राय भूपुजे॥ ३१
इदं चापि जपेदम्बु दद्यादात्मेच्छया नृप।
उपकाराय भूतानां कृतदेवादितर्पणम्॥ ३२
देवासुरास्तथा यक्षा नागगन्धर्वराक्षसाः।
पिशाचा गुह्यकास्सिद्धाः कूष्माण्डाः पशवः खगाः॥ ३३
जलेचरा भूनिलया वाय्वाहाराश्च जन्तवः।
तृप्तिमेतेन यान्त्वाशु मद्द्त्तेनाम्बुनाखिलाः॥ ३४
[हिन्दी अनुवाद]
फिर भली प्रकार स्नान करनेके अनन्तर केश सँवारे और दर्पण, अंजन तथा दूर्वा आदि मांगलिक द्रव्योंका यथाविधि व्यवहार करे॥ २२॥ तदनन्तर हे पृथिवीपते! अपने वर्णधर्मके अनुसार आजीविकाके लिये धनोपार्जन करे और श्रद्धापूर्वक यज्ञानुष्ठान करे॥ २३॥ सोमसंस्था, हविस्संस्था और पाकसंस्था—इन सब धर्म-कर्मोंका आधार धन ही है।* अतः मनुष्योंको धनोपार्जनका यत्न करना चाहिये॥ २४॥ नित्यकर्मोंके सम्पादनके लिये नदी, नद, तड़ाग, देवालयोंकी बावड़ी और पर्वतीय झरनोंमें स्नान करना चाहिये॥ २५॥ अथवा कुएँसे जल खींचकर उसके पासकी भूमिपर स्नान करे और यदि वहाँ भूमिपर स्नान करना सम्भव न हो तो कुएँसे खींचकर लाये हुए जलसे घरहीमें नहा ले॥ २६॥
स्नान करनेके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण कर देवता, ऋषिगण और पितृगणका उन्हींके तीर्थोंसे तर्पण करे॥ २७॥ देवता और ऋषियोंके तर्पणके लिये तीन-तीन बार तथा प्रजापतिके लिये एक बार जल छोड़े॥ २८॥ हे पृथिवीपते! पितृगण और पितामहोंकी प्रसन्नताके लिये तीन बार जल छोड़े तथा इसी प्रकार प्रपितामहोंको भी सन्तुष्ट करे एवं मातामह (नाना) और उनके पिता तथा उनके पिताको भी सावधानतापूर्वक पितृ-तीर्थसे जलदान करे। अब काम्य तर्पणका वर्णन करता हूँ, श्रवण करो॥ २९-३०॥
'यह जल माताके लिये हो, यह प्रमाताके लिये हो, यह वृद्धाप्रमाताके लिये हो, यह गुरुपत्नीको, यह गुरुको, यह मामाको, यह प्रिय मित्रको तथा यह राजाको प्राप्त हो—हे राजन्! यह जपता हुआ समस्त भूतोंके हितके लिये देवादि तर्पण करके अपनी इच्छानुसार अभिलषित सम्बन्धीके लिये जलदान करे'॥ ३१-३२॥ [देवादि तर्पणके समय इस प्रकार कहे—] 'देव, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, पशु, पक्षी, जलचर, स्थलचर और वायु-भक्षक आदि सभी प्रकारके जीव मेरे दिये हुए इस जलसे तृप्त हों॥ ३३-३४॥
* गौतमस्मृतिके अष्टम अध्यायमें कहा है—
‘औपासनमष्टका पार्वणश्राद्धः श्रावण्याग्रहायणी चैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकयज्ञसंस्थाः। अग्न्याधेयमग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासा-वाग्रयणं चातुर्मास्यानि निरूढपशुबन्धस्सौत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थाः। अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थः षोडशी वाजपेयोऽतिरात्राप्तोर्यामा इति सप्त सोमसंस्थाः।’
औपासन, अष्टका श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध तथा श्रावण, अग्रहायण, चैत्र और आश्विन मासकी पूर्णिमाएँ—ये सात ‘पाकयज्ञ-संस्था’ हैं। अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास, आग्रयण, चातुर्मास्य, यज्ञपशुबन्ध और सौत्रामणी—ये सात ‘हविर्यज्ञसंस्था’ हैं, यथा अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये सात ‘सोमयज्ञसंस्था’ हैं।