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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० ११] * तृतीय अंश * १९७


ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय मनसा मतिमान्नृप।
प्रबुद्धश्चिन्तयेद्धर्ममर्थं चाप्यविरोधिनम्॥ ५
अपीडया तयोः काममुभयोरपि चिन्तयेत्।
दृष्टादृष्टविनाशाय त्रिवर्गे समदर्शिता॥ ६
परित्यजेदर्थकामौ धर्मपीडाकरौ नृप।
धर्ममप्यसुखोदर्कं लोकविद्विष्टमेव च॥ ७
ततः कल्यं समुत्थाय कुर्यान्मूत्रं नरेश्वर॥ ८
नैर्ऋत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकं भुवः।
दूरादावसथान्मूत्रं पुरीषं च विसर्जयेत्॥ ९
पादावनेजनोच्छिष्टे प्रक्षिपेन्न गृहांगणे॥ १०
आत्मच्छायां तरुच्छायां गोसूर्याग्न्यनिलांस्तथा।
गुरुद्विजादींस्तु बुधो नाधिमेहेत्कदाचन॥ ११
न कृष्टे सस्यमध्ये वा गोव्रजे जनसंसदि।
न वर्त्मनि न नद्यादितीर्थेषु पुरुषर्षभ॥ १२
नाप्सु नैवाम्भसस्तीरे श्मशाने न समाचरेत्।
उत्सर्गं वै पुरीषस्य मूत्रस्य च विसर्जनम्॥ १३
उदङ्मुखो दिवा मूत्रं विपरीतमुखो निशि।
कुर्वीतानापदि प्राज्ञो मूत्रोत्सर्गं च पार्थिव॥ १४
तृणैरास्तीर्य वसुधां वस्त्रप्रावृतमस्तकः।
तिष्ठेन्नातिचिरं तत्र नैव किञ्चिदुदीरयेत्॥ १५
वल्मीकमूषिकोद्भूतां मृदं नान्तर्जलां तथा।
शौचावशिष्टां गेहाच्च नादद्याल्लेपसम्भवाम्॥ १६
अणुप्राण्युपपन्नां च हलोत्खातां च पार्थिव।
परित्यजेन्मृदो ह्येतास्सकलाश्शौचकर्मणि॥ १७
एका लिंगे गुदे तिस्रो दश वामकरे नृप।
हस्तद्वये च सप्त स्युर्मृदश्शौचोपपादिकाः॥ १८
अच्छेनागन्धलेपेन जलेनाबुद्बुदेन च।
आचामेच्च मृदं भूयस्तथादद्यात्समाहितः॥ १९
निष्पादिताङ्घ्रिशौचस्तु पादावभ्युक्ष्य तैः पुनः।
त्रिःपिबेत्सलिलं तेन तथा द्विः परिमार्जयेत्॥ २०
शीर्षण्यानि ततः खानि मूर्द्धानं च समालभेत।
बाहू नाभिं च तोयेन हृदयं चापि संस्पृशेत्॥ २१


हे नृप! बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ चित्तसे ब्राह्ममुहूर्तमें जगकर अपने धर्म और धर्माविरोधी अर्थका चिन्तन करे॥ ५॥ तथा जिसमें धर्म और अर्थकी क्षति न हो ऐसे कामका भी चिन्तन करे। इस प्रकार दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टकी निवृत्तिके लिये धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्गके प्रति समान भाव रखना चाहिये॥ ६॥ हे नृप! धर्मविरुद्ध अर्थ और काम दोनोंका त्याग कर दे तथा ऐसे धर्मका भी आचरण न करे जो उत्तरकालमें दुःखमय अथवा समाज-विरुद्ध हो॥ ७॥

हे नरेश्वर! तदनन्तर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रथम मूत्रत्याग करे। ग्रामसे नैर्ऋत्यकोणमें जितनी दूर बाण जा सकता है उससे आगे बढ़कर अथवा अपने निवास स्थानसे दूर जाकर मल-मूत्र त्याग करे। पैर धोया हुआ और जूठा जल अपने घरके आँगनमें न डाले॥ ८-१०॥ अपनी या वृक्षकी छायाके ऊपर तथा गौ, सूर्य, अग्नि, वायु, गुरु और द्विजातीय पुरुषके सामने बुद्धिमान् पुरुष कभी मल-मूत्र त्याग न करे॥ ११॥ इसी प्रकार हे पुरुषर्षभ! जुते हुए खेतमें, सस्यसम्पन्न भूमिमें, गौओंके गोष्ठमें, जन-समाजमें, मार्गके बीचमें, नदी आदि तीर्थस्थानोंमें, जल अथवा जलाशयके तटपर और श्मशानमें भी कभी मल-मूत्रका त्याग न करे॥ १२-१३॥ हे राजन्! कोई विशेष आपत्ति न हो तो प्राज्ञ पुरुषको चाहिये कि दिनके समय उत्तर-मुख और रात्रिके समय दक्षिण-मुख होकर मूत्रत्याग करे॥ १४॥ मल-त्यागके समय पृथिवीको तिनकोंसे और सिरको वस्त्रसे ढाँप ले तथा उस स्थानपर अधिक समयतक न रहे और न कुछ बोले ही॥ १५॥

हे राजन्! बाँबीकी, चूहोंद्वारा बिलसे निकाली हुई, जलके भीतरकी, शौचकर्मसे बची हुई, घरके लीपनकी, चींटी आदि छोटे-छोटे जीवोंद्वारा निकाली हुई और हलसे उखाड़ी हुई—इन सब प्रकारकी मृत्तिकाओंका शौच कर्ममें उपयोग न करे॥ १६-१७॥ हे नृप! लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार और दोनों हाथोंमें सात बार मृत्तिका लगानेसे शौच सम्पन्न होता है॥ १८॥ तदनन्तर गन्ध और फेनरहित स्वच्छ जलसे आचमन करे। तथा फिर सावधानीपूर्वक बहुत-सी मृत्तिका ले॥ १९॥ उससे चरण-शुद्धि करनेके अनन्तर फिर पैर धोकर तीन बार कुल्ला करे और दो बार मुख धोवे॥ २०॥ तत्पश्चात् जल लेकर शिरोदेशमें स्थित इन्द्रियरन्ध्र, मूर्द्धा, बाहु, नाभि और हृदयको स्पर्श करे॥ २१॥

१९८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ११

[मूल संस्कृत श्लोक]

स्वाचान्तस्तु ततः कुर्यात्पुमान्केशप्रसाधनम्।
आदर्शाञ्जनमांगल्यं दूर्व्वाद्यालम्भनानि च॥ २२

ततस्स्ववर्णधर्मेण वृत्त्यर्थं च धनार्जनम्।
कुर्वीत श्रद्धासम्पन्नो यजेच्च पृथिवीपते॥ २३

सोमसंस्था हविस्संस्थाः पाकसंस्थास्तु संस्थिताः।
धने यतो मनुष्याणां यतेतातो धनार्जने॥ २४

नदीनदतटाकेषु देवखातजलेषु च।
नित्यक्रियार्थं स्नायीत गिरिप्रस्रवणेषु च॥ २५

कूपेषूद्धृततोयेन स्नानं कुर्वीत वा भुवि।
गृहेषूद्धृततोयेन ह्यथवा भुव्यसम्भवे॥ २६

शुचिवस्त्रधरः स्नातो देवर्षिपितृतर्पणम्।
तेषामेव हि तीर्थेन कुर्वीत सुसमाहितः॥ २७

त्रिरपः प्रीणनार्थाय देवानामुपवर्जयेत्।
ऋषीणां च यथान्यायं सकृच्चापि प्रजापतेः॥ २८

पितॄणां प्रीणनार्थाय त्रिरपः पृथिवीपते।
पितामहेभ्यश्च तथा प्रीणयेत्प्रपितामहान्॥ २९

मातामहाय तत्पित्रे तत्पित्रे च समाहितः।
दद्यात्तैत्रेण तीर्थेन काम्यं चान्यच्छृणुष्व मे॥ ३०

मात्रे प्रमात्रे तन्मात्रे गुरुपत्न्यै तथा नृप।
गुरूणां मातुलानां च स्निग्धमित्राय भूपुजे॥ ३१

इदं चापि जपेदम्बु दद्यादात्मेच्छया नृप।
उपकाराय भूतानां कृतदेवादितर्पणम्॥ ३२

देवासुरास्तथा यक्षा नागगन्धर्वराक्षसाः।
पिशाचा गुह्यकास्सिद्धाः कूष्माण्डाः पशवः खगाः॥ ३३

जलेचरा भूनिलया वाय्वाहाराश्च जन्तवः।
तृप्तिमेतेन यान्त्वाशु मद्द्त्तेनाम्बुनाखिलाः॥ ३४


[हिन्दी अनुवाद]

फिर भली प्रकार स्नान करनेके अनन्तर केश सँवारे और दर्पण, अंजन तथा दूर्वा आदि मांगलिक द्रव्योंका यथाविधि व्यवहार करे॥ २२॥ तदनन्तर हे पृथिवीपते! अपने वर्णधर्मके अनुसार आजीविकाके लिये धनोपार्जन करे और श्रद्धापूर्वक यज्ञानुष्ठान करे॥ २३॥ सोमसंस्था, हविस्संस्था और पाकसंस्था—इन सब धर्म-कर्मोंका आधार धन ही है।* अतः मनुष्योंको धनोपार्जनका यत्न करना चाहिये॥ २४॥ नित्यकर्मोंके सम्पादनके लिये नदी, नद, तड़ाग, देवालयोंकी बावड़ी और पर्वतीय झरनोंमें स्नान करना चाहिये॥ २५॥ अथवा कुएँसे जल खींचकर उसके पासकी भूमिपर स्नान करे और यदि वहाँ भूमिपर स्नान करना सम्भव न हो तो कुएँसे खींचकर लाये हुए जलसे घरहीमें नहा ले॥ २६॥

स्नान करनेके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण कर देवता, ऋषिगण और पितृगणका उन्हींके तीर्थोंसे तर्पण करे॥ २७॥ देवता और ऋषियोंके तर्पणके लिये तीन-तीन बार तथा प्रजापतिके लिये एक बार जल छोड़े॥ २८॥ हे पृथिवीपते! पितृगण और पितामहोंकी प्रसन्नताके लिये तीन बार जल छोड़े तथा इसी प्रकार प्रपितामहोंको भी सन्तुष्ट करे एवं मातामह (नाना) और उनके पिता तथा उनके पिताको भी सावधानतापूर्वक पितृ-तीर्थसे जलदान करे। अब काम्य तर्पणका वर्णन करता हूँ, श्रवण करो॥ २९-३०॥

'यह जल माताके लिये हो, यह प्रमाताके लिये हो, यह वृद्धाप्रमाताके लिये हो, यह गुरुपत्नीको, यह गुरुको, यह मामाको, यह प्रिय मित्रको तथा यह राजाको प्राप्त हो—हे राजन्! यह जपता हुआ समस्त भूतोंके हितके लिये देवादि तर्पण करके अपनी इच्छानुसार अभिलषित सम्बन्धीके लिये जलदान करे'॥ ३१-३२॥ [देवादि तर्पणके समय इस प्रकार कहे—] 'देव, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, पशु, पक्षी, जलचर, स्थलचर और वायु-भक्षक आदि सभी प्रकारके जीव मेरे दिये हुए इस जलसे तृप्त हों॥ ३३-३४॥


* गौतमस्मृतिके अष्टम अध्यायमें कहा है—
‘औपासनमष्टका पार्वणश्राद्धः श्रावण्याग्रहायणी चैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकयज्ञसंस्थाः। अग्न्याधेयमग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासा-वाग्रयणं चातुर्मास्यानि निरूढपशुबन्धस्सौत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थाः। अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थः षोडशी वाजपेयोऽतिरात्राप्तोर्यामा इति सप्त सोमसंस्थाः।’
औपासन, अष्टका श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध तथा श्रावण, अग्रहायण, चैत्र और आश्विन मासकी पूर्णिमाएँ—ये सात ‘पाकयज्ञ-संस्था’ हैं। अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास, आग्रयण, चातुर्मास्य, यज्ञपशुबन्ध और सौत्रामणी—ये सात ‘हविर्यज्ञसंस्था’ हैं, यथा अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये सात ‘सोमयज्ञसंस्था’ हैं।

अ० ११ ] * तृतीय अंश * १९९


नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया॥ ३५

जो प्राणी सम्पूर्ण नरकोंमें नाना प्रकारकी यातनाएँ भोग रहे हैं उनकी तृप्तिके लिये मैं यह जलदान करता हूँ॥ ३५॥

ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु ये चास्मत्तोयकांक्षिणः॥ ३६

जो मेरे बन्धु अथवा अबन्धु हैं, तथा जो अन्य जन्मोंमें मेरे बन्धु थे एवं और भी जो-जो मुझसे जलकी इच्छा रखनेवाले हैं वे सब मेरे दिये हुए जलसे परितृप्त हों॥ ३६॥

यत्र क्वचनसंस्थानां क्षुत्तृष्णोपहतात्मनाम्।
इदमाप्यायनायास्तु मया दत्तं तिलोदकम्॥ ३७

क्षुधा और तृष्णासे व्याकुल जीव कहीं भी क्यों न हों मेरा दिया हुआ यह तिलोदक उनको तृप्ति प्रदान करे'॥ ३७॥

काम्योदकप्रदानं ते मयैतत्कथितं नृप।
यद्दत्त्वा प्रीणयत्येतन्मनुष्यस्सकलं जगत्।
जगदाप्यायनोद्भूतं पुण्यमाप्नोति चानघ॥ ३८

हे नृप! इस प्रकार मैंने तुमसे यह काम्य-तर्पणका निरूपण किया, जिसके करनेसे मनुष्य सकल संसारको तृप्त कर देता है और हे अनघ! इससे उसे जगत्‌की तृप्तिसे होनेवाला पुण्य प्राप्त होता है॥ ३८॥

