विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४
श्राद्धं परां तृप्तिमुपेत्य तेन युगं सहस्त्रं पितरस्स्वपन्ति ॥ १७ गंगां शतद्रूं यमुनां विपाशां सरस्वतीं नैमिषगोमतीं वा। तत्रावगाह्यार्चनमादरेण कृत्वा पितॄणां दुरितानि हन्ति ॥ १८ गायन्ति चैतत्पितरः कदानु वर्षामघात्तृप्तिमवाप्य भूयः। माघासितान्ते शुभतीर्थतोयै- र्यास्याम तृप्तिं तनयादिदत्तैः ॥ १९ चित्तं च वित्तं च नृणां विशुद्धं शस्तश्च कालः कथितो विधिश्च। पात्रं यथोक्तं परमा च भक्ति- र्नृणां प्रयच्छन्त्यभिवाञ्छितानि ॥ २० पितृगीतांस्तथैवात्र श्लोकांस्ताञ्छृणु पार्थिव। श्रुत्वा तथैव भवता भाव्यं तत्रादृतात्मना ॥ २१ अपि धन्यः कुले जायादस्माकं मतिमान्नरः। अकुर्वन्वित्तशाठ्यं यः पिण्डान्नॆ निर्वपिष्यति ॥ २२ रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु। विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति ॥ २३ अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधीः। भोजयिष्यति विप्राग्र्यांस्तन्मात्रविभवो नरः ॥ २४ असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तितः। प्रदास्यति द्विजाग्रेभ्यः स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम् ॥ २५ तत्राप्यसामर्थ्ययुतः कराग्राग्रस्थितांस्तिलान्। प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद्द्रूप दास्यति ॥ २६ तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलाञ्जलिम्। भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति ॥ २७ यतः कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाहिकम्। अभावे प्रीणयन्नस्माञ्छ्रद्धायुक्तः प्रदास्यति ॥ २८ सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शकः। सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ॥ २९
परम तृप्ति प्राप्त होती है और वे एक सहस्र युगतक शयन करते रहते हैं॥ १७॥ गंगा, शतद्रू, यमुना, विपाशा, सरस्वती और नैमिषारण्यस्थिता गोमतीमें स्नान करके पितृगणका आदरपूर्वक अर्चन करनेसे मनुष्य समस्त पापोंको नष्ट कर देता है॥ १८॥ पितृगण सर्वदा यह गान करते हैं कि वर्षाकाल (भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी)-के मघानक्षत्रमें तृप्त होकर फिर माघकी अमावास्याको अपने पुत्र-पौत्रादिद्वारा दी गयी पुण्यतीर्थोकी जलांजलिसे हम कब तृप्ति लाभ करेंगे'॥ १९॥ विशुद्ध चित्त, शुद्ध धन, प्रशस्त काल, उपर्युक्त विधि, योग्य पात्र औरपरम भक्ति-ये सब मनुष्यको इच्छित फल देते हैं॥ २०॥
हे पार्थिव! अब तुम पितृगणके गाये हुए कुछ श्लोकोंका श्रवण करो, उन्हें सुनकर तुम्हें आदरपूर्वक वैसा ही आचरण करना चाहिये॥ २१॥ [पितृगण कहते हैं-] 'हमारे कुलमें क्या कोई ऐसा मतिमान् धन्य पुरुष उत्पन्न होगा जो वित्तलोलुपताको छोड़कर हमें पिण्डदान देगा॥ २२॥ जो सम्पत्ति होनेपर हमारे उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको रत्न, वस्त्र, यान और सम्पूर्ण भोगसामग्री देगा॥ २३॥ अथवा अन्न-वस्त्र मात्र वैभव होनेसे जो श्राद्धकालमें भक्ति-विनम्र चित्तसे उत्तम ब्राह्मणोंको यथाशक्ति अन्न ही भोजन करायेगा॥ २४॥ या अन्नदानमें भी असमर्थ होनेपर जो ब्राह्मणश्रेष्ठोंको कच्चा धान्य और थोड़ी-सी दक्षिणा ही देगा॥ २५॥ और यदि इसमें भी असमर्थ होगा तो किन्हीं द्विजश्रेष्ठको प्रणाम कर एक मुट्ठी तिल ही देगा॥ २६॥ अथवा हमारे उद्देश्यसे पृथिवीपर भक्ति-विनम्र चित्तसे सात-आठ तिलोंसे युक्त जलांजलि ही देगा॥ २७॥ और यदि इसका भी अभाव होगा तो कहीं-न-कहींसे एक दिनका चारा लाकर प्रीति और श्रद्धापूर्वक हमारे उद्देश्यसे गौको खिलायेगा॥ २८॥ तथा इन सभी वस्तुओंका अभाव होनेपर जो वनमें जाकर अपने कक्षमूल (बगल) को दिखाता हुआ सूर्य आदि दिक्पालोंसे उच्च स्वरसे यह कहेगा॥ २९॥