भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

२१० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १३

यत्र तत्र स्थितायैतदमुकायेति वादिनः ।<br>दक्षिणाभिमुखा दद्युर्बान्धवास्सलिलाञ्जलीन् ॥ ९<br><br>प्रविष्टाश्च समं गोभिर्ग्रामं नक्षत्रदर्शने ।<br>कटकर्म ततः कुर्युर्भूमौ प्रस्तरशायिनः ॥ १०<br><br>दातव्योऽनुदिनं पिण्डः प्रेताय भुवि पार्थिव ।<br>दिवा च भक्तं भोक्तव्यममांसं मनुजर्षभ ॥ ११<br><br>दिनानि तानि चेच्छात्तः कर्तव्यं विप्रभोजनम् ।<br>प्रेता यान्ति तथा तृप्तिं बन्धुवर्गेण भुञ्जता ॥ १२<br><br>प्रथमेऽह्नि तृतीये च सप्तमे नवमे तथा ।<br>वस्त्रत्यागबहिस्नाने कृत्वा दद्यात्तिलोदकम् ॥ १३<br><br>चतुर्थेऽह्नि च कर्तव्यं तस्यास्थिचयनं नृप ।<br>तदूर्ध्वमंगसंस्पर्शस्सपिण्डानामिष्यते ॥ १४<br><br>योग्यास्सर्वक्रियाणां तु समानसलिलास्तथा ।<br>अनुलेपनपुष्पादिभोगादन्यत्र पार्थिव ॥ १५<br><br>शय्यासनोपभोगश्च सपिण्डानामिष्यते ।<br>भस्मास्थिचयनादूर्ध्वं संयोगो न तु योषिताम् ॥ १६<br><br>बाले देशान्तरस्थे च पतिते च मुनौ मृते ।<br>सद्यश्शौचं तथेच्छातो जलाग्न्युद्बन्धनादिषु ॥ १७<br><br>मृतबन्धोर्दशाहानि कुलस्यान्नं न भुज्यते ।<br>दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥ १८<br><br>विप्रस्यैतद् द्वादशाहं राजन्यस्याप्यशौचकम् ।<br>अर्धमासं तु वैश्यस्य मासं शूद्रस्य शुद्धये ॥ १९बाहर दाह करें और फिर जलाशयमें वस्त्रसहित स्नान कर दक्षिण-मुख होकर **'यत्र तत्र स्थितायैतदमुकाय'**¹ आदि वाक्यका उच्चारण करते हुए जलांजलि दें ॥ ८-९ ॥<br><br>तदनन्तर गोधूलिके समय तारा-मण्डलके दीखने लगनेपर ग्राममें प्रवेश करें और कटकर्म (अशौच कृत्य) सम्पन्न करके पृथिवीपर तृणादिकी शय्यापर शयन करें ॥ १० ॥<br><br>हे पृथिवीपते ! मृत पुरुषके लिये नित्यप्रति पृथिवीपर पिण्डदान करना चाहिये और हे पुरुषश्रेष्ठ ! केवल दिनके समय मांसहीन भात खाना चाहिये ॥ ११ ॥ अशौच कालमें, यदि ब्राह्मणोंकी इच्छा हो तो उन्हें भोजन कराना चाहिये, क्योंकि उस समय ब्राह्मण और बन्धुवर्गके भोजन करनेसे मृत जीवकी तृप्ति होती है ॥ १२ ॥ अशौचके पहले, तीसरे, सातवें अथवा नवें दिन वस्त्र त्यागकर और बहिर्देशमें स्नान करके तिलोदक दे ॥ १३ ॥<br><br>हे नृप ! अशौचके चौथे दिन अस्थिचयन करना चाहिये; उसके अनन्तर अपने सपिण्ड बन्धुजनोंका अंग स्पर्श किया जा सकता है ॥ १४ ॥ हे राजन् ! उस समयसे समानोदक² पुरुष चन्दन और पुष्पधारण आदि क्रियाओंके सिवा [पंचयज्ञादि] और सब कर्म कर सकते हैं ॥ १५ ॥<br><br>भस्म और अस्थिचयनके अनन्तर सपिण्ड पुरुषोंद्वारा शय्या और आसनका उपयोग तो किया जा सकता है, किन्तु स्त्री-संसर्ग नहीं किया जा सकता ॥ १६ ॥ बालक, देशान्तरस्थित व्यक्ति, पतित और तपस्वीके मरनेपर तथा जल, अग्नि और उद्वन्धन (फाँसी लगाने) आदिद्वारा आत्मघात करनेपर शीघ्र ही अशौचकी निवृत्ति हो जाती है ³ ॥ १७ ॥ मृतकके कुटुम्बका अन्न दस दिनतक न खाना चाहिये तथा अशौच कालमें दान, परिग्रह, होम और स्वाध्याय आदि कर्म भी न करने चाहिये ॥ १८ ॥ यह [दस दिनका] अशौच ब्राह्मणका है; क्षत्रियका अशौच बारह दिन और वैश्यका पन्द्रह दिन रहता है तथा शूद्रकी अशौच-शुद्धि एक मासमें होती है ॥ १९ ॥

१- अर्थात् हमलोग अमुक नाम-गोत्रवाले प्रेतके निमित्त, वे जहाँ कहीं भी हों, यह जल देते हैं।
२- समानोदक (तर्पणादिमें समान जलाधिकारी अर्थात् सगोत्र) और सपिण्ड (पिण्डाधिकारी)-की व्याख्या कूर्मपुराणमें इस प्रकार की है—

'सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥'
अर्थात् सातवीं पीढ़ीमें पुरुषकी सपिण्डता निवृत्त हो जाती है, किन्तु समानोदकभाव उसके जन्म और नामका पता न रहनेपर दूर होता है।

३- परन्तु माता-पिताके विषयमें यह नियम नहीं है; जैसा कि कहा है—

पितरौ चेन्मृतौ स्यातां दूरस्थोऽपि हि पुत्रकः । श्रुत्वा तद्दिनमारभ्य दशाहं सूतकी भवेत् ॥

अ० १३ ] * तृतीय अंश * २११

अयुजो भोजयेत्कामं द्विजानन्ते ततो दिने। दद्याद्दर्भेषु पिण्डं च प्रेतायोच्छिष्टसन्निधौ ॥ २०

वार्यायुधप्रतोदास्तु दण्डश्च द्विजभोजनात्। स्प्रष्टव्योऽनन्तरं वर्णैः शुद्धेरन्ते ततः क्रमात् ॥ २१

ततस्स्ववर्णधर्मा ये विप्रादीनामुदाहृताः। तान्कुर्वीत पुमाञ्जीवेन्निजधर्मार्जनैस्तथा॥ २२

मृताहनि च कर्तव्यमेकोद्दिष्टमतः परम्। आह्वानादिक्रियादैवनियोगरहितं हि तत्॥ २३

एकोऽर्घ्यस्तत्र दातव्यस्तथैककपवित्रकम्। प्रेताय पिण्डो दातव्यो भुक्तवत्सु द्विजातिषु ॥ २४

प्रश्नश्च तत्राभिरतिर्यजमानैर्द्विजन्मनाम्। अक्षय्यममुकस्येति वक्तव्यं विरतौ तथा ॥ २५

एकोद्दिष्टमयो धर्म इत्थमावत्सरात्स्मृतः। सपिण्डीकरणं तस्मिन्काले राजेन्द्र तच्छृणु॥ २६

एकोद्दिष्टविधानेन कार्यं तदपि पार्थिव। संवत्सरेऽथ षष्ठे वा मासे वा द्वादशेऽह्नि तत्॥ २७

तिलगन्धोदकैर्युक्तं तत्र पात्रचतुष्टयम्॥ २८

पात्रं प्रेतस्य तत्रैकं पैत्रं पात्रत्रयं तथा। सेचयेत्पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं ततस्त्रिषु ॥ २९

ततः पितृत्वमापन्ने तस्मिन्प्रेते महीपते। श्राद्धधर्मैरशेषैस्तु तत्पूर्वानर्चयेत्पितॄन्॥ ३०

पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रो वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः। सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हो नृप जायते ॥ ३१

तेषामभावे सर्वेषां समानोदकसन्ततिः। मातृपक्षसपिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा॥ ३२

कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभिः कार्याः क्रिया नृप॥ ३३

सङ्घातान्तर्गतैर्वापि कार्याः प्रेतस्य च क्रियाः। उत्सन्नबन्धुरिक्थाद्वा कारयेदवनीपतिः ॥ ३४

अशौचके अन्तमें इच्छानुसार अयुग्म (तीन, पाँच, सात, नौ आदि) ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा उनकी उच्छिष्ट (जूठन)-के निकट प्रेतकी तृप्तिके लिये कुशापर पिण्डदान करे ॥ २०॥ अशौच-शुद्धि हो जानेपर ब्रह्मभोजके अनन्तर ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंको क्रमशः जल, शस्त्र, प्रतोद (कोड़ा) और लाठीका स्पर्श करना चाहिये ॥ २१ ॥

तदनन्तर ब्राह्मण आदि वर्णोंके जो-जो जातीय धर्म बतलाये गये हैं उनका आचरण करे; और स्वधर्मानुसार उपार्जित जीविकासे निर्वाह करे ॥ २२॥ फिर प्रतिमास मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट श्राद्ध करे जो आवाहनादि क्रिया और विश्वेदेवसम्बन्धी ब्राह्मणके आमन्त्रण आदिसे रहित होने चाहिये ॥ २३॥ उस समय एक अर्घ्य और एक पवित्रक देना चाहिये, तथा बहुत-से ब्राह्मणोंके भोजन करनेपर भी मृतकके लिये एक ही पिण्डदान करना चाहिये ॥ २४॥ तदनन्तर यजमानके 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहनेपर ब्राह्मणगण 'अभिरताः स्मः' ऐसा कहें और फिर पिण्डदान समाप्त होनेपर 'अमुकस्य अक्षय्यमिदमुपतिष्ठताम्' इस वाक्यका उच्चारण करें ॥ २५॥ इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास एकोद्दिष्टकर्म करनेका विधान है। हे राजेन्द्र ! वर्षके समाप्त होनेपर सपिण्डीकरण करे; उसकी विधि सुनो ॥ २६॥

हे पार्थिव ! इस सपिण्डीकरण कर्मको भी एक वर्ष, छः मास अथवा बारह दिनके अनन्तर एकोद्दिष्टश्राद्धकी विधिसे ही करना चाहिये ॥ २७॥ इसमें तिल, गन्ध और जलसे युक्त चार पात्र रखे। इनमेंसे एक पात्र मृत-पुरुषका होता है तथा तीन पितृगणके होते हैं। फिर मृत-पुरुषके पात्रस्थित जलादिसे पितृगणके पात्रोंका सिंचन करे ॥ २८-२९ ॥ इस प्रकार मृत-पुरुषको पितृत्व प्राप्त हो जानेपर सम्पूर्ण श्राद्धधर्मोंके द्वारा उस मृत-पुरुषसे ही आरम्भ कर पितृगणका पूजन करे ॥ ३० ॥ हे राजन् ! पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भतीजा अथवा अपनी सपिण्ड सन्ततिमें उत्पन्न हुआ पुरुष ही श्राद्धादि क्रिया करनेका अधिकारी होता है ॥ ३१ ॥ यदि इन सबका अभाव हो तो समानोदककी सन्तति अथवा मातृपक्षके सपिण्ड अथवा समानोदकको इसका अधिकार है ॥ ३२॥ हे राजन् ! मातृकुल और पितृकुल दोनोंके नष्ट हो जानेपर स्त्री ही इस क्रियाको करे; अथवा [यदि स्त्री भी न हो तो] साथियोंमेंसे ही कोई करे या बान्धवहीन मृतकके धनसे राजा ही उसके सम्पूर्ण प्रेत-कर्म करे ॥ ३३-३४॥

२१२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १४

पूर्वाः क्रिया मध्यमाश्च तथा चैवोत्तराः क्रियाः ।
त्रिप्रकाराः क्रियाः सर्वास्तासां भेदं शृणुष्व मे ॥ ३५
आदाहवार्यायुधादिस्पर्शाद्यन्तास्तु याः क्रियाः ।
ताः पूर्वा मध्यमा मासि मास्येकोद्दिष्टसंज्ञिताः ॥ ३६
प्रेते पितृत्वमापन्ने सपिण्डीकरणादनु ।
क्रियन्ते याः क्रियाः पित्र्याः प्रोच्यन्ते ता नृपोत्तराः ॥ ३७
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानसलिलैस्तथा ।
सङ्घातान्तर्गतैर्वापि राज्ञा तद्धनहारिणा ॥ ३८
पूर्वाः क्रियाश्च कर्तव्याः पुत्राद्यैरेव चोत्तराः ।
दौहित्रैर्वा नृपश्रेष्ठ कार्यास्तत्तनयैस्तथा ॥ ३९
मृताहनि च कर्तव्याः स्त्रीणामप्युत्तराः क्रियाः ।
प्रतिसंवत्सरं राजन्नेकोद्दिष्टविधानतः ॥ ४०
तस्मादुत्तरसंज्ञायाः क्रियास्ताः शृणु पार्थिव ।
यथा यथा च कर्तव्या विधिना येन चानघ ॥ ४१

सम्पूर्ण प्रेत-कर्म तीन प्रकारके हैं—पूर्वकर्म, मध्यमकर्म तथा उत्तरकर्म। इनके पृथक्-पृथक् लक्षण सुनो॥ ३५॥ दाहसे लेकर जल और शस्त्र आदिके स्पर्शपर्यन्त जितने कर्म हैं उनको पूर्वकर्म कहते हैं तथा प्रत्येक मासमें जो एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया जाता है वह मध्यमकर्म कहलाता है॥ ३६॥ और हे नृप! सपिण्डीकरणके पश्चात् मृतक व्यक्तिके पितृत्वको प्राप्त हो जानेपर जो पितृकर्म किये जाते हैं वे उत्तरकर्म कहलाते हैं॥ ३७॥ माता, पिता, सपिण्ड, समानोदक, समूहके लोग अथवा उसके धनका अधिकारी राजा पूर्वकर्म कर सकते हैं; किंतु उत्तरकर्म केवल पुत्र, दौहित्र आदि अथवा उनकी सन्तानको ही करना चाहिये॥ ३८-३९॥ हे राजन्! प्रतिवर्ष मरण-दिनपर स्त्रियोंका भी उत्तरकर्म एकोद्दिष्ट श्राद्धकी विधिसे अवश्य करना चाहिये॥ ४०॥ अतः हे अनघ! उन उत्तरक्रियाओंको जिस-जिसको जिस-जिस विधिसे करना चाहिये, वह सुनो ॥ ४१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार

और्व उवाच
ब्रह्मेन्द्ररुद्रनासत्यसूर्याग्निवसुमारुतान् ।
विश्वेदेवान्पितृगणान्वयांसि मनुजान्यशून् ॥ १
सरीसृपानृषिगणान्यच्चान्यद्भूतसंज्ञितम् ।
श्राद्धं श्रद्धान्वितः कुर्वन्प्रीणयत्यखिलं जगत् ॥ २
मासि मास्यसिते पक्षे पञ्चदश्यां नरेश्वर ।
तथाष्टकासु कुर्वीत काम्यान्कालाञ्छृणुष्व मे ॥ ३
श्राद्धार्हमागतं द्रव्यं विशिष्टमथ वा द्विजम् ।
श्राद्धं कुर्वीत विज्ञाय व्यतीपातेऽयने तथा ॥ ४
विषुवे चापि सम्प्राप्ते ग्रहणे शशिसूर्ययोः ।
समस्तेष्वेव भूपाल राशिष्वर्के च गच्छति ॥ ५
नक्षत्रग्रहपीडासु दुष्टस्वप्नावलोकने ।
इच्छाश्राद्धानि कुर्वीत नवसस्यागमे तथा ॥ ६

और्व बोले— हे राजन्! श्रद्धासहित श्राद्धकर्म करनेसे मनुष्य ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसुगण, मरुद्गण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, ऋषिगण तथा भूतगण आदि सम्पूर्ण जगत्‌को प्रसन्न कर देता है॥ १-२॥ हे नरेश्वर! प्रत्येक मासके कृष्णपक्षकी पंचदशी (अमावास्या) और अष्टका (हेमन्त और शिशिर ऋतुओंके चार महीनोंकी शुक्लाष्टमियों)- पर श्राद्ध करे। [यह नित्यश्राद्धकाल है] अब काम्यश्राद्धका काल बतलाता हूँ, श्रवण करो॥ ३॥
जिस समय श्राद्धयोग्य पदार्थ या किसी विशिष्ट ब्राह्मणको घरमें आया जाने, अथवा जब उत्तरायण या दक्षिणायनका आरम्भ या व्यतीपात हो तब काम्य-श्राद्धका अनुष्ठान करे॥ ४॥ विषुवसंक्रान्तिपर, सूर्य और चन्द्रग्रहणपर, सूर्यके प्रत्येक राशिमें प्रवेश करते समय, नक्षत्र अथवा ग्रहकी पीडा होनेपर, दुःस्वप्न देखनेपर और घरमें नवीन अन्न आनेपर भी काम्यश्राद्ध करे॥ ५-६॥

अ० १४] * तृतीय अंश * २१३

अमावास्या यदा मैत्रविशाखास्वात्तियोगिनी। श्राद्धैः पितृगणस्तृप्तिं तथाप्नोत्यष्टवार्षिकीम्॥ ७ अमावास्या यदा पुष्ये रौद्रे चर्क्षे पुनर्वसौ। द्वादशाब्दं तदा तृप्तिं प्रयान्ति पितरोऽर्चिताः॥ ८ वासवाकपादक्षै पितॄणां तृप्तिमिच्छताम्। वारुणे वाप्यमावास्या देवानापि दुर्लभा॥ ९ नवस्वृक्षेष्वमावास्या यदैतेष्ववनीपते। तदा हि तृप्तिदं श्राद्धं पितॄणां शृणु चापरम्॥ १० गीतं सनत्कुमारेण यथैलाय महात्मने। पृच्छते पितृभक्ताय प्रश्रयावनताय च॥ ११ श्रीसनत्कुमार उवाच वैशाखमासस्य च या तृतीया नवम्यसौ कार्तिकशुक्लपक्षे। नभस्य मासस्य च कृष्णपक्ष त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे॥ १२ एता युगाद्याः कथिताः पुराणे- ष्वनन्तपुण्यास्तिथयश्चतस्रः। उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च त्रिष्वष्टकास्वप्ययनद्वये च॥ १३ पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः। श्राद्धं कृतं तेन समाससहस्त्रं रहस्यमेतत्पितरो वदन्ति॥ १४ माघेऽसिते पञ्चदशी कदाचि- दुपैति योगं यदि वारुणेन। ऋक्षेण कालस्स परः पितॄणां न ह्यल्पपुण्यैर्नृप लभ्यतेऽसौ॥ १५ काले धनिष्ठा यदि नाम तस्मि- न्भवेत्तु भूपाल तदा पितृभ्यः। दत्तं जलान्नं प्रददाति तृप्तिं वर्षायुतं तत्कुलजैर्मनुष्यैः॥ १६ तत्रैव चेद्भाद्रपदा नु पूर्वा काले यथावत्क्रियते पितृभ्यः।

जो अमावास्या अनुराधा, विशाखा या स्वातिनक्षत्रयुक्ता हो उसमें श्राद्ध करनेसे पितृगण आठ वर्षतक तृप्त रहते हैं॥ ७॥ तथा जो अमावास्या पुष्य, आर्द्रा या पुनर्वसु नक्षत्रयुक्ता हो उसमें पूजित होनेसे पितृगण बारह वर्षतक तृप्त रहते हैं॥ ८॥

जो पुरुष पितृगण और देवगणको तृप्त करना चाहते हों उनके लिये धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपदा अथवा शतभिषानक्षत्रयुक्त अमावास्या अति दुर्लभ है॥ ९॥ हे पृथिवीपते! जब अमावास्या इन नौ नक्षत्रोंसे युक्त होती है उस समय किया हुआ श्राद्ध पितृगणको अत्यन्त तृप्तिदायक होता है। इनके अतिरिक्त पितृभक्त इलापुत्र महात्मा पुरूरवाके अति विनीत भावसे पूछनेपर श्रीसनत्कुमारजीने जिनका वर्णन किया था वे अन्य तिथियाँ भी सुनो॥ १०-११॥

श्रीसनत्कुमारजी बोले— वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी तथा माघमासकी अमावास्या—इन चार तिथियोंको पुराणोंमें 'युगाद्या' कहा है। ये चारों तिथियाँ अनन्त पुण्यदायिनी हैं। चन्द्रमा या सूर्यके ग्रहणके समय, तीन अष्टकाओंमें अथवा उत्तरायण या दक्षिणायनके आरम्भमें जो पुरुष एकाग्रचित्तसे पितृगणको तिलसहित जल भी दान करता है वह मानो एक सहस्त्र वर्षके लिये श्राद्ध कर देता है—यह परम रहस्य स्वयं पितृगण ही कहते हैं॥ १२-१४॥

यदि कदाचित् माघकी अमावास्याका शतभिषानक्षत्रसे योग हो जाय तो पितृगणकी तृप्तिके लिये यह परम उत्कृष्ट काल होता है। हे राजन्! अल्प पुण्यवान् पुरुषोंको ऐसा समय नहीं मिलता॥ १५॥ और यदि उस समय (माघकी अमावास्यामें) धनिष्ठानक्षत्रका योग हो तब तो अपने ही कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषद्वारा दिये हुए अन्नोदकसे पितृगणकी दस सहस्र वर्षतक तृप्ति रहती है॥ १६॥ तथा यदि उसके साथ पूर्वाभाद्रपादनक्षत्रका योग हो और उस समय पितृगणके लिये श्राद्ध किया जाय तो उन्हें

२१४ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४

श्राद्धं परां तृप्तिमुपेत्य तेन युगं सहस्त्रं पितरस्स्वपन्ति ॥ १७ गंगां शतद्रूं यमुनां विपाशां सरस्वतीं नैमिषगोमतीं वा। तत्रावगाह्यार्चनमादरेण कृत्वा पितॄणां दुरितानि हन्ति ॥ १८ गायन्ति चैतत्पितरः कदानु वर्षामघात्तृप्तिमवाप्य भूयः। माघासितान्ते शुभतीर्थतोयै- र्यास्याम तृप्तिं तनयादिदत्तैः ॥ १९ चित्तं च वित्तं च नृणां विशुद्धं शस्तश्च कालः कथितो विधिश्च। पात्रं यथोक्तं परमा च भक्ति- र्नृणां प्रयच्छन्त्यभिवाञ्छितानि ॥ २० पितृगीतांस्तथैवात्र श्लोकांस्ताञ्छृणु पार्थिव। श्रुत्वा तथैव भवता भाव्यं तत्रादृतात्मना ॥ २१ अपि धन्यः कुले जायादस्माकं मतिमान्नरः। अकुर्वन्वित्तशाठ्यं यः पिण्डान्नॆ निर्वपिष्यति ॥ २२ रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु। विभवे सति विप्रेभ्यो योऽस्मानुद्दिश्य दास्यति ॥ २३ अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेऽस्मिन्भक्तिनम्रधीः। भोजयिष्यति विप्राग्र्यांस्तन्मात्रविभवो नरः ॥ २४ असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तितः। प्रदास्यति द्विजाग्रेभ्यः स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम् ॥ २५ तत्राप्यसामर्थ्ययुतः कराग्राग्रस्थितांस्तिलान्। प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद्द्रूप दास्यति ॥ २६ तिलैस्सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलाञ्जलिम्। भक्तिनम्रस्समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति ॥ २७ यतः कुतश्चित्सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवाहिकम्। अभावे प्रीणयन्नस्माञ्छ्रद्धायुक्तः प्रदास्यति ॥ २८ सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शकः। सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ॥ २९

परम तृप्ति प्राप्त होती है और वे एक सहस्र युगतक शयन करते रहते हैं॥ १७॥ गंगा, शतद्रू, यमुना, विपाशा, सरस्वती और नैमिषारण्यस्थिता गोमतीमें स्नान करके पितृगणका आदरपूर्वक अर्चन करनेसे मनुष्य समस्त पापोंको नष्ट कर देता है॥ १८॥ पितृगण सर्वदा यह गान करते हैं कि वर्षाकाल (भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी)-के मघानक्षत्रमें तृप्त होकर फिर माघकी अमावास्याको अपने पुत्र-पौत्रादिद्वारा दी गयी पुण्यतीर्थोकी जलांजलिसे हम कब तृप्ति लाभ करेंगे'॥ १९॥ विशुद्ध चित्त, शुद्ध धन, प्रशस्त काल, उपर्युक्त विधि, योग्य पात्र औरपरम भक्ति-ये सब मनुष्यको इच्छित फल देते हैं॥ २०॥

हे पार्थिव! अब तुम पितृगणके गाये हुए कुछ श्लोकोंका श्रवण करो, उन्हें सुनकर तुम्हें आदरपूर्वक वैसा ही आचरण करना चाहिये॥ २१॥ [पितृगण कहते हैं-] 'हमारे कुलमें क्या कोई ऐसा मतिमान् धन्य पुरुष उत्पन्न होगा जो वित्तलोलुपताको छोड़कर हमें पिण्डदान देगा॥ २२॥ जो सम्पत्ति होनेपर हमारे उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको रत्न, वस्त्र, यान और सम्पूर्ण भोगसामग्री देगा॥ २३॥ अथवा अन्न-वस्त्र मात्र वैभव होनेसे जो श्राद्धकालमें भक्ति-विनम्र चित्तसे उत्तम ब्राह्मणोंको यथाशक्ति अन्न ही भोजन करायेगा॥ २४॥ या अन्नदानमें भी असमर्थ होनेपर जो ब्राह्मणश्रेष्ठोंको कच्चा धान्य और थोड़ी-सी दक्षिणा ही देगा॥ २५॥ और यदि इसमें भी असमर्थ होगा तो किन्हीं द्विजश्रेष्ठको प्रणाम कर एक मुट्ठी तिल ही देगा॥ २६॥ अथवा हमारे उद्देश्यसे पृथिवीपर भक्ति-विनम्र चित्तसे सात-आठ तिलोंसे युक्त जलांजलि ही देगा॥ २७॥ और यदि इसका भी अभाव होगा तो कहीं-न-कहींसे एक दिनका चारा लाकर प्रीति और श्रद्धापूर्वक हमारे उद्देश्यसे गौको खिलायेगा॥ २८॥ तथा इन सभी वस्तुओंका अभाव होनेपर जो वनमें जाकर अपने कक्षमूल (बगल) को दिखाता हुआ सूर्य आदि दिक्पालोंसे उच्च स्वरसे यह कहेगा॥ २९॥

अ० १५ ] * तृतीय अंश * २१५

न मेऽस्ति वित्तं न धनं च नान्य-
  च्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ
  कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ॥ ३०

'मेरे पास श्राद्धकर्मके योग्य न वित्त है, न धन है और न कोई अन्य सामग्री है, अतः मैं अपने पितृगणको नमस्कार करता हूँ, वे मेरी भक्तिसे ही तृप्ति लाभ करें। मैंने अपनी दोनों भुजाएँ आकाशमें उठा रखी हैं' ॥ ३० ॥

और्व उवाच

इत्येतत्पितृभिर्गीतं भावाभावप्रयोजनम्।
यः करोति कृतं तेन श्राद्धं भवति पार्थिव ॥ ३१

और्व बोले—हे राजन्! धनके होने अथवा न होनेपर पितृगणने जिस प्रकार बतलाया है वैसा ही जो पुरुष आचरण करता है वह उस आचारसे विधिपूर्वक श्राद्ध ही कर देता है ॥ ३१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