दत्त्वा काम्योदकं सम्यगेतेभ्यः श्रद्धयान्वितः।
आचम्य च ततो दद्यात्सूर्याय सलिलाञ्जलिम्॥ ३९

इस प्रकार उपरोक्त जीवोंको श्रद्धापूर्वक काम्यजल-दान करनेके अनन्तर आचमन करे और फिर सूर्यदेवको जलांजलि दे॥ ३९॥ [उस समय इस प्रकार कहे—]

नमो विवस्वते ब्रह्मभास्वते विष्णुतेजसे।
जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मसाक्षिणे॥ ४०

'भगवान् विवस्वान्‌को नमस्कार है जो वेद-वेद्य और विष्णुके तेजस्स्वरूप हैं तथा जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले, अति पवित्र एवं कर्मोंके साक्षी हैं'॥ ४०॥

ततो गृहार्चनं कुर्यादभीष्टसुरपूजनम्।
जलाभिषेकैः पुष्पैश्च धूपाद्यैश्च निवेदनम्॥ ४१

तदनन्तर जलाभिषेक और पुष्प तथा धूपादि निवेदन करता हुआ गृहदेव और इष्टदेवका पूजन करे॥ ४१॥

अपूर्वमग्निहोत्रं च कुर्यात्प्राग्ब्रह्मणे नृप॥ ४२
प्रजापतिं समुद्दिश्य दद्यादाहुतिमादरात्।
गुह्येभ्यः काश्यपायाथ ततोऽनुमतये क्रमात्॥ ४३

हे नृप! फिर अपूर्व अग्निहोत्र करे, उसमें पहले ब्रह्माको और तदनन्तर क्रमशः प्रजापति, गुह्य, काश्यप और अनुमतिको आदरपूर्वक आहुतियाँ दे॥ ४२-४३॥

तच्छेषं मणिके पृथ्वीपर्जन्येभ्यः क्षिपेत्ततः।
द्वारे धातुर्विधातुश्च मध्ये च ब्रह्मणे क्षिपेत्॥ ४४
गृहस्य पुरुषव्याघ्र दिग्देवानपि मे शृणु॥ ४५

उससे बचे हुए हव्यको पृथिवी और मेघके उद्देश्यसे उदकपात्रमें,* धाता और विधाताके उद्देश्यसे द्वारके दोनों ओर तथा ब्रह्माके उद्देश्यसे घरके मध्यमें छोड़ दे। हे पुरुषव्याघ्र! अब मैं दिक्पालगणकी पूजाका वर्णन करता हूँ, श्रवण करो॥ ४४-४५॥

इन्द्राय धर्मराजाय वरुणाय तथेन्दवे।
प्राच्यादिषु बुधो दद्याद्धुतशेषात्मकं बलिम्॥ ४६

बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, यम, वरुण और चन्द्रमाके लिये हुतशिष्ट सामग्रीसे बलि प्रदान करे॥ ४६॥

प्रागुत्तरे च दिग्भागे धन्वन्तरिबलिं बुधः।
निर्वपेद्वैश्वदेवं च कर्म कुर्यादतः परम्॥ ४७

पूर्व और उत्तर-दिशाओंमें धन्वन्तरिके लिये बलि दे तथा इसके अनन्तर बलिवैश्वदेव-कर्म करे॥ ४७॥

वायव्यां वायवे दिक्षु समस्तासु यथादिशम्।
ब्रह्मणे चान्तरिक्षाय भानवे च क्षिपेद्बलिम्॥ ४८

बलिवैश्वदेवके समय वायव्यकोणमें वायुको तथा अन्य समस्त दिशाओंमें वायु एवं उन दिशाओंको बलि दे, इसी प्रकार ब्रह्मा, अन्तरिक्ष और सूर्यको भी उनकी दिशाओंके अनुसार [अर्थात् मध्यमें] बलि प्रदान करे॥ ४८॥


* वह जल भरा पात्र जो अग्निहोत्र करते समय समीपमें रख लिया जाता है और जिसमें 'इदं न मम' कहकर आहुतिका शेष भाग छोड़ा जाता है।

२०० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११


विश्वेदेवान्विश्वभूतानथ विश्वपतीन्पितॄन्।
यक्षाणां च समुद्दिश्य बलिं दद्यान्नरेश्वर॥ ४९

ततोऽन्यदन्नमादाय भूमिभागे शुचौ बुधः।
दद्यादशेषभूतेभ्यस्स्वेच्छया सुसमाहितः॥ ५०

देवा मनुष्याः पशवो वयांसि
सिद्धास्सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः।
प्रेताः पिशाचास्तरवस्समस्ता
ये चान्नमिच्छन्ति मयात्र दत्तम्॥ ५१

पिपीलिकाः कीटपतङ्गकाद्या
बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः।
प्रयान्तु ते तृप्तिमिदं मयान्नं
तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु॥ ५२

येषां न माता न पिता न बन्धु-
नैवान्नसिद्धिर्न तथान्नम्ति।
तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्
ते यान्तु तृप्तिं मुदिता भवन्तु॥ ५३

भूतानि सर्वाणि तथान्नमेत-
दहं च विष्णुर्न ततोऽन्यदस्ति।
तस्मादहं भूतनिकायभूत-
मन्नं प्रयच्छामि भवाय तेषाम्॥ ५४

चतुर्दशो भूतगणो य एष
तत्र स्थिता येऽखिलभूतसङ्घाः।
तृप्त्यर्थमन्नं हि मया विसृष्टं
तेषामिदं ते मुदिता भवन्तु॥ ५५

इत्युच्चार्य नरो दद्यादन्नं श्रद्धासमन्वितः।
भुवि सर्वोपकाराय गृही सर्वाश्रयो यतः॥ ५६

श्वचाण्डालविहङ्गानां भुवि दद्यान्नरेश्वर।
ये चान्ये पतिताःकेचिदपुत्राः सन्ति मानवाः॥ ५७

ततो गोदोहमात्रं वै कालं तिष्ठेद् गृहाङ्गणे।
अतिथिग्रहणार्थाय तदूर्ध्वं तु यथेच्छया॥ ५८

फिर हे नरेश्वर! विश्वेदेवों, विश्वभूतों, विश्वपतियों, पितरों और यक्षोंके उद्देश्यसे [यथास्थान] बलि प्रदान करे॥४९॥

तदनन्तर बुद्धिमान् व्यक्ति और अन्न लेकर पवित्र पृथिवीपर समाहित चित्तसे बैठकर स्वेच्छानुसार समस्त प्राणियोंको बलि प्रदान करे॥५०॥ [उस समय इस प्रकार कहे—] ‘देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष, सर्प, दैत्य, प्रेत, पिशाच, वृक्ष तथा और भी चींटी आदि कीट-पतंग जो अपने कर्मबन्धनसे बँधे हुए क्षुधातुर होकर मेरे दिये हुए अन्नकी इच्छा करते हैं, उन सबके लिये मैं यह अन्न दान करता हूँ। वे इससे परितृप्त और आनन्दित हों॥५१-५२॥ जिनके माता, पिता अथवा कोई और बन्धु नहीं हैं तथा अन्न प्रस्तुत करनेका साधन और अन्न भी नहीं है उनकी तृप्तिके लिये पृथिवीपर मैंने यह अन्न रखा है; वे इससे तृप्त होकर आनन्दित हों॥५३॥ सम्पूर्ण प्राणी, यह अन्न और मैं—सभी विष्णु हैं; क्योंकि उनसे भिन्न और कुछ है ही नहीं। अतः मैं समस्त भूतोंका शरीररूप यह अन्न उनके पोषणके लिये दान करता हूँ॥५४॥ यह जो चौदह प्रकारका* भूतसमुदाय है उसमें जितने भी प्राणिगण अवस्थित हैं उन सबकी तृप्तिके लिये मैंने यह अन्न प्रस्तुत किया है; वे इससे प्रसन्न हों’॥५५॥ इस प्रकार उच्चारण करके गृहस्थ पुरुष श्रद्धापूर्वक समस्त जीवोंके उपकारके लिये पृथिवीमें अन्नदान करे, क्योंकि गृहस्थ ही सबका आश्रय है॥५६॥ हे नरेश्वर! तदनन्तर कुत्ता, चाण्डाल, पक्षिगण तथा और भी जो कोई पतित एवं पुत्रहीन पुरुष हों उनकी तृप्तिके लिये पृथिवीमें बलिभाग रखे॥५७॥

फिर गो-दोहनकालपर्यन्त अथवा इच्छानुसार इससे भी कुछ अधिक देर अतिथि ग्रहण करनेके लिये घरके आँगनमें रहे॥५८॥


* चौदह भूतसमुदायोंका वर्णन इस प्रकार किया गया है—
अष्टविधं दैवत्वं तैर्यग्योन्यश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यं चैकविधं समासतो भौतिकः सर्गः॥
अर्थात् आठ प्रकारका देवसम्बन्धी, पाँच प्रकारका तिर्यग्योनिसम्बन्धी और एक प्रकारका मनुष्ययोनिसम्बन्धी—यह संक्षेपसे भौतिक सर्ग कहलाता है। इनका पृथक्-पृथक् विवरण इस प्रकार है—
सिद्धगुह्यकगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः। विद्याधराः पिशाचाश्च निर्दिष्टा देवयोनयः॥

अ० ११] * तृतीय अंश * २०९

अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं पूजयेत्स्वागतादिना । तथासनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च ॥ ५९

श्रद्धया चान्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चानुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद् गृही ॥ ६०

अज्ञातकुलनामानमन्यदेशादुपागतम् । पूजयेदतिथिं सम्यङ् नैकग्रामनिवासिनम् ॥ ६१

अकिञ्चनम walkसम्बन्धमज्ञातकुलशीलिनम् । असम्पूज्यातिथिं भुक्त्वा भोक्तुकामं व्रजत्यधः ॥ ६२

स्वाध्यायगोत्राचरणमपृष्ट्वा च तथा कुलम् । हिरण्यगर्भबुद्ध्या तं मन्येताभ्यागतं गृही ॥ ६३

पित्रर्थं चापरं विप्रमेकमप्याशयेन्नृप । तद्देश्यं विदिताचारसम्भूतिं पाञ्चयज्ञिकम् ॥ ६४

अन्नाग्रञ्च समुद्धृत्य हन्तकारोपकल्पितम् । निर्वापभूतं भूपाल श्रोत्रियायोपपादयेत् ॥ ६५

दत्त्वा च भिक्षात्रितयं परिव्राड्ब्रह्मचारिणाम् । इच्छया च बुधो दद्याद्विभवे सत्यवारितम् ॥ ६६

इत्येतेऽतिथयः प्रोक्ताः प्रागुक्ता भिक्षवश्च ये । चतुरः पूजयित्वैतान्नृप पापात्प्रमुच्यते ॥ ६७

अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥ ६८

धाता प्रजापतिः शक्रो वह्निर्वसुगणोऽर्यमा । प्रविश्यातिथिमेते वै भुञ्जन्तेऽन्नं नरेश्वर ॥ ६९

तस्मादतिथिपूजायां यतेत सततं नरः । स केवलमघं भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यतिथिं विना ॥ ७०

ततः स्ववासिनीदुःखिगर्भिणीवृद्धबालकान् । भोजयेत्संस्कृतान्नेन प्रथमं चर मं गृही ॥ ७१

यदि अतिथि आ जाय तो उसका स्वागतादिसे तथा आसन देकर और चरण धोकर सत्कार करे ॥ ५९ ॥ फिर श्रद्धापूर्वक भोजन कराकर मधुर वाणीसे प्रश्नोत्तर करके तथा उसके जानेके समय पीछे-पीछे जाकर उसको प्रसन्न करे ॥ ६० ॥ जिसके कुल और नामका कोई पता न हो तथा अन्य देशसे आया हो उसी अतिथिका सत्कार करे, अपने ही गाँवमें रहनेवाले पुरुषकी अतिथिरूपसे पूजा करनी उचित नहीं है ॥ ६१ ॥ जिसके पास कोई सामग्री न हो, जिससे कोई सम्बन्ध न हो, जिसके कुल-शीलका कोई पता न हो और जो भोजन करना चाहता हो उस अतिथिका सत्कार किये बिना भोजन करनेसे मनुष्य अधोगतिको प्राप्त होता है ॥ ६२ ॥ गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि आये हुए अतिथिके अध्ययन, गोत्र, आचरण और कुल आदिके विषयमें कुछ भी न पूछकर हिरण्यगर्भ-बुद्धिसे उसकी पूजा करे ॥ ६३ ॥ हे नृप ! अतिथि-सत्कारके अनन्तर अपने ही देशके एक और पांचयज्ञिक ब्राह्मणको जिसके आचार और कुल आदिका ज्ञान हो पितृगणके लिये भोजन करावे ॥ ६४ ॥ हे भूपाल ! [मनुष्ययज्ञकी विधिसे 'मनुष्येभ्यो हन्त' इत्यादि मन्त्रोच्चारणपूर्वक] पहले ही निकालकर अलग रखे हुए हन्तकार नामक अन्नसे उस श्रोत्रिय ब्राह्मणको भोजन करावे ॥ ६५ ॥

इस प्रकार [देवता, अतिथि और ब्राह्मणको] ये तीन भिक्षाएँ देकर, यदि सामर्थ्य हो तो परिव्राजक और ब्रह्मचारियोंको भी बिना लौटाये हुए इच्छानुसार भिक्षा दे ॥ ६६ ॥ तीन पहले तथा भिक्षुगण—ये चारों अतिथि कहलाते हैं। हे राजन् ! इन चारोंका पूजन करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ६७ ॥ जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है उसे वह अपने पाप देकर उसके शुभकर्मोंको ले जाता है ॥ ६८ ॥ हे नरेश्वर ! धाता, प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, वसुगण और अर्यमा—ये समस्त देवगण अतिथिमें प्रविष्ट होकर अन्न भोजन करते हैं ॥ ६९ ॥ अतः मनुष्यको अतिथि-पूजाके लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। जो पुरुष अतिथिके बिना भोजन करता है वह तो केवल पाप ही भोग करता है ॥ ७० ॥ तदनन्तर गृहस्थ पुरुष पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता कन्या, दुखिया और गर्भिणी स्त्री तथा वृद्ध और बालकोंको संस्कृत अन्नसे भोजन कराकर अन्तमें स्वयं भोजन करे ॥ ७१ ॥


