भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

अ० १३ ] * तृतीय अंश * २०९

ये कामक्रोधलोभानां वीतरागा न गोचरे।
सदाचारस्थितास्तेषामनुभावैर्धृता मही॥ ४२

तस्मात्सत्यं वदेत्प्राज्ञो यत्परप्रीतिकारणम्।
सत्यं यत्परदुःखाय तदा मौनपरो भवेत्॥ ४३

प्रियम्युक्तं हितं नैतदिति मत्वा न तद्वदेत्।
श्रेयस्तत्र हितं वाच्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्॥ ४४

प्राणिनामुपकाराय यथैवेह परत्र च।
कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान्भजेत्॥ ४५

जो वीतरागमहापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचारमें स्थित रहते हैं उनके प्रभावसे ही पृथिवी टिकी हुई है॥ ४२॥ अतः प्राज्ञ पुरुषको वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरोंकी प्रसन्नताका कारण हो। यदि किसी सत्य वाक्यके कहनेसे दूसरोंको दुःख होता जाने तो मौन रहे॥ ४३॥ यदि प्रिय वाक्यको भी अहितकर समझे तो उसे न कहे; उस अवस्थामें तो हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यन्त अप्रिय क्यों न हो॥ ४४॥ जो कार्य इहलोक और परलोकमें प्राणियोंके हितका साधक हो मतिमान् पुरुष मन, वचन और कर्मसे उसीका आचरण करे॥ ४५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार

और्व उवाच
सचैलस्य पितुः स्नानं जाते पुत्रे विधीयते।
जातकर्म तदा कुर्याच्छ्राद्धमभ्युदये च यत्॥ १

युग्मान्देवांश्च पित्रांश्च सम्यक्सव्यक्रमाद् द्विजान्।
पूजयेद्भोजयेच्चैव तन्मना नान्यमानसः॥ २

दध्यक्षतैस्सबदरैः प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा।
देवतीर्थेन वै पिण्डान्दद्यात्कायेन वा नृप॥ ३

नान्दीमुखः पितृगणस्तेन श्राद्धेन पार्थिव।
प्रीयते तत्तु कर्त्तव्यं पुरुषैस्सर्ववृद्धिषु॥ ४

कन्यापुत्रविवाहेषु प्रवेशेषु च वेश्मनः।
नामकर्माणि बालानां चूडाकर्मादिके तथा॥ ५

सीमन्तोन्नयने चैव पुत्रादिमुखदर्शने।
नान्दीमुखं पितृगणं पूजयेत्प्रयतो गृही॥ ६

पितृपूजाक्रमः प्रोक्तो वृद्धावेष सनातनः।
श्रूयतामवनीपाल प्रेतकर्मक्रियाविधिः॥ ७

प्रेतदेहं शुभैः स्नानैस्स्नापितं स्रग्विभूषितम्।
दग्ध्वा ग्रामाद्वहिः स्नात्वा सचैलस्सलिलाशये॥ ८

और्व बोले— पुत्रके उत्पन्न होनेपर पिताको सचैल (वस्त्रोंसहित) स्नान करना चाहिये। उसके पश्चात् जातकर्म-संस्कार और आभ्युदयिक श्राद्ध करने चाहिये॥ १॥ फिर तन्मयभावसे अनन्यचित्त होकर देवता और पितृगणके लिये क्रमशः दायीं और बायीं ओर बिठाकर दो-दो ब्राह्मणोंका पूजन करे और उन्हें भोजन करावे॥ २॥ हे राजन्! पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके दधि, अक्षत और बदरीफलसे बने हुए पिण्डोंको देवतीर्थ^१ या प्रजापतितीर्थसे^२ दान करे॥ ३॥ हे पृथिवीनाथ! इस आभ्युदयिक श्राद्धसे नान्दीमुख नामक पितृगण प्रसन्न होते हैं, अतः सब प्रकारकी अभिवृद्धिके समय पुरुषोंको इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४॥ कन्या और पुत्रके विवाहमें, गृहप्रवेशमें, बालकोंके नामकरण तथा चूडाकर्म आदि संस्कारोंमें, सीमन्तोन्नयन-संस्कारमें और पुत्र आदिके मुख देखनेके समय गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्तसे नान्दीमुख नामक पितृगणका पूजन करे॥ ५-६॥ हे पृथिवीपाल! आभ्युदयिक श्राद्धमें पितृपूजाका यह सनातन क्रम तुमको सुनाया, अब प्रेतक्रियाकी विधि सुनो॥ ७॥
बन्धु-बान्धवोंको चाहिये कि भली प्रकार स्नान करानेके अनन्तर पुष्प-मालाओंसे विभूषित शवका गाँवके


१- अँगुलियोंके अग्रभाग। २- कनिष्ठिकाका मूलभाग।