श्राद्ध-विधि

और्व उवाच
ब्राह्मणाम्भोजयेच्छ्राद्धे यद्गुणांस्तान्निबोध मे ॥ १
त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुस्त्रिसुपर्णष्षडङ्गवित्।
वेदविच्छ्रोत्रियो योगी तथा वै ज्येष्ठसामगः ॥ २
ऋत्विक्स्वस्रेयदौहित्रजामातृश्वशुरास्तथा।
मातुलोऽथ तपवनिष्ठः पञ्चाग्न्यभिरतस्तथा।
शिष्यास्सम्बन्धिनश्चैव मातापितृरतश्च यः ॥ ३
एतान्नियोजयेच्छ्राद्धे पूर्वोक्तानप्रथमे नृप।
ब्राह्मणान्‍पितृतृप्त्यर्थमनुकल्पेष्वनन्तरान् ॥ ४
मित्रध्रुक्कुनखी क्लीबश्श्यावदन्तस्तथा द्विजः।
कन्यादूषयिता वह्निवेदोज्झस्सोमविक्रयी ॥ ५
अभिशस्तस्तथा स्तेनः पिशुनो ग्रामयाजकः।
भृतकाध्यापकस्तद्वद्भृतकाध्यापितश्च यः ॥ ६
परपूर्वापतिश्चैव मातापित्रोस्तथोज्झकः।
वृषलीसूपतिपोष्टा च वृषलीपतिरेव च ॥ ७
तथा देवलकश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति केतनम् ॥ ८

और्व बोले—हे राजन्! श्राद्धकालमें जैसे गुणशील ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये वह बतलाता हूँ, सुनो। त्रिणाचिकेत$^१$, त्रिमधु$^२$, त्रिसुपर्ण$^३$, छहों वेदांगोंके जाननेवाले, वेदवेत्ता, श्रोत्रिय, योगी और ज्येष्ठसामग तथा ऋत्विक्, भानजे, दौहित्र, जामाता, श्वशुर, मामा, तपस्वी, पंचाग्नि तपनेवाले, शिष्य, सम्बन्धी और माता-पिताके प्रेमी इन ब्राह्मणोंको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करे। इनमेंसे [त्रिणाचिकेत आदि] पहले कहे हुओंको पूर्वकालमें नियुक्त करे और [ऋत्विक् आदि] पीछे बतलाये हुओंको पितरोंकी तृप्तिके लिये उत्तरकर्ममें भोजन करावे ॥ १—४ ॥
मित्रघाती, स्वभावसे ही विकृत नखोंवाला, नपुंसक, काले दाँतोंवाला, कन्यागामी, अग्नि और वेदका त्याग करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, लोकनिन्दित, चोर, चुगलखोर, ग्रामपुरोहित, वेतन लेकर पढ़ानेवाला अथवा पढ़नेवाला, पुनर्विवाहिताका पति, माता-पिताका त्याग करनेवाला, शूद्रकी सन्तानका पालन करनेवाला, शूद्राका पति तथा देवोपजीवी ब्राह्मण श्राद्धमें निमन्त्रण देनेयोग्य नहीं है ॥ ५–८ ॥


१-द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन अनुवाकोंको 'त्रिणाचिकेत' कहते हैं, उसको पढ़नेवाला या उसका अनुष्ठान करनेवाला।
२-'मधुवाताः' इत्यादि ऋचाका अध्ययन और मधुव्रतका आचरण करनेवाला।
३-'ब्रह्ममेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।

२१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


प्रथमेऽह्नि बुधश्शस्ताञ्छ्रोत्रियादीन्निमन्त्रयेत्। कथयेच्च तथैवैषां नियोगात्पितृदैविकान् ॥ ९

ततः क्रोधव्यवायादीनायासं तैर्द्विजैस्सह। यजमानो न कुर्वीत दोषस्तत्र महानयम् ॥ १०

श्राद्धे नियुक्तो भुक्त्वा वा भोजयित्वा नियुज्य च। व्यवायी रेतसो गर्ते मज्जयत्यात्मनः पितॄन् ॥ ११

तस्मात्प्रथममत्रोक्तं द्विजाग्र्याणां निमन्त्रणम्। अनिमन्त्र्य द्विजानेवमागतान्भोजयेद्यतीन् ॥ १२

पादशौचादिना गेहमागतानूजयेद् द्विजान् ॥ १३

पवित्रपाणिराचान्तानासनेषूपवेशयेत् । पितॄणामयुजो युग्मान्देवानामिच्छया द्विजान् ॥ १४

देवानामेकमेकं वा पितॄणां च नियोजयेत् ॥ १५

तथा मातामहश्राद्धं वैश्वदेवसमन्वितम्। कुर्वीत भक्तिसम्पन्नस्तन्त्रं वा वैश्वदैविकम् ॥ १६

प्राङ्मुखान्भोजयेद्विप्रान्देवानामुभयात्मकान्। पितॄमातामहानां च भोजयेच्चाप्युदङ्मुखान् ॥ १७

पृथक्तयोः केचिदाहुः श्राद्धस्य करणं नृप। एकत्रैकेन पाकेन वदन्त्यन्ये महर्षयः ॥ १८

विष्टरार्थं कुशं दत्त्वा सम्पूज्यार्घ्यं विधानतः। कुर्यादावाहनं प्राज्ञो देवानां तदनुज्ञया ॥ १९

यवाम्बुना च देवानां दद्यादर्घ्यं विधानवित्। स्रग्गन्धधूपदीपांश्च तेभ्यो दद्याद्यथाविधि ॥ २०

पितॄणामपसव्यं तत्सर्वमेवोपकल्पयेत्। अनुज्ञां च ततः प्राप्य दत्त्वा दर्भांन्द्विधाकृतान् ॥ २१

मन्त्रपूर्वं पितॄणां तु कुर्याच्चावाहनं बुधः। तिलाम्बुना चापसव्यं दद्यादर्घ्यादिकं नृप ॥ २२

काले तत्रातिथिं प्राप्तमन्नकामं नृपाध्वगम्। ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः कामं तमपि भोजयेत् ॥ २३


श्राद्धके पहले दिन बुद्धिमान् पुरुष श्रोत्रिय आदि विहित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और उनसे यह कह दे कि 'आपको पितृ-श्राद्धमें और आपको विश्वेदेव-श्राद्धमें नियुक्त होना है'॥ ९॥ उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके सहित श्राद्ध करनेवाला पुरुष उस दिन क्रोधादि तथा स्त्रीगमन और परिश्रम आदि न करे, क्योंकि श्राद्ध करनेमें यह महान् दोष माना गया है॥ १०॥ श्राद्धमें निमन्त्रित होकर या भोजन करके अथवा निमन्त्रण करके या भोजन कराकर जो पुरुष स्त्री-प्रसंग करता है वह अपने पितृगणको मानो वीर्यके कुण्डमें डुबोता है॥ ११॥ अतः श्राद्धके प्रथम दिन पहले तो उपरोक्त गुणविशिष्ट द्विजश्रेष्ठोंको निमन्त्रित करे और यदि उस दिन कोई अनिमन्त्रित तपस्वी ब्राह्मण घर आ जायँ तो उन्हें भी भोजन करावे॥ १२॥

घर आये हुए ब्राह्मणोंका पहले पाद-शुद्धि आदिसे सत्कार करे; फिर हाथ धोकर उन्हें आचमन करानेके अनन्तर आसनपर बिठावे। अपनी सामर्थ्यानुसार पितृगणके लिये अयुग्म और देवगणके लिये युग्म ब्राह्मण नियुक्त करे अथवा दोनों पक्षोंके लिये एक-एक ब्राह्मणकी ही नियुक्ति करे॥ १३-१५॥ और इसी प्रकार वैश्वदेवके सहित मातामह-श्राद्ध करे अथवा पितृपक्ष और मातामह-पक्ष दोनोंके लिये भक्तिपूर्वक एक ही वैश्वदेव-श्राद्ध करे॥ १६॥ देव-पक्षके ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाकर और पितृ-पक्ष तथा मातामह-पक्षके ब्राह्मणोंको उत्तर-मुख बिठाकर भोजन करावे॥ १७॥ हे नृप! कोई तो पितृ-पक्ष और मातामह-पक्षके श्राद्धोंको अलग-अलग करनेके लिये कहते हैं और कोई महर्षि दोनोंका एक साथ एक पाकमें ही अनुष्ठान करनेके पक्षमें हैं॥ १८॥ विज्ञ व्यक्ति प्रथम निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठनेके लिये कुशा बिछाकर फिर अर्घ्यदान आदिसे विधिपूर्वक पूजा कर उनकी अनुमतिसे देवताओंका आवाहन करे॥ १९॥ तदनन्तर श्राद्धविधिको जाननेवाला पुरुष यव-मिश्रित जलसे देवताओंको अर्घ्यदान करे और उन्हें विधिपूर्वक धूप, दीप, गन्ध तथा माला आदि निवेदन करे॥ २०॥ ये समस्त उपचार पितृगणके लिये अपसव्य भावसे* निवेदन करे; और फिर ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे दो भागोंमें बँटे हुए कुशाओंका दान करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक पितृगणका आवाहन करे, तथा हे राजन्! अपसव्य-भावसे तिलोदकसे अर्घ्यादि दे॥ २१-२२॥

हे नृप! उस समय यदि कोई भूखा पथिक अतिथि-रूपसे आ जाय तो निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उसे भी यथेच्छ भोजन करावे॥ २३॥


* यज्ञोपवीतको दायें कन्धेपर करके।

अ० १५] * तृतीय अंश * २१७

योगिनो विविधै रूपैर्नराणामुपकारिणः । भ्रमन्ति पृथिवीमेतामविज्ञातस्वरूपिणः ॥ २४ तस्मादभ्यर्चयेत्प्राप्तं श्राद्धकालेऽतिथिं बुधः । श्राद्धक्रियाफलं हन्ति नरेन्द्र्रापूजितोऽतिथिः ॥ २५ जुहुयाद्व्यञ्जनक्षारवर्जमन्नं ततोऽनले। अनुज्ञातो द्विजैस्तैस्तु त्रिकृत्वः पुरुषर्षभ ॥ २६ अग्नये कव्यवाहाय स्वाहेत्यादौ नृपाहुतिः । सोमाय वै पितृमते दातव्या तदनन्तरम् ॥ २७ वैवस्वताय चैवान्या तृतीया दीयते ततः । हुतावशिष्टमल्पान्नं विप्रपात्रेषु निर्वपेत् ॥ २८ ततोऽन्नं मृष्टमत्यर्थमभीष्टमतिसंस्कृतम् । दत्त्वा जुषध्वमिच्छातो वाच्यमेतदनिष्ठुरम् ॥ २९ भोक्तव्यं तैश्च तच्चित्तैर्मौनिभिस्सुमुखैः सुखम्। अक्रुद्ध्यता चात्वरता देयं तेनापि भक्तितः ॥ ३० रक्षोघ्नमन्त्रपठनं भूमेरास्तरणं तिलैः । कृत्वा ध्येयास्स्वपितरस्त एव द्विजसत्तमाः ॥ ३१ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । मम तृप्तिं प्रयान्त्वद्य विप्रदेहेषु संस्थिताः ॥ ३२ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । मम तृप्तिं प्रयान्त्वद्य होमाप्यायितमूर्तयः ॥ ३३ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । तृप्तिं प्रयान्तु पिण्डेन मया दत्तेन भूतले ॥ ३४ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । तृप्तिं प्रयान्तु मे भक्त्या मयैतत्समुदाहृतम् ॥ ३५ मातामहस्तृप्तिमुपैतु तस्य तथा पिता तस्य पिता ततोऽन्यः । विश्वे च देवाः परमां प्रयान्तु तृप्तिं प्रणश्यन्तु च यातुधानाः ॥ ३६ यज्ञेश्वरो हव्यसमस्तकव्य- भोक्ताव्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र ।

अनेक अज्ञात-स्वरूप योगिगण मनुष्योंके कल्याणकी कामनासे नाना रूप धारणकर पृथिवीतलपर विचरते रहते हैं ॥ २४ ॥ अतः विज्ञ पुरुष श्राद्धकालमें आये हुए अतिथिका अवश्य सत्कार करे। हे नरेन्द्र! उस समय अतिथिका सत्कार न करनेसे वह श्राद्ध-क्रियाके सम्पूर्ण फलको नष्ट कर देता है ॥ २५ ॥

हे पुरुषश्रेष्ठ ! तदनन्तर उन ब्राह्मणोंकी आज्ञासे शाक और लवणहीन अन्नसे अग्निमें तीन बार आहुति दे ॥ २६ ॥ हे राजन् ! उनमेंसे 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे पहली आहुति, 'सोमाय पितृमते स्वाहा' इससे दूसरी और 'वैवस्वताय स्वाहा' इस मन्त्रसे तीसरी आहुति दे। तदनन्तर आहुतियोंसे बचे हुए अन्नको थोड़ा-थोड़ा सब ब्राह्मणोंके पात्रोंमें परोस दे ॥ २७-२८ ॥

फिर रुचिके अनुकूल अति संस्कारयुक्त मधुर अन्न सबको परोसे और अति मृदुल वाणीसे कहे कि 'आप भोजन कीजिये' ॥ २९ ॥ ब्राह्मणोंको भी तद्गतचित्त और मौन होकर प्रसन्नमुखसे सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये तथा यजमानको क्रोध और उतावलेपनको छोड़कर भक्तिपूर्वक परोसते रहना चाहिये ॥ ३० ॥ फिर 'रक्षोघ्न'* मन्त्रका पाठ कर श्राद्धभूमिपर तिल छिड़के तथा अपने पितृरूपसे उन द्विजश्रेष्ठोंका ही चिन्तन करे ॥ ३१ ॥ [ और कहे कि] 'इन ब्राह्मणोंके शरीरोंमें स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज तृप्ति लाभ करें ॥ ३२ ॥ होमद्वारा सबल होकर मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आज तृप्ति लाभ करें ॥ ३३ ॥ मैंने जो पृथिवीपर पिण्डदान किया है उससे मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह तृप्ति लाभ करें ॥ ३४ ॥ [ श्राद्धरूपसे कुछ भी निवेदन न कर सकनेके कारण] मैंने भक्तिपूर्वक जो कुछ कहा है उस मेरे भक्तिभावसे ही मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह तृप्ति लाभ करें ॥ ३५ ॥ मेरे मातामह (नाना), उनके पिता और उनके भी पिता तथा विश्वेदेवगण परम तृप्ति लाभ करें तथा समस्त राक्षसगण नष्ट हों ॥ ३६ ॥ यहाँ समस्त हव्य-कव्यके भोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् हरि विराजमान हैं,