सरीसृपा वानराश्च पशवो मृगपक्षिणः। तिर्यञ्च इति कथ्यन्ते पञ्चैताः प्राणिजातयः ॥ सिद्ध, गुह्यक, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर और पिशाच—ये आठ देवयोनियाँ मानी गयी हैं तथा सरीसृप, वानर, पशु, मृग, (जंगली प्राणी) और पक्षी—ये पाँच तिर्यग् योनियाँ कही गयी हैं।

२०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११

अभुक्तवत्सु चैतेषु भुञ्जन्भुङ्क्ते स दुष्कृतम्।<br>मृतश्च गत्वा नरकं श्लेष्मभुग्जायते नरः॥ ७२इन सबको भोजन कराये बिना जो स्वयं भोजन कर लेता है वह पापमय भोजन करता है और अन्तमें मरकर नरकमें श्लेष्मभोजी कीट होता है॥ ७२॥
अस्नाताशी मलं भुङ्क्ते ह्यजपी पूयशोणितम्।<br>असंस्कृतान्रभुङ्ग्मूत्रं बालादिप्रथमं शकृत्॥ ७३जो व्यक्ति स्नान किये बिना भोजन करता है वह मल भक्षण करता है, जप किये बिना भोजन करनेवाला रक्त और पूय पान करता है, संस्कारहीन अन्न खानेवाला मूत्र पान करता है तथा जो बालक-वृद्ध आदिसे पहले आहार करता है वह विष्ठाहारी है।
अहोमी च कृमीन्भुङ्क्ते अदत्त्वा विषमश्नुते॥ ७४इसी प्रकार बिना होम किये भोजन करनेवाला मानो कीड़ोंको खाता है और बिना दान किये खानेवाला विष-भोजी है॥ ७३-७४॥
तस्माच्छृणुष्व राजेन्द्र यथा भुञ्जीत वै गृही।<br>भुञ्जतश्च यथा पुंसः पापबन्धो न जायते॥ ७५अतः हे राजेन्द्र! गृहस्थको जिस प्रकार भोजन करना चाहिये—जिस प्रकार भोजन करनेसे पुरुषको पाप-बन्धन नहीं होता तथा इहलोकमें अत्यन्त आरोग्य, बल, बुद्धिकी प्राप्ति और अरिष्टोंकी शान्ति होती है और जो शत्रुपक्षका ह्रास करनेवाली है—वह भोजनविधि सुनो॥ ७५-७६॥
इह चारोग्यविपुलं बलबुद्धिस्तथा नृप।<br>भवत्यरिष्टशान्तिश्च वैरिपक्षाभिचारिका॥ ७६
स्नातो यथावत्कृत्वा च देवर्षिपितृतर्पणम्।<br>प्रशस्तरत्नपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही॥ ७७गृहस्थको चाहिये कि स्नान करनेके अनन्तर यथाविधि देव, ऋषि और पितृगणका तर्पण करके हाथमें उत्तम रत्न धारण किये पवित्रतापूर्वक भोजन करे॥ ७७॥
कृते जपे हुते वह्नौ शुद्धवस्त्रधरो नृप।<br>दत्त्वातिथिभ्यो विप्रेभ्यो गुरुभ्यस्संश्रिताय च।<br>पुण्यगन्धश्शस्तमाल्यधारी चैव नरेश्वर॥ ७८हे नृप! जप तथा अग्निहोत्रके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण कर अतिथि, ब्राह्मण, गुरुजन और अपने आश्रित (बालक एवं वृद्धों)-को भोजन करा सुन्दर सुगन्धयुक्त उत्तम पुष्पमाला तथा एक ही वस्त्र धारण किये हाथ-पाँव और मुँह धोकर प्रीतिपूर्वक भोजन करे। हे राजन्! भोजनके समय इधर-उधर न देखे॥ ७८-७९॥
एकवस्त्रधरोऽथार्द्रपाणिपादो महीपते।<br>विशुद्धवदनः प्रीतो भुञ्जीत न विदिङ्मुखः॥ ७९
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न चैवान्यमना नरः।<br>अन्नं प्रशस्तं पथ्यं च प्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैः॥ ८०मनुष्यको चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके, अन्यमना न होकर उत्तम और पथ्य अन्नको प्रोक्षणके लिये रखे हुए मन्त्रपूत जलसे छिड़क कर भोजन करे॥ ८०॥
न कुत्सिताहृतं नैव जुगुप्सावदसंस्कृतम्।<br>दत्त्वा तु भक्तं शिष्येभ्यः क्षुधितेभ्यस्तथा गृही॥ ८१जो अन्न दुराचारी व्यक्तिका लाया हुआ हो, घृणाजनक हो अथवा बलिवैश्वदेव आदि संस्कारशून्य हो उसको ग्रहण न करे। हे द्विज! गृहस्थ पुरुष अपने खाद्यमेंसे कुछ अंश अपने शिष्य तथा अन्य भूखे-प्यासोंको देकर उत्तम और शुद्ध पात्रमें शान्तचित्तसे भोजन करे॥ ८१-८२॥
प्रशस्तशुद्धपात्रे तु भुञ्जीताकुपितो द्विजः॥ ८२
नासन्दिसंस्थिते पात्रे नादेशे च नरेश्वर।<br>नाकाले नातिसंकीर्णे दत्त्वाग्रं च नरोऽग्नये॥ ८३हे नरेश्वर! किसी बेंत आदिके आसन (कुर्सी आदि)-पर रखे हुए पात्रमें, अयोग्य स्थानमें, असमय (सन्ध्या आदि काल)-में अथवा अत्यन्त संकुचित स्थानमें कभी भोजन न करे। मनुष्यको चाहिये कि [परोसे हुए भोजनका] अग्र-भाग अग्निको देकर भोजन करे॥ ८३॥
मन्त्राभिमन्त्रितं शस्तं न च पर्युषितं नृप।<br>अन्यत्र फलमूलेभ्यश्शुष्कशाखादिकात्तथा॥ ८४हे नृप! जो अन्न मन्त्रपूत और प्रशस्त हो तथा जो बासी न हो उसीको भोजन करे। परंतु फल, मूल और सूखी शाखाओंको तथा बिना पकाये हुए लेह्य (चटनी) आदि और गुड़के पदार्थोंकि

अ० ११] * तृतीय अंश * २०३


तद्वद्धारीतकेभ्यश्च गुडभक्ष्येभ्य एव च।
भुञ्जीतोद्धृतसाराणि न कदापि नरेश्वर॥ ८५
नाशेषं पुरुषोऽश्नीयादन्यत्र जगतीपते।
मध्वम्बुदधिसर्पिर्भ्यस्सक्तुभ्यश्च विवेकवान्॥ ८६
अश्नीयात्तन्मयो भूत्वा पूर्वं तु मधुरं रसम्।
लवणाम्लौ तथा मध्ये कटुतिक्तादिकांस्ततः॥ ८७
प्राग्द्रवं पुरुषोऽश्नीयान्मध्ये कठिनभोजनः।
अन्ते पुनर्द्रवाशी तु बलारोग्ये न मुञ्चति॥ ८८
अनिन्द्यं भक्षयेदित्थं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्।
पञ्चग्रासं महामौनं प्राणाद्याप्यायनं हि तत्॥ ८९
भुक्त्वा सम्यगथाचाम्य प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा।
यथावत्पुनराचामेत्पाणी प्रक्षाल्य मूलतः॥ ९०
स्वस्थः प्रशान्तचित्तस्तु कृतासनपरिग्रहः।
अभीष्टदेवतानां तु कुर्वीत स्मरणं नरः॥ ९१
अग्निराप्याययेद्धातुं पार्थिवं पवनेरितः।
दत्तावकाशं नभसा जरयत्वस्तु मे सुखम्॥ ९२
अन्नं बलाय मे भूमेरपामग्न्यनिलस्य च।
भवत्येतत्परिणतं ममास्त्वव्याहतं सुखम्॥ ९३
प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा।
अन्नं पुष्टिकरं चास्तु ममाप्यव्याहतं सुखम्॥ ९४
अगस्तिरग्निर्बडवानलश्च
भुक्तं मयान्नं जरयत्वशेषम्।
सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं
यच्छन्त्वरोगो मम चास्तु देहे॥ ९५
विष्णुस्समस्तेन्द्रियदेहदेही
प्रधानभूतो भगवान्यथैकः।
सत्येन तेनात्तमशेषमन्न-
मारोग्यदं मे परिणाममेतु॥ ९६
विष्णुरत्ता तथैवान्नं परिणामश्च वै तथा।
सत्येन तेन मद्भुक्तं जीर्यत्वन्नमिदं तथा॥ ९७
इत्युच्चार्य स्वहस्तेन परिमृज्य तथोदरम्।
अनायासप्रदायीनि कुर्यात्कर्माण्यतन्द्रितः॥ ९८


लिये ऐसा नियम नहीं है। हे नरेश्वर! सारहीन पदार्थोंको कभी न खाय॥ ८४-८५॥ हे पृथिवीपते! विवेकी पुरुष मधु, जल, दही, घी और सत्तूके सिवा और किसी पदार्थको पूरा न खाय॥ ८६॥
भोजन एकाग्रचित्त होकर करे तथा प्रथम मधुररस, फिर लवण और अम्ल (खट्टा)-रस तथा अन्तमें कटु और तीखे पदार्थोंको खाय॥ ८७॥ जो पुरुष पहले द्रव पदार्थोंको, बीचमें कठिन वस्तुओंको तथा अन्तमें फिर द्रव पदार्थोंको ही खाता है वह कभी बल तथा आरोग्यसे हीन नहीं होता॥ ८८॥ इस प्रकार वाणीका संयम करके अनिषिद्ध अन्न भोजन करे। अन्नकी निन्दा न करे। प्रथम पाँच ग्रास अत्यन्त मौन होकर ग्रहण करे, उनसे पंचप्राणोंकी तृप्ति होती है॥ ८९॥ भोजनके अनन्तर भली प्रकार आचमन करे और फिर पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके हाथोंको उनके मूलदेशतक धोकर विधिपूर्वक आचमन करे॥ ९०॥
तदनन्तर स्वस्थ और शान्त-चित्तसे आसनपर बैठकर अपने इष्टदेवोंका चिन्तन करे॥ ९१॥ [और इस प्रकार कहे-] "[प्राणरूप] पवनसे प्रज्वलित हुआ जठराग्नि आकाशके द्वारा अवकाशयुक्त अन्नका परिपाक करे और [फिर अन्नरससे] मेरे शरीरके पार्थिव धातुओंको पुष्ट करे जिससे मुझे सुख प्राप्त हो॥ ९२॥ यह अन्न मेरे शरीरस्थ पृथिवी, जल, अग्नि और वायुका बल बढ़ानेवाला हो और इन चारों तत्त्वोंके रूपमें परिणत हुआ यह अन्न ही मुझे निरन्तर सुख देनेवाला हो॥ ९३॥ यह अन्न मेरे प्राण, अपान, समान, उदान और व्यानकी पुष्टि करे तथा मुझे भी निर्बाध सुखकी प्राप्ति हो॥ ९४॥ मेरे खाये हुए सम्पूर्ण अन्नका अगस्ति नामक अग्नि और बडवानल परिपाक करें, मुझे उसके परिणामसे होनेवाला सुख प्रदान करें और उससे मेरे शरीरको आरोग्यता प्राप्त हो॥ ९५॥ 'देह और इन्द्रियादिके अधिष्ठाता एकमात्र भगवान् विष्णु ही प्रधान हैं'— इस सत्यके बलसे मेरा खाया हुआ समस्त अन्न परिपक्व होकर मुझे आरोग्यता प्रदान करे॥ ९६॥ 'भोजन करनेवाला, भोज्य अन्न और उसका परिपाक—ये सब विष्णु ही है'—इस सत्य भावनाके बलसे मेरा खाया हुआ यह अन्न पच जाय"॥ ९७॥ ऐसा कहकर अपने उदरपर हाथ फेरे और सावधान होकर अधिक श्रम उत्पन्न न करनेवाले कार्योंमें लग जाय॥ ९८॥


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२०४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ११

सच्छास्त्रादिविनोदेन सन्मार्गादविरोधिना।
दिनं नयेत्ततस्सन्ध्यामुपतिष्ठेत्समाहितः॥ ९९

दिनान्तसन्ध्यां सूर्येण पूर्वामृक्षैर्युतां बुधः।
उपतिष्ठेद्यथान्यायं सम्यगाचम्य पार्थिव॥ १००

सर्वकालमुपस्थानं सन्ध्ययोः पार्थिवेष्यते।
अन्यत्र सूतकाशौचविभ्रमातुरभीतितः॥ १०१

सूर्येणाभ्युदितो यश्च त्यक्तः सूर्येण वा स्वपन्।
अन्यत्रातुरभावात्तु प्रायश्चित्ती भवेन्नरः॥ १०२

तस्मादनुदिते सूर्ये समुत्थाय महीपते।
उपतिष्ठेन्नरस्सन्ध्यामस्वपंश्च दिनान्तजाम्॥ १०३

उपतिष्ठन्ति वै सन्ध्यां ये न पूर्वां न पश्चिमाम्।
व्रजन्ति ते दुरात्मानस्तामिस्रं नरकं नृप॥ १०४

पुनः पाकमुपादाय सायम्प्यवनीपते।
वैश्वदेवनिमित्तं वै पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्॥ १०५

तत्रापि श्वपचादिभ्यस्तथैवान्नविसर्जनम्॥ १०६

अतिथिं चागतं तत्र स्वशक्त्या पूजयेद् बुधः।
पादशौचासनप्रह्वस्वागतोक्त्या च पूजनम्।
ततश्चान्नप्रदानेन शयनेन च पार्थिव॥ १०७

