विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] * तृतीय अंश * १९९
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया॥ ३५
जो प्राणी सम्पूर्ण नरकोंमें नाना प्रकारकी यातनाएँ भोग रहे हैं उनकी तृप्तिके लिये मैं यह जलदान करता हूँ॥ ३५॥
ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते तृप्तिमखिला यान्तु ये चास्मत्तोयकांक्षिणः॥ ३६
जो मेरे बन्धु अथवा अबन्धु हैं, तथा जो अन्य जन्मोंमें मेरे बन्धु थे एवं और भी जो-जो मुझसे जलकी इच्छा रखनेवाले हैं वे सब मेरे दिये हुए जलसे परितृप्त हों॥ ३६॥
यत्र क्वचनसंस्थानां क्षुत्तृष्णोपहतात्मनाम्।
इदमाप्यायनायास्तु मया दत्तं तिलोदकम्॥ ३७
क्षुधा और तृष्णासे व्याकुल जीव कहीं भी क्यों न हों मेरा दिया हुआ यह तिलोदक उनको तृप्ति प्रदान करे'॥ ३७॥
काम्योदकप्रदानं ते मयैतत्कथितं नृप।
यद्दत्त्वा प्रीणयत्येतन्मनुष्यस्सकलं जगत्।
जगदाप्यायनोद्भूतं पुण्यमाप्नोति चानघ॥ ३८
हे नृप! इस प्रकार मैंने तुमसे यह काम्य-तर्पणका निरूपण किया, जिसके करनेसे मनुष्य सकल संसारको तृप्त कर देता है और हे अनघ! इससे उसे जगत्की तृप्तिसे होनेवाला पुण्य प्राप्त होता है॥ ३८॥
दत्त्वा काम्योदकं सम्यगेतेभ्यः श्रद्धयान्वितः।
आचम्य च ततो दद्यात्सूर्याय सलिलाञ्जलिम्॥ ३९
इस प्रकार उपरोक्त जीवोंको श्रद्धापूर्वक काम्यजल-दान करनेके अनन्तर आचमन करे और फिर सूर्यदेवको जलांजलि दे॥ ३९॥ [उस समय इस प्रकार कहे—]
नमो विवस्वते ब्रह्मभास्वते विष्णुतेजसे।
जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मसाक्षिणे॥ ४०
'भगवान् विवस्वान्को नमस्कार है जो वेद-वेद्य और विष्णुके तेजस्स्वरूप हैं तथा जगत्को उत्पन्न करनेवाले, अति पवित्र एवं कर्मोंके साक्षी हैं'॥ ४०॥
ततो गृहार्चनं कुर्यादभीष्टसुरपूजनम्।
जलाभिषेकैः पुष्पैश्च धूपाद्यैश्च निवेदनम्॥ ४१
तदनन्तर जलाभिषेक और पुष्प तथा धूपादि निवेदन करता हुआ गृहदेव और इष्टदेवका पूजन करे॥ ४१॥
अपूर्वमग्निहोत्रं च कुर्यात्प्राग्ब्रह्मणे नृप॥ ४२
प्रजापतिं समुद्दिश्य दद्यादाहुतिमादरात्।
गुह्येभ्यः काश्यपायाथ ततोऽनुमतये क्रमात्॥ ४३
हे नृप! फिर अपूर्व अग्निहोत्र करे, उसमें पहले ब्रह्माको और तदनन्तर क्रमशः प्रजापति, गुह्य, काश्यप और अनुमतिको आदरपूर्वक आहुतियाँ दे॥ ४२-४३॥
तच्छेषं मणिके पृथ्वीपर्जन्येभ्यः क्षिपेत्ततः।
द्वारे धातुर्विधातुश्च मध्ये च ब्रह्मणे क्षिपेत्॥ ४४
गृहस्य पुरुषव्याघ्र दिग्देवानपि मे शृणु॥ ४५
उससे बचे हुए हव्यको पृथिवी और मेघके उद्देश्यसे उदकपात्रमें,* धाता और विधाताके उद्देश्यसे द्वारके दोनों ओर तथा ब्रह्माके उद्देश्यसे घरके मध्यमें छोड़ दे। हे पुरुषव्याघ्र! अब मैं दिक्पालगणकी पूजाका वर्णन करता हूँ, श्रवण करो॥ ४४-४५॥
इन्द्राय धर्मराजाय वरुणाय तथेन्दवे।
प्राच्यादिषु बुधो दद्याद्धुतशेषात्मकं बलिम्॥ ४६
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, यम, वरुण और चन्द्रमाके लिये हुतशिष्ट सामग्रीसे बलि प्रदान करे॥ ४६॥
प्रागुत्तरे च दिग्भागे धन्वन्तरिबलिं बुधः।
निर्वपेद्वैश्वदेवं च कर्म कुर्यादतः परम्॥ ४७
पूर्व और उत्तर-दिशाओंमें धन्वन्तरिके लिये बलि दे तथा इसके अनन्तर बलिवैश्वदेव-कर्म करे॥ ४७॥
वायव्यां वायवे दिक्षु समस्तासु यथादिशम्।
ब्रह्मणे चान्तरिक्षाय भानवे च क्षिपेद्बलिम्॥ ४८
बलिवैश्वदेवके समय वायव्यकोणमें वायुको तथा अन्य समस्त दिशाओंमें वायु एवं उन दिशाओंको बलि दे, इसी प्रकार ब्रह्मा, अन्तरिक्ष और सूर्यको भी उनकी दिशाओंके अनुसार [अर्थात् मध्यमें] बलि प्रदान करे॥ ४८॥
* वह जल भरा पात्र जो अग्निहोत्र करते समय समीपमें रख लिया जाता है और जिसमें 'इदं न मम' कहकर आहुतिका शेष भाग छोड़ा जाता है।