* 'ॐ अपहता असुरा रक्षाँसि वेदिषदः' इत्यादि।

२१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्सन्निधानादपयान्तु सद्यो<br>रक्षांस्यशेषाण्यसुराश्च सर्वे ॥ ३७अतः उनकी सन्निधिके कारण समस्त राक्षस और असुरगण यहाँसे तुरन्त भाग जायँ' ॥ ३७ ॥
तृप्तेष्वेतेषु विकिरेदन्नं विप्रेषु भूतले।<br>दद्यादाचमनार्थाय तेभ्यो वारि सकृत्सकृत् ॥ ३८तदनन्तर ब्राह्मणोंके तृप्त हो जानेपर थोड़ा-सा अन्न पृथिवीपर डाले और आचमनके लिये उन्हें एक-एक बार और जल दे ॥ ३८ ॥
सुतृप्तैस्तैरनुज्ञातस्सर्वैणान्नेन भूतले।<br>सतिलेन ततः पिण्डान्सम्यग्दद्यात्समाहितः ॥ ३९फिर भलीप्रकार तृप्त हुए उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा होनेपर समाहितचित्तसे पृथिवीपर अन्न और तिलके पिण्ड-दान करे ॥ ३९ ॥
पितृतीर्थेन सतिलं तथैव सलिलाञ्जलिम्।<br>मातामहेभ्यस्तेनैव पिण्डांस्तीर्थेन निर्वपेत् ॥ ४०और पितृतीर्थसे तिलयुक्त जलांजलि दे तथा मातामह आदिको भी उस पितृतीर्थसे ही पिण्ड-दान करे ॥ ४० ॥
दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु पुष्पधूपादिपूजितम्।<br>स्वपित्रे प्रथमं पिण्डं दद्यादुच्छिष्टसन्निधौ ॥ ४१ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट (जूठन)-के निकट दक्षिणकी ओर अग्रभाग करके बिछाये हुए कुशाओंपर पहले अपने पिताके लिये पुष्प-धूपादिसे पूजित पिण्डदान करे ॥ ४१ ॥
पितामहाय चैवान्यं तत्पित्रे च तथापरम्।<br>दर्भमूले लेपभुजः प्रीणयेल्लेपघर्षणैः ॥ ४२तत्पश्चात् एक पिण्ड पितामहके लिये और एक प्रपितामहके लिये दे और फिर कुशाओंके मूलमें हाथमें लगे अन्नको पोंछकर ['लेपभागभुजस्तृप्यन्ताम्' ऐसा उच्चारण करते हुए ] लेपभोजी पितृगणको तृप्त करे ॥ ४२ ॥
पिण्डैर्मातामहांस्तद्वद्गन्धमाल्यादिसंयुतैः।<br>पूजयित्वा द्विजाग्र्याणां दद्याच्चाचमनं ततः ॥ ४३इसी प्रकार गन्ध और मालादियुक्त पिण्डोंसे मातामह आदिका पूजन कर फिर द्विजश्रेष्ठोंको आचमन करावे ॥ ४३ ॥
पितृभ्यः प्रथमं भक्त्या तन्मनस्को नरेश्वर।<br>सुस्वधेत्याशिषा युक्तां दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम् ॥ ४४और हे नरेश्वर ! इसके पीछे भक्तिभावसे तन्मय होकर पहले पितृपक्षीय ब्राह्मणोंका 'सुस्वधा' यह आशीर्वाद ग्रहण करता हुआ यथाशक्ति दक्षिणा दे ॥ ४४ ॥
दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो वाचयेद्वैश्वदेविकान्।<br>प्रीयन्तामिह ये विश्वेदेवास्तेन इतीरयेत् ॥ ४५फिर वैश्वदैविक ब्राह्मणोंके निकट जा उन्हें दक्षिणा देकर कहे कि 'इस दक्षिणासे विश्वेदेवगण प्रसन्न हों' ॥ ४५ ॥
तथेति चोक्ते तैर्विप्रैः प्रार्थनीयास्तथाशिषः।<br>पश्चाद्विसर्जयेद्देवान्पूर्वं पित्र्यान्महीपते ॥ ४६उन ब्राह्मणोंके 'तथास्तु' कहनेपर उनसे आशीर्वादके लिये प्रार्थना करे और फिर पहले पितृपक्षके और पीछे देवपक्षके ब्राह्मणोंको विदा करे ॥ ४६ ॥
मातामहानामप्येवं सह देवैः क्रमः स्मृतः।<br>भोजने च स्वशक्त्या च दाने तद्वद्विसर्जने ॥ ४७विश्वेदेवगणके सहित मातामह आदिके श्राद्धमें भी ब्राह्मण-भोजन, दान और विसर्जन आदिकी यही विधि बतलायी गयी है ॥ ४७ ॥
आपादशौचनात्पूर्वं कुर्याद्देवद्विजन्मसु।<br>विसर्जनं तु प्रथमं पैत्रमातामहेषु वै ॥ ४८पितृ और मातामह दोनों ही पक्षोंके श्राद्धोंमें पादशौच आदि सभी कर्म पहले देवपक्षके ब्राह्मणोंके करे; परन्तु विदा पहले पितृपक्षीय अथवा मातामहपक्षीय ब्राह्मणोंकी ही करे ॥ ४८ ॥
विसर्जयेत्प्रीतिवचस्सम्मान्याभ्यर्थितांस्ततः।<br>निवर्त्तेताभ्यनुज्ञात आद्वारं ताननुव्रजेत् ॥ ४९तदनन्तर प्रीतिवचन और सम्मानपूर्वक ब्राह्मणोंको विदा करे और उनके जानेके समय द्वारतक उनके पीछे-पीछे जाय तथा जब वे आज्ञा दें तो लौट आवे ॥ ४९ ॥
ततस्तु वैश्वदेवाख्यं कुर्यान्नित्यक्रियां बुधः।<br>भुञ्जीयाच्चैव समं पूज्यभृत्यबन्धुभिरात्मनः ॥ ५०फिर विज्ञ पुरुष वैश्वदेव नामक नित्यकर्म करे और अपने पूज्य पुरुष, बन्धुजन तथा भृत्यगणके सहित स्वयं भोजन करे ॥ ५० ॥
एवं श्राद्धं बुधः कुर्यात्पित्र्यं मातामहं तथा।<br>श्राद्धैराप्यायिता दद्युस्सर्वान्कामान्पितामहाः ॥ ५१बुद्धिमान् पुरुष इस प्रकार पैत्र्य और मातामह-श्राद्धका अनुष्ठान करे। श्राद्धसे तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ ५१ ॥

अ० १६ ] * तृतीय अंश * २१९


त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।
रजतस्य तथा दानं कथासंकीर्तनादिकम्॥ ५२

वर्ज्यानि कुर्वता श्राद्धं क्रोधोऽध्वगमनं त्वरा।
भोक्तुरप्यत्र राजेन्द्र त्रयमेतन्न शस्यते॥ ५३

विश्वेदेवास्सपितरस्तथा मातामहा नृप।
कुलं चाप्यायते पुंसां सर्वं श्राद्धं प्रकुर्वताम्॥ ५४

सोमाधारः पितृगणो योगाधारश्च चन्द्रमाः।
श्राद्धे योगिनियोगस्तु तस्माद्भूपाल शस्यते॥ ५५

सहस्रस्यापि विप्राणां योगी चेत्पुरतः स्थितः।
सर्वान्भोक्तूंस्तारयति यजमानं तथा नृप॥ ५६

दौहित्र (लड़कीका लड़का), कुतप (दिनका आठवाँ मुहूर्त) और तिल—ये तीन तथा चाँदीका दान और उसकी बातचीत करना—ये सब श्राद्धकालमें पवित्र माने गये हैं॥ ५२॥ हे राजेन्द्र! श्राद्धकर्ताके लिये क्रोध, मार्गगमन और उतावलापन—ये तीन बातें वर्जित हैं; तथा श्राद्धमें भोजन करनेवालोंको भी इन तीनोंका करना उचित नहीं है॥ ५३॥

हे राजन्! श्राद्ध करनेवाले पुरुषसे विश्वेदेवगण, पितृगण, मातामह तथा कुटुम्बीजन—सभी सन्तुष्ट रहते हैं॥ ५४॥ हे भूपाल! पितृगणका आधार चन्द्रमा है और चन्द्रमाका आधार योग है, इसलिये श्राद्धमें योगिजनको नियुक्त करना अति उत्तम है॥ ५५॥ हे राजन्! यदि श्राद्धभोजी एक सहस्र ब्राह्मणोंके सम्मुख एक योगी भी हो तो वह यजमानके सहित उन सबका उद्धार कर देता है॥ ५६॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेंऽशे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥


सोलहवाँ अध्याय

श्राद्ध-कर्ममें विहित और अविहित वस्तुओंका विचार

और्व उवाच
हविष्यमत्स्यमांसैस्तु शशस्य नकुलस्य च।
सौकरच्छागलैणेयौरवैर्र्गवयेन च॥ १

औरभ्रगव्यैश्च तथा मासवृद्ध्या पितामहाः।
प्रयान्ति तृप्तिं मांसैस्तु नित्यं वार्ध्रीणसामिषैः॥ २

खड्गमांसमतीवात्र कालशाकं तथा मधु।
शस्तानि कर्मण्यत्यन्ततृप्तिदानि नरेश्वर॥ ३

और्व बोले— हवि, मत्स्य, शशक (खरगोश), नकुल, शूकर, छाग, कस्तूरिया मृग, कृष्ण मृग, गवय (वनगाय) और मेषके मांसोंसे तथा गव्य (गौके दूध-घी आदि)-से पितृगण क्रमशः एक-एक मास अधिक तृप्ति लाभ करते हैं और वार्ध्रीणस पक्षीके मांससे सदा तृप्त रहते हैं॥ १-२॥ हे नरेश्वर! श्राद्धकर्ममें गेंडेका मांस, कालशाक और मधु अत्यन्त प्रशस्त और अत्यन्त तृप्तिदायक हैं*॥ ३॥


* इन तीन श्लोकोंका मूलके अनुसार अनुवाद कर दिया गया है। समझमें नहीं आता, इस व्यवस्थाका क्या रहस्य है? मालूम होता है, श्रुति-स्मृतिमें जहाँ कहीं मांसका विधान है, वह स्वाभाविक मांसभोजी मनुष्योंकी प्रवृत्तिको संकुचित और नियमित करनेके लिये ही है। सभी जगह उत्कृष्ट धर्म तो मांसभक्षणका सर्वथा त्याग ही माना गया है। मनुस्मृति अ० ५ में मांसप्रकरणका उपसंहार करते हुए श्लोक ४५ से ५६ तक मांसभक्षणकी निन्दा और निरामिष आहारकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है। श्राद्धकर्ममें मांस कितना निन्दनीय है, यह श्रीमद्भागवत सप्तम स्कन्ध अध्याय १५ के इन श्लोकोंसे स्पष्ट हो जाता है—

न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित्। मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया॥ ७॥
नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम्। न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः॥ ८॥
द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति। एष माऽकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम्॥ १०॥

अर्थ- धर्मके मर्मको समझनेवाला पुरुष श्राद्धमें [खानेके लिये] मांस न दे और न स्वयं ही खाय, क्योंकि पितृगणकी तृप्ति जैसी मुनिजनोचित आहारसे होती है वैसी पशुहिंसासे नहीं होती॥ ७॥ सद्धर्मकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये 'सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और शरीरसे दण्डका त्याग कर देना'—इसके समान और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है॥ ८॥ पुरुषको द्रव्ययज्ञसे यजन करते देखकर जीव डरते हैं कि यह अपने ही प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दय अज्ञानी मुझे अवश्य मार डालेगा॥ १०॥

२२० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १६


गयामुपेत्य यः श्राद्धं करोति पृथिवीपते ।
सफलं तस्य तज्जन्म जायते पितृतुष्टिदम् ॥ ४

प्रशान्तिकासस्नीवाराश्श्यामाका द्विविधास्तथा ।
वन्यौषधीप्रधानास्तु श्राद्धार्हाः पुरुषर्षभ ॥ ५

यवाः प्रियंगवो मुद्गा गोधूमा व्रीहयस्तिलाः ।
निष्पावाः कोविदाराश्च सर्षपाश्चात्र शोभनाः ॥ ६

अकृताग्रयणं यच्च धान्यजातं नरेश्वर ।
राजमाषानणूम्श्चैव मसूरांश्च विसर्जयेत् ॥ ७

अलाबुं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं पिण्डमूलकम् ।
गान्धारककरम्बादिलवणान्यौषराणि च ॥ ८

आरक्ताश्चैव निर्यासाः प्रत्यक्षलवणानि च ।
वर्ज्यान्येतानि वै श्राद्धे यच्च वाचा न शस्यते ॥ ९

नक्ताहृतमनुच्छिन्नं तृप्यते न च यत्र गौः ।
दुर्गन्धि फेनिलं चाम्बु श्राद्धयोग्यं न पार्थिव ॥ १०

क्षीरमेकशफानां यदौष्ट्रमाविकमेव च ।
मार्गं च माहिषं चैव वर्जयेच्छ्राद्धकर्मणि ॥ ११

षण्ढापविद्धचाण्डालपापिपाषण्डिरोगिभिः ।
कृकवाकुश्वनग्नैश्च वानरग्रामसूकरैः ॥ १२

उदक्यासूतकाशौचिमृतहारैश्च वीक्षिते ।
श्राद्धे सुरा न पितरो भुञ्जते पुरुषर्षभ ॥ १३