दिवातिथौ तु विमुखे गते यत्पातकं नृप।
तदेवाष्टगुणं पुंसस्सूर्योढे विमुखे गते॥ १०८

तस्मात्स्वशक्त्या राजेन्द्र सूर्योढमतिथिं नरः।
पूजयेत्पूजिते तस्मिन्पूजितास्सर्वदेवताः॥ १०९

अन्नशाकाम्बुदानेन स्वशक्त्या पूजयेत्पुमान्।
शयनप्रस्तरमहीप्रदानैरथवापि तम्॥ ११०

कृतपादादिशौचस्तु भुक्त्वा सायं ततो गृही।
गच्छेच्छय्यामस्फुटितामपि दारुमयीं नृप॥ १११

नाविशालां न वै भग्नां नासमां मलिनां न च।
न च जन्तुमयीं शय्यामधितिष्ठेदनास्तृताम्॥ ११२


हिन्दी अनुवाद

सच्छास्त्रोंका अवलोकन आदि सन्मार्गके अविरोधी विनोदोंसे शेष दिनको व्यतीत करे और फिर सायंकालके समय सावधानतापूर्वक सन्ध्योपासन करे॥ ९९॥

हे राजन्! बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि सायंकालके समय सूर्यके रहते हुए और प्रातःकाल तारागणके चमकते हुए ही भली प्रकार आचमनादि करके विधिपूर्वक सन्ध्योपासन करे॥ १००॥ हे पार्थिव! सूतक (पुत्र-जन्मादिसे होनेवाली अशुचिता), अशौच (मृत्युसे होनेवाली अशुचिता), उन्माद, रोग और भय आदि कोई बाधा न हो तो प्रतिदिन ही सन्ध्योपासन करना चाहिये॥ १०१॥ जो पुरुष रुग्णावस्थाको छोड़कर और कभी सूर्यके उदय अथवा अस्तके समय सोता है वह प्रायश्चित्तका भागी होता है॥ १०२॥ अतः हे महीपते! गृहस्थ पुरुष सूर्योदयसे पूर्व ही उठकर प्रातःसन्ध्या करे और सायंकालमें भी तत्कालीन सन्ध्यावन्दन करे; सोवे नहीं॥ १०३॥ हे नृप! जो पुरुष प्रातः अथवा सायंकालीन सन्ध्योपासन नहीं करते वे दुरात्मा अन्धतामिस्र नरकमें पड़ते हैं॥ १०४॥

तदनन्तर हे पृथिवीपते! सायंकालके समय सिद्ध किये हुए अन्नसे गृहपत्नी मन्त्रहीन बलिवैश्वदेव करे; उस समय भी उसी प्रकार श्वपच आदिके लिये अन्नदान किया जाता है॥ १०५-१०६॥ बुद्धिमान् पुरुष उस समय आये हुए अतिथिका भी सामर्थ्यानुसार सत्कार करे। हे राजन्! प्रथम पाँव धुलाने, आसन देने और स्वागतसूचक विनम्र वचन कहनेसे तथा फिर भोजन कराने और शयन करानेसे अतिथिका सत्कार किया जाता है॥ १०७॥ हे नृप! दिनके समय अतिथिके लौट जानेसे जितना पाप लगता है उससे आठगुना पाप सूर्यास्तके समय लौटनेसे होता है॥ १०८॥ अतः हे राजेन्द्र! सूर्यास्तके समय आये हुए अतिथिका गृहस्थ पुरुष अपनी सामर्थ्यानुसार अवश्य सत्कार करे क्योंकि उसका पूजन करनेसे ही समस्त देवताओंका पूजन हो जाता है॥ १०९॥ मनुष्यको चाहिये कि अपनी शक्तिके अनुसार उसे भोजनके लिये अन्न, शाक या जल देकर तथा सोनेके लिये शय्या या घास-फूसका बिछौना अथवा पृथिवी ही देकर उसका सत्कार करे॥ ११०॥

हे नृप! तदनन्तर गृहस्थ पुरुष सायंकालका भोजन करके तथा हाथ-पाँव धोकर छिद्रादिहीन काष्ठमय शय्यापर लेट जाय॥ १११॥ जो काफी बड़ी न हो, टूटी हुई हो, ऊँची-नीची हो, मलिन हो अथवा जिसमें जीव हों या जिसपर कुछ बिछा हुआ न हो उस शय्यापर न सोवे॥ ११२॥

अ० ११ ] * तृतीय अंश * २०५


प्राच्यां दिशि शिरश्शस्तं याम्यायामथ वा नृप।<br>सदैव स्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्॥ ११३हे नृप! सोनेके समय सदा पूर्व अथवा दक्षिणकी ओर सिर रखना चाहिये। इनके विपरीत दिशाओंकी ओर सिर रखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है॥ ११३॥
ऋतावुपेगमश्शस्तस्स्वपत्यामवनीपते।<br>पुन्नामर्क्षे शुभे काले ज्येष्ठाद्युग्मासु रात्रिषु॥ ११४हे पृथिवीपते! ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे संग करना उचित है। पुल्लिङ्ग नक्षत्रमें युग्म और उनमें भी पीछेकी रात्रियोंमें शुभ समयमें स्त्रीप्रसंग करे॥ ११४॥
नादूनां तु स्त्रियं गच्छेन्नातुरां न रजस्वलाम्।<br>नानिष्टां न प्रकुपितां न त्रस्तां न च गर्भिणीम्॥ ११५किन्तु यदि स्त्री अप्रसन्ना, रोगिणी, रजस्वला, निरभिलाषिणी, क्रोधिता, दुःखिनी अथवा गर्भिणी हो तो उसका संग न करे॥ ११५॥
नादक्षिणां नान्यकामां नाकामां नान्ययोषितम्।<br>क्षुत्क्षामां नातिभुक्तां वा स्वयं चैभिर्गुणैर्युतः॥ ११६जो सीधे स्वभावकी न हो, पराभिलाषिणी अथवा निरभिलाषिणी हो, क्षुधार्ता हो, अधिक भोजन किये हुए हो अथवा परस्त्री हो उसके पास न जाय; और यदि अपनेमें ये दोष हों तो भी स्त्रीगमन न करे॥ ११६॥
स्नातस्स्रग्गन्धधृक्प्रीतो नाध्मातः क्षुधितोऽपि वा।<br>सकामस्सानुरागश्च व्यवायं पुरुषो व्रजेत्॥ ११७पुरुषको उचित है कि स्नान करनेके अनन्तर माला और गन्ध धारण कर काम और अनुरागयुक्त होकर स्त्रीगमन करे। जिस समय अति भोजन किया हो अथवा क्षुधित हो उस समय उसमें प्रवृत्त न हो॥ ११७॥
चतुर्दश्यष्टमी चैव तथामा चाथ पूर्णिमा।<br>पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसंक्रान्तिरेव च॥ ११८हे राजेन्द्र! चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, पूर्णिमा और सूर्यकी संक्रान्ति—ये सब पर्वदिन हैं॥ ११८॥
तैलस्त्रीमांससम्भोगी सर्वेष्वेतेषु वै पुमान्।<br>विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः॥ ११९इन पर्वदिनोंमें तैल, स्त्री अथवा मांसका भोग करनेवाला पुरुष मरनेपर विष्ठा और मूत्रसे भरे नरकमें पड़ता है॥ ११९॥
अशेषपर्वस्वेतेषु तस्मात्संयमिभिर्बुधैः।<br>भाव्यं सच्छास्त्रदेवेज्याध्यायनजप्यपरैर्नरैः॥ १२०संयमी और बुद्धिमान् पुरुषोंको इन समस्त पर्वदिनोंमें सच्छास्त्रावलोकन, देवोपासना, यज्ञानुष्ठान, ध्यान और जप आदिमें लगे रहना चाहिये॥ १२०॥
नान्योनावयोनौ वा नोपयुक्तौषधस्तथा।<br>द्विजदेवगुरूणां च व्यवायी नाश्रमे भवेत्॥ १२१गौ-छाग आदि अन्य योनियोंसे, अयोनियोंसे, औषध-प्रयोगसे अथवा ब्राह्मण, देवता और गुरुके आश्रमोंमें कभी मैथुन न करे॥ १२१॥
चैत्यचत्वरतीर्थेषु नैव गोष्ठे चतुष्पथे।<br>नैव श्मशानोपवने सलिलेषु महीपते॥ १२२हे पृथिवीपते! चैत्यवृक्षके नीचे, आँगनमें, तीर्थमें, पशुशालामें, चौराहेपर, श्मशानमें, उपवनमें अथवा जलमें भी मैथुन करना उचित नहीं है॥ १२२॥
प्रोक्तपर्वस्वशेषेषु नैव भूपाल सन्ध्ययोः।<br>गच्छेद्व्यवायं मतिमान्न मूत्रोच्चारपीडितः॥ १२३हे राजन्! पूर्वोक्त समस्त पर्वदिनोंमें प्रातःकाल और सायंकालमें तथा मल-मूत्रके वेगके समय बुद्धिमान् पुरुष मैथुनमें प्रवृत्त न हो॥ १२३॥
पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप।<br>भुवि रोगावहो नृणामप्रशस्तो जलाशये॥ १२४हे नृप! पर्वदिनोंमें स्त्रीगमन करनेसे धनकी हानि होती है; दिनमें करनेसे पाप होता है, पृथिवीपर करनेसे रोग होते हैं और जलाशयमें स्त्रीप्रसंग करनेसे अमंगल होता है॥ १२४॥
परदारान्न गच्छेच्च मनसापि कथञ्चन।<br>किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवायिनाम्॥ १२५परस्त्रीसे तो वाणीसे क्या, मनसे भी प्रसंग न करे, क्योंकि उनसे मैथुन करनेवालोंको अस्थि-बन्धन भी नहीं होता [अर्थात् उन्हें अस्थिशून्य कीटादि होना पड़ता है]॥ १२५॥

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२०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२


मृतो नरकमभ्येति हीयतेऽत्रापि चायुषः ।
परदाररतिः पुंसामिह चामुत्र भीतिदा ॥ १२६

इति मत्वा स्वदारेषु ऋतुपत्सु बुधो व्रजेत् ।
यथोक्तदोषहीनेषु सकामेष्वनृतावपि ॥ १२७

परस्त्रीकी आसक्ति पुरुषको इहलोक और परलोक दोनों जगह भय देनेवाली है; इहलोकमें उसकी आयु क्षीण हो जाती है और मरनेपर वह नरकमें जाता है ॥ १२६ ॥ ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष उपरोक्त दोषोंसे रहित अपनी स्त्रीसे ही ऋतुकालमें प्रसंग करे तथा उसकी विशेष अभिलाषा हो तो बिना ऋतुकालके भी गमन करे ॥ १२७ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥


बारहवाँ अध्याय

गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन

और्व उवाच
देवगोब्राह्मणांन्सिद्धांन्वृद्धाचार्यांस्तथार्चयेत् ।
द्विकालं च नमेत्सन्ध्यामग्नीनुपचरेत्तथा ॥ १

सदाऽनुपहते वस्त्रे प्रशस्तांश्च महौषधीः ।
गारुडानि च रत्नानि बिभृयात्प्रयतो नरः ॥ २

प्रस्निग्धामलकेशश्च सुगन्धश्चारुवेषधृक् ।
सितास्सुमनसो हृद्या बिभृयाच्च नरस्सदा ॥ ३

किञ्चित्परस्वं न हरेन्नाल्पमप्यप्रियं वदेत् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयान्नान्यदोषानुदीरयेत् ॥ ४

नान्यस्त्रियं तथा वैरं रोचयेत्पुरुषर्षभ ।
न दुष्टं यानमारोहेत्कूलच्छायां न संश्रयेत् ॥ ५

विद्विष्टपतितोन्मत्तबहुवैरादिकण्टकैः ।
बन्धकी बन्धकीभर्तुः क्षुद्रानृतकथैस्सह ॥ ६

तथातिव्ययशीलैश्च परिवादरतैश्शठैः ।
बुधो मैत्रीं न कुर्वीत नैकः पन्थानमाश्रयेत् ॥ ७

नावगाहेज्जलोघस्य वेगमग्रे नरेश्वर ।
प्रदीप्तं वेश्म न विशेन्नारोहेच्छिखरं तरोः ॥ ८

न कुर्याद्दन्तसङ्घर्षं कुष्णीयाच्च न नासिकाम् ।
नासंवृतमुखो जृम्भेच्छ्वासकासौ विसर्जयेत् ॥ ९

नोच्चैर्हसेत्सशब्दं च न मुञ्चेत्पवनं बुधः ।
नखान् खादयेच्छिन्द्यान्न तृणं न महीं लिखेत् ॥ १०

और्व बोले— गृहस्थ पुरुषको नित्यप्रति देवता, गौ, ब्राह्मण, सिद्धगण, वयोवृद्ध तथा आचार्यकी पूजा करनी चाहिये और दोनों समय सन्ध्यावन्दन तथा अग्निहोत्रादि कर्म करने चाहिये ॥ १ ॥ गृहस्थ पुरुष सदा ही संयमपूर्वक रहकर बिना कहींसे कटे हुए दो वस्त्र, उत्तम ओषधियाँ और गारुड (मरकत आदि विष नष्ट करनेवाले) रत्न धारण करे ॥ २ ॥ वह केशोंको स्वच्छ और चिकना रखे तथा सर्वदा सुगन्धयुक्त सुन्दर वेष और मनोहर श्वेतपुष्प धारण करे ॥ ३ ॥ किसीका थोड़ा-सा भी धन हरण न करे और थोड़ा-सा भी अप्रिय भाषण न करे। जो मिथ्या हो ऐसा प्रिय वचन भी कभी न बोले और न कभी दूसरोंके दोषोंको ही कहे ॥ ४ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! दूसरोंकी स्त्री अथवा दूसरोंके साथ वैर करनेमें कभी रुचि न करे, निन्दित सवारीमें कभी न चढ़े और नदीतीरकी छायाका कभी आश्रय न ले ॥ ५ ॥ बुद्धिमान् पुरुष लोकविद्विष्ट, पतित, उन्मत्त और जिसके बहुत-से शत्रु हों ऐसे परपीडक पुरुषोंके साथ तथा कुलटा, कुलटाके स्वामी, क्षुद्र, मिथ्यावादी अति व्ययशील, निन्दापरायण और दुष्ट पुरुषोंके साथ कभी मित्रता न करे और न कभी मार्गमें अकेला चले ॥ ६-७ ॥ हे नरेश्वर ! जलप्रवाहके वेगमें सामने पड़कर स्नान न करे, जलते हुए घरमें प्रवेश न करे और वृक्षकी चोटीपर न चढ़े ॥ ८ ॥ दाँतोंको परस्पर न घिसे, नाकको न कुरेदे तथा मुखको बन्द किये हुए जमुहाई न ले और न बन्द मुखसे खाँसे या श्वास छोड़े ॥ ९ ॥ बुद्धिमान् पुरुष जोरसे न हँसे और शब्द करते हुए अधोवायु न छोड़े; तथा नखोंको न चबावे, तिनका न तोड़े और पृथिवीपर भी न लिखे ॥ १० ॥

