भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

अ० १५] * तृतीय अंश * २१७

योगिनो विविधै रूपैर्नराणामुपकारिणः । भ्रमन्ति पृथिवीमेतामविज्ञातस्वरूपिणः ॥ २४ तस्मादभ्यर्चयेत्प्राप्तं श्राद्धकालेऽतिथिं बुधः । श्राद्धक्रियाफलं हन्ति नरेन्द्र्रापूजितोऽतिथिः ॥ २५ जुहुयाद्व्यञ्जनक्षारवर्जमन्नं ततोऽनले। अनुज्ञातो द्विजैस्तैस्तु त्रिकृत्वः पुरुषर्षभ ॥ २६ अग्नये कव्यवाहाय स्वाहेत्यादौ नृपाहुतिः । सोमाय वै पितृमते दातव्या तदनन्तरम् ॥ २७ वैवस्वताय चैवान्या तृतीया दीयते ततः । हुतावशिष्टमल्पान्नं विप्रपात्रेषु निर्वपेत् ॥ २८ ततोऽन्नं मृष्टमत्यर्थमभीष्टमतिसंस्कृतम् । दत्त्वा जुषध्वमिच्छातो वाच्यमेतदनिष्ठुरम् ॥ २९ भोक्तव्यं तैश्च तच्चित्तैर्मौनिभिस्सुमुखैः सुखम्। अक्रुद्ध्यता चात्वरता देयं तेनापि भक्तितः ॥ ३० रक्षोघ्नमन्त्रपठनं भूमेरास्तरणं तिलैः । कृत्वा ध्येयास्स्वपितरस्त एव द्विजसत्तमाः ॥ ३१ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । मम तृप्तिं प्रयान्त्वद्य विप्रदेहेषु संस्थिताः ॥ ३२ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । मम तृप्तिं प्रयान्त्वद्य होमाप्यायितमूर्तयः ॥ ३३ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । तृप्तिं प्रयान्तु पिण्डेन मया दत्तेन भूतले ॥ ३४ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । तृप्तिं प्रयान्तु मे भक्त्या मयैतत्समुदाहृतम् ॥ ३५ मातामहस्तृप्तिमुपैतु तस्य तथा पिता तस्य पिता ततोऽन्यः । विश्वे च देवाः परमां प्रयान्तु तृप्तिं प्रणश्यन्तु च यातुधानाः ॥ ३६ यज्ञेश्वरो हव्यसमस्तकव्य- भोक्ताव्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र ।

अनेक अज्ञात-स्वरूप योगिगण मनुष्योंके कल्याणकी कामनासे नाना रूप धारणकर पृथिवीतलपर विचरते रहते हैं ॥ २४ ॥ अतः विज्ञ पुरुष श्राद्धकालमें आये हुए अतिथिका अवश्य सत्कार करे। हे नरेन्द्र! उस समय अतिथिका सत्कार न करनेसे वह श्राद्ध-क्रियाके सम्पूर्ण फलको नष्ट कर देता है ॥ २५ ॥

हे पुरुषश्रेष्ठ ! तदनन्तर उन ब्राह्मणोंकी आज्ञासे शाक और लवणहीन अन्नसे अग्निमें तीन बार आहुति दे ॥ २६ ॥ हे राजन् ! उनमेंसे 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे पहली आहुति, 'सोमाय पितृमते स्वाहा' इससे दूसरी और 'वैवस्वताय स्वाहा' इस मन्त्रसे तीसरी आहुति दे। तदनन्तर आहुतियोंसे बचे हुए अन्नको थोड़ा-थोड़ा सब ब्राह्मणोंके पात्रोंमें परोस दे ॥ २७-२८ ॥

फिर रुचिके अनुकूल अति संस्कारयुक्त मधुर अन्न सबको परोसे और अति मृदुल वाणीसे कहे कि 'आप भोजन कीजिये' ॥ २९ ॥ ब्राह्मणोंको भी तद्गतचित्त और मौन होकर प्रसन्नमुखसे सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये तथा यजमानको क्रोध और उतावलेपनको छोड़कर भक्तिपूर्वक परोसते रहना चाहिये ॥ ३० ॥ फिर 'रक्षोघ्न'* मन्त्रका पाठ कर श्राद्धभूमिपर तिल छिड़के तथा अपने पितृरूपसे उन द्विजश्रेष्ठोंका ही चिन्तन करे ॥ ३१ ॥ [ और कहे कि] 'इन ब्राह्मणोंके शरीरोंमें स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज तृप्ति लाभ करें ॥ ३२ ॥ होमद्वारा सबल होकर मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आज तृप्ति लाभ करें ॥ ३३ ॥ मैंने जो पृथिवीपर पिण्डदान किया है उससे मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह तृप्ति लाभ करें ॥ ३४ ॥ [ श्राद्धरूपसे कुछ भी निवेदन न कर सकनेके कारण] मैंने भक्तिपूर्वक जो कुछ कहा है उस मेरे भक्तिभावसे ही मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह तृप्ति लाभ करें ॥ ३५ ॥ मेरे मातामह (नाना), उनके पिता और उनके भी पिता तथा विश्वेदेवगण परम तृप्ति लाभ करें तथा समस्त राक्षसगण नष्ट हों ॥ ३६ ॥ यहाँ समस्त हव्य-कव्यके भोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् हरि विराजमान हैं,

* 'ॐ अपहता असुरा रक्षाँसि वेदिषदः' इत्यादि।