तस्मात्परिश्रिते कुर्याच्छ्राद्धं श्रद्धासमन्वितः ।
उर्व्यां च तिलविक्षेपाद्यातुधानान्निवारयेत् ॥ १४

नखादिना चोपपन्नं केशकीटादिभिर्नृप ।
न चैवाभिश्वैर्मिश्रमन्नं पर्युषितं तथा ॥ १५

श्रद्धासमन्वितैर्दत्तं पितृभ्यो नामगोत्रतः ।
यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत् ॥ १६

श्रूयते चापि पितृभिर्गीता गाथा महीपते ।
इक्ष्वाकोर्मनुपुत्रस्य कलापोपवने पुरा ॥ १७

अपि नस्ते भविष्यन्ति कुले सन्मार्गशीलिनः ।
गयामुपेत्य ये पिण्डान्दास्यन्त्यस्माकमादरात् ॥ १८

अपि नस्स कुले जायाद्यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् ।
पायसं मधुसर्पिर्भ्यां वर्षासु च मघासु च ॥ १९


हे पृथिवीपते ! जो पुरुष गयामें जाकर श्राद्ध करता है, उसका पितृगणको तृप्ति देनेवाला वह जन्म सफल हो जाता है ॥ ४ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! देवधान्य, नीवार और श्याम तथा श्वेत वर्णके श्यामाक (सावाँ) एवं प्रधान-प्रधान वन्यौषधियाँ श्राद्धके उपयुक्त द्रव्य हैं ॥ ५ ॥ जौ, काँगनी, मूँग, गेहूँ, धान, तिल, मटर, कचनार और सरसों—इन सबका श्राद्धमें होना अच्छा है ॥ ६ ॥

हे राजेश्वर ! जिस अन्नसे नवान्न यज्ञ न किया गया हो तथा बड़े उड़द, छोटे उड़द, मसूर, कद्दू, गाजर, प्याज, शलजम, गान्धारक (शालिविशेष) बिना तुषके गिरे हुए धान्यका आटा, ऊसर भूमिमें उत्पन्न हुआ लवण, हींग आदि कुछ-कुछ लाल रंगकी वस्तुएँ, प्रत्यक्ष लवण और कुछ अन्य वस्तुएँ जिनका शास्त्रमें विधान नहीं है, श्राद्धकर्ममें त्याज्य हैं ॥ ७—९ ॥ हे राजन् ! जो रात्रिके समय लाया गया हो, अप्रतिष्ठित जलाशयका हो, जिसमें गौ तृप्त न हो सकती हो ऐसे गड्ढेका अथवा दुर्गन्ध या फेनयुक्त जल श्राद्धके योग्य नहीं होता ॥ १० ॥ एक खुरवालोंका, ऊँटनीका, भेड़‌का, मृगीका तथा भैंसका दूध श्राद्धकर्ममें काममें न ले ॥ ११ ॥

हे पुरुषर्षभ ! नपुंसक, अपविद्ध (सत्पुरुषोंद्वारा बहिष्कृत), चाण्डाल, पापी, पाषण्डी, रोगी, कुक्कुट, श्वान, नग्न (वैदिक कर्मको त्याग देनेवाला पुरुष) वानर, ग्राम्यशूकर, रजस्वला स्त्री, जन्म अथवा मरणके अशौचसे युक्त व्यक्ति और शव ले जानेवाले पुरुष—इनमेंसे किसीकी भी दृष्टि पड़ जानेसे देवगण अथवा पितृगण कोई भी श्राद्धमें अपना भाग नहीं लेते ॥ १२-१३ ॥ अतः किसी घिरे हुए स्थानमें श्रद्धापूर्वक श्राद्धकर्म करे तथा पृथिवीमें तिल छिड़ककर राक्षसोंको निवृत्त कर दे ॥ १४ ॥

हे राजन् ! श्राद्धमें ऐसा अन्न न दे जिसमें नख, केश या कीड़े आदि हों या जो निचोड़कर निकाले हुए रससे युक्त हो या बासी हो ॥ १५ ॥ श्रद्धायुक्त व्यक्तियोंद्वारा नाम और गोत्रके उच्चारणपूर्वक दिया हुआ अन्न पितृगणको वे जैसे आहारके योग्य होते हैं वैसा ही होकर उन्हें मिलता है ॥ १६ ॥ हे राजन् ! इस सम्बन्धमें एक गाथा सुनी जाती है जो पूर्वकालमें मनुपुत्र महाराज इक्ष्वाकुके प्रति पितृगणने कलाप उपवनमें कही थी ॥ १७ ॥

‘क्या हमारे कुलमें ऐसे सन्मार्ग-शील व्यक्ति होंगे जो गयामें जाकर हमारे लिये आदरपूर्वक पिण्डदान करेंगे ? ॥ १८ ॥ क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष होगा जो वर्षाकालकी मघानक्षत्रयुक्त त्रयोदशीको हमारे उद्देश्यसे मधु और घृतयुक्त पायस (खीर)-का दान करेगा ? ॥ १९ ॥

अ० १७ ] * तृतीय अंश * २२१


गौरीं वाप्युद्वहेत्कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ।
यजेत वाश्वमेधेन विधिवद्दक्षिणावता ॥ २० ॥

अथवा गौरी कन्यासे विवाह करेगा, नीला वृषभ छोड़ेगा या दक्षिणासहित विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ करेगा ?' ॥ २० ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेंऽशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥


सत्रहवाँ अध्याय

नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान्‌की शरणमें जाना और भगवान्‌का मायामोहको प्रकट करना

श्रीपराशर उवाच
इत्याह भगवानौर्वस्सगराय महात्मने।
सदाचारं पुरा सम्यङ् मैत्रेय परिपृच्छते ॥ १ ॥
मयाप्येतदशेषेण कथितं भवतो द्विज।
समुल्लङ्घ्य सदाचारं कश्चिन्नाप्नोति शोभनम् ॥ २ ॥

श्रीमैत्रेय उवाच
षण्ढापविद्धप्रमुखा विदिता भगवन्मया।
उदक्याद्याश्च मे सम्यङ् नग्नमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
को नग्नः किं समाचारो नग्नसंज्ञां नरो लभेत्।
नग्नस्वरूपमिच्छामि यथावत्कथितं त्वया।
श्रोतुं धर्मभृतां श्रेष्ठ न ह्यास्त्यविदितं तव ॥ ४ ॥

श्रीपराशर उवाच
ऋग्यजुस्सामसंज्ञेयं त्रयी वर्णावृतिर्द्विज।
एतामुज्झति यो मोहात्स नग्नः पातकी द्विजः ॥ ५ ॥
त्रयी समस्तवर्णानां द्विज संवरणं यतः।
नग्नो भवत्युज्झितायामतस्तस्यां न संशयः ॥ ६ ॥
इदं च श्रूयतामन्यद्गाङ्गेयाय महात्मने।
कथयामास धर्मज्ञो वसिष्ठोऽस्मत्पितामहः ॥ ७ ॥
मयापि तस्य गदतश्श्रुतमेतन्महात्मनः।
नग्नसम्बन्धि मैत्रेय यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥ ८ ॥
देवासुरमभूद्युद्धं दिव्यमब्दशतं पुरा।
तस्मिन्पराजिता देवा दैत्यैर्ह्लादपुरोगमैः ॥ ९ ॥
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं गत्वातप्यन्त वै तपः।
विष्णोराराधनार्थाय जगुश्चेमं स्तवं तदा ॥ १० ॥


श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! पूर्वकालमें महात्मा सगरसे उनके पूछनेपर भगवान् और्वने इस प्रकार गृहस्थके सदाचारका निरूपण किया था ॥ १ ॥ हे द्विज! मैंने भी तुमसे इसका पूर्णतया वर्णन कर दिया। कोई भी पुरुष सदाचारका उल्लंघन करके सद्गति नहीं पा सकता ॥ २ ॥

श्रीमैत्रेयजी बोले— भगवन्! नपुंसक, अपविद्ध और रजस्वला आदिको तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ [किन्तु यह नहीं जानता कि 'नग्न' किसको कहते हैं]। अतः इस समय मैं नग्नके विषयमें जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ नग्न कौन है? और किस प्रकारके आचरणवाला पुरुष नग्न संज्ञा प्राप्त करता है? हे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! मैं आपके द्वारा नग्नके स्वरूपका यथावत् वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आपको कोई भी बात अविदित नहीं है ॥ ४ ॥

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! ऋक्, साम और यजुः यह वेदत्रयी वर्णोंका आवरणस्वरूप है। जो पुरुष मोहसे इसका त्याग कर देता है वह पापी 'नग्न' कहलाता है ॥ ५ ॥ हे ब्रह्मन्! समस्त वर्णोंका संवरण (ढँकनेवाला वस्त्र) वेदत्रयी ही है; इसलिये उसका त्याग कर देनेपर पुरुष 'नग्न' हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६ ॥ हमारे पितामह धर्मज्ञ वसिष्ठजीने इस विषयमें महात्मा भीष्मजीसे जो कुछ कहा था वह श्रवण करो ॥ ७ ॥ हे मैत्रेय! तुमने जो मुझसे नग्नके विषयमें पूछा है, इस सम्बन्धमें भीष्मके प्रति वर्णन करते समय मैंने भी महात्मा वसिष्ठजीका कथन सुना था ॥ ८ ॥

पूर्वकालमें किसी समय सौ दिव्यवर्षतक देवता और असुरोंका परस्पर युद्ध हुआ। उसमें ह्राद प्रभृति दैत्योंद्वारा देवगण पराजित हुए ॥ ९ ॥ अतः देवगणने क्षीरसागरके उत्तरीय तटपर जाकर तपस्या की और भगवान् विष्णुकी आराधनाके लिये उस समय इस स्तवका गान किया ॥ १० ॥

२२२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १७

देवा ऊचुः

आराधनाय लोकानां विष्णोरीशस्य यां गिरम्।
वक्ष्यामो भगवानाद्यस्तया विष्णुः प्रसीदतु ॥ ११

यतो भूतान्यशेषाणि प्रसूतानि महात्मनः।
यस्मिंश्च लयमेष्यन्ति कस्तं स्तोतुमिहेश्वरः ॥ १२

तथाप्यरातिविध्वंसध्वस्तवीर्या भयार्थिनः।
त्वां स्तोष्यामस्तवोक्तीनां याथार्थ्यं नैव गोचरे ॥ १३

त्वमुर्वी सलिलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।
समस्तमन्तःकरणं प्रधानं तत्परः पुमान् ॥ १४

एकं तवैतद्भूतात्मन्मूर्त्तामूर्त्तमयं वपुः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं स्थानकालविभेदवत् ॥ १५

तत्रेश तव यत्पूर्वं त्वन्नाभिकमलोद्भवम्।
रूपं विश्वोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६

शक्रार्करुद्रवस्वश्विमरुत्सोमादिभेदवत् ।
वयमेकं स्वरूपं ते तस्मै देवात्मने नमः ॥ १७

दम्भप्रायमसम्बोधि तितिक्षादमवर्जितम्।
यद्रूपं तव गोविन्द तस्मै दैत्यात्मने नमः ॥ १८

नातिज्ञानवहा यस्मिन्नाड्यः स्तिमिततेजसि।
शब्दादिलोभि यत्तस्मै तुभ्यं यक्षात्मने नमः ॥ १९

क्रौर्यमायामयं घोरं यच्च रूपं तवासितम्।
निशाचरात्मने तस्मै नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ २०

स्वर्गस्थधर्मिसद्धर्मफलोपकरणं तव।
धर्माख्यं च तथा रूपं नमस्तस्मै जनार्दन ॥ २१

हर्षप्रायमसंसर्गी गतिमद्गमनादिषु।
सिद्धाख्यं तव यद्रूपं तस्मै सिद्धात्मने नमः ॥ २२

अतितिक्षायनं क्रूरमुपभोगसहं हरे।
द्विजिह्वं तव यद्रूपं तस्मै नागात्मने नमः ॥ २३

अवबोधि च यच्छान्तमदोषमपकल्मषम्।
ऋषिरूपात्मने तस्मै विष्णो रूपाय ते नमः ॥ २४

भक्षयत्यथ कल्पान्ते भूतानि यदवारितम्।
त्वद्रूपं पुण्डरीकाक्ष तस्मै कालात्मने नमः ॥ २५