अ० १२ ] * तृतीय अंश * २०७


न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्टं न मृद्नीयाद्विचक्षणः।<br/>ज्योतींष्यमेध्यशस्तानि नाभिवीक्षेत च प्रभो॥ ११<br/>नग्नां परस्त्रियं चैव सूर्यं चास्तमयोदये।<br/>न हुंकुर्याच्छवं गन्धं शवगन्धो हि सोमजः॥ १२<br/>चतुष्पथं चैत्यतरुं श्मशानोपवनानि च।<br/>दुष्टस्त्रीसन्निकर्षं च वर्जयेन्निशि सर्वदा॥ १३<br/>पूज्यदेवद्विजज्योतिश्छायां नातिक्रमेद् बुधः।<br/>नैकश्शून्याटवीं गच्छेत्तथा शून्यगृहे वसेत्॥ १४<br/>केशास्थिकण्टकामेध्यबलिभस्मतुषांस्तथा।<br/>स्नानार्द्रधरणीं चैव दूरतः परिवर्जयेत्॥ १५<br/>नानार्यानाश्रयेत्कांश्चिन्न जिह्मां रोचयेद् बुधः।<br/>उपसर्पेन्न वै व्यालं चिरं तिष्ठेन्न वोत्थितः॥ १६<br/>अतीव जागरस्वप्ने तद्वत्स्नानासने बुधः।<br/>न सेवेत तथा शय्यां व्यायामं च नरेश्वर॥ १७<br/>दंष्ट्रिणः शृंगिणश्चैव प्राज्ञो दूरेण वर्जयेत्।<br/>अवश्यायं च राजेन्द्र पुरोवातातपौ तथा॥ १८<br/>न स्नायान्न स्वपेन्नग्नो न चैवोपस्पृशेद् बुधः।<br/>मुक्तकेशश्च नाचामेद्देवाद्यर्चां च वर्जयेत्॥ १९<br/>होमदेवार्चनाद्यासु क्रियास्वाचमने तथा।<br/>नैकवस्त्रः प्रवर्तेत द्विजवाचनिके जपे॥ २०<br/>नासमञ्जसशीलैस्तु सहासीत कथञ्चन।<br/>सदृवृत्तसन्निकर्षो हि क्षणादर्द्धमपि शस्यते॥ २१<br/>विरोधं नोत्तमैर्गच्छेन्नाधमैश्च सदा बुधः।<br/>विवाहश्च विवादश्च तुल्यशीलैर्नृपेष्यते॥ २२<br/>नारभेत कलिं प्राज्ञश्शुष्कवैरं च वर्जयेत्।<br/>अप्यल्पहानिस्सोढव्या वैरेणार्थागमं त्यजेत्॥ २३<br/>स्नातो नांगानि सम्मार्जैत्स्नानशाट्या न पाणिना।<br/>न च निर्धूनयेत्केशान्नाचामेच्चैव चोत्थितः॥ २४<br/>पादेन नाक्रमेत्पादं न पूज्याभिमुखं नयेत्।<br/>नोच्चासनं गुरोरग्रे भजेताविनयान्वितः॥ २५<br/>अपसव्यं न गच्छेच्च देवागारचतुष्पथान्।<br/>मांगल्यपूज्यांश्च तथा विपरीतान्न दक्षिणम्॥ २६हे प्रभो! विचक्षण पुरुष मूँछ-दाढ़ीके बालोंको न चबावे, दो ढेलोंको परस्पर न रगड़े और अपवित्र एवं निन्दित नक्षत्रोंको न देखे॥ ११॥ नग्न परस्त्रीको और उदय अथवा अस्त होते हुए सूर्यको न देखे तथा शव और शव-गन्धसे घृणा न करे, क्योंकि शव-गन्ध सोमका अंश है॥ १२॥ चौराहा, चैत्यवृक्ष, श्मशान, उपवन और दुष्टा स्त्रीकी समीपता—इन सबका रात्रिके समय सर्वदा त्याग करे॥ १३॥ बुद्धिमान् पुरुष अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और तेजोमय पदार्थोंकी छायाको कभी न लाँघे तथा शून्य वनखण्डी और शून्य घरमें कभी अकेला न रहे॥ १४॥ केश, अस्थि, कण्टक, अपवित्र वस्तु, बलि, भस्म, तुष तथा स्नानके कारण भीगी हुई पृथिवीका दूरहीसे त्याग करे॥ १५॥ प्राज्ञ पुरुषको चाहिये कि अनार्य व्यक्तिका संग न करे, कुटिल पुरुषमें आसक्त न हो, सर्पके पास न जाय और जग पड़नेपर अधिक देरतक लेटा न रहे॥ १६॥ हे नरेश्वर! बुद्धिमान् पुरुष जागने, सोने, स्नान करने, बैठने, शय्यासेवन करने और व्यायाम करनेमें अधिक समय न लगावे॥ १७॥ हे राजेन्द्र! प्राज्ञ पुरुष दाँत और सींगवाले पशुओंको, ओसको तथा सामनेकी वायु और धूपका सर्वदा परित्याग करे॥ १८॥ नग्न होकर स्नान, शयन और आचमन न करे तथा केश खोलकर आचमन और देव-पूजन न करे॥ १९॥ होम तथा देवार्चन आदि क्रियाओंमें, आचमनमें, पुण्याहवाचनमें और जपमें एक वस्त्र धारण करके प्रवृत्त न हो॥ २०॥ संशयशील व्यक्तियोंके साथ कभी न रहे। सदाचारी पुरुषोंका तो आधे क्षणका संग भी अति प्रशंसनीय होता है॥ २१॥ बुद्धिमान् पुरुष उत्तम अथवा अधम व्यक्तियोंसे विरोध न करे। हे राजन्! विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियोंसे ही होना चाहिये॥ २२॥ प्राज्ञ पुरुष कलह न बढ़ावे तथा व्यर्थ वैरका भी त्याग करे। थोड़ी-सी हानि सह ले, किन्तु वैरसे कुछ लाभ होता हो तो उसे भी छोड़ दे॥ २३॥ स्नान करनेके अनन्तर स्नानसे भीगी हुई धोती अथवा हाथोंसे शरीरको न पोंछे तथा खड़े-खड़े केशोंको न झाड़े और आचमन भी न करे॥ २४॥ पैरके ऊपर पैर न रखे, गुरुजनोंके सामने पैर न फैलावे और धृष्टतापूर्वक उनके सामने कभी उच्चासनपर न बैठे॥ २५॥<br/>देवालय, चौराहा, मांगलिक द्रव्य और पूज्य व्यक्ति—इन सबको बायीं ओर रखकर न निकले तथा इनके विपरीत वस्तुओंको दायीं ओर रखकर न जाय॥ २६॥

२०८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १२


सोमार्कोग्न्यम्बुवायूनां पूज्यानां च न सम्मुखम्।
कुर्यान्निष्ठीवविण्मूत्रसमुत्सर्गं च पण्डितः ॥ २७
तिष्ठन्न मूत्रयेत्तद्वत्पथिष्वपि न मूत्रयेत्।
श्लेष्मविण्मूत्ररक्तानि सर्वदैव न लङ्घयेत् ॥ २८
श्लेष्मशिङ्घाणिकोत्सर्गो नान्नकाले प्रशस्यते।
बलिमङ्गलजप्यादौ न होमे न महाजने ॥ २९
योषितो नावमन्येत न चासां विश्वसेद् बुधः ।
न चैवेर्ष्या भवेत्तासु न धिक्कुर्यात्कदाचन ॥ ३०
मङ्गल्यपुष्परत्नाज्यपूज्याननभिवाद्य च।
न निष्क्रमेद् गृहात्प्राज्ञस्सदाचारपरो नरः॥ ३१
चतुष्पथान्नमस्कार्यात्काले होमपरो भवेत्।
दीनानभ्युद्धरेत्साधूनुपासीत बहुश्रुतान् ॥ ३२
देवर्षिपूजकस्सम्यक्पितृपिण्डोदकप्रदः ।
सत्कर्ता चातिथीनां यः स लोकानुत्तमान्व्रजेत्॥ ३३
हितं मितं प्रियं काले वश्यात्मा योऽभिभाषते।
स याति लोकानाह्लादहेतुभूतान्नपाक्षयान् ॥ ३४
धीमान्हीमाञ्क्षमायुक्तो ह्यास्तिको विनयान्वितः ।
विद्याभिजनवृद्धानां याति लोकाननुत्तमान् ॥ ३५
अकालगर्जितादौ च पर्वस्वाशौचकादिषु ।
अनध्यायं बुधः कुर्यादुपरागादिके तथा॥ ३६
शमं नयति यः क्रुद्धान्सर्वबन्धुरमत्सरी।
भीताश्वासनकृत्साधुस्स्वर्गस्तस्याल्पकं फलम् ॥ ३७
वर्षातपादिषु छत्री दण्डी रात्र्यटवीषु च।
शरीरत्राणकामो वै सोपानत्कस्सदा व्रजेत् ॥ ३८
नोर्ध्वं न तिर्यग्दूरं वा न पश्यन्नर्यटेद् बुधः ।
युगमात्रं महीपृष्ठं नरो गच्छेद्विलोकयन् ॥ ३९
दोषहेतूनशेषांश्च वश्यात्मा यो निरस्यति ।
तस्य धर्मार्थकामानां हानिर्नाल्पापि जायते ॥ ४०
सदाचाररतः प्राज्ञो विद्याविनयशिक्षितः ।
पापेऽप्यपापः परुषे ह्यभिधत्ते प्रियाणि यः ।
मैत्रीद्रवान्तःकरणस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ॥ ४१


चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, वायु और पूज्य व्यक्तियोंके सम्मुख पण्डित पुरुष मल-मूत्र-त्याग न करे और न थूके ही ॥ २७॥ खड़े-खड़े अथवा मार्गमें मूत्र-त्याग न करे तथा श्लेष्मा (थूक), विष्ठा, मूत्र और रक्तको कभी न लाँघे ॥ २८॥ भोजन, देव-पूजा, मांगलिक कार्य और जप-होमादिके समय तथा महापुरुषोंके सामने थूकना और छींकना उचित नहीं है ॥ २९॥ बुद्धिमान् पुरुष स्त्रियोंका अपमान न करे, उनका विश्वास भी न करे तथा उनसे ईर्ष्या और उनका तिरस्कार भी कभी न करे ॥ ३०॥ सदाचार-परायण प्राज्ञ पुरुष मांगलिक द्रव्य, पुष्प, रत्न, घृत और पूज्य व्यक्तियोंका अभिवादन किये बिना कभी अपने घरसे न निकले ॥ ३१॥ चौराहोंको नमस्कार करे, यथासमय अग्निहोत्र करे, दीन-दुःखियोंका उद्धार करे और बहुश्रुत साधु पुरुषोंका सत्संग करे ॥ ३२॥

जो पुरुष देवता और ऋषियोंकी पूजा करता है, पितृगणको पिण्डोदक देता है और अतिथिका सत्कार करता है वह पुण्यलोकोंको जाता है ॥ ३३॥ जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर समयानुसार हित, मित और प्रिय भाषण करता है, हे राजन्! वह आनन्दके हेतुभूत अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ ३४॥ बुद्धिमान्, लज्जावान्, क्षमाशील, आस्तिक और विनयी पुरुष विद्वान् और कुलीन पुरुषोंके योग्य उत्तम लोकोंमें जाता है ॥ ३५॥ अकाल मेघगर्जनके समय, पर्व-दिनोंपर, अशौच कालमें तथा चन्द्र और सूर्यग्रहणके समय बुद्धिमान् पुरुष अध्ययन न करे ॥ ३६॥ जो व्यक्ति क्रोधितको शान्त करता है, सबका बन्धु है, मत्सरशून्य है, भयभीतको सान्त्वना देनेवाला है और साधु-स्वभाव है उसके लिये स्वर्ग तो बहुत थोड़ा फल है ॥ ३७॥ जिसे शरीर-रक्षाकी इच्छा हो वह पुरुष वर्षा और धूपमें छाता लेकर निकले, रात्रिके समय और वनमें दण्ड लेकर जाय तथा जहाँ कहीं जाना हो सर्वदा जूते पहनकर जाय ॥ ३८॥ बुद्धिमान् पुरुषको ऊपरकी ओर, इधर-उधर अथवा दूरके पदार्थोंको देखते हुए नहीं चलना चाहिये, केवल युगमात्र (चार हाथ) पृथिवीको देखता हुआ चले ॥ ३९॥

जो जितेन्द्रिय दोषके समस्त हेतुओंको त्याग देता है उसके धर्म, अर्थ और कामकी थोड़ी-सी भी हानि नहीं होती ॥ ४०॥ जो विद्या-विनय-सम्पन्न, सदाचारी प्राज्ञ पुरुष पापीके प्रति पापमय व्यवहार नहीं करता, कुटिल पुरुषोंसे प्रिय भाषण करता है तथा जिसका अन्तःकरण मैत्रीसे द्रवीभूत रहता है, मुक्ति उसकी मुट्ठीमें रहती है ॥ ४१॥


