भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१९६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११


न घर्घरस्वरां क्षामां तथा काकस्वरां न च।
नानिबन्धेक्षणां तद्वद्वृत्ताक्षीं नोद्वहेद्बुधः ॥ १९

यस्याश्च रोमशे जङ्घे गुल्फौ यस्यास्तथोनतौ।
गण्डयोः कूपरौ यस्या हसन्त्यास्तां न चोद्वहेत् ॥ २०

नातिरूक्षच्छविं पाण्डुकरजामरुणेक्षणाम्।
आपीनहस्तपादां च न कन्यामुद्वहेद् बुधः ॥ २१

न वामनां नातिदीर्घां नोद्वहेत्संहतभ्रुवम्।
न चातिच्छिद्रदशनां न करालमुखीं नरः ॥ २२

पञ्चमीं मातृपक्षाच्च पितृपक्षाच्च सप्तमीम्।
गृहस्थश्चोद्वहेत्कन्यां न्यायेन विधिना नृप ॥ २३

ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः।
गान्धर्वराक्षसौ चान्यौ पैशाचश्चाष्टमो मतः ॥ २४

एतेषां यस्य यो धर्म्यो वर्णस्योक्तो महर्षिभिः।
कुर्वीत दारग्रहणं तेनान्यं परिवर्जयेत् ॥ २५

सधर्मचारिणीं प्राप्य गार्हस्थ्यं सहितस्तया।
समुद्वहेद्बदात्येतत्सम्यगूढं महाफलम् ॥ २६

अनुसार अंगहीना हो, जिसके श्मश्रु (मूँछोंके) चिह्न हों, जो पुरुषके-से आकारवाली हो अथवा घर्घर शब्द करनेवाले अति मन्द या कौएके समान (कर्णकटु) स्वरवाली हो तथा पक्ष्मशून्या या गोल नेत्रोंवाली हो उस स्त्रीसे विवाह न करे ॥ १८-१९ ॥ जिसकी जंघाओंपर रोम हों, जिसके गुल्फ (टखने) ऊँचे हों तथा हँसते समय जिसके कपोलोंमें गड्ढे पड़ते हों उस कन्यासे विवाह न करे ॥ २० ॥ जिसकी कान्ति अत्यन्त उदासीन न हो, नख पाण्डुवर्ण हों, नेत्र लाल हों तथा हाथ-पैर कुछ भारी हों, बुद्धिमान् पुरुष उस कन्यासे सम्बन्ध न करे ॥ २१ ॥ जो अति वामन (नाटी) अथवा अति दीर्घ (लम्बी) हो, जिसकी भुकुटियाँ जुड़ी हुई हों, जिसके दाँतोंमें अधिक अन्तर हो तथा जो दन्तुर (आगेको दाँत निकले हुए) मुखवाली हो उस स्त्रीसे कभी विवाह न करे ॥ २२ ॥ हे राजन्! मातृपक्षसे पाँचवीं पीढ़ी तक और पितृपक्षसे सातवीं पीढ़ी तक जिस कन्याका सम्बन्ध न हो, गृहस्थ पुरुषको नियमानुसार उसीसे विवाह करना चाहिये ॥ २३ ॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच—ये आठ प्रकारके विवाह हैं ॥ २४ ॥ इनमेंसे जिस विवाहको जिस वर्णके लिये महर्षियोंने धर्मानुकूल कहा है उसीके द्वारा दार–परिग्रह करे, अन्य विधियोंको छोड़ दे ॥ २५ ॥ इस प्रकार सहधर्मिणीको प्राप्तकर उसके साथ गार्हस्थ्यधर्मका पालन करे, क्योंकि उसका पालन करनेपर वह महान् फल देनेवाला होता है ॥ २६ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥


ग्यारहवाँ अध्याय

गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन

सगर उवाच
गृहस्थस्य सदाचारं श्रोतुमिच्छाम्यहं मुने।
लोकादस्मात्परस्माच्च यमातिष्ठन्न हीयते ॥ १

और्व उवाच
श्रूयतां पृथिवीपाल सदाचारस्य लक्षणम्।
सदाचारवता पुंसा जितौ लोकावुभावपि ॥ २

साधवः क्षीणदोषास्तु सच्छब्दः साधुवाचकः।
तेषामाचरणं यत्तु सदाचारस्स उच्यते ॥ ३

सप्तर्षयोऽथ मनवः प्रजानां पतयस्तथा।
सदाचारस्य वक्तारः कर्तारश्च महीपते ॥ ४

सगर बोले— हे मुने! मैं गृहस्थके सदाचारोंको सुनना चाहता हूँ, जिनका आचरण करनेसे वह इहलोक और परलोक दोनों जगह पतित नहीं होता ॥ १ ॥

और्व बोले— हे पृथिवीपाल! तुम सदाचारके लक्षण सुनो। सदाचारी पुरुष इहलोक और परलोक दोनोंहीको जीत लेता है ॥ २ ॥ 'सत्' शब्दका अर्थ साधु है, और साधु वही है जो दोषरहित हो। उस साधु पुरुषका जो आचरण होता है उसीको सदाचार कहते हैं ॥ ३ ॥ हे राजन्! इस सदाचारके वक्ता और कर्ता सप्तर्षिगण, मनु एवं प्रजापति हैं ॥ ४ ॥