देवगण बोले— हमलोग लोकनाथ भगवान् विष्णुकी आराधनाके लिये जिस वाणीका उच्चारण करते हैं, उससे वे आद्य-पुरुष श्रीविष्णुभगवान् प्रसन्न हों ॥ ११ ॥ जिन परमात्मासे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न हुए हैं और जिनमें वे सब अन्तमें लीन हो जायँगे, संसारमें उनकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है ? ॥ १२ ॥ हे प्रभो ! यद्यपि आपका यथार्थ स्वरूप वाणीका विषय नहीं है तो भी शत्रुओंके हाथसे विध्वस्त होकर पराक्रमहीन हो जानेके कारण हम अभय-प्राप्तिके लिये आपकी स्तुति करते हैं ॥ १३ ॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अन्तःकरण, मूल-प्रकृति और प्रकृतिसे परे पुरुष—ये सब आप ही हैं ॥ १४ ॥ हे सर्वभूतात्मन् ! ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त स्थान और कालादि भेदयुक्त यह मूर्त्तामूर्त्त पदार्थमय सम्पूर्ण प्रपंच आपहीका शरीर है ॥ १५ ॥ आपके नाभि-कमलसे विश्वके उपकारार्थ प्रकट हुआ जो आपका प्रथम रूप है, हे ईश्वर ! उस ब्रह्मस्वरूपको नमस्कार है ॥ १६ ॥ इन्द्र, सूर्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण और सोम आदि भेदयुक्त हमलोग भी आपहीका एक रूप हैं; अतः आपके उस देवरूपको नमस्कार है ॥ १७ ॥ हे गोविन्द ! जो दम्भमयी, अज्ञानमयी तथा तितिक्षा और दम्भसे शून्य है, आपकी उस दैत्य-मूर्तिको नमस्कार है ॥ १८ ॥ जिस मन्दसत्त्व स्वरूपमें हृदयकी नाड़ियाँ अत्यन्त ज्ञानवाहिनी नहीं होतीं तथा जो शब्दादि विषयोंका लोभी होता है, आपके उस यक्षरूपको नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आपका जो क्रूरता और मायासे युक्त घोर तमोमय रूप है, उस राक्षसस्वरूपको नमस्कार है ॥ २० ॥ हे जनार्दन ! जो स्वर्गमें रहनेवाले धार्मिक जनोंके यागादि सद्धर्मोंके फल (सुखादि)-की प्राप्ति करानेवाला आपका धर्म नामक रूप है उसे नमस्कार है ॥ २१ ॥ जो जल-अग्नि आदि गमनीय स्थानोंमें जाकर भी सर्वदा निर्लिप्त और प्रसन्नतामय रहता है वह सिद्ध नामक रूप आपहीका है; ऐसे सिद्धस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥ हे हरे ! जो अक्षमाका आश्रय अत्यन्त क्रूर और कामोपभोगमें समर्थ आपका द्विजिह्व (दो जीभवाला) रूप है, उन नागस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥ हे विष्णो ! जो ज्ञानमय, शान्त, दोषरहित और कल्मषहीन है, उस आपके मुनिमय स्वरूपको नमस्कार है ॥ २४ ॥ जो कल्पान्तमें अनिवार्यरूपसे समस्त भूतोंका भक्षण कर जाता है, हे पुण्डरीकाक्ष ! आपके उस कालस्वरूपको नमस्कार है ॥ २५ ॥

अ० १७ ] * तृतीय अंश * २२३

सम्भक्ष्य सर्वभूतानि देवादीन्यविशेषतः।<br>नृत्यत्यन्ते च यद्रूपं तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥ २६जो प्रलयकालमें देवता आदि समस्त प्राणियोंको सामान्य भावसे भक्षण करके नृत्य करता है आपके उस रुद्रस्वरूपको नमस्कार है॥ २६॥
प्रवृत्त्या रजसो यच्च कर्मणां करणात्मकम्।<br>जनार्दन नमस्तस्मै त्वद्रूपाय नरात्मने ॥ २७रजोगुणकी प्रवृत्तिके कारण जो कर्मोंका करणरूप है, हे जनार्दन ! आपके उस मनुष्यात्मक स्वरूपको नमस्कार है॥ २७॥
अष्टाविंशद्वधोपेतं यद्रूपं तामसं तव।<br>उन्मार्गगामि सर्वात्मंस्तस्मै वश्यात्मने नमः ॥ २८हे सर्वात्मन् ! जो अट्ठाईस वध-युक्त* तमोमय और उन्मार्गगामी है आपके उस पशुरूपको नमस्कार है॥ २८॥
यज्ञाङ्गभूतं यद्रूपं जगतः स्थितिसाधनम्।<br>वृक्षादिभेदैष्षड्भेदै तस्मै मुख्यात्मने नमः ॥ २९जो जगत्की स्थितिका साधन और यज्ञका अंगभूत है तथा वृक्ष, लता, गुल्म, वीरुध, तृण और गिरि—इन छः भेदोंसे युक्त हैं उन मुख्य (उद्भिद्)-रूप आपको नमस्कार है॥ २९॥
तिर्यङ्मनुष्यदेवादि व्योमशब्दादिकं च यत्।<br>रूपं तवादेः सर्वस्य तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ३०तिर्यक्, मनुष्य तथा देवता आदि प्राणी, आकाशादि पंचभूत और शब्दादि उनके गुण—ये सब, सबके आदिभूत आपहीके रूप हैं; अतः आप सर्वात्माको नमस्कार है॥ ३०॥
प्रधानबुद्ध्यादिमयादशेषा-<br>$\quad$द्यदन्यदस्मात्परमं परात्मन्।<br>रूपं तवाद्यं यदनन्यतुल्यं<br>$\quad$तस्मै नमः कारणकारणाय ॥ ३१हे परमात्मन्! प्रधान और महत्तत्वादिरूप इस सम्पूर्ण जगत्‌से जो परे है, सबका आदि कारण है तथा जिसके समान कोई अन्य रूप नहीं है, आपके उस प्रकृति आदि कारणोंके भी कारण रूपको नमस्कार है॥ ३१॥
शुक्लादिदीर्घादिघनादिहीन-<br>$\quad$मगोचरं यच्च विशेषणानाम्।<br>शुद्धातिशुद्धं परमर्षिदृश्यं<br>$\quad$रूपाय तस्मै भगवन्नताः स्मः ॥ ३२हे भगवन्! जो शुक्लादि रूपसे, दीर्घता आदि परिमाणसे तथा घनता आदि गुणोंसे रहित है, इस प्रकार जो समस्त विशेषणोंका अविषय है, तथा परमर्षियोंका दर्शनीय एवं शुद्धातिशुद्ध है, आपके उस स्वरूपको हम नमस्कार करते हैं॥ ३२॥
यन्नः शरीरेषु यदन्यदेहे-<br>$\quad$ष्वशेषवस्तुष्वजमक्षयं यत्।<br>तस्माच्च नान्यद्व्यतिरिक्तम्स्ति<br>$\quad$ब्रह्मस्वरूपाय नताः स्म तस्मै ॥ ३३जो हमारे शरीरोंमें, अन्य प्राणियोंके शरीरोंमें तथा समस्त वस्तुओंमें वर्तमान है, अजन्मा और अविनाशी है तथा जिससे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है, उस ब्रह्मस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं॥ ३३॥
सकलमिदमजस्य यस्य रूपं<br>$\quad$परमपदात्मवतस्सनातन्स्य ।<br>तमनिधनमशेषबीजभूतं<br>$\quad$प्रभुममलं प्रणतास्म वासुदेवम् ॥ ३४परम पद ब्रह्म ही जिनका आत्मा है ऐसे जिस सनातन और अजन्मा भगवान्‌का यह सकल प्रपंच रूप है, उस सबके बीजभूत, अविनाशी और निर्मल प्रभु वासुदेवको हम नमस्कार करते हैं॥ ३४॥

श्रीपराशर उवाच

स्तोत्रस्य चावसाने ते ददृशुः परमेश्वरम्।<br>शङ्खचक्रगदापाणिं गरुडस्थं सुरा हरिम्॥ ३५**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! स्तोत्रके समाप्त हो जानेपर देवताओोंने परमात्मा श्रीहरिको हाथमें शंख, चक्र और गदा लिये तथा गरुडपर आरूढ़ हुए अपने सम्मुख विराजमान देखा॥ ३५॥

* ग्यारह इन्द्रिय-वध, नौ तुष्टि-वध और आठ सिद्धि-वध—ये कुल अट्ठाईस वध हैं। इनका प्रथमांश पञ्चमाध्याय श्लोक दसकी टिप्पणीमें विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

२२४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८


तमूचुस्सकला देवाः प्रणिपातपुरस्सरम्।
प्रसीद नाथ दैत्येभ्यस्त्राहि नश्शरणाथिनः॥ ३६
त्रैलोक्ययज्ञभागाश्च दैत्यैर्ह्लादपुरोगमैः।
हृता नो ब्रह्मणोऽप्याज्ञामुल्लङ्घ्य परमेश्वर॥ ३७
यद्यप्यशेषभूतस्य वयं ते च तवांशजाः।
तथाप्यविद्याभेदेन भिन्नं पश्यामहे जगत्॥ ३८
स्ववर्णधर्माभिरता वेदमार्गानुसारिणः।
न शक्यास्तेऽरयो हन्तुमस्माभिस्तपसावृताः॥ ३९
तमुपायमशेषात्मन्नस्माकं दातुमर्हसि।
येन तानसुरान्हन्तुं भवेम भगवन्क्षमाः॥ ४०

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तो भगवांस्तेभ्यो मायामोहं शरीरतः।
समुत्पाद्य ददौ विष्णुः प्राह चेदं सुरोत्तमान्॥ ४१
मायामोहोऽयमखिलान्दैत्यांस्तान्मोहयिष्यति।
ततो वध्या भविष्यन्ति वेदमार्गबहिष्कृताः॥ ४२
स्थितौ स्थितस्य मे वध्या यावन्तः परिपन्थिनः।
ब्रह्मणो ह्यधिकारस्य देवदैत्यादिकाः सुराः॥ ४३
तद्गच्छत न भीः कार्या मायामोहोऽयमग्रतः।
गच्छन्नद्योपकाराय भवतां भविता सुराः॥ ४४

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ताः प्रणिपत्यैनं ययुर्देवा यथागतम्।
मायामोहोऽपि तैस्सार्द्धं ययौ यत्र महासुराः॥ ४५

उन्हें देखकर समस्त देवताओंने प्रणाम करनेके अनन्तर उनसे कहा—“हे नाथ! प्रसन्न होइये और हम शरणागतोंकी दैत्योंसे रक्षा कीजिये॥ ३६॥ हे परमेश्वर! ह्लाद प्रभृति दैत्यगणने ब्रह्माजीकी आज्ञाका भी उल्लंघन कर हमारे और त्रिलोकीके यज्ञभागोंका अपहरण कर लिया है॥ ३७॥ यद्यपि हम और वे सर्वभूत आपके अंशज हैं तथापि अविद्यावश हम जगत्को परस्पर भिन्न-भिन्न देखते हैं॥ ३८॥ हमारे शत्रुगण अपने वर्णधर्मका पालन करनेवाले, वेदमार्गावलम्बी और तपोनिष्ठ हैं, अतः वे हमसे नहीं मारे जा सकते॥ ३९॥ अतः हे सर्वात्मन्! जिससे हम उन असुरोंका वध करनेमें समर्थ हों ऐसा कोई उपाय आप हमें बतलाइये”॥ ४०॥

**श्रीपराशरजी बोले—**उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने अपने शरीरसे मायामोहको उत्पन्न किया और उसे देवताओंको देकर कहा—॥ ४१॥ “यह मायामोह उन सम्पूर्ण दैत्यगणको मोहित कर देगा, तब वे वेदमार्गका उल्लंघन करनेसे तुमलोगोंसे मारे जा सकेंगे॥ ४२॥ हे देवगण! जो कोई देवता अथवा दैत्य ब्रह्माजीके कार्यमें बाधा डालते हैं वे सृष्टिकी रक्षामें तत्पर मेरे वध्य होते हैं॥ ४३॥ अतः हे देवगण! अब तुम जाओ, डरो मत। यह मायामोह आगेसे जाकर तुम्हारा उपकार करेगा”॥ ४४॥

**श्रीपराशरजी बोले—**भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर देवगण उन्हें प्रणाम कर जहाँसे आये थे वहाँ चले गये, तथा उनके साथ मायामोह भी जहाँ असुरगण थे वहाँ गया॥ ४५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥


अठारहवाँ अध्याय

मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा

श्रीपराशर उवाच
तपस्यभिरतान्सोऽथ मायामोहो महासुरान्।
मैत्रेय ददृशे गत्वा नर्मदातीरसंश्रितान्॥ १
ततो दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपिच्छधरो द्विज।
मायामोहोऽसुरान् श्लक्ष्णमिदं वचनमब्रवीत्॥ २

**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! तदनन्तर मायामोहने [देवताओंके साथ] जाकर देखा कि असुरगण नर्मदाके तटपर तपस्यामें लगे हुए हैं॥ १॥ तब उस मयूरपिच्छधारी दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोहने असुरोंसे अति मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा॥ २॥

अ० १८ ] * तृतीय अंश * २२५


मायामोह उवाच
हे दैत्यपतयो ब्रूत यदर्थं तप्यते तपः।
ऐहिकं वाथ पारत्र्यं तपसः फलमिच्छथ ॥ ३

असुरा ऊचुः
पारत्र्यफललाभाय तपश्चर्या महामते।
अस्माभिरियमारब्धा किं वा तेऽत्र विवक्षितम्॥ ४

मायामोह उवाच
कुरुध्वं मम वाक्यानि यदि मुक्तिमभीप्सथ।
अर्हध्वमेनं धर्मं च मुक्तिद्वारमंसंवृतम् ॥ ५
धर्मो विमुक्तेर्होऽयं नैतस्मादपरो वरः।
अत्रैव संस्थिताः स्वर्गं विमुक्तिं वा गमिष्यथ ॥ ६
अर्हध्वं धर्ममेतं च सर्वे यूयं महाबलाः ॥ ७

श्रीपराशर उवाच
एवं प्रकारैर्बहुभिर्युक्तिदर्शनचर्चितैः ।
मायामोहेन ते दैत्या वेदमार्गादपाकृताः ॥ ८
धर्मार्यैतदधर्मार्यं सदेतन्न सदित्यपि।
विमुक्तये त्विदं नैतद्विमुक्तिं सम्प्रयच्छति ॥ ९
परमार्थोऽयमत्यर्थं परमार्थो न चाप्ययम्।
कार्यमेतदकार्यं च नैतदेवं स्फुटं त्विदम्॥ १०
दिग्वाससामयं धर्मो धर्मोऽयं बहुवाससाम् ॥ ११
इत्यनेकान्तवादं च मायामोहेन नैकधा।
तेन दर्शयता दैत्यास्स्वधर्मं त्याजिता द्विज ॥ १२
अर्हतैतं महाधर्मं मायामोहेन ते यतः।
प्रोक्तास्तमाश्रिता धर्ममार्हतास्तेन तेऽभवन् ॥ १३
त्रयीधर्मसमुत्सर्गं मायामोहेन तेऽसुराः।
कारितास्तन्मया ह्यासंस्ततोऽन्ये तत्रचोदिताः ॥ १४
तैरप्यन्ये परे तैश्च तैरप्यन्ये परे च तैः।
अल्पैरहोभिस्सन्न्यक्ता तैर्दैत्यैः प्रायशस्त्रयी ॥ १५
पुनश्च रक्ताम्बरधृङ् मायामोहो जितेन्द्रियः।
अन्यानाहासुरान् गत्वा मृद्वल्पमधुराक्षरम्॥ १६
स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा निर्वाणार्थमथासुराः।
तदलं पशुघातादिदुष्टधर्मैर्निबोधत ॥ १७