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अ० १३ ] * तृतीय अंश * २०९

ये कामक्रोधलोभानां वीतरागा न गोचरे।
सदाचारस्थितास्तेषामनुभावैर्धृता मही॥ ४२

तस्मात्सत्यं वदेत्प्राज्ञो यत्परप्रीतिकारणम्।
सत्यं यत्परदुःखाय तदा मौनपरो भवेत्॥ ४३

प्रियम्युक्तं हितं नैतदिति मत्वा न तद्वदेत्।
श्रेयस्तत्र हितं वाच्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्॥ ४४

प्राणिनामुपकाराय यथैवेह परत्र च।
कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान्भजेत्॥ ४५

जो वीतरागमहापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचारमें स्थित रहते हैं उनके प्रभावसे ही पृथिवी टिकी हुई है॥ ४२॥ अतः प्राज्ञ पुरुषको वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरोंकी प्रसन्नताका कारण हो। यदि किसी सत्य वाक्यके कहनेसे दूसरोंको दुःख होता जाने तो मौन रहे॥ ४३॥ यदि प्रिय वाक्यको भी अहितकर समझे तो उसे न कहे; उस अवस्थामें तो हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यन्त अप्रिय क्यों न हो॥ ४४॥ जो कार्य इहलोक और परलोकमें प्राणियोंके हितका साधक हो मतिमान् पुरुष मन, वचन और कर्मसे उसीका आचरण करे॥ ४५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार

और्व उवाच
सचैलस्य पितुः स्नानं जाते पुत्रे विधीयते।
जातकर्म तदा कुर्याच्छ्राद्धमभ्युदये च यत्॥ १

युग्मान्देवांश्च पित्रांश्च सम्यक्सव्यक्रमाद् द्विजान्।
पूजयेद्भोजयेच्चैव तन्मना नान्यमानसः॥ २

दध्यक्षतैस्सबदरैः प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा।
देवतीर्थेन वै पिण्डान्दद्यात्कायेन वा नृप॥ ३

नान्दीमुखः पितृगणस्तेन श्राद्धेन पार्थिव।
प्रीयते तत्तु कर्त्तव्यं पुरुषैस्सर्ववृद्धिषु॥ ४

कन्यापुत्रविवाहेषु प्रवेशेषु च वेश्मनः।
नामकर्माणि बालानां चूडाकर्मादिके तथा॥ ५

सीमन्तोन्नयने चैव पुत्रादिमुखदर्शने।
नान्दीमुखं पितृगणं पूजयेत्प्रयतो गृही॥ ६

पितृपूजाक्रमः प्रोक्तो वृद्धावेष सनातनः।
श्रूयतामवनीपाल प्रेतकर्मक्रियाविधिः॥ ७

प्रेतदेहं शुभैः स्नानैस्स्नापितं स्रग्विभूषितम्।
दग्ध्वा ग्रामाद्वहिः स्नात्वा सचैलस्सलिलाशये॥ ८

और्व बोले— पुत्रके उत्पन्न होनेपर पिताको सचैल (वस्त्रोंसहित) स्नान करना चाहिये। उसके पश्चात् जातकर्म-संस्कार और आभ्युदयिक श्राद्ध करने चाहिये॥ १॥ फिर तन्मयभावसे अनन्यचित्त होकर देवता और पितृगणके लिये क्रमशः दायीं और बायीं ओर बिठाकर दो-दो ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हें भोजन करावे॥ २॥ हे राजन्! पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके दधि, अक्षत और बदरीफलसे बने हुए पिण्डोंको देवतीर्थ^१ या प्रजापतितीर्थसे^२ दान करे॥ ३॥ हे पृथिवीनाथ! इस आभ्युदयिक श्राद्धसे नान्दीमुख नामक पितृगण प्रसन्न होते हैं, अतः सब प्रकारकी अभिवृद्धिके समय पुरुषोंको इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४॥ कन्या और पुत्रके विवाहमें, गृहप्रवेशमें, बालकोंके नामकरण तथा चूडाकर्म आदि संस्कारोंमें, सीमन्तोन्नयन-संस्कारमें और पुत्र आदिके मुख देखनेके समय गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्तसे नान्दीमुख नामक पितृगणका पूजन करे॥ ५-६॥ हे पृथिवीपाल! आभ्युदयिक श्राद्धमें पितृपूजाका यह सनातन क्रम तुमको सुनाया, अब प्रेतक्रियाकी विधि सुनो॥ ७॥
बन्धु-बान्धवोंको चाहिये कि भली प्रकार स्नान करानेके अनन्तर पुष्प-मालाओंसे विभूषित शवका गाँवके


१- अँगुलियोंके अग्रभाग। २- कनिष्ठिकाका मूलभाग।

२१० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

यत्र तत्र स्थितायैतदमुकायेति वादिनः ।<br>दक्षिणाभिमुखा दद्युर्बान्धवास्सलिलाञ्जलीन् ॥ ९<br><br>प्रविष्टाश्च समं गोभिर्ग्रामं नक्षत्रदर्शने ।<br>कटकर्म ततः कुर्युर्भूमौ प्रस्तरशायिनः ॥ १०<br><br>दातव्योऽनुदिनं पिण्डः प्रेताय भुवि पार्थिव ।<br>दिवा च भक्तं भोक्तव्यममांसं मनुजर्षभ ॥ ११<br><br>दिनानि तानि चेच्छात्तः कर्तव्यं विप्रभोजनम् ।<br>प्रेता यान्ति तथा तृप्तिं बन्धुवर्गेण भुञ्जता ॥ १२<br><br>प्रथमेऽह्नि तृतीये च सप्तमे नवमे तथा ।<br>वस्त्रत्यागबहिस्नाने कृत्वा दद्यात्तिलोदकम् ॥ १३<br><br>चतुर्थेऽह्नि च कर्तव्यं तस्यास्थिचयनं नृप ।<br>तदूर्ध्वमंगसंस्पर्शस्सपिण्डानामिष्यते ॥ १४<br><br>योग्यास्सर्वक्रियाणां तु समानसलिलास्तथा ।<br>अनुलेपनपुष्पादिभोगादन्यत्र पार्थिव ॥ १५<br><br>शय्यासनोपभोगश्च सपिण्डानामिष्यते ।<br>भस्मास्थिचयनादूर्ध्वं संयोगो न तु योषिताम् ॥ १६<br><br>बाले देशान्तरस्थे च पतिते च मुनौ मृते ।<br>सद्यश्शौचं तथेच्छातो जलाग्न्युद्बन्धनादिषु ॥ १७<br><br>मृतबन्धोर्दशाहानि कुलस्यान्नं न भुज्यते ।<br>दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥ १८<br><br>विप्रस्यैतद् द्वादशाहं राजन्यस्याप्यशौचकम् ।<br>अर्धमासं तु वैश्यस्य मासं शूद्रस्य शुद्धये ॥ १९बाहर दाह करें और फिर जलाशयमें वस्त्रसहित स्नान कर दक्षिण-मुख होकर **'यत्र तत्र स्थितायैतदमुकाय'**¹ आदि वाक्यका उच्चारण करते हुए जलांजलि दें ॥ ८-९ ॥<br><br>तदनन्तर गोधूलिके समय तारा-मण्डलके दीखने लगनेपर ग्राममें प्रवेश करें और कटकर्म (अशौच कृत्य) सम्पन्न करके पृथिवीपर तृणादिकी शय्यापर शयन करें ॥ १० ॥<br><br>हे पृथिवीपते ! मृत पुरुषके लिये नित्यप्रति पृथिवीपर पिण्डदान करना चाहिये और हे पुरुषश्रेष्ठ ! केवल दिनके समय मांसहीन भात खाना चाहिये ॥ ११ ॥ अशौच कालमें, यदि ब्राह्मणोंकी इच्छा हो तो उन्हें भोजन कराना चाहिये, क्योंकि उस समय ब्राह्मण और बन्धुवर्गके भोजन करनेसे मृत जीवकी तृप्ति होती है ॥ १२ ॥ अशौचके पहले, तीसरे, सातवें अथवा नवें दिन वस्त्र त्यागकर और बहिर्देशमें स्नान करके तिलोदक दे ॥ १३ ॥<br><br>हे नृप ! अशौचके चौथे दिन अस्थिचयन करना चाहिये; उसके अनन्तर अपने सपिण्ड बन्धुजनोंका अंग स्पर्श किया जा सकता है ॥ १४ ॥ हे राजन् ! उस समयसे समानोदक² पुरुष चन्दन और पुष्पधारण आदि क्रियाओंके सिवा [पंचयज्ञादि] और सब कर्म कर सकते हैं ॥ १५ ॥<br><br>भस्म और अस्थिचयनके अनन्तर सपिण्ड पुरुषोंद्वारा शय्या और आसनका उपयोग तो किया जा सकता है, किन्तु स्त्री-संसर्ग नहीं किया जा सकता ॥ १६ ॥ बालक, देशान्तरस्थित व्यक्ति, पतित और तपस्वीके मरनेपर तथा जल, अग्नि और उद्वन्धन (फाँसी लगाने) आदिद्वारा आत्मघात करनेपर शीघ्र ही अशौचकी निवृत्ति हो जाती है ³ ॥ १७ ॥ मृतकके कुटुम्बका अन्न दस दिनतक न खाना चाहिये तथा अशौच कालमें दान, परिग्रह, होम और स्वाध्याय आदि कर्म भी न करने चाहिये ॥ १८ ॥ यह [दस दिनका] अशौच ब्राह्मणका है; क्षत्रियका अशौच बारह दिन और वैश्यका पन्द्रह दिन रहता है तथा शूद्रकी अशौच-शुद्धि एक मासमें होती है ॥ १९ ॥

१- अर्थात् हमलोग अमुक नाम-गोत्रवाले प्रेतके निमित्त, वे जहाँ कहीं भी हों, यह जल देते हैं।
२- समानोदक (तर्पणादिमें समान जलाधिकारी अर्थात् सगोत्र) और सपिण्ड (पिण्डाधिकारी)-की व्याख्या कूर्मपुराणमें इस प्रकार की है—

'सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥'
अर्थात् सातवीं पीढ़ीमें पुरुषकी सपिण्डता निवृत्त हो जाती है, किन्तु समानोदकभाव उसके जन्म और नामका पता न रहनेपर दूर होता है।

३- परन्तु माता-पिताके विषयमें यह नियम नहीं है; जैसा कि कहा है—

पितरौ चेन्मृतौ स्यातां दूरस्थोऽपि हि पुत्रकः । श्रुत्वा तद्दिनमारभ्य दशाहं सूतकी भवेत् ॥

अ० १३ ] * तृतीय अंश * २११

अयुजो भोजयेत्कामं द्विजानन्ते ततो दिने। दद्याद्दर्भेषु पिण्डं च प्रेतायोच्छिष्टसन्निधौ ॥ २०

वार्यायुधप्रतोदास्तु दण्डश्च द्विजभोजनात्। स्प्रष्टव्योऽनन्तरं वर्णैः शुद्धेरन्ते ततः क्रमात् ॥ २१

ततस्स्ववर्णधर्मा ये विप्रादीनामुदाहृताः। तान्कुर्वीत पुमाञ्जीवेन्निजधर्मार्जनैस्तथा॥ २२

मृताहनि च कर्तव्यमेकोद्दिष्टमतः परम्। आह्वानादिक्रियादैवनियोगरहितं हि तत्॥ २३

एकोऽर्घ्यस्तत्र दातव्यस्तथैककपवित्रकम्। प्रेताय पिण्डो दातव्यो भुक्तवत्सु द्विजातिषु ॥ २४

प्रश्नश्च तत्राभिरतिर्यजमानैर्द्विजन्मनाम्। अक्षय्यममुकस्येति वक्तव्यं विरतौ तथा ॥ २५

एकोद्दिष्टमयो धर्म इत्थमावत्सरात्स्मृतः। सपिण्डीकरणं तस्मिन्काले राजेन्द्र तच्छृणु॥ २६

एकोद्दिष्टविधानेन कार्यं तदपि पार्थिव। संवत्सरेऽथ षष्ठे वा मासे वा द्वादशेऽह्नि तत्॥ २७

तिलगन्धोदकैर्युक्तं तत्र पात्रचतुष्टयम्॥ २८

पात्रं प्रेतस्य तत्रैकं पैत्रं पात्रत्रयं तथा। सेचयेत्पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं ततस्त्रिषु ॥ २९

ततः पितृत्वमापन्ने तस्मिन्प्रेते महीपते। श्राद्धधर्मैरशेषैस्तु तत्पूर्वानर्चयेत्पितॄन्॥ ३०

पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रो वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः। सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हो नृप जायते ॥ ३१

तेषामभावे सर्वेषां समानोदकसन्ततिः। मातृपक्षसपिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा॥ ३२

कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभिः कार्याः क्रिया नृप॥ ३३

सङ्घातान्तर्गतैर्वापि कार्याः प्रेतस्य च क्रियाः। उत्सन्नबन्धुरिक्थाद्वा कारयेदवनीपतिः ॥ ३४

अशौचके अन्तमें इच्छानुसार अयुग्म (तीन, पाँच, सात, नौ आदि) ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा उनकी उच्छिष्ट (जूठन)-के निकट प्रेतकी तृप्तिके लिये कुशापर पिण्डदान करे ॥ २०॥ अशौच-शुद्धि हो जानेपर ब्रह्मभोजके अनन्तर ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंको क्रमशः जल, शस्त्र, प्रतोद (कोड़ा) और लाठीका स्पर्श करना चाहिये ॥ २१ ॥

