विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ९ ] * तृतीय अंश * १९३
| भिक्षाभुजश्च ये केचित्परिव्राड्ब्रह्मचारिणः ।<br>तेऽप्यत्रैव प्रतिष्ठन्ते गार्हस्थ्यं तेन वै परम् ॥ ११ | जो केवल भिक्षावृत्तिसे ही रहनेवाले परिव्राजक और ब्रह्मचारी आदि हैं उनका आश्रय भी गृहस्थाश्रम ही है, अतः यह सर्वश्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ हे राजन्! विप्रगण वेदाध्ययन, तीर्थस्नान और देश-दर्शनके लिये पृथिवी-पर्यटन किया करते हैं ॥ १२ ॥ उनमेंसे जिनका कोई निश्चित गृह अथवा भोजन प्रबन्ध नहीं होता और जो जहाँ सायंकाल हो जाता है वहीं ठहर जाते हैं, उन सबका आधार और मूल गृहस्थाश्रम ही है ॥ १३ ॥ हे राजन्! ऐसे लोग जब घर आवें तो उनका कुशल-प्रश्न और मधुर वचनोंसे स्वागत करे तथा शय्या, आसन और भोजनके द्वारा उनका यथाशक्ति सत्कार करे ॥ १४ ॥ जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है उसे अपने समस्त दुष्कर्म देकर वह (अतिथि) उसके पुण्यकर्मोंको स्वयं ले जाता है ॥ १५ ॥ गृहस्थके लिये अतिथिके प्रति अपमान, अहंकार और दम्भका आचरण करना, उसे देकर पछताना, उसपर प्रहार करना अथवा उससे कटुभाषण करना उचित नहीं है ॥ १६ ॥ इस प्रकार जो गृहस्थ अपने परम धर्मका पूर्णतया पालन करता है वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर अत्युत्तम लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |
| वेदाहरणकार्याय तीर्थस्नानाय च प्रभो ।<br>अटन्ति वसुधां विप्राः पृथिवीदर्शनाय च ॥ १२ | |
| अनिकेता ह्यनाहारा यत्र सायंगृहाश्च ये ।<br>तेषां गृहस्थः सर्वेषां प्रतिष्ठा योनिरैव च ॥ १३ | |
| तेषां स्वागतदानादि वक्तव्यं मधुरं नृप ।<br>गृहागतानां दद्याच्च शयनासनभोजनम् ॥ १४ | |
| अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते ।<br>स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ १५ | |
| अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव गृहे सतः ।<br>परितापोपघातौ च पारुष्यं च न शस्यते ॥ १६ | |
| यस्तु सम्यक्करोत्येवं गृहस्थः परमं विधिम् ।<br>सर्वबन्धविनिर्मुक्तो लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ १७ | |
| वयःपरिणतो राजन्कृतकृत्यो गृहाश्रमी ।<br>पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ १८ | हे राजन्! इस प्रकार गृहस्थोचित कार्य करते-करते जिसकी अवस्था ढल गयी हो उस गृहस्थको उचित है कि स्त्रीको पुत्रोंके प्रति सौंपकर अथवा अपने साथ लेकर वनको चला जाय ॥ १८ ॥ वहाँ पत्र, मूल, फल आदिका आहार करता हुआ, लोम, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) और जटाओंको धारण कर पृथिवीपर शयन करे और मुनिवृत्तिका अवलम्बन कर सब प्रकार अतिथिकी सेवा करे ॥ १९ ॥ उसे चर्म, काश और कुशाओंसे अपना बिछौना तथा ओढ़नेका वस्त्र बनाना चाहिये । हे नरेश्वर! उस मुनिके लिये त्रिकाल-स्नानका विधान है ॥ २० ॥ इसी प्रकार देवपूजन, होम, सब अतिथियोंका सत्कार, भिक्षा और बलिवैश्वदेव भी उसके विहित कर्म हैं ॥ २१ ॥ हे राजेन्द्र! वन्य तैलादिको शरीरमें मलना और शीतोष्णका सहन करते हुए तपस्यामें लगे रहना उसके प्रशस्त कर्म हैं ॥ २२ ॥ जो वानप्रस्थ मुनि इन नियत कर्मोंका आचरण करता है वह अपने समस्त दोषोंको अग्निके समान भस्म कर देता है और नित्य-लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥ |
| पर्णमूलफलाहारः केशश्मश्रुजटाधरः ।<br>भूमिशायी भवेत्तत्र मुनिस्स्र्वातिथिनृप ॥ १९ | |
| चर्मकाशकुशैः कुर्यात्परिधानोत्तरीयके ।<br>तद्वत्त्रिश्रवणं स्नानं शस्तमस्य नरेश्वर ॥ २० | |
| देव build: देवताभ्यर्चनं होमस्सर्वाभ्यागतपूजनम् ।<br>भिक्षा बलिप्रदानं च शस्तमस्य नरेश्वर ॥ २१ | |
| वन्यस्नेहेन गात्राणामभ्यंगश्चास्य शस्यते ।<br>तपश्च तस्य राजेन्द्र शीतोष्णादिसहिष्णुता ॥ २२ | |
| यस्त्वेतां नियतश्चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः ।<br>स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च शाश्वतान् ॥ २३ | |
| चतुर्थश्चाश्रमो भिक्षोः प्रोच्यते यो मनीषिभिः ।<br>तस्य स्वरूपं गदतो मम श्रोतुं नृपार्हसि ॥ २४ | हे नृप! पण्डितगण जिस चतुर्थ आश्रमको भिक्षु-आश्रम कहते हैं अब मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २४ ॥ हे नरेन्द्र! तृतीय आश्रमके अनन्तर पुत्र, द्रव्य और स्त्री आदिके स्नेहको सर्वथा त्यागकर तथा मात्सर्यको छोड़कर चतुर्थ आश्रममें प्रवेश करे ॥ २५ ॥ |
| पुत्रद्रव्यकलत्रेषु त्यक्तस्नेहो नराधिप ।<br>चतुर्थमाश्रमस्थानं गच्छेद्विधूत मत्सरः ॥ २५ |
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