मायामोह बोला— हे दैत्यपतिगण! कहिये, आपलोग किस उद्देश्यसे तपस्या कर रहे हैं, आपको किसी लौकिक फलकी इच्छा है या पारलौकिक की ?॥ ३॥

असुरगण बोले— हे महामते! हमलोगोंने पारलौकिक फलकी कामनासे तपस्या आरम्भ की है। इस विषयमें तुमको हमसे क्या कहना है?॥ ४॥

मायामोह बोला— यदि आपलोगोंको मुक्तिकी इच्छा है तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो। आपलोग मुक्तिके खुले द्वाररूप इस धर्मका आदर कीजिये ॥ ५॥ यह धर्म मुक्तिमें परमोपयोगी है। इससे श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नहीं है। इसका अनुष्ठान करनेसे आपलोग स्वर्ग अथवा मुक्ति जिसकी कामना करेंगे प्राप्त कर लेंगे। आप सब लोग महाबलवान् हैं, अतः इस धर्मका आदर कीजिये ॥ ६-७॥

श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार नाना प्रकारकी युक्तियोंसे अतिरंजित वाक्योंद्वारा मायामोहने दैत्यगणको वैदिक मार्गसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ८ ॥ 'यह धर्मयुक्त है और यह धर्मविरुद्ध है, यह सत् है और यह असत् है, यह मुक्तिकारक है और इससे मुक्ति नहीं होती, यह आत्यन्तिक परमार्थ है और यह परमार्थ नहीं है, यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है, यह ऐसा नहीं है और यह स्पष्ट ऐसा ही है, यह दिगम्बरोंका धर्म है और यह साम्बरोंका धर्म है'—हे द्विज ! ऐसे अनेक प्रकारके अनन्त वादोंको दिखलाकर मायामोहने उन दैत्योंको स्वधर्मसे च्युत कर दिया ॥ ९—१२॥ मायामोहने दैत्योंसे कहा था कि आपलोग इस महाधर्मको 'अर्हत' अर्थात् इसका आदर कीजिये। अतः उस धर्मका अवलम्बन करनेसे वे 'आर्हत' कहलाये ॥ १३॥

मायामोहने असुरगणको त्रयीधर्मसे विमुख कर दिया और वे मोहग्रस्त हो गये; तथा पीछे उन्होंने अन्य दैत्योंको भी इसी धर्ममें प्रवृत्त किया ॥ १४ ॥ उन्होंने दूसरे दैत्योंको, दूसरोंने तीसरोँको, तीसरोँने चौथोंको तथा उन्होंने औरोंको इसी धर्ममें प्रवृत्त किया। इस प्रकार थोड़े ही दिनोंमें दैत्यगणने वेदत्रयीका प्रायः त्याग कर दिया ॥ १५॥

तदनन्तर जितेन्द्रिय मायामोहने रक्तवस्त्र धारणकर अन्यान्य असुरोंके पास जा उनसे मृदु, अल्प और मधुर शब्दोंमें कहा— ॥ १६॥ “हे असुरगण! यदि तुमलोगोंको स्वर्ग अथवा मोक्षकी इच्छा है तो पशुहिंसा आदि दुष्टकर्मोंको त्यागकर बोध प्राप्त करो ॥ १७॥


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२२६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८


विज्ञानमयमेवैतदशेषमवगच्छत ।
बुध्यध्वं मे वचः सम्यग्बुधैरेवमिहोदितम् ॥ १८

जगदेतदनाधारं भ्रान्तिज्ञानार्थतत्परम् ।
रागादिदुष्टमत्यर्थं भ्राम्यते भवसंकटे ॥ १९

एवं बुध्यत बुध्यध्वं बुध्यतैवामितीरयन् ।
मायामोहः स दैतेयान्धर्ममत्याजयन्निजम् ॥ २०

नानाप्रकारवचनं स तेषां युक्तियोजितम् ।
तथा तथा त्रयीधर्मं तत्यजुस्ते यथा यथा ॥ २१

तेऽप्यन्येषां तथैवोचुस्तैरन्ये तथोदिताः ।
मैत्रेय तत्यजुर्धर्मं वेदस्मृत्युदितं परम् ॥ २२

अन्यानप्यन्यपाषण्डप्रकारैर्बहुभिर्द्विज ।
दैतेयान्मोहयामास मायामोहोऽतिमोहकृत् ॥ २३

स्वल्पेनैव हि कालेन मायामोहेन तेऽसुराः ।
मोहितास्तत्यजुस्सर्वां त्रयीमार्गाश्रितां कथाम् ॥ २४

केचिन्निन्दां वेदानां देवानाम्परे द्विज ।
यज्ञकर्मकलापस्य तथान्ये च द्विजन्मनाम् ॥ २५

नैतद्युक्तिसहं वाक्यं हिंसा धर्माय चेष्यते ।
हवींष्यनलदग्धानि फलायेत्यर्भकोदितम् ॥ २६

यज्ञैरनेकैर्देवत्वमवाप्येन्द्रेण भुज्यते ।
शम्यादि यदि चेत्काष्ठं तद्वरं पत्रभुक्पशुः ॥ २७

निहतस्य पशोर्यज्ञे स्वर्गप्राप्तिर्यदीष्यते ।
स्वपिता यजमानेन किन्नु तस्मान्न हन्यते ॥ २८

तृप्तये जायते पुंसो भुक्तमन्येन चेत्ततः ।
कुर्याच्छ्राद्धं श्रमायान्नं न वहेयुः प्रवासिनः ॥ २९

जनश्रद्धेयमित्येतदवगम्य ततोऽत्र वः ।
उपेक्षा श्रेयसे वाक्यं रोचतां यन्मयेरितम् ॥ ३०

न ह्याप्तवादा नभसो निपतन्ति महासुराः ।
युक्तिमद्वचनं ग्राह्यं मयान्यैश्च भवद्विधैः ॥ ३१


यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानमय है—ऐसा जानो। मेरे वाक्योंपर पूर्णतया ध्यान दो। इस विषयमें बुधजनोंका ऐसा ही मत है कि यह संसार अनाधार है, भ्रमजन्य पदार्थोंकी प्रतीतिपर ही स्थिर है तथा रागादि दोषोंसे दूषित है। इस संसारसंकटमें जीव अत्यन्त भटकता रहा है' ॥ १८-१९॥

इस प्रकार 'बुध्यत (जानो), बुध्यध्वं (समझो), बुध्यत (जानो)' आदि शब्दोंसे बुद्धधर्मका निर्देश कर मायामोहने दैत्योंसे उनका निजधर्म छुड़ा दिया ॥ २०॥ मायामोहने ऐसे नाना प्रकारके युक्तियुक्त वाक्य कहे जिससे उन दैत्यगणने त्रयीधर्मको त्याग दिया ॥ २१ ॥ उन दैत्यगणने अन्य दैत्योंसे तथा उन्होंने अन्यान्यसे ऐसे ही वाक्य कहे। हे मैत्रेय ! इस प्रकार उन्होंने श्रुतिस्मृतिविहित अपने परम धर्मको त्याग दिया ॥ २२॥ हे द्विज! मोहकारी मायामोहने और भी अनेकानेक दैत्योंको भिन्न-भिन्न प्रकारके विविध पाखण्डोंसे मोहित कर दिया ॥ २३॥ इस प्रकार थोड़े ही समयमें मायामोहके द्वारा मोहित होकर असुरगणने वैदिक धर्मकी बातचीत करना भी छोड़ दिया ॥ २४ ॥

हे द्विज! उनमेंसे कोई वेदोंकी, कोई देवताओंकी, कोई याज्ञिक कर्म-कलापोंकी तथा कोई ब्राह्मणोंकी निन्दा करने लगे ॥ २५॥ [वे कहने लगे—] 'हिंसासे भी धर्म होता है—यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है। अग्निमें हवि जलानेसे फल होगा—यह भी बच्चोंकी-सी बात है ॥ २६॥ अनेको यज्ञोंके द्वारा देवत्व लाभ करके यदि इन्द्रको शमी आदि काष्ठका ही भोजन करना पड़ता है तो इससे तो पत्ते खानेवाला पशु ही अच्छा है॥ २७॥ यदि यज्ञमें बलि किये गये पशुको स्वर्गकी प्राप्ति होती है तो यजमान अपने पिताको ही क्यों नहीं मार डालता ?॥ २८॥ यदि किसी अन्य पुरुषके भोजन करनेसे भी किसी पुरुषकी तृप्ति हो सकती है तो विदेशकी यात्राके समय खाद्यपदार्थ ले जानेका परिश्रम करनेकी क्या आवश्यकता है; पुत्रगण घरपर ही श्राद्ध कर दिया करें॥ २९॥ अतः यह समझकर कि 'यह (श्राद्धादि कर्मकाण्ड) लोगोंकी अन्ध-श्रद्धा ही है' इसके प्रति उपेक्षा करनी चाहिये और अपने श्रेयः साधनके लिये जो कुछ मैंने कहा है उसमें रुचि करनी चाहिये॥ ३०॥ हे असुरगण! श्रुति आदि आप्तवाक्य कुछ आकाशसे नहीं गिरा करते। हम, तुम और अन्य सबको भी युक्तियुक्त वाक्योंको ग्रहण कर लेना चाहिये' ॥ ३१ ॥

अ० १८ ] * तृतीय अंश * २२७


श्रीपराशर उवाच

मायामोहेन ते दैत्याः प्रकारैर्बहुभिस्तथा।
व्युत्थापिता यथा नैषां त्रयी कश्चिदरोचयत्॥ ३२
इत्थमुन्मार्गयातेषु तेषु दैत्येषु तेऽमराः।
उद्योगं परमं कृत्वा युद्धाय समुपस्थिताः॥ ३३
ततो दैवासुरं युद्धं पुनरेवाभवद् द्विज।
हताश्च तेऽसुरा देवैः सन्मार्गपरिपन्थिनः॥ ३४
स्वधर्मकवचं तेषामभूद्यत्प्रथमं द्विज।
तेन रक्षाभवत्पूर्वं नेशुर्नष्टे च तत्र ते॥ ३५
ततो मैत्रेय तन्मार्गवर्तिनो येऽभवञ्जनाः।
नग्नास्ते तैरैयतस्त्यक्तं त्रयीसंवरणं तथा॥ ३६
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थस्तथाश्रमी।
परिव्राड् वा चतुर्थोऽत्र पञ्चमो नोपपद्यते॥ ३७
यस्तु सन्त्यज्य गार्हस्थ्यं वानप्रस्थो न जायते।
परिव्राट् चापि मैत्रेय स नग्नः पापकृन्नरः॥ ३८
नित्यानां कर्मणां विप्र तस्य हानिरहर्निशम्।
अकुर्वन्विहितं कर्म शक्तः पतति तद्दिने॥ ३९
प्रायश्चित्तेन महता शुद्धिमाप्नोत्यनापदि।
पक्षं नित्यक्रियाहानेः कर्त्ता मैत्रेय मानवः॥ ४०
संवत्सरं क्रियाहानिर्यस्य पुंसोऽभिजायते।
तस्यावलोकनात्सूर्यो निरीक्ष्यस्साधुभिस्सदा॥ ४१
स्पृष्टे स्नानं सचैलस्य शुद्धेर्हेतुर्महामते।
पुंसो भवति तस्योक्ता न शुद्धिः पापकर्मणः॥ ४२
देवर्षिपितृभूतानि यस्य निःश्वस्य वेश्मनि।
प्रयान्त्यनर्चितान्यत्र लोके तस्मान्न पापकृत्॥ ४३
सम्भाषणाqueriesनुप्रश्नादि सहास्यां चैव कुर्वतः।
जायते तुल्यता तस्य तेनैव द्विज वत्सरात्॥ ४४
देवाद्दिनिःश्वासहतं शरीरं यस्य वेश्म च।
न तेन संकरं कुर्याद् गृहासनपरिच्छदैः॥ ४५
अथ भुङ्क्ते गृहे तस्य करोत्यास्यां तथासने।
शेते चाप्येकशयने स सद्यस्तत्समो भवेत्॥ ४६


श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार अनेक युक्तियोंसे मायामोहने दैत्योंको विचलित कर दिया जिससे उनमेंसे किसीकी भी वेदत्रयीमें रुचि नहीं रही॥ ३२॥ इस प्रकार दैत्योंके विपरीत मार्गमें प्रवृत्त हो जानेपर देवगण खूब तैयारी करके उनके पास युद्धके लिये उपस्थित हुए॥ ३३॥

हे द्विज! तब देवता और असुरोंमें पुनः संग्राम छिड़ा। उसमें सन्मार्गविरोधी दैत्यगण देवताओंद्वारा मारे गये॥ ३४॥ हे द्विज! पहले दैत्योंके पास जो स्वधर्मरूप कवच था उसीसे उनकी रक्षा हुई थी। अबकी बार उसके नष्ट हो जानेसे वे भी नष्ट हो गये॥ ३५॥ हे मैत्रेय! उस समयसे जो लोग मायामोहद्वारा प्रवर्तित मार्गका अवलम्बन करनेवाले हुए; वे 'नग्न' कहलाये क्योंकि उन्होंने वेदत्रयीरूप वस्त्रको त्याग दिया था॥ ३६॥

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—ये चार ही आश्रमी हैं। इनके अतिरिक्त पाँचवाँ आश्रमी और कोई नहीं है॥ ३७॥ हे मैत्रेय! जो पुरुष गृहस्थाश्रमको छोड़नेके अनन्तर वानप्रस्थ या संन्यासी नहीं होता वह पापी भी नग्न ही है॥ ३८॥