तदनन्तर ब्राह्मण आदि वर्णोंके जो-जो जातीय धर्म बतलाये गये हैं उनका आचरण करे; और स्वधर्मानुसार उपार्जित जीविकासे निर्वाह करे ॥ २२॥ फिर प्रतिमास मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट श्राद्ध करे जो आवाहनादि क्रिया और विश्वेदेवसम्बन्धी ब्राह्मणके आमन्त्रण आदिसे रहित होने चाहिये ॥ २३॥ उस समय एक अर्घ्य और एक पवित्रक देना चाहिये, तथा बहुत-से ब्राह्मणोंके भोजन करनेपर भी मृतकके लिये एक ही पिण्डदान करना चाहिये ॥ २४॥ तदनन्तर यजमानके 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहनेपर ब्राह्मणगण 'अभिरताः स्मः' ऐसा कहें और फिर पिण्डदान समाप्त होनेपर 'अमुकस्य अक्षय्यमिदमुपतिष्ठताम्' इस वाक्यका उच्चारण करें ॥ २५॥ इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास एकोद्दिष्टकर्म करनेका विधान है। हे राजेन्द्र ! वर्षके समाप्त होनेपर सपिण्डीकरण करे; उसकी विधि सुनो ॥ २६॥

हे पार्थिव ! इस सपिण्डीकरण कर्मको भी एक वर्ष, छः मास अथवा बारह दिनके अनन्तर एकोद्दिष्टश्राद्धकी विधिसे ही करना चाहिये ॥ २७॥ इसमें तिल, गन्ध और जलसे युक्त चार पात्र रखे। इनमेंसे एक पात्र मृत-पुरुषका होता है तथा तीन पितृगणके होते हैं। फिर मृत-पुरुषके पात्रस्थित जलादिसे पितृगणके पात्रोंका सिंचन करे ॥ २८-२९ ॥ इस प्रकार मृत-पुरुषको पितृत्व प्राप्त हो जानेपर सम्पूर्ण श्राद्धधर्मोंके द्वारा उस मृत-पुरुषसे ही आरम्भ कर पितृगणका पूजन करे ॥ ३० ॥ हे राजन् ! पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भतीजा अथवा अपनी सपिण्ड सन्ततिमें उत्पन्न हुआ पुरुष ही श्राद्धादि क्रिया करनेका अधिकारी होता है ॥ ३१ ॥ यदि इन सबका अभाव हो तो समानोदककी सन्तति अथवा मातृपक्षके सपिण्ड अथवा समानोदकको इसका अधिकार है ॥ ३२॥ हे राजन् ! मातृकुल और पितृकुल दोनोंके नष्ट हो जानेपर स्त्री ही इस क्रियाको करे; अथवा [यदि स्त्री भी न हो तो] साथियोंमेंसे ही कोई करे या बान्धवहीन मृतकके धनसे राजा ही उसके सम्पूर्ण प्रेत-कर्म करे ॥ ३३-३४॥

२१२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १४

पूर्वाः क्रिया मध्यमाश्च तथा चैवोत्तराः क्रियाः ।
त्रिप्रकाराः क्रियाः सर्वास्तासां भेदं शृणुष्व मे ॥ ३५
आदाहवार्यायुधादिस्पर्शाद्यन्तास्तु याः क्रियाः ।
ताः पूर्वा मध्यमा मासि मास्येकोद्दिष्टसंज्ञिताः ॥ ३६
प्रेते पितृत्वमापन्ने सपिण्डीकरणादनु ।
क्रियन्ते याः क्रियाः पित्र्याः प्रोच्यन्ते ता नृपोत्तराः ॥ ३७
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानसलिलैस्तथा ।
सङ्घातान्तर्गतैर्वापि राज्ञा तद्धनहारिणा ॥ ३८
पूर्वाः क्रियाश्च कर्तव्याः पुत्राद्यैरेव चोत्तराः ।
दौहित्रैर्वा नृपश्रेष्ठ कार्यास्तत्तनयैस्तथा ॥ ३९
मृताहनि च कर्तव्याः स्त्रीणामप्युत्तराः क्रियाः ।
प्रतिसंवत्सरं राजन्नेकोद्दिष्टविधानतः ॥ ४०
तस्मादुत्तरसंज्ञायाः क्रियास्ताः शृणु पार्थिव ।
यथा यथा च कर्तव्या विधिना येन चानघ ॥ ४१

सम्पूर्ण प्रेत-कर्म तीन प्रकारके हैं—पूर्वकर्म, मध्यमकर्म तथा उत्तरकर्म। इनके पृथक्-पृथक् लक्षण सुनो॥ ३५॥ दाहसे लेकर जल और शस्त्र आदिके स्पर्शपर्यन्त जितने कर्म हैं उनको पूर्वकर्म कहते हैं तथा प्रत्येक मासमें जो एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाता है वह मध्यमकर्म कहलाता है॥ ३६॥ और हे नृप! सपिण्डीकरणके पश्चात् मृतक व्यक्तिके पितृत्वको प्राप्त हो जानेपर जो पितृकर्म किये जाते हैं वे उत्तरकर्म कहलाते हैं॥ ३७॥ माता, पिता, सपिण्ड, समानोदक, समूहके लोग अथवा उसके धनका अधिकारी राजा पूर्वकर्म कर सकते हैं; किंतु उत्तरकर्म केवल पुत्र, दौहित्र आदि अथवा उनकी सन्तानको ही करना चाहिये॥ ३८-३९॥ हे राजन्! प्रतिवर्ष मरण-दिनपर स्त्रियोंका भी उत्तरकर्म एकोद्दिष्ट श्राद्धकी विधिसे अवश्य करना चाहिये॥ ४०॥ अतः हे अनघ! उन उत्तरक्रियाओंको जिस-जिसको जिस-जिस विधिसे करना चाहिये, वह सुनो ॥ ४१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार

और्व उवाच
ब्रह्मेन्द्ररुद्रनासत्यसूर्याग्निवसुमारुतान् ।
विश्वेदेवान्पितृगणान्वयांसि मनुजान्यशून् ॥ १
सरीसृपानृषिगणान्यच्चान्यद्भूतसंज्ञितम् ।
श्राद्धं श्रद्धान्वितः कुर्वन्प्रीणयत्यखिलं जगत् ॥ २
मासि मास्यसिते पक्षे पञ्चदश्यां नरेश्वर ।
तथाष्टकासु कुर्वीत काम्यान्कालाञ्छृणुष्व मे ॥ ३
श्राद्धार्हमागतं द्रव्यं विशिष्टमथ वा द्विजम् ।
श्राद्धं कुर्वीत विज्ञाय व्यतीपातेऽयने तथा ॥ ४
विषुवे चापि सम्प्राप्ते ग्रहणे शशिसूर्ययोः ।
समस्तेष्वेव भूपाल राशिष्वर्के च गच्छति ॥ ५
नक्षत्रग्रहपीडासु दुष्टस्वप्नावलोकने ।
इच्छाश्राद्धानि कुर्वीत नवसस्यागमे तथा ॥ ६

और्व बोले— हे राजन्! श्रद्धासहित श्राद्धकर्म करनेसे मनुष्य ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसुगण, मरुद्गण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, ऋषिगण तथा भूतगण आदि सम्पूर्ण जगत्‌को प्रसन्न कर देता है॥ १-२॥ हे नरेश्वर! प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी पंचदशी (अमावास्या) और अष्टका (हेमन्त और शिशिर ऋतुओंके चार महीनोंकी शुक्लाष्टमियों)- पर श्राद्ध करे। [यह नित्यश्राद्धकाल है] अब काम्यश्राद्धका काल बतलाता हूँ, श्रवण करो॥ ३॥
जिस समय श्राद्धयोग्य पदार्थ या किसी विशिष्ट ब्राह्मणको घरमें आया जाने, अथवा जब उत्तरायण या दक्षिणायनका आरम्भ या व्यतीपात हो तब काम्य-श्राद्धका अनुष्ठान करे॥ ४॥ विषुवसंक्रान्तिपर, सूर्य और चन्द्रग्रहणपर, सूर्यके प्रत्येक राशिमें प्रवेश करते समय, नक्षत्र अथवा ग्रहकी पीडा होनेपर, दुःस्वप्न देखनेपर और घरमें नवीन अन्न आनेपर भी काम्यश्राद्ध करे॥ ५-६॥

अ० १४] * तृतीय अंश * २१३

अमावास्या यदा मैत्रविशाखास्वात्तियोगिनी। श्राद्धैः पितृगणस्तृप्तिं तथाप्नोत्यष्टवार्षिकीम्॥ ७ अमावास्या यदा पुष्ये रौद्रे चर्क्षे पुनर्वसौ। द्वादशाब्दं तदा तृप्तिं प्रयान्ति पितरोऽर्चिताः॥ ८ वासवाकपादक्षै पितॄणां तृप्तिमिच्छताम्। वारुणे वाप्यमावास्या देवानापि दुर्लभा॥ ९ नवस्वृक्षेष्वमावास्या यदैतेष्ववनीपते। तदा हि तृप्तिदं श्राद्धं पितॄणां शृणु चापरम्॥ १० गीतं सनत्कुमारेण यथैलाय महात्मने। पृच्छते पितृभक्ताय प्रश्रयावनताय च॥ ११ श्रीसनत्कुमार उवाच वैशाखमासस्य च या तृतीया नवम्यसौ कार्तिकशुक्लपक्षे। नभस्य मासस्य च कृष्णपक्ष त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे॥ १२ एता युगाद्याः कथिताः पुराणे- ष्वनन्तपुण्यास्तिथयश्चतस्रः। उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च त्रिष्वष्टकास्वप्ययनद्वये च॥ १३ पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः। श्राद्धं कृतं तेन समाससहस्त्रं रहस्यमेतत्पितरो वदन्ति॥ १४ माघेऽसिते पञ्चदशी कदाचि- दुपैति योगं यदि वारुणेन। ऋक्षेण कालस्स परः पितॄणां न ह्यल्पपुण्यैर्नृप लभ्यतेऽसौ॥ १५ काले धनिष्ठा यदि नाम तस्मि- न्भवेत्तु भूपाल तदा पितृभ्यः। दत्तं जलान्नं प्रददाति तृप्तिं वर्षायुतं तत्कुलजैर्मनुष्यैः॥ १६ तत्रैव चेद्भाद्रपदा नु पूर्वा काले यथावत्क्रियते पितृभ्यः।

जो अमावास्या अनुराधा, विशाखा या स्वातिनक्षत्रयुक्ता हो उसमें श्राद्ध करनेसे पितृगण आठ वर्षतक तृप्त रहते हैं॥ ७॥ तथा जो अमावास्या पुष्य, आर्द्रा या पुनर्वसु नक्षत्रयुक्ता हो उसमें पूजित होनेसे पितृगण बारह वर्षतक तृप्त रहते हैं॥ ८॥

जो पुरुष पितृगण और देवगणको तृप्त करना चाहते हों उनके लिये धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपदा अथवा शतभिषानक्षत्रयुक्त अमावास्या अति दुर्लभ है॥ ९॥ हे पृथिवीपते! जब अमावास्या इन नौ नक्षत्रोंसे युक्त होती है उस समय किया हुआ श्राद्ध पितृगणको अत्यन्त तृप्तिदायक होता है। इनके अतिरिक्त पितृभक्त इलापुत्र महात्मा पुरूरवाके अति विनीत भावसे पूछनेपर श्रीसनत्कुमारजीने जिनका वर्णन किया था वे अन्य तिथियाँ भी सुनो॥ १०-११॥

श्रीसनत्कुमारजी बोले— वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी तथा माघमासकी अमावास्या—इन चार तिथियोंको पुराणोंमें 'युगाद्या' कहा है। ये चारों तिथियाँ अनन्त पुण्यदायिनी हैं। चन्द्रमा या सूर्यके ग्रहणके समय, तीन अष्टकाओंमें अथवा उत्तरायण या दक्षिणायनके आरम्भमें जो पुरुष एकाग्रचित्तसे पितृगणको तिलसहित जल भी दान करता है वह मानो एक सहस्त्र वर्षके लिये श्राद्ध कर देता है—यह परम रहस्य स्वयं पितृगण ही कहते हैं॥ १२-१४॥

यदि कदाचित् माघकी अमावास्याका शतभिषानक्षत्रसे योग हो जाय तो पितृगणकी तृप्तिके लिये यह परम उत्कृष्ट काल होता है। हे राजन्! अल्प पुण्यवान् पुरुषोंको ऐसा समय नहीं मिलता॥ १५॥ और यदि उस समय (माघकी अमावास्यामें) धनिष्ठानक्षत्रका योग हो तब तो अपने ही कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषद्वारा दिये हुए अन्नोदकसे पितृगणकी दस सहस्र वर्षतक तृप्ति रहती है॥ १६॥ तथा यदि उसके साथ पूर्वाभाद्रपादनक्षत्रका योग हो और उस समय पितृगणके लिये श्राद्ध किया जाय तो उन्हें

२१४ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४

श्राद्धं परां तृप्तिमुपेत्य तेन युगं सहस्त्रं पितरस्स्वपन्ति ॥ १७ गंगां शतद्रूं यमुनां विपाशां सरस्वतीं नैमिषगोमतीं वा। तत्रावगाह्यार्चनमादरेण कृत्वा पितॄणां दुरितानि हन्ति ॥ १८ गायन्ति चैतत्पितरः कदानु वर्षामघात्तृप्तिमवाप्य भूयः। माघासितान्ते शुभतीर्थतोयै- र्यास्याम तृप्तिं तनयादिदत्तैः ॥ १९ चित्तं च वित्तं च नृणां विशुद्धं शस्तश्च कालः कथितो विधिश्च। पात्रं यथोक्तं परमा च भक्ति- र्नृणां प्रयच्छन्त्यभिवाञ्छितानि ॥ २० पितृगीतांस्तथैवात्र श्लोकांस्ताञ्छृणु पार्थिव। श्रुत्वा तथैव भवता भाव्यं तत्रादृतात्मना ॥ २१ अपि धन्यः कुले जायादस्माकं मतिमान्नरः। अकुर्वन्वित्तशाठ्यं यः पिण्डान्नॆ निर्वपिष्यति ॥ २२ रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु। विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति ॥ २३ अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधीः। भोजयिष्यति विप्राग्र्यांस्तन्मात्रविभवो नरः ॥ २४ असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तितः। प्रदास्यति द्विजाग्रेभ्यः स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम् ॥ २५ तत्राप्यसामर्थ्ययुतः कराग्राग्रस्थितांस्तिलान्। प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद्द्रूप दास्यति ॥ २६ तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलाञ्जलिम्। भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति ॥ २७ यतः कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाहिकम्। अभावे प्रीणयन्नस्माञ्छ्रद्धायुक्तः प्रदास्यति ॥ २८ सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शकः। सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ॥ २९

