भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

अ० ११] * तृतीय अंश * १९७


ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय मनसा मतिमान्नृप।
प्रबुद्धश्चिन्तयेद्धर्ममर्थं चाप्यविरोधिनम्॥ ५
अपीडया तयोः काममुभयोरपि चिन्तयेत्।
दृष्टादृष्टविनाशाय त्रिवर्गे समदर्शिता॥ ६
परित्यजेदर्थकामौ धर्मपीडाकरौ नृप।
धर्ममप्यसुखोदर्कं लोकविद्विष्टमेव च॥ ७
ततः कल्यं समुत्थाय कुर्यान्मूत्रं नरेश्वर॥ ८
नैर्ऋत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकं भुवः।
दूरादावसथान्मूत्रं पुरीषं च विसर्जयेत्॥ ९
पादावनेजनोच्छिष्टे प्रक्षिपेन्न गृहांगणे॥ १०
आत्मच्छायां तरुच्छायां गोसूर्याग्न्यनिलांस्तथा।
गुरुद्विजादींस्तु बुधो नाधिमेहेत्कदाचन॥ ११
न कृष्टे सस्यमध्ये वा गोव्रजे जनसंसदि।
न वर्त्मनि न नद्यादितीर्थेषु पुरुषर्षभ॥ १२
नाप्सु नैवाम्भसस्तीरे श्मशाने न समाचरेत्।
उत्सर्गं वै पुरीषस्य मूत्रस्य च विसर्जनम्॥ १३
उदङ्मुखो दिवा मूत्रं विपरीतमुखो निशि।
कुर्वीतानापदि प्राज्ञो मूत्रोत्सर्गं च पार्थिव॥ १४
तृणैरास्तीर्य वसुधां वस्त्रप्रावृतमस्तकः।
तिष्ठेन्नातिचिरं तत्र नैव किञ्चिदुदीरयेत्॥ १५
वल्मीकमूषिकोद्भूतां मृदं नान्तर्जलां तथा।
शौचावशिष्टां गेहाच्च नादद्याल्लेपसम्भवाम्॥ १६
अणुप्राण्युपपन्नां च हलोत्खातां च पार्थिव।
परित्यजेन्मृदो ह्येतास्सकलाश्शौचकर्मणि॥ १७
एका लिंगे गुदे तिस्रो दश वामकरे नृप।
हस्तद्वये च सप्त स्युर्मृदश्शौचोपपादिकाः॥ १८
अच्छेनागन्धलेपेन जलेनाबुद्बुदेन च।
आचामेच्च मृदं भूयस्तथादद्यात्समाहितः॥ १९
निष्पादिताङ्घ्रिशौचस्तु पादावभ्युक्ष्य तैः पुनः।
त्रिःपिबेत्सलिलं तेन तथा द्विः परिमार्जयेत्॥ २०
शीर्षण्यानि ततः खानि मूर्द्धानं च समालभेत।
बाहू नाभिं च तोयेन हृदयं चापि संस्पृशेत्॥ २१


हे नृप! बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ चित्तसे ब्राह्ममुहूर्तमें जगकर अपने धर्म और धर्माविरोधी अर्थका चिन्तन करे॥ ५॥ तथा जिसमें धर्म और अर्थकी क्षति न हो ऐसे कामका भी चिन्तन करे। इस प्रकार दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टकी निवृत्तिके लिये धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्गके प्रति समान भाव रखना चाहिये॥ ६॥ हे नृप! धर्मविरुद्ध अर्थ और काम दोनोंका त्याग कर दे तथा ऐसे धर्मका भी आचरण न करे जो उत्तरकालमें दुःखमय अथवा समाज-विरुद्ध हो॥ ७॥

हे नरेश्वर! तदनन्तर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रथम मूत्रत्याग करे। ग्रामसे नैर्ऋत्यकोणमें जितनी दूर बाण जा सकता है उससे आगे बढ़कर अथवा अपने निवास स्थानसे दूर जाकर मल-मूत्र त्याग करे। पैर धोया हुआ और जूठा जल अपने घरके आँगनमें न डाले॥ ८-१०॥ अपनी या वृक्षकी छायाके ऊपर तथा गौ, सूर्य, अग्नि, वायु, गुरु और द्विजातीय पुरुषके सामने बुद्धिमान् पुरुष कभी मल-मूत्र त्याग न करे॥ ११॥ इसी प्रकार हे पुरुषर्षभ! जुते हुए खेतमें, सस्यसम्पन्न भूमिमें, गौओंके गोष्ठमें, जन-समाजमें, मार्गके बीचमें, नदी आदि तीर्थस्थानोंमें, जल अथवा जलाशयके तटपर और श्मशानमें भी कभी मल-मूत्रका त्याग न करे॥ १२-१३॥ हे राजन्! कोई विशेष आपत्ति न हो तो प्राज्ञ पुरुषको चाहिये कि दिनके समय उत्तर-मुख और रात्रिके समय दक्षिण-मुख होकर मूत्रत्याग करे॥ १४॥ मल-त्यागके समय पृथिवीको तिनकोंसे और सिरको वस्त्रसे ढाँप ले तथा उस स्थानपर अधिक समयतक न रहे और न कुछ बोले ही॥ १५॥

हे राजन्! बाँबीकी, चूहोंद्वारा बिलसे निकाली हुई, जलके भीतरकी, शौचकर्मसे बची हुई, घरके लीपनकी, चींटी आदि छोटे-छोटे जीवोंद्वारा निकाली हुई और हलसे उखाड़ी हुई—इन सब प्रकारकी मृत्तिकाओंका शौच कर्ममें उपयोग न करे॥ १६-१७॥ हे नृप! लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार और दोनों हाथोंमें सात बार मृत्तिका लगानेसे शौच सम्पन्न होता है॥ १८॥ तदनन्तर गन्ध और फेनरहित स्वच्छ जलसे आचमन करे। तथा फिर सावधानीपूर्वक बहुत-सी मृत्तिका ले॥ १९॥ उससे चरण-शुद्धि करनेके अनन्तर फिर पैर धोकर तीन बार कुल्ला करे और दो बार मुख धोवे॥ २०॥ तत्पश्चात् जल लेकर शिरोदेशमें स्थित इन्द्रियरन्ध्र, मूर्द्धा, बाहु, नाभि और हृदयको स्पर्श करे॥ २१॥