हे विप्र! सामर्थ्य रहते हुए भी जो विहित कर्म नहीं करता वह उसी दिन पतित हो जाता है और उस एक दिन-रातमें ही उसके सम्पूर्ण नित्यकर्मोंका क्षय हो जाता है॥ ३९॥ हे मैत्रेय! आपत्तिकालको छोड़कर और किसी समय एक पक्षतक नित्यकर्मका त्याग करनेवाला पुरुष महान् प्रायश्चित्तसे ही शुद्ध हो सकता है॥ ४०॥ जो पुरुष एक वर्षतक नित्य-क्रिया नहीं करता उसपर दृष्टि पड़ जानेसे साधु पुरुषको सदा सूर्यका दर्शन करना चाहिये॥ ४१॥ हे महामते! ऐसे पुरुषका स्पर्श होनेपर वस्त्रसहित स्नान करनेसे शुद्धि हो सकती है और उस पापात्माकी शुद्धि तो किसी भी प्रकार नहीं हो सकती॥ ४२॥

जिस मनुष्यके घरसे देवगण, ऋषिगण, पितृगण और भूतगण बिना पूजित हुए निःश्वास छोड़ते अन्यत्र चले जाते हैं, लोकमें उससे बढ़कर और कोई पापी नहीं है॥ ४३॥ हे द्विज! ऐसे पुरुषके साथ एक वर्षतक सम्भाषण, कुशलप्रश्न और उठने-बैठनेसे मनुष्य उसीके समान पापान्मा हो जाता है॥ ४४॥ जिसका शरीर अथवा गृह देवता आदिके निःश्वाससे निहत है उसके साथ अपने गृह, आसन और वस्त्र आदिको न मिलावे॥ ४५॥ जो पुरुष उसके घरमें भोजन करता है, उसका आसन ग्रहण करता है अथवा उसके साथ एक ही शय्यापर शयन करता है वह शीघ्र ही उसीके समान हो जाता है॥ ४६॥

२२८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १८

देवतापितृभूतानि तथानभ्यर्च्य योऽतिथीन्। भुङ्क्ते स पातकं भुङ्क्ते निष्कृतिस्तस्य नेष्यते॥ ४७ ब्राह्मणाद्यास्तु ये वर्णास्स्वधर्मादन्यतोमुखाः। यान्ति ते नग्नसंज्ञां तु हीनकर्मस्ववस्थिताः॥ ४८ चतुर्णां यत्र वर्णानां मैत्रेयात्यन्तसंकरः। तत्रास्या साधुवृत्तीनामुपघाताय जायते॥ ४९ अनभ्यर्च्य ऋषीन्देवान्पितॄन्भूतातिथींस्तथा। यो भुङ्क्ते तस्य संल्लापात्पतन्ति नरके नराः॥ ५० तस्मादेतान्नरो नग्नांस्त्रयीसन्त्यागदूषितान्। सर्वदा वर्जयेत्प्राज्ञ आलापस्पर्शनादिषु॥ ५१ श्रद्धावद्भिः कृतं यत्नाद्देवान्पितॄन्पितामहान्। न प्रीणयति तच्छ्राद्धं यद्येभिरवलोकितम्॥ ५२ श्रूयते च पुरा ख्यातो राजा शतधनुर्भुवि। पत्नी च शैव्या तस्याभूदतिधर्मपरायणा॥ ५३ पतिव्रता महाभागा सत्यशौचदयान्विता। सर्वलक्षणसम्पन्ना विनयेन नयेन च॥ ५४ स तु राजा तया सार्द्धं देवदेवं जनार्दनम्। आराधयामास विभुं परमेण समाधिना॥ ५५ होमैर्जपैस्तथा दानैरुपवासैश्च भक्तितः। पूजाभिश्चानुदिवसं तन्मना नान्यमानसः॥ ५६ एकदा तु समं स्नातौ तौ तु भार्यापती जले। भागीरथ्यास्समुत्तीर्णौ कार्त्तिक्यां समु Schneider षितौ। पाषण्डिनमपश्येतामायान्तं सम्मुखं द्विज॥ ५७ चापाचार्यस्य तस्यासौ सखा राज्ञो महात्मनः। अतस्तद्गौरवात्तेन सखाभावमथाकरोत्॥ ५८ न तु सा वाग्यता देवी तस्य पत्नी पतिव्रता। उपोषितास्मीति रविं तस्मिन्दृष्टे ददर्श च॥ ५९ समागम्‍य यथान्यायं दम्पती तौ यथाविधि। विष्णोः पूजादिकं सर्वं कृतवन्तौ द्विजोत्तम॥ ६० कालेन गच्छता राजा ममरासौ सपत्नजित्। अन्वारुरोह तं देवी चितास्थं भूपतिं पतिम्॥ ६१

जो मनुष्य देवता, पितर, भूतगण और अतिथियोंका पूजन किये बिना स्वयं भोजन करता है वह पापमय भोजन करता है; उसकी शुभगति नहीं हो सकती॥ ४७॥ जो ब्राह्मणादि वर्ण स्वधर्मको छोड़कर परधर्ममें प्रवृत्त होते हैं अथवा हीनवृत्तिका अवलम्बन करते हैं वे 'नग्न' कहलाते हैं॥ ४८॥ हे मैत्रेय! जिस स्थानमें चारों वर्णोंका अत्यन्त मिश्रण हो उसमें रहनेसे पुरुषकी साधुवृत्तियोंका क्षय हो जाता है॥ ४९॥ जो पुरुष ऋषि, देव, पितृ, भूत और अतिथिगणका पूजन किये बिना भोजन करता है उससे सम्भाषण करनेसे भी लोग नरकमें पड़ते हैं॥ ५०॥ अतः वेदत्रयीके त्यागसे दूषित इन नग्नोंके साथ प्राज्ञपुरुष सर्वदा सम्भाषण और स्पर्श आदिका भी त्याग कर दे॥ ५१॥ यदि इनकी दृष्टि पड़ जाय तो श्रद्धावान् पुरुषोंका यत्नपूर्वक किया हुआ श्राद्ध देवता अथवा पितृ-पितामहगणकी तृप्ति नहीं करता॥ ५२॥ सुना जाता है, पूर्वकालमें पृथिवीतलपर शतधनु नामसे विख्यात एक राजा था। उसकी पत्नी शैव्या अत्यन्त धर्मपरायणा थी॥ ५३॥ वह महाभागा पतिव्रता, सत्य, शौच और दयासे युक्त तथा विनय और नीति आदि सम्पूर्ण सुलक्षणोंसे सम्पन्ना थी॥ ५४॥ उस महारानीके साथ राजा शतधनुने परम समाधिद्वारा सर्वव्यापक, देवदेव श्रीजनार्दनकी आराधना की॥ ५५॥ वे प्रतिदिन तन्मय होकर अनन्यभावसे होम, जप, दान, उपवास और पूजन आदिद्वारा भगवान्‌की भक्तिपूर्वक आराधना करने लगे॥ ५६॥ हे द्विज! एक दिन कार्त्तिकी पूर्णिमाको उपवास कर उन दोनों पति-पत्नियोंने श्रीगंगाजीमें एक साथ ही स्नान करनेके अनन्तर बाहर आनेपर एक पाखण्डीको सामने आता देखा॥ ५७॥ यह ब्राह्मण उस महात्मा राजाके धनुर्वेदाचार्यका मित्र था; अतः आचार्यके गौरववश राजाने भी उससे मित्रवत् व्यवहार किया॥ ५८॥ किन्तु उसकी पतिव्रता पत्नीने उसका कुछ भी आदर नहीं किया; वह मौन रही और यह सोचकर कि मैं उपोषिता (उपवासयुक्त) हूँ उसे देखकर सूर्यका दर्शन किया॥ ५९॥ हे द्विजोत्तम! फिर उन स्त्री-पुरुषोंने यथारीति आकर भगवान् विष्णुके पूजा आदिक सम्पूर्ण कर्म विधिपूर्वक किये॥ ६०॥ कालान्तरमें वह शत्रुजित् राजा मर गया। तब देवी शैव्याने भी चितारूढ़ महाराजका अनुगमन किया॥ ६१॥

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अ० १८ ]* तृतीय अंश *२२९

स तु तेनापचारेण श्वा जज्ञे वसुधाधिपः।
उपोषितेन पाषण्डसंल्लापो यत्कृतोऽभवत्॥ ६२
राजा शतधनुने उपवास-अवस्थामें पाखण्डीसे वार्तालाप किया था। अतः उस पापके कारण उसने कुत्तेका जन्म लिया॥ ६२॥ तथा वह शुभलक्षणा

सा तु जातिस्मरा जज्ञे काशीराजसुता शुभा।
सर्वविज्ञानसम्पूर्णा सर्वलक्षणपूजिता॥ ६३
काशीनरेशकी कन्या हुई, जो सब प्रकारके विज्ञानसे युक्त, सर्वलक्षणसम्पन्ना और जातिस्मरा (पूर्वजन्मका

तां पिता दातुकामोऽभूद्वराय विनिवारितः।
तयैव तन्व्या विरतो विवाहारम्भतो नृपः॥ ६४
वृत्तान्त जाननेवाली) थी॥ ६३॥ राजाने उसे किसी वरको देनेकी इच्छा की, किन्तु उस सुन्दरीके ही रोक देनेपर वह उसके विवाहादिसे उपरत हो गये॥ ६४॥

ततस्सा दिव्यया दृष्ट्या दृष्ट्वा श्वानं निजं पतिम्।
विदिशाख्यं पुरं गत्वा तदवस्थं ददर्श तम्॥ ६५
तब उसने दिव्य दृष्टिसे अपने पतिको श्वान हुआ जान विदिशा नामक नगरमें जाकर उसे वहाँ कुत्तेकी अवस्थामें देखा॥ ६५॥ अपने महाभाग पतिको

तं दृष्ट्वैव महाभागं श्वभूतं तु पतिं तदा।
ददौ तस्मै वराहारं सत्कारप्रवणं शुभा॥ ६६
श्वानरूपमें देखकर उस सुन्दरीने उसे सत्कारपूर्वक अति उत्तम भोजन कराया॥ ६६॥ उसके दिये हुए

भुञ्जन्दत्तं तया सोऽन्नमतिमृष्टमभीप्सितम्।
स्वजातिललितं कुर्वन्बहु चाटु चकार वै॥ ६७
उस अति मधुर और इच्छित अन्नको खाकर वह अपनी जातिके अनुकूल नाना प्रकारकी चाटुता प्रदर्शित करने लगा॥ ६७॥ उसके चाटुता करनेसे अत्यन्त

अतीव व्रीडिता बाला कुर्वता चाटु तेन सा।
प्रणामपूर्वमाहेदं दयितं तं कुयोनिजम्॥ ६८
संकुचित हो उस बालिकाने कुत्सित योनिमें उत्पन्न हुए उस अपने प्रियतमको प्रणाम कर उससे इस प्रकार कहा—॥ ६८॥ “महाराज! आप अपनी उस

स्मर्यतां तन्महाराज दाक्षिण्यललितं त्वया।
येन श्वयोनिमापन्नो मम चाटुकरो भवान्॥ ६९
उदारताका स्मरण कीजिये जिसके कारण आज आप श्वान-योनिको प्राप्त होकर मेरे चाटुकार हुए हैं॥ ६९॥

पाषण्डिनं समाभाष्य तीर्थस्नानादनन्तरम्।
प्राप्तोऽसि कुत्सितां योनिं किन्न स्मरसि तत्प्रभो॥ ७०
हे प्रभो! क्या आपको यह स्मरण नहीं है कि तीर्थस्नानके अनन्तर पाखण्डीसे वार्तालाप करनेके कारण ही आपको यह कुत्सित योनि मिली है?”॥ ७०॥

श्रीपराशर उवाच
श्रीपराशरजी बोले—

तयैवं स्मारिते तस्मिन्पूर्वजातिकृते तदा।
दध्यौ चिरमथावाप निर्वेदमतिदुर्लभम्॥ ७१
काशिराजसुताद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर उसने बहुत देरतक अपने पूर्वजन्मका चिन्तन किया। तब उसे अति दुर्लभ निर्वेद प्राप्त हुआ॥ ७१॥

निर्विण्णचित्तस्स ततो निर्गम्य नगराद्बहिः।
मरुत्प्रपतनं कृत्वा शार्गालीं योनिमागतः॥ ७२
उसने अति उदास चित्तसे नगरके बाहर आ प्राण त्याग दिये और फिर शृगाल-योनिमें जन्म लिया॥ ७२॥ तब

सापि द्वितीये सम्प्राप्ते वीक्ष्य दिव्येन चक्षुषा।
ज्ञात्वा शृगालं तं द्रष्टुं ययौ कोलाहलं गिरिम्॥ ७३
काशिराजकन्या दिव्य दृष्टिसे उसे दूसरे जन्ममें शृगाल हुआ जान उसे देखनेके लिये कोलाहल पर्वतपर गयी॥ ७३॥

तत्रापि दृष्ट्वा तं प्राह शार्गालीं योनिमागतम्।
भर्त्तारमपि चार्वङ्गी तनया पृथिवीक्षितः॥ ७४
वहाँ भी अपने पतिको शृगाल-योनिमें उत्पन्न हुआ देख वह सुन्दरी राजकन्या उससे बोली—॥ ७४॥ “हे राजेन्द्र!

अपि स्मरसि राजेन्द्र श्वयोनिस्थस्य यन्मया।
प्रोक्तं ते पूर्वचरितं पाषण्डालापसंश्रयम्॥ ७५
श्वान-योनिमें जन्म लेनेपर मैंने आपसे जो पाखण्डीसे वार्तालापविषयक पूर्वजन्मका वृत्तान्त कहा था क्या वह आपको स्मरण है?”॥ ७५॥ तब सत्यनिष्ठोंमें श्रेष्ठ राजा

पुनस्तयोक्तं स ज्ञात्वा सत्यं सत्यवतां वरः।
कानने स निराहारस्तत्याज स्वं कलेवरम्॥ ७६
शतधनुने उसके इस प्रकार कहनेपर सारा सत्य वृत्तान्त जानकर निराहार रह वनमें अपना शरीर छोड़ दिया॥ ७६॥