विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४] * तृतीय अंश * २१३
अमावास्या यदा मैत्रविशाखास्वात्तियोगिनी। श्राद्धैः पितृगणस्तृप्तिं तथाप्नोत्यष्टवार्षिकीम्॥ ७ अमावास्या यदा पुष्ये रौद्रे चर्क्षे पुनर्वसौ। द्वादशाब्दं तदा तृप्तिं प्रयान्ति पितरोऽर्चिताः॥ ८ वासवाकपादक्षै पितॄणां तृप्तिमिच्छताम्। वारुणे वाप्यमावास्या देवानापि दुर्लभा॥ ९ नवस्वृक्षेष्वमावास्या यदैतेष्ववनीपते। तदा हि तृप्तिदं श्राद्धं पितॄणां शृणु चापरम्॥ १० गीतं सनत्कुमारेण यथैलाय महात्मने। पृच्छते पितृभक्ताय प्रश्रयावनताय च॥ ११ श्रीसनत्कुमार उवाच वैशाखमासस्य च या तृतीया नवम्यसौ कार्तिकशुक्लपक्षे। नभस्य मासस्य च कृष्णपक्ष त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे॥ १२ एता युगाद्याः कथिताः पुराणे- ष्वनन्तपुण्यास्तिथयश्चतस्रः। उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च त्रिष्वष्टकास्वप्ययनद्वये च॥ १३ पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः। श्राद्धं कृतं तेन समाससहस्त्रं रहस्यमेतत्पितरो वदन्ति॥ १४ माघेऽसिते पञ्चदशी कदाचि- दुपैति योगं यदि वारुणेन। ऋक्षेण कालस्स परः पितॄणां न ह्यल्पपुण्यैर्नृप लभ्यतेऽसौ॥ १५ काले धनिष्ठा यदि नाम तस्मि- न्भवेत्तु भूपाल तदा पितृभ्यः। दत्तं जलान्नं प्रददाति तृप्तिं वर्षायुतं तत्कुलजैर्मनुष्यैः॥ १६ तत्रैव चेद्भाद्रपदा नु पूर्वा काले यथावत्क्रियते पितृभ्यः।
जो अमावास्या अनुराधा, विशाखा या स्वातिनक्षत्रयुक्ता हो उसमें श्राद्ध करनेसे पितृगण आठ वर्षतक तृप्त रहते हैं॥ ७॥ तथा जो अमावास्या पुष्य, आर्द्रा या पुनर्वसु नक्षत्रयुक्ता हो उसमें पूजित होनेसे पितृगण बारह वर्षतक तृप्त रहते हैं॥ ८॥
जो पुरुष पितृगण और देवगणको तृप्त करना चाहते हों उनके लिये धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपदा अथवा शतभिषानक्षत्रयुक्त अमावास्या अति दुर्लभ है॥ ९॥ हे पृथिवीपते! जब अमावास्या इन नौ नक्षत्रोंसे युक्त होती है उस समय किया हुआ श्राद्ध पितृगणको अत्यन्त तृप्तिदायक होता है। इनके अतिरिक्त पितृभक्त इलापुत्र महात्मा पुरूरवाके अति विनीत भावसे पूछनेपर श्रीसनत्कुमारजीने जिनका वर्णन किया था वे अन्य तिथियाँ भी सुनो॥ १०-११॥
श्रीसनत्कुमारजी बोले— वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी तथा माघमासकी अमावास्या—इन चार तिथियोंको पुराणोंमें 'युगाद्या' कहा है। ये चारों तिथियाँ अनन्त पुण्यदायिनी हैं। चन्द्रमा या सूर्यके ग्रहणके समय, तीन अष्टकाओंमें अथवा उत्तरायण या दक्षिणायनके आरम्भमें जो पुरुष एकाग्रचित्तसे पितृगणको तिलसहित जल भी दान करता है वह मानो एक सहस्त्र वर्षके लिये श्राद्ध कर देता है—यह परम रहस्य स्वयं पितृगण ही कहते हैं॥ १२-१४॥
यदि कदाचित् माघकी अमावास्याका शतभिषानक्षत्रसे योग हो जाय तो पितृगणकी तृप्तिके लिये यह परम उत्कृष्ट काल होता है। हे राजन्! अल्प पुण्यवान् पुरुषोंको ऐसा समय नहीं मिलता॥ १५॥ और यदि उस समय (माघकी अमावास्यामें) धनिष्ठानक्षत्रका योग हो तब तो अपने ही कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषद्वारा दिये हुए अन्नोदकसे पितृगणकी दस सहस्र वर्षतक तृप्ति रहती है॥ १६॥ तथा यदि उसके साथ पूर्वाभाद्रपादनक्षत्रका योग हो और उस समय पितृगणके लिये श्राद्ध किया जाय तो उन्हें