विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
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सामर्थ्ये सति तत्त्याज्यमुभाभ्यामपि पार्थिव ।<br>तदेवापदि कर्तव्यं न कुर्यात्कर्मसङ्करम् ॥ ४०<br>इत्येते कथिता राजन्वर्णधर्मा मया तव ।<br>धर्मानाश्रमिणां सम्यग्ब्रुवतो मे निशामय ॥ ४१ | हे राजन् ! इन उपरोक्त वृत्तियोंको भी सामर्थ्य होनेपर त्याग दे; केवल आपत्कालमें ही इनका आश्रय ले, कर्म संकरता (कर्मोंका मेल) न करे ॥ ४० ॥ हे राजन् ! इस प्रकार वर्णधर्मोंका वर्णन तो मैंने तुमसे कर दिया; अब आश्रम-धर्मोंका निरूपण और करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४१ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय
ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका वर्णन
और्व उवाच
बालः कृतोपनयनो वेदाहरणतत्परः ।<br>गुरुगेहे वसेद्द्रूप ब्रह्मचारी समाहितः ॥ १
शौचाचारव्रतं तत्र कार्यं शुश्रूषणं गुरोः ।<br>व्रतानि चरता ग्राह्यो वेदश्च कृतबुद्धिना ॥ २
उभे सन्ध्ये रविं भूप तथैवाग्निं समाहितः ।<br>उपतिष्ठेत्तदा कुर्याद्गुरोरप्यभिवादनम् ॥ ३
स्थिते तिष्ठेद्ब्रजेद्याते नीचैरासीत चासति ।<br>शिष्यो गुरोर्नृपश्रेष्ठ प्रतिकूलं न सञ्चरेत् ॥ ४
तेनैवोक्तं पठेद्देवं नान्यचित्तः पुरःस्थितः ।<br>अनुज्ञातश्च भिक्षानमश्नीयाद्गुरुणा ततः ॥ ५
अवगाहेदपः पूर्वमाचार्येणावगाहिताः ।<br>समिज्जलादिकं चास्य कल्यं कल्यमुपानयेत् ॥ ६
गृहीतग्राह्यवेदश्च ततोऽनुज्ञामवाप्य च ।<br>गार्हस्थ्यमाविशेत्प्राज्ञो निष्पन्नगुरुनिष्कृतिः ॥ ७
विधिनावाप्तदारस्तु धनं प्राप्य स्वकर्मणा ।<br>गृहस्थकार्यमखिलं कुर्याद्द्रूपाल शक्तितः ॥ ८
निवापेन पितॄनर्चन्यज्ञैर्देवांस्तथातिथीन् ।<br>अन्नैर्मुनींश्च स्वाध्यायैरपत्येन प्रजापतिम् ॥ ९
भूतानि बलिभिश्चैव वात्सल्येनाखिलं जगत् ।<br>प्राप्नोति लोकान्पुरुषो निजकर्मसमार्जितान् ॥ १०
और्व बोले—हे भूपते ! बालकको चाहिये कि उपनयन-संस्कारके अनन्तर वेदाध्ययनमें तत्पर होकर ब्रह्मचर्यका अवलम्बन कर, सावधानतापूर्वक गुरुगृहमें निवास करे ॥ १ ॥ वहाँ रहकर उसे शौच और आचार-व्रतका पालन करते हुए गुरुकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये तथा व्रतादिका आचरण करते हुए स्थिर-बुद्धिसे वेदाध्ययन करना चाहिये ॥ २ ॥ हे राजन् ! [ प्रातःकाल और सायंकाल] दोनों सन्ध्याओंमें एकाग्र होकर सूर्य और अग्निकी उपासना करे तथा गुरुका अभिवादन करे ॥ ३ ॥ गुरुके खड़े होनेपर खड़ा हो जाय, चलनेपर पीछे-पीछे चलने लगे तथा बैठ जानेपर नीचे बैठ जाय। हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार कभी गुरुके विरुद्ध कोई आचरण न करे ॥ ४ ॥ गुरुजीके कहनेपर ही उनके सामने बैठकर एकाग्रचित्तसे वेदाध्ययन करे और उनकी आज्ञा होनेपर ही भिक्षान्न भोजन करे ॥ ५ ॥ जलमें प्रथम आचार्यके स्नान कर चुकनेपर फिर स्वयं स्नान करे तथा प्रतिदिन प्रातःकाल गुरुजीके लिये समिधा, जल, कुश और पुष्पादि लाकर जुटा दे ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपना अभिमत वेदपाठ समाप्त कर चुकनेपर बुद्धिमान् शिष्य गुरुजीकी आज्ञासे उन्हें गुरु-दक्षिणा देकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे ॥ ७ ॥ हे राजन् ! फिर विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर अपनी वर्णानुकूल वृत्तिसे द्रव्योपार्जन करता हुआ सामर्थ्यानुसार समस्त गृहकार्य करता रहे ॥ ८ ॥ पिण्ड-दानादिसे पितृगणकी, यज्ञादिसे देवताओंकी, अन्नदानसे अतिथियोंकी, स्वाध्यायसे ऋषियोंकी, पुत्रोत्पत्तिसे प्रजापतिकी, बलियों (अन्नभाग)-से भूतगणकी तथा वात्सल्यभावसे सम्पूर्ण जगत्की पूजा करते हुए पुरुष अपने कर्मोंद्वारा मिले हुए उत्तमोत्तम लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ९-१० ॥