परम तृप्ति प्राप्त होती है और वे एक सहस्र युगतक शयन करते रहते हैं॥ १७॥ गंगा, शतद्रू, यमुना, विपाशा, सरस्वती और नैमिषारण्यस्थिता गोमतीमें स्नान करके पितृगणका आदरपूर्वक अर्चन करनेसे मनुष्य समस्त पापोंको नष्ट कर देता है॥ १८॥ पितृगण सर्वदा यह गान करते हैं कि वर्षाकाल (भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी)-के मघानक्षत्रमें तृप्त होकर फिर माघकी अमावास्याको अपने पुत्र-पौत्रादिद्वारा दी गयी पुण्यतीर्थोकी जलांजलिसे हम कब तृप्ति लाभ करेंगे'॥ १९॥ विशुद्ध चित्त, शुद्ध धन, प्रशस्त काल, उपर्युक्त विधि, योग्य पात्र औरपरम भक्ति-ये सब मनुष्यको इच्छित फल देते हैं॥ २०॥

हे पार्थिव! अब तुम पितृगणके गाये हुए कुछ श्लोकोंका श्रवण करो, उन्हें सुनकर तुम्हें आदरपूर्वक वैसा ही आचरण करना चाहिये॥ २१॥ [पितृगण कहते हैं-] 'हमारे कुलमें क्या कोई ऐसा मतिमान् धन्य पुरुष उत्पन्न होगा जो वित्तलोलुपताको छोड़कर हमें पिण्डदान देगा॥ २२॥ जो सम्पत्ति होनेपर हमारे उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको रत्न, वस्त्र, यान और सम्पूर्ण भोगसामग्री देगा॥ २३॥ अथवा अन्न-वस्त्र मात्र वैभव होनेसे जो श्राद्धकालमें भक्ति-विनम्र चित्तसे उत्तम ब्राह्मणोंको यथाशक्ति अन्न ही भोजन करायेगा॥ २४॥ या अन्नदानमें भी असमर्थ होनेपर जो ब्राह्मणश्रेष्ठोंको कच्चा धान्य और थोड़ी-सी दक्षिणा ही देगा॥ २५॥ और यदि इसमें भी असमर्थ होगा तो किन्हीं द्विजश्रेष्ठको प्रणाम कर एक मुट्ठी तिल ही देगा॥ २६॥ अथवा हमारे उद्देश्यसे पृथिवीपर भक्ति-विनम्र चित्तसे सात-आठ तिलोंसे युक्त जलांजलि ही देगा॥ २७॥ और यदि इसका भी अभाव होगा तो कहीं-न-कहींसे एक दिनका चारा लाकर प्रीति और श्रद्धापूर्वक हमारे उद्देश्यसे गौको खिलायेगा॥ २८॥ तथा इन सभी वस्तुओंका अभाव होनेपर जो वनमें जाकर अपने कक्षमूल (बगल) को दिखाता हुआ सूर्य आदि दिक्पालोंसे उच्च स्वरसे यह कहेगा॥ २९॥

अ० १५ ] * तृतीय अंश * २१५

न मेऽस्ति वित्तं न धनं च नान्य-
  च्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ
  कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ॥ ३०

'मेरे पास श्राद्धकर्मके योग्य न वित्त है, न धन है और न कोई अन्य सामग्री है, अतः मैं अपने पितृगणको नमस्कार करता हूँ, वे मेरी भक्तिसे ही तृप्ति लाभ करें। मैंने अपनी दोनों भुजाएँ आकाशमें उठा रखी हैं' ॥ ३० ॥

और्व उवाच

इत्येतत्पितृभिर्गीतं भावाभावप्रयोजनम्।
यः करोति कृतं तेन श्राद्धं भवति पार्थिव ॥ ३१

और्व बोले—हे राजन्! धनके होने अथवा न होनेपर पितृगणने जिस प्रकार बतलाया है वैसा ही जो पुरुष आचरण करता है वह उस आचारसे विधिपूर्वक श्राद्ध ही कर देता है ॥ ३१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

श्राद्ध-विधि

और्व उवाच
ब्राह्मणाम्भोजयेच्छ्राद्धे यद्गुणांस्तान्निबोध मे ॥ १
त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुस्त्रिसुपर्णष्षडङ्गवित्।
वेदविच्छ्रोत्रियो योगी तथा वै ज्येष्ठसामगः ॥ २
ऋत्विक्स्वस्रेयदौहित्रजामातृश्वशुरास्तथा।
मातुलोऽथ तपवनिष्ठः पञ्चाग्न्यभिरतस्तथा।
शिष्यास्सम्बन्धिनश्चैव मातापितृरतश्च यः ॥ ३
एतान्नियोजयेच्छ्राद्धे पूर्वोक्तानप्रथमे नृप।
ब्राह्मणान्‍पितृतृप्त्यर्थमनुकल्पेष्वनन्तरान् ॥ ४
मित्रध्रुक्कुनखी क्लीबश्श्यावदन्तस्तथा द्विजः।
कन्यादूषयिता वह्निवेदोज्झस्सोमविक्रयी ॥ ५
अभिशस्तस्तथा स्तेनः पिशुनो ग्रामयाजकः।
भृतकाध्यापकस्तद्वद्भृतकाध्यापितश्च यः ॥ ६
परपूर्वापतिश्चैव मातापित्रोस्तथोज्झकः।
वृषलीसूपतिपोष्टा च वृषलीपतिरेव च ॥ ७
तथा देवलकश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ॥ ८

और्व बोले—हे राजन्! श्राद्धकालमें जैसे गुणशील ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये वह बतलाता हूँ, सुनो। त्रिणाचिकेत$^१$, त्रिमधु$^२$, त्रिसुपर्ण$^३$, छहों वेदांगोंके जाननेवाले, वेदवेत्ता, श्रोत्रिय, योगी और ज्येष्ठसामग तथा ऋत्विक्, भानजे, दौहित्र, जामाता, श्वशुर, मामा, तपस्वी, पंचाग्नि तपनेवाले, शिष्य, सम्बन्धी और माता-पिताके प्रेमी इन ब्राह्मणोंको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करे। इनमेंसे [त्रिणाचिकेत आदि] पहले कहे हुओंको पूर्वकालमें नियुक्त करे और [ऋत्विक् आदि] पीछे बतलाये हुओंको पितरोंकी तृप्तिके लिये उत्तरकर्ममें भोजन करावे ॥ १—४ ॥
मित्रघाती, स्वभावसे ही विकृत नखोंवाला, नपुंसक, काले दाँतोंवाला, कन्यागामी, अग्नि और वेदका त्याग करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, लोकनिन्दित, चोर, चुगलखोर, ग्रामपुरोहित, वेतन लेकर पढ़ानेवाला अथवा पढ़नेवाला, पुनर्विवाहिताका पति, माता-पिताका त्याग करनेवाला, शूद्रकी सन्तानका पालन करनेवाला, शूद्राका पति तथा देवोपजीवी ब्राह्मण श्राद्धमें निमन्त्रण देनेयोग्य नहीं है ॥ ५–८ ॥


१-द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन अनुवाकोंको 'त्रिणाचिकेत' कहते हैं, उसको पढ़नेवाला या उसका अनुष्ठान करनेवाला।
२-'मधुवाताः' इत्यादि ऋचाका अध्ययन और मधुव्रतका आचरण करनेवाला।
३-'ब्रह्ममेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।

२१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


प्रथमेऽह्नि बुधश्शस्ताञ्छ्रोत्रियादीन्निमन्त्रयेत्। कथयेच्च तथैवैषां नियोगात्पितृदैविकान् ॥ ९

ततः क्रोधव्यवायादीनायासं तैर्द्विजैस्सह। यजमानो न कुर्वीत दोषस्तत्र महानयम् ॥ १०

श्राद्धे नियुक्तो भुक्त्वा वा भोजयित्वा नियुज्य च। व्यवायी रेतसो गर्ते मज्जयत्यात्मनः पितॄन् ॥ ११

तस्मात्प्रथममत्रोक्तं द्विजाग्र्याणां निमन्त्रणम्। अनिमन्त्र्य द्विजानेवमागतान्भोजयेद्यतीन् ॥ १२

पादशौचादिना गेहमागतानूजयेद् द्विजान् ॥ १३

पवित्रपाणिराचान्तानासनेषूपवेशयेत् । पितॄणामयुजो युग्मान्देवानामिच्छया द्विजान् ॥ १४

देवानामेकमेकं वा पितॄणां च नियोजयेत् ॥ १५

तथा मातामहश्राद्धं वैश्वदेवसमन्वितम्। कुर्वीत भक्तिसम्पन्नस्तन्त्रं वा वैश्वदैविकम् ॥ १६

प्राङ्मुखान्भोजयेद्विप्रान्देवानामुभयात्मकान्। पितॄमातामहानां च भोजयेच्चाप्युदङ्मुखान् ॥ १७

पृथक्तयोः केचिदाहुः श्राद्धस्य करणं नृप। एकत्रैकेन पाकेन वदन्त्यन्ये महर्षयः ॥ १८

विष्टरार्थं कुशं दत्त्वा सम्पूज्यार्घ्यं विधानतः। कुर्यादावाहनं प्राज्ञो देवानां तदनुज्ञया ॥ १९

यवाम्बुना च देवानां दद्यादर्घ्यं विधानवित्। स्रग्गन्धधूपदीपांश्च तेभ्यो दद्याद्यथाविधि ॥ २०

पितॄणामपसव्यं तत्सर्वमेवोपकल्पयेत्। अनुज्ञां च ततः प्राप्य दत्त्वा दर्भांन्द्विधाकृतान् ॥ २१

मन्त्रपूर्वं पितॄणां तु कुर्याच्चावाहनं बुधः। तिलाम्बुना चापसव्यं दद्यादर्घ्यादिकं नृप ॥ २२

काले तत्रातिथिं प्राप्तमन्नकामं नृपाध्वगम्। ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः कामं तमपि भोजयेत् ॥ २३


श्राद्धके पहले दिन बुद्धिमान् पुरुष श्रोत्रिय आदि विहित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और उनसे यह कह दे कि 'आपको पितृ-श्राद्धमें और आपको विश्वेदेव-श्राद्धमें नियुक्त होना है'॥ ९॥ उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके सहित श्राद्ध करनेवाला पुरुष उस दिन क्रोधादि तथा स्त्रीगमन और परिश्रम आदि न करे, क्योंकि श्राद्ध करनेमें यह महान् दोष माना गया है॥ १०॥ श्राद्धमें निमन्त्रित होकर या भोजन करके अथवा निमन्त्रण करके या भोजन कराकर जो पुरुष स्त्री-प्रसंग करता है वह अपने पितृगणको मानो वीर्यके कुण्डमें डुबोता है॥ ११॥ अतः श्राद्धके प्रथम दिन पहले तो उपरोक्त गुणविशिष्ट द्विजश्रेष्ठोंको निमन्त्रित करे और यदि उस दिन कोई अनिमन्त्रित तपस्वी ब्राह्मण घर आ जायँ तो उन्हें भी भोजन करावे॥ १२॥

घर आये हुए ब्राह्मणोंका पहले पाद-शुद्धि आदिसे सत्कार करे; फिर हाथ धोकर उन्हें आचमन करानेके अनन्तर आसनपर बिठावे। अपनी सामर्थ्यानुसार पितृगणके लिये अयुग्म और देवगणके लिये युग्म ब्राह्मण नियुक्त करे अथवा दोनों पक्षोंके लिये एक-एक ब्राह्मणकी ही नियुक्ति करे॥ १३-१५॥ और इसी प्रकार वैश्वदेवके सहित मातामह-श्राद्ध करे अथवा पितृपक्ष और मातामह-पक्ष दोनोंके लिये भक्तिपूर्वक एक ही वैश्वदेव-श्राद्ध करे॥ १६॥ देव-पक्षके ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाकर और पितृ-पक्ष तथा मातामह-पक्षके ब्राह्मणोंको उत्तर-मुख बिठाकर भोजन करावे॥ १७॥ हे नृप! कोई तो पितृ-पक्ष और मातामह-पक्षके श्राद्धोंको अलग-अलग करनेके लिये कहते हैं और कोई महर्षि दोनोंका एक साथ एक पाकमें ही अनुष्ठान करनेके पक्षमें हैं॥ १८॥ विज्ञ व्यक्ति प्रथम निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठनेके लिये कुशा बिछाकर फिर अर्घ्यदान आदिसे विधिपूर्वक पूजा कर उनकी अनुमतिसे देवताओंका आवाहन करे॥ १९॥ तदनन्तर श्राद्धविधिको जाननेवाला पुरुष यव-मिश्रित जलसे देवताओंको अर्घ्यदान करे और उन्हें विधिपूर्वक धूप, दीप, गन्ध तथा माला आदि निवेदन करे॥ २०॥ ये समस्त उपचार पितृगणके लिये अपसव्य भावसे* निवेदन करे; और फिर ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे दो भागोंमें बँटे हुए कुशाओंका दान करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक पितृगणका आवाहन करे, तथा हे राजन्! अपसव्य-भावसे तिलोदकसे अर्घ्यादि दे॥ २१-२२॥

हे नृप! उस समय यदि कोई भूखा पथिक अतिथि-रूपसे आ जाय तो निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उसे भी यथेच्छ भोजन करावे॥ २३॥


* यज्ञोपवीतको दायें कन्